जिरह पढ़ें, आप अपनी लिपि में (Read JIRAH in your own script)

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जिरह करने की कोई उम्र नहीं होती। पर यह सच है कि जिरह करने से पैदा हुई बातों की उम्र बेहद लंबी होती है। इसलिए इस ब्लॉग पर आपका स्वागत है। आइए,शुरू करें जिरह।
'जिरह' की किसी पोस्ट पर कमेंट करने के लिए यहां रोमन में लिखें अपनी बात। स्पेसबार दबाते ही वह देवनागरी लिपि में तब्दील होती दिखेगी।

Wednesday, February 25, 2009

सोच समझ कर लिखें ब्लॉग में

जो लोग ब्लॉग को निजी डायरी मान बैठे हैं और इस नाते जो मन में आए यहां बुकड़ देते हैं; उन्हें दैनिक हिंदुस्तान में आज छपी यह खबर जरूर पढ़नी चाहिए। नई दिल्ली के विशेष संवाददाता के हवाले से यह खबर छापी गयी है। दैनिक हिंदुस्तान की इस खबर को साभार जिरह पर अपने ब्लॉगर साथियों के लिए पेश कर रहा हूं।

-अनुराग अन्वेषी


ब्लॉ
ग पर मनमर्जी की बकवास लिखने, भड़ास, कुंठाएं प्रकट करने और अपुष्ट आरोप लगाने वाले सावधान। यह मानहानि का अपराध हो सकता है जिसके लिए तीन साल की सजा तथा दो लाख रुपये का जुर्माना हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में ब्लॉग पर राजनीतिक पार्टी के खिलाफ अभियान चलाने वाले युवक को राहत देने से इनकार कर उसके खिलाफ दायर मानहानि की एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस केजी बालाकृष्णन और पी सथाशिवम की खंडपीठ ने करल के यवक की रिट याचिका खारिज करते हुए कहा कि इस बारे में कानून अपना काम करेगा। कोर्ट ने यह तर्क ठुकरा दिया कि ब्लॉग पर लिखे गये शब्द ब्लॉगर्स समुदाय के लिए ही थे, सार्वजिनक नहीं। इस संबंध में साइबर कानून के विशेषज्ञ पवन दुग्गल कहते हैं कि ब्लॉग लिखने वालों को अपनी सीमा में रहना चाहिए। ब्लॉग एक सार्वजनिक स्थल है जिस पर लिखी गई हर बात सार्वजनिक होती है। आईटी एक्ट में इसके दुरुपयोग पर रोक है। इस कानून में ब्लॉगर को 'इंटरमीडियरी सर्विस सोर्स' की श्रेणी में रका गया है जो साइट पर लिखी हर बात के लिए नेटवर्क सर्विस प्रोवाइडर की तरह जिम्मेदार होता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर आप किसी की मानहानि नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि ब्लॉग सार्वजनिक स्थल है इसलिए इसमें कही गई कोई भी बात आपराधिक और सिविल मानहानि का कारण बन सकती है। आपराधिक मामले में मानहानिकर्ता को तीन साल की सजा तथा दो लाख रुपये जुर्माना हो सकता है। युवक ने सीधे सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर की थी और कहा कि उसके खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द की जाए क्योंकि ब्लॉग पर पोस्ट किए गए कमेंट ब्लॉगर्स समुदाय के लिए थे, सार्वजनिक नहीं।

Wednesday, February 18, 2009

चलो, व्यूह रचें

मां की कविता प्रतीक्षा पढ़ते हुए ये बातें 26 दिसंबर 95 की रात लिखी थीं। प्रतीक्षा यहां पढ़ी जा सकती है।

निःशब्द
होकर बिखर जाना,
किसी ताजा खबर की आस में
सचमुच
बहुत बड़ी भ्रांति है
सच है
कि सपने प्यारे होते हैं
लेकिन
वासंती बयार के साथ
उन्हें उड़ा देना
ठीक वैसा ही है
कि हम विरोध करें
और हमारी तनी मुट्ठियां
हवा में आघात करें
इसलिए चलो
बाहर की उमस को बढ़ने से रोकें
और
फिर से
युद्ध के लिए एक व्यूह रचें।

Saturday, February 14, 2009

मां

मां की कविता 'गूलर के फूल' पढ़ते हुए 6 फरवरी 95 की रात 2 बजे मेरी प्रतिक्रिया यह थी। 'गूलर के फूल' 'चांदनी आग है' (मां की कविताओं का संग्रह) में शामिल है। कविता यहां पढ़ी जा सकती है।


गूलर के फूल
की तलाश में
तुम
बि-ख-र-ती गयी
और बुनती रही
हमारे लिए
बरगद-सी छांव

Wednesday, January 21, 2009

आग-राग

मां की कविता 'साक्षी' पढ़ते हुए 9 फरवरी 95 की रात यह कविता लिखी थी। 'साक्षी' चांदनी आग है संकलन में शामिल है। वह कविता यहां पढ़ी जा सकती है।

-अनुराग अन्वेषी





आग मेरे भीतर है।
राख मैं भी हुआ हूं।
पर आग,
किसी समझौते का नाम नहीं मित्र।
बल्कि आग होना नियति हो गयी।

जब सभी संभावनाएं
शेष हो जाएं,
तो आग साक्षी होती है,
हमारे उबलने की।
और हम लिख देते हैं,
उम्र की चट्टान पर
कई अक्षर।
इस उम्मीद में,
कि शायद कभी,
फिर कहीं पैदा हो
आग।

Friday, January 2, 2009

तय करें अपनी भूमिका

भाई से भड़वा

और
नेता से दलाल
होने का अहसास
जब पसरा हो
अपने आसपास
तो कहने की ज़रूरत नहीं
कि अंधेरा गहरा है
और
चुनौतियां ज़्यादा
इसलिए
अब बेहद जरूरी है
कि मूकदर्शक की भूमिका से
हम उबरें
और नये साल के सूरज के साथ
संघर्ष बन उभरें

Tuesday, December 23, 2008

मां की आखिरी शाम

मेरे लिए 1 दिसंबर 1994 की रात बेहद काली थी। इसी रात तकरीबन 10 बजे पराग भइया ने दिल्ली से फोन कर बताया कि मां की तबीयत बेहद खराब है, हमलोग कल उसे लेकर रांची आ रहे हैं। मैंने पूछा - प्लेन से या ट्रेन से। भइया का जवाब था - प्लेन से। उसके इस जवाब से मैं समझ गया कि 1 दिसंबर की शाम मां की जिंदगी की आखिरी शाम हो गई। बहरहाल, मैं उन यातनादायी दौर से फिर गुजरने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा, इसलिए इस चर्चा को यहीं पर रोक कर एक दूसरी बात कहूं।

मां की मौत के बाद उनकी एक कविता ने हमसबों का ध्यान अपनी ओर खींचा। यह कविता मां की कविताओं के दूसरे संकलन 'चांदनी आग है' में शामिल है। 'एक संदेश' नाम की इस छोटी-सी कविता में मां ने दिसंबरी शाम से आखिरी बार मिलने की बात कही है। वाकई, इस संयोग ने मुझे हैरत में डाल दिया।

आप भी पढ़ें मां की यह कविता :


एक संदेश

ओ दिसंबरी शाम।
आज तुमसे मिल लूं
विदा बेला में
अंतिम बार।
सच है,
बीता हुआ कोई क्षण
नहीं लौटता।
नहीं बांध सकती मैं
तुम्हारे पांव।
कोई नहीं रह सकता एक ठांव।

Monday, December 1, 2008

सलाम और लानत के मायने एक हो गये हैं क्या?

टीएस प्रमुख हेमंत करकरे, एसीपी अशोक काम्टे और एनकाउंटर स्पेशलिस्ट विजय सालस्कर वाकई शहीद हुए या अपनी लापरवाही की वजह से मारे गए? यह सवाल उठाते हुए यह ध्यान है कि इस वक्त यह सवाल बहाव के विपरीत तैरने की जोखिम उठाने जैसा है। पर वाकई यह सवाल जेहन में उठता है कॉन्स्टेबल अरुण जाधव के बयानों को पढ़ने के बाद। यह वही अरुण जाधव है जो जान बचाने के लिए लाश बना आतंकवादियों की उस गाड़ी में पड़ा रहा, जिसे पुलिसवालों को मार कर लूटा गया था।

जब किसी इलाके में आतंकवादी घूम रहे हों और यह जानने के बाद भी
विवेक आसरी की प्रतिक्रिया वाकई गौर करने लायक है, जो उन्होंने इस रूप में मुझ तक पहुंचाई हैं।
बातों के बाजारों में हम

कुछ बातें तो सीधी-सादी
कुछ बातें सरकारी हैं
बातों के बाजारों में
हम बातों व्यापारी हैं
मैं भी कहता तुम भी कहते
हर बात उछलती मंडी में
कुछ बातें तो जलती जाती
कुछ फुंक जाती हैं
ठंडी में कुछ बातें
सौगातें बनकर
स्याही में ढल में जाती हैं
कुछ बातें आंखों में चुभतीं
सवालात फरमाती हैं
कुछ बातें दिल को छू लेतीं
करामात कर जाती हैं
सौ बातों की एक बात
बाकी सब मारामारी है
बातों के बाजारों में हम
बातों के व्यापारी हैं
एनकाउंटर स्पेशलिस्ट कहलाने वाले सालस्कर की अंगुलियां पुलिस कैब की स्टियरिंग संभालने में जुटी हों, तो वे अंगुलियां हथियार कब चलाएंगी। जाहिर है ऐसे में सामने से चली दुश्मन की गोली जाया नहीं जाएगी। दुश्मन को वार करने का पूरा मौका मिलेगा। और आप अपनी रक्षा भी नहीं कर पाएंगे। यही हुआ इन सिपाहियों के साथ भी।

यह मुमकिन है कि इन्हें मामले की गंभीरता का अहसास न रहा हो। और शायद इसीलिए भी सालस्कर ड्राइविंग सीट पर बैठ गए कि साथ में काम्टे और करकरे तो हैं ही। बहरहाल, यह शहीद कहे जाने लायक मामला नहीं लगता। महज आतंकवादी कार्रवाई की चपेट में आकर मारे जाने का मामला है। अगर ये सभी पुलिसकर्मी शहीद कहे जाने लायक हैं, तब वीटी स्टेशन, ताज, ओबरॉय और नरीमन हाउस में मारे गये लोग शहीद क्यों न कहे जायें? और अगर ये सभी शहीद कहे गये तो एनएसजी के हवलदार गजेंद्र सिंह और मेजर संदीप उन्नीकृष्णन की शहादत को आप क्या कहेंगे? इनके लिए कोई और शब्द तलाशना पड़ेगा।

और अब बात उस सिपाही की, जिसने नौकरी तो की सिपाही की, पर सिपाही की भूमिका नहीं निभाई। लाश बन कर पड़ा रहा लूटी गई गाड़ी में। अरुण जाधव भले जान बच जाने की खुशी मना लें, पर क्या कभी वह खुद से आंख भी मिला पाएंगे? अरुण जाधव के दाहिने हाथ में दो गोलियां लगी थीं। उन्हीं के मुताबिक, उनका वह हाथ उठ नहीं रहा था। बेशक, ऐसा हुआ होगा। उन की ख्वाहिश थी कि काश उनका हाथ उनकी बंदूक तक पहुंच जाता।

ख्वाहिश का उनका यह बयान उनकी चुगली करता है। आम आदमी और पुलिस का जो सबसे बड़ा अंतर है वह है उसकी ट्रेनिंग का। पुलिस को मिलने वाली ट्रेनिंग ही उसे आम से खास बना देती है। पर लाश बनकर आतंकवादियों द्वारा लूटी गई गाड़ी में पड़े रहना पुलिस की निशानी नहीं हो सकती। कायरता या बदहवासी का यह आलम तो आम आदमी के हिस्से में होता है, पुलिस के नहीं।

जाधव ने मीडिया को बताया है कि जब गाड़ी का टायर बर्स्ट हो गया और आतंकवादी उस गाड़ी को छोड़ कर चले गए तो उन्होंने अगली सीट पर किसी तरह चढ़कर पुलिस रेडियो से बैकअप के लिए कॉल की। गौर करें कि जो शरीर बंदूक उठाने की इजाजत नहीं दे रहा था, वही मदद की गुहार लगाने के काम आ गया। दरअसल, उस वक्त का खौफ कुछ ऐसा रहा होगा कि उन्होंने बंदूक उठाने की जोखिम नहीं उठाई। आम आदमी की तरह जान है तो जहान है का फॉर्म्यूला अपनाया। लाश बन कर घूमते रहे। ऐसे सिपाही को सलाम और महिमामंडित कर रहे लोगों को मेरा सलाम (लानत)।

Tuesday, October 28, 2008

अंधेरा जब बढ़ता है


ओ साथी,
अपने भीतर जब अंधेरा बढ़ता है
वह अहं, राग और द्वेष का
किला गढ़ता है।
सच मानें
यही तो जड़ता है।
फिर भीतर ही भीतर
सारा कुछ सड़ता है
और आदमी
धीरे-धीरे मरता है।

हां साथी, इससे पहले
कि संवेदनाओं से लबरेज हमारा चेहरा
किसी भीड़ में गुम हो जाये,
और व्यवस्था को बदलने के लिए निकला जुलूस
किसी शवयात्रा में तब्दील हो
अपने भीतर
आस्था का दीया जलाएं।
इसकी टिमटिमाती लौ
खत्म कर देती है सारी आशंकाएं
हां साथी,
स्वीकार करें दीपावली पर
हमारी शुभाशंसाएं ।

Saturday, September 27, 2008

ईश्वर, जो हमें डराता है

मो

हल्ले पर आकांक्षा की कविता पढ़ी। उस तथाकथित ईश्वर के बारे में जिसे आज अगर याद किया जाता है तो शहर दंगाग्रस्त हो जाता है। जिसकी सारी सत्ता धर्म के ठीकेदारों ने बुनी है। ये ठीकेदार हर कौम में मौजूद हैं। और इसी सर्वशक्तिमान के बल पर इनकी दुकानदारी चल रही है। खैर, दुकानदारी का चलना और धर्मों की यह विकृति - ये तो अलग से बहस का मुद्दा हैं।

बहरहाल, सोचना चाहता हूं कि इस ईश्वर के प्रति हमारी आस्था का राज कहां छुपा है। लगता है जैसे यह आस्था बरसों पहले से हमारी रगो में दौड़ रही है। तब से, जब हमारे पूर्वज जंगलों में रहा करते थे। (हालांकि रहते तो हम आज भी जंगल में ही हैं)। तो जब वह जंगल में रहते होंगे, जाहिर तौर पर उनका जीवन उसी जंगल पर निर्भर था। वह जंगल जिससे उन्हें भोजन मिलता था, जिसके आश्रय में वह रहते थे। श्रद्धा से भर उठा होगा उनका मन उसकी शक्ति देखकर। वह उसकी इज्जत करने लगे होंगे। उन्हें लगने लगा होगा इन पेड़-पौधों, झरने-पहाड़ों से बेहतर और श्रेष्ठ दूसरा कुछ तो हो ही नहीं सकता। वह नतमस्तक हुए होंगे। जीवन सुख-शांति से गुजर रहा होगा। तभी जंगल में आग लगी। (यह आग वैसे नहीं लगी होगी जैसे आज अचानक पैसेंजर ट्रेन में लग जाती है या कोई कस्बा और शहर अचानक जलने लग जाता है)। बहरहाल जंगल में आग लगी और हमारे पूर्वजों ने देखा जंगल को धू-धू कर जलते हुए। वह जंगल जो उन्हें जिंदगी देता था अभी अपनी जिंदगी बचा पाने में नाकाम था। आग जलाए जा रही थी जंगल को। सिहर गए होंगे हमारे पूर्वज। डरे होंगे। डरकर नतमस्तक हुए होंगे। डरे-डरे भागते फिरे होंगे। तभी मौसम बदला। बरसात शुरू हुई। आग को उन्होंने मरते देखा। लगा, इस आग पर तो काबू पा लेती है बारिश। यह बारिश तो आग से भी ज्यादा शक्तिशाली है। पूजा होगा उन्होंने उस बारिश को। इस तरह कई-कई और परिघटनाएं हुईं होंगी और हमारे पूर्वज कई-कई बार नतमस्तक हुए होंगे ऐसे सर्वशक्तिमानों के प्रति।

तो इस तरह हमारे भीतर डर से पैदा हुई होगी श्रद्धा और हम सबकी सत्ता स्वीकार करते गए। फिर क्या था हममें से कुछ शातिर लोग हमारे इस डर का लाभ उठाने लगे। हमारे भीतर डर पैदा करते गए, हम डरकर उस नए पैदा हुए डर को स्वीकार करते गए। ईश्वर या वह अदृश्य शक्ति, जिसका राज हमें नहीं मालूम था, हम पर राज करने लगे। धर्म के ठीकेदारों के पौबारह हुए :-( और हम ब्लॉग लिखने बैठ गए। :-)

Tuesday, September 23, 2008

यह कैसा शख्स है मेरे यारो

खिले-खिले, पर घुटे-घुटे
तने-तने, पर झुके-झुके
मिले हुए, पर कटे-कटे
ये कैसे लोग हैं मेरे यारो

साफ-साफ, पर धुआं-धुआं
भेड़चाल और हुआं-हुआं
हंसी-हंसी में जलाभुना
यह कैसा वक्त है मेरे यारो

बहुत-बहुत, पर जरा-जरा
डरा-डरा, पर हरा-भरा
जगा-जगा, पर मरा-मरा
यह कैसा रूप है मेरे यारो

प्यार-प्यार में मारो-काटो
रौद्र रूप भी और तलवे चाटो
तारीफ के बजाए डांटो-डांटो
यह कैसा शख्स है मेरे यारो

चापलूसी में है सना-सना
जगह-जगह है, घना-घना
तू कर इसे अब मना-मना
यही है वक्त का तकाजा यारो

Monday, September 22, 2008

जिंदगी मांगती रही है हिसाब

उम्र के
इसी पड़ाव पर
जिंदगी पूछने लगी मुझसे,
सच-सच बता
मुझे आखिर तूने कितना जिया

जिंदगी जब
मांगने लगे,
हर किये-धरे का
ऐसे हिसाब
मै जानता हूं
सुख गुम होता है
दुख तो खैर बेहिसाब

अब
तू तो ये न पूछ मुझसे
कि दिल्ली आकर क्या किया
सचमुच यारो,
जीने की आदत छूट गई,
मरने का सलीका सीख लिया।

Sunday, September 21, 2008

पोस्ट के नेचर के मुताबिक लगाएं तस्वीर

किसी पोस्ट के साथ उस नेचर की तस्वीर हो, तो पोस्ट निखर आता है। यह तो सच है कि इनसान का पहला परिचय तस्वीर से होता है, न कि टेक्स्ट से। इसलिए भी तस्वीर को फीलर की तरह इस्तेमाल करने की बजाय उसे पोस्ट के जरूरी हिस्से की तरह इस्तेमाल करना चाहिए। कई साथियों ने मेल कर कहा था पोस्ट के बीच में तस्वीर लगाने का तरीका बताने को। तो ऐसे साथियों की फरमाइश पर ही पेश है आज का ब्लॉग बाइट। इस अंक को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Monday, September 15, 2008

हादसों में हमारा भी हाथ

"यह बात एक बार फिर साबित हुई कि 13 की संख्या कितनी अशुभ होती है। और उसपर दिन अगर शनिवार हो तो कहने ही क्या। करैला ऊपर से नीम चढ़ा। याद करें, वह 13 सितंबर, दिन शनिवार की ही शाम थी, जब दिल्ली में सीरियल धमाके हुए। 20 लोग मौत के हवाले हुए और तकरीबन 150 लोग भयंकर जख्मी।"

स तरह की कोई भी स्क्रिप्ट हमारे बीच राहत लेकर नहीं आती। बल्कि सच तो यह है कि ऐसा या इस जैसा कोई भी एक्स्प्रेशन वह काम करता है जो धमाके के जरिये आतंकवादी करना चाहते थे और नहीं कर सके। यानी, ऐसी स्क्रिप्ट से हम आतंकवादियों के अधूरे मिशन को उसकी मंजिल तक पहुंचाते हैं।

ऐसे मौकों पर एक्सक्लूसिव के नाम पर जो सनसनी पैदा की जाती है, सबसे तेज की दौड़ में जो हड़बड़ी दिखाई जाती है, वह लोगों का इत्मीनान छीन लेती है। ऐसी सनसनी की जगह सजगता पैदा करने की कोशिश हो, तो वाकई कोई बात बने।


हम जिस छोटी-सी पट्टी पर हेल्पलाइन नंबर चलाते हैं, सचमुच उसका दायरा बढ़ना चाहिए। और जितने बड़े दायरे में हंगामे को समेटते हैं उसे समेट कर पट्टी में लाने की जरूरत है। ऐसा नहीं कि घटनास्थल पर हमारे कैमरे न जाएं। हमारे रिपोर्टर वहां से रिपोर्टिंग न करें। बिल्कुल करें। घटनास्थल से रिपोर्टिंग कर वहां के बारे में बताना, बेशक बेहद जरूरी है। पर मीडिया को भाषा की उस शक्ति की भी समझ होनी चाहिए, जो किसी थके-हारे को शक्ति भी देती है।

फर्ज करें, आपके पड़ोसी के घर में किसी की असामयिक मौत हो गई। आप उसके घर जाते हैं तो इसलिए कि आपके भीतर उससे अपनत्व का कोई रिश्ता है। उसे आप सांत्वना देते हैं। सच बोलने के नाम पर यह नहीं कहते कि क्या यार, जिसे मरना था मर गया, अब कितनी देर तक टेसुए बहाएगा।

मतलब यह कि हम अपने समाज से अपनत्व का वह रिश्ता भूलते जा रहे हैं। भाषा की वह समझ खोते जा रहे हैं, जिससे कोहराम के समय भी राहत दी जा सकती है। अपने उस दायित्व को भी नजरअंदाज कर रहे हैं, जिसे निभाने से खौफ की उम्र बेहद छोटी हो जाती।

आइए, लिंक करें हर बात को

साथियो,
आपके कई पत्र हमें मिले थे, जिनमें कहा गया था कि पोस्ट के बीच लिंक लगाने का तरीका बतायें। पिछले अंक में हमने वह तरीका आपको बताया था, पर साथ ही यह भी चर्चा की थी कि यह तरीका भले आसान है पर है दोषपूर्ण। लिंक लगाने के उस तरीके में दोष यह है कि लिंक की गई साइट किसी नये विंडो में न खुलकर मौजूद विंडो को ही कन्वर्ट कर देती है। इस बार ब्लॉग बाइट में एचटीएमएल की वह कोडिंग दी है, जिसके सहारे दिया गया लिंक नये विंडो में खुलेगा। नवभारत टाइम्स में छपी इस ताज़ा किस्त के लिए यहां क्लिक करें

Sunday, September 7, 2008

अपनी पोस्ट के बीच ऐसे लगाएं लिंक

ब्लॉग बाइट की ताजा किस्त के साथ हाजिर हूं मेरे दोस्तो। वादे के मुताबिक इस बार चर्चा की गई है अपनी पोस्ट के बीच किसी संदर्भ के लिंक लगाने के तरीके की। तो देखें यह काम है कितना आसान।
नवभारत टाइम्स में छपी इस ताज़ा किस्त के लिए यहां क्लिक करें

Friday, September 5, 2008

क्या है श्लील और क्या है अश्लील

श्लील और अश्लील पर बहस कोई नई बात नहीं है। जरूरी नहीं कि जो चीज एक की निगाह में अश्लील हो, उसे दूसरा भी उसी रूप में देखे। अमूमन, नंगेपन को हम बड़ी आसानी से अश्लील कह जाते हैं। पर देखने की जरूरत यह है कि किसी का नंगापन उसकी कोई मजबूरी तो नहीं। इसके बाद ही हमें किसी निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए। कोई स्त्री या पुरुष अपने कमरे में नंगा लेटी है/लेटा है - हमें इसे अश्लील कहना चाहिए या उस निगाह को जिसने उसके कमरे में झांकने की कोशिश की?
- क्या चापलूसी करना अश्लील नहीं है?
- किसी गलत को सही कह उसे प्रोत्साहित करना अश्लील नहीं है?
- हम ग़ज़ल लिखें और शीर्षक दें गज़ल (गजल लिखें तब तो चलेगा), तो क्या यह अश्लील नहीं है?
.......
कहने का मतलब यह कि अगर हम छांट-छांट कर निकालें तो हमारे कदम-कदम पर अश्लीलता बिछी मिलेगी। और अगर ऐसा है और हम उसे आसानी से नजरअंदाज कर बर्दाश्त किये चले जाते हैं तो क्या यह अश्लील नहीं है?
साथियो, क्या सोचते हैं आप। क्या है श्लील और क्या है अश्लील? कृपया हमें बतायें।

Monday, September 1, 2008

झट से करें फॉन्ट का धर्मांतरण

क्रुति देव सरीखे फॉन्ट को यूनिकोड में कैसे बदलें - इस बार के ब्लॉग बाइट में इसी पर चर्चा है। वैसे, यूनिकोड फॉन्ट को भी दूसरे किसी फॉन्ट में कन्वर्ट किया जा सकता है - इसकी भी जानकारी जुटाई गई है इस बार। अगले अंक में पोस्ट के बीच लिंक लगाने की चर्चा करूंगा। इसके लिए एचटीएमएल कोड भी उपलब्ध कराया जायेगा, ताकि लिंक की गई साइट या ब्लॉग नये विंडो में खुले। नवभारत टाइम्स में छपी इस ताज़ा किस्त के लिए यहां क्लिक करें

Sunday, August 24, 2008

यूनिकोडेड फॉन्ट को सपोर्ट करते कुछ और कीबोर्ड

ब्लॉग बाइट की एक और किस्त के साथ मैं आपके लिए हाजिर हूं। इस बार के अंक में चर्चा की गई है हिंदी में कंपोजिंग के कुछ और कीबोर्ड की। विंडोजएक्सपी के साथ जो यूनिकोड फॉन्ट हमें मिलने लगा है उसके इस्तेमाल के लिए इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड का ऑप्शन तो होता ही है। पर हमारे कई साथी ऐसे भी हैं जो इन्स्क्रिप्ट कंपोजिंग नहीं जानते हैं। वे रेमिंग्टन या फिर किसी और कीबोर्ड का इस्तेमाल करना जानते हैं। इस किस्त में ऐसे साथियों के लिए उनकी सुविधा के कुछ कीबोर्ड के लिंक दिये गये हैं। अभी तक की योजना है कि अगली किस्त में फॉन्ट कन्वर्टर की चर्चा हो। नवभारत टाइम्स में छपी इस ताज़ा किस्त के लिए यहां क्लिक करें

Sunday, August 17, 2008

अपने ब्लॉग पर देखें दूसरों के ब्लॉग की लास्ट पोस्ट

कुछ ब्लॉगरों ने अपने ब्लॉग पर दूसरों के ब्लॉग की जो लिंक लगाई है, उसमें उस ब्लॉग की लास्ट पोस्ट दिखती है, साथ ही कितनी देर पहले पोस्ट की गई यह भी। यानी, यह जो सुविधा है वह आपको अप्रत्यक्ष तौर पर ब्लॉग एग्रिगेटर भी बना रही है। और सबसे रोचक बात यह कि ब्लॉग स्पॉट ने लिंक लगाने के इस तरीके के बेहद आसान बना दिया है। पहले जब आप लिंक लगाते थे तो लिंक नये विंडो में खुले इसके लिए HTML कोडिंग करनी पड़ती थी। इस बार ब्लॉगरों को इस झंझट से मुक्ति मिल गई है। लिंक लगाने की इस पूरी प्रक्रिया को ब्लॉग बाइट की इस नई किस्त में देखें। नवभारत टाइम्स में छपी इस ताज़ा किस्त के लिए यहां क्लिक करें

और हां, पिछली बार जिस इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड लेआउट की चर्चा मैंने की थी, उस की बोर्ड लेआउट का फोटो आप यहां से डाउनलोड कर सकते हैं।

Wednesday, August 13, 2008

बहुत दिनों बाद

किसी कविता को सुनाने या पढ़ाने से पहले उसके बारे में अगर कवि को अपनी ओर से कुछ कहने की जरूरत पड़े तो यह उस कविता का कमजोर पक्ष हो सकता है। जाहिर है इस कविता के बारे में मैं अपनी ओर से कुछ कहना नहीं चाहता। पर यह भरोसा है कि पाठकों की ओर से भी इस पर कई नई बातें आ सकती हैं। कुछ ऐसी बातें जिन पर संभवतः मेरी निगाह भी नहीं गई है। फिलहाल पेश है कविता 'बहुत दिनों बाद' :