जिरह पढ़ें, आप अपनी लिपि में (Read JIRAH in your own script)

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Monday, December 1, 2008

सलाम और लानत के मायने एक हो गये हैं क्या?

टीएस प्रमुख हेमंत करकरे, एसीपी अशोक काम्टे और एनकाउंटर स्पेशलिस्ट विजय सालस्कर वाकई शहीद हुए या अपनी लापरवाही की वजह से मारे गए? यह सवाल उठाते हुए यह ध्यान है कि इस वक्त यह सवाल बहाव के विपरीत तैरने की जोखिम उठाने जैसा है। पर वाकई यह सवाल जेहन में उठता है कॉन्स्टेबल अरुण जाधव के बयानों को पढ़ने के बाद। यह वही अरुण जाधव है जो जान बचाने के लिए लाश बना आतंकवादियों की उस गाड़ी में पड़ा रहा, जिसे पुलिसवालों को मार कर लूटा गया था।

जब किसी इलाके में आतंकवादी घूम रहे हों और यह जानने के बाद भी
विवेक आसरी की प्रतिक्रिया वाकई गौर करने लायक है, जो उन्होंने इस रूप में मुझ तक पहुंचाई हैं।
बातों के बाजारों में हम

कुछ बातें तो सीधी-सादी
कुछ बातें सरकारी हैं
बातों के बाजारों में
हम बातों व्यापारी हैं
मैं भी कहता तुम भी कहते
हर बात उछलती मंडी में
कुछ बातें तो जलती जाती
कुछ फुंक जाती हैं
ठंडी में कुछ बातें
सौगातें बनकर
स्याही में ढल में जाती हैं
कुछ बातें आंखों में चुभतीं
सवालात फरमाती हैं
कुछ बातें दिल को छू लेतीं
करामात कर जाती हैं
सौ बातों की एक बात
बाकी सब मारामारी है
बातों के बाजारों में हम
बातों के व्यापारी हैं
एनकाउंटर स्पेशलिस्ट कहलाने वाले सालस्कर की अंगुलियां पुलिस कैब की स्टियरिंग संभालने में जुटी हों, तो वे अंगुलियां हथियार कब चलाएंगी। जाहिर है ऐसे में सामने से चली दुश्मन की गोली जाया नहीं जाएगी। दुश्मन को वार करने का पूरा मौका मिलेगा। और आप अपनी रक्षा भी नहीं कर पाएंगे। यही हुआ इन सिपाहियों के साथ भी।

यह मुमकिन है कि इन्हें मामले की गंभीरता का अहसास न रहा हो। और शायद इसीलिए भी सालस्कर ड्राइविंग सीट पर बैठ गए कि साथ में काम्टे और करकरे तो हैं ही। बहरहाल, यह शहीद कहे जाने लायक मामला नहीं लगता। महज आतंकवादी कार्रवाई की चपेट में आकर मारे जाने का मामला है। अगर ये सभी पुलिसकर्मी शहीद कहे जाने लायक हैं, तब वीटी स्टेशन, ताज, ओबरॉय और नरीमन हाउस में मारे गये लोग शहीद क्यों न कहे जायें? और अगर ये सभी शहीद कहे गये तो एनएसजी के हवलदार गजेंद्र सिंह और मेजर संदीप उन्नीकृष्णन की शहादत को आप क्या कहेंगे? इनके लिए कोई और शब्द तलाशना पड़ेगा।

और अब बात उस सिपाही की, जिसने नौकरी तो की सिपाही की, पर सिपाही की भूमिका नहीं निभाई। लाश बन कर पड़ा रहा लूटी गई गाड़ी में। अरुण जाधव भले जान बच जाने की खुशी मना लें, पर क्या कभी वह खुद से आंख भी मिला पाएंगे? अरुण जाधव के दाहिने हाथ में दो गोलियां लगी थीं। उन्हीं के मुताबिक, उनका वह हाथ उठ नहीं रहा था। बेशक, ऐसा हुआ होगा। उन की ख्वाहिश थी कि काश उनका हाथ उनकी बंदूक तक पहुंच जाता।

ख्वाहिश का उनका यह बयान उनकी चुगली करता है। आम आदमी और पुलिस का जो सबसे बड़ा अंतर है वह है उसकी ट्रेनिंग का। पुलिस को मिलने वाली ट्रेनिंग ही उसे आम से खास बना देती है। पर लाश बनकर आतंकवादियों द्वारा लूटी गई गाड़ी में पड़े रहना पुलिस की निशानी नहीं हो सकती। कायरता या बदहवासी का यह आलम तो आम आदमी के हिस्से में होता है, पुलिस के नहीं।

जाधव ने मीडिया को बताया है कि जब गाड़ी का टायर बर्स्ट हो गया और आतंकवादी उस गाड़ी को छोड़ कर चले गए तो उन्होंने अगली सीट पर किसी तरह चढ़कर पुलिस रेडियो से बैकअप के लिए कॉल की। गौर करें कि जो शरीर बंदूक उठाने की इजाजत नहीं दे रहा था, वही मदद की गुहार लगाने के काम आ गया। दरअसल, उस वक्त का खौफ कुछ ऐसा रहा होगा कि उन्होंने बंदूक उठाने की जोखिम नहीं उठाई। आम आदमी की तरह जान है तो जहान है का फॉर्म्यूला अपनाया। लाश बन कर घूमते रहे। ऐसे सिपाही को सलाम और महिमामंडित कर रहे लोगों को मेरा सलाम (लानत)।

10 comments:

vimal verma said...

शहीद की परिभाषा बदल रही है...

vivek said...

हमारे यहां होता ही ऐसा है, जब सिर पर चढ़ाना हो तो किसी को भी चढ़ा लेते हैं, वजूहात गढ़ लेते हैं खुद-ब-खुद, आपकी बात सही है कि सिर्फ पुलिस या आर्मी के लोग ही शहीद क्यों, बाकी जो मरे वे सेंतमेत में मारे गए, कोई सुनवाई नहीं?

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

यह घटना साफ़ बताती है कि राज्य पुलिस में ATS जैसी संस्थायें क्यों बनाई जाती हैं और उनमें कितने सक्षम लोग चुने जाते हैं. समय आ गया है जब पुलिस को न सिर्फ़ अंग्रेजी राज्य का बडबोलापन और अत्याचार छोड़ना पडेगा बल्कि सक्षम, तुर और शक्तिशाली भी होना पडेगा.

सुमो said...

अनुराग भाई, हमारे यहां मुर्दे के बारे में बुरा बोलने की प्रथा नहीं है, हम गांधी जी के बन्दर हैं ना
आपने बात बढ़ायी अच्छा किया

सालस्कर, काम्टे और करकरे होटल ताज या आतंकवादी घटना से दूर आजाद मैदान के पास अपनी कालिस में बैठे थे. ये पुलिसिये चार और आतंकवादी दो.
ये पुलिसिये रास्ता चलते मूंगफली बेचने वाले आम वैंडर नहीं थे बल्कि बार बार उच्च प्रशिक्षण प्राप्त जिम्मेदार लोग थे कितने लापरवाह निकले ये?

अरुण जाधब के पास ही स्टेनगन पड़ी थी और ये चाहता तो पीछे की सीट से उन दोनों को मार सकता था

वाकई इन्हें हवलदार गजेन्द्र सिंह और मेजर संदीप उन्नीकृष्णन की कैटेगरी में नहीं रखा जाना चाहिये

sareetha said...

बेहतरीन मुद्दा । मीडिया ने अपने फ़ायदे के लिए इन्हें शहीद करार दे डाला । शहादत की इस नई परिभाषा ने हतप्रभ कर दिया है । कायराना भंगिमा का महिमा मंडन ही देश के लोगों को और नाकारा बनाएगा । ऎसे में जान जोखिम में डाल कर कौन करना चाहेगा देश की हिफ़ाज़त ...?

पंगेबाज said...

अनुराग जी यही सवाल मेरा था जिसके लिये कोई रौशन ला जी और अफ़लातून जी को मेरे भारतीय नागरिक होने पर अफ़सोस जाहिर करना पडा मुझे हाफ़ पेंट ब्रिगेड का सदस्य बताना पडा . जब गोलिया चल रही थी तब ये तीनो कैमरे के सामने तैयार होकर गाडी मे बैठ कर कहा चल दिये थे . जब की इनके हथियारो का मूंह बाहर की और फ़ायर के लिये खुला होना चाहिये था तब ये हथियारो को अंदर रख कर क्या कर रहे थे पर ये सवाल अनुतरित ही रह जायेगे

डॉ .अनुराग said...

आपने विचारणीय प्रश्न उठाये है ...उम्मीद है इनका जवाब मिलेगा

likhlo said...

शहीद शब्द का प्रयोग करने में कुछ ज्यादा ही जल्दबाजी दिखा रहे हैं लोग।

--- भुवन

vikshubdha said...

एक आम आदमी ...जो डरता भी है घबराता भी है और जिसे अपनी जान की फ़िक्र भी होती है...लेकिन इसी आम आदमी के तन पर जब वर्दी आ जाती है तो फ़िर वह रक्षक बन जाता है ...वोह रक्षक जिसके भरोसे हर आम आदमी ख़ुद को महफूज़ समझता है ..सुरक्षित समझता है ! ....अगर वही रक्षक अपनी जान बचाने के लिए दूसरों की जान दांव पे लगा दे तो उसे कितना अधिकार है रक्षक कहलाने का और कितना औचित्य है उसके वर्दी पहनने का - यह निश्चित तौर पर बहस का गंभीर मुद्दा है !

कितने आदमी थे .....
सरदार दो
हूँ...वोह दो थे और तुम चार .... फ़िर भी मारे गए
धिक्कार है !!!!!!

आदर्श राठौर said...

आपने सही बातें रखी हैं।