जिरह पढ़ें, आप अपनी लिपि में (Read JIRAH in your own script)

Hindi Roman(Eng) Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam

 
जिरह करने की कोई उम्र नहीं होती। पर यह सच है कि जिरह करने से पैदा हुई बातों की उम्र बेहद लंबी होती है। इसलिए इस ब्लॉग पर आपका स्वागत है। आइए,शुरू करें जिरह।
'जिरह' की किसी पोस्ट पर कमेंट करने के लिए यहां रोमन में लिखें अपनी बात। स्पेसबार दबाते ही वह देवनागरी लिपि में तब्दील होती दिखेगी।

Tuesday, December 23, 2008

मां की आखिरी शाम

मेरे लिए 1 दिसंबर 1994 की रात बेहद काली थी। इसी रात तकरीबन 10 बजे पराग भइया ने दिल्ली से फोन कर बताया कि मां की तबीयत बेहद खराब है, हमलोग कल उसे लेकर रांची आ रहे हैं। मैंने पूछा - प्लेन से या ट्रेन से। भइया का जवाब था - प्लेन से। उसके इस जवाब से मैं समझ गया कि 1 दिसंबर की शाम मां की जिंदगी की आखिरी शाम हो गई। बहरहाल, मैं उन यातनादायी दौर से फिर गुजरने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा, इसलिए इस चर्चा को यहीं पर रोक कर एक दूसरी बात कहूं।

मां की मौत के बाद उनकी एक कविता ने हमसबों का ध्यान अपनी ओर खींचा। यह कविता मां की कविताओं के दूसरे संकलन 'चांदनी आग है' में शामिल है। 'एक संदेश' नाम की इस छोटी-सी कविता में मां ने दिसंबरी शाम से आखिरी बार मिलने की बात कही है। वाकई, इस संयोग ने मुझे हैरत में डाल दिया।

आप भी पढ़ें मां की यह कविता :


एक संदेश

ओ दिसंबरी शाम।
आज तुमसे मिल लूं
विदा बेला में
अंतिम बार।
सच है,
बीता हुआ कोई क्षण
नहीं लौटता।
नहीं बांध सकती मैं
तुम्हारे पांव।
कोई नहीं रह सकता एक ठांव।

11 comments:

Mired Mirage said...

यह तो बहुत विचित्र संयोग है। आपकी माँ को मेरी श्रद्धांजली।
घुघूती बासूती

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

अनुराग भाई, जीवन के यथार्थ की कविता है। माता जी को विनम्र श्रद्धांजलि!

डॉ .अनुराग said...

माँ दुनिया की सबसे कीमती शै है.......

माता जी को विनम्र श्रद्धांजलि!

रंजना [रंजू भाटिया] said...

विचित्र संयोग ..माँ को मेरी श्रद्धांजली

विक्षुब्ध सागर said...

संयोग ! मगर फ़िर यह जग, यह जीवन- यह सब भी इक संयोग ही तो है...!
माँ को श्रद्धांजली ...!!

कंचन सिंह चौहान said...

समझ सकती हूँ कि इस कविता ने कितने दिनो तक बेचैन रखा होगा आपको....!

nidhi said...

maa jaanti hain sb.unhe mera prnaam

nidhi said...

maa sb jaanti hain.maa komera prnaam.

lalit said...

maan hamesha kyun hamare saath nahi rahti.....
hamare bachpan se hamare budhape takk.....

कविता वाचक्नवी said...

Aap ki Maata jim ke lekhan va aap donon bhayion ki unke prati vinamra shrdhha ne bhav vigalit kar diya, kayi baar kayi cheejein padhin hain sabhi link kiye aap ke blogs par.

aaj ki Chitthacharchaa mein Maata ji ke lekhan ko saadar sandarbhit kiya gaya hai. unhein vinamra sharadhhanjali.Dhnya hai vah maan.....

megha said...

ye kavita apne sath 15 years back le gai, sab kuch jaise ek jhatke me yaad aa gaya ho her ki pal, wo 1st dec, mere exams chal rehe the school me aur achanak se hi pata chala ki fua ab nhi rehi, ise padh ker aaj bhi rona aa gaya.