जिरह पढ़ें, आप अपनी लिपि में (Read JIRAH in your own script)

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जिरह करने की कोई उम्र नहीं होती। पर यह सच है कि जिरह करने से पैदा हुई बातों की उम्र बेहद लंबी होती है। इसलिए इस ब्लॉग पर आपका स्वागत है। आइए,शुरू करें जिरह।
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Tuesday, October 28, 2008

अंधेरा जब बढ़ता है


ओ साथी,
अपने भीतर जब अंधेरा बढ़ता है
वह अहं, राग और द्वेष का
किला गढ़ता है।
सच मानें
यही तो जड़ता है।
फिर भीतर ही भीतर
सारा कुछ सड़ता है
और आदमी
धीरे-धीरे मरता है।

हां साथी, इससे पहले
कि संवेदनाओं से लबरेज हमारा चेहरा
किसी भीड़ में गुम हो जाये,
और व्यवस्था को बदलने के लिए निकला जुलूस
किसी शवयात्रा में तब्दील हो
अपने भीतर
आस्था का दीया जलाएं।
इसकी टिमटिमाती लौ
खत्म कर देती है सारी आशंकाएं
हां साथी,
स्वीकार करें दीपावली पर
हमारी शुभाशंसाएं ।

7 comments:

Udan Tashtari said...

आपको एवं आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऐं.

समीर लाल
http://udantashtari.blogspot.com/

manvinder bhimber said...

Bahut sundar sabd chitran. Deepavali ke deepakon ka prakash aapke jeevan path ko aalokit karta rahe aur aapke lekhan ka margdarshan karta rahe, yahi shubh kamnayen.

Mired Mirage said...

प्रेरणाप्रद कविता !
आपको व आपके परिवार को भी दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं ।
घुघूती बासूती

Kapil said...

कम शब्‍दों में बड़ी गहरी बात कह गये अनुराग भाई। उजाले की दुनिया रचना और संवेदनाओं में आस्‍था बचाये रखना बेहद जरूरी है। इस यकीन को सलाम। दीपावली की शुभकामनाएं।

Ek ziddi dhun said...

`मिट्टी के दीये की थरथराती लौ को हिफाजत की दरकार है`

डॉ .अनुराग said...

बहुत खूब........बेहद खूबसूरत कविता....अरसे बाद आप नजर आये ....एक दिये को लेकर.....

Rohit Tripathi said...

सुंदर और प्रेरनादायी कविता.. बहुत सुंदर लिखा आपने अनुराग जी

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