जिरह पढ़ें, आप अपनी लिपि में (Read JIRAH in your own script)

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जिरह करने की कोई उम्र नहीं होती। पर यह सच है कि जिरह करने से पैदा हुई बातों की उम्र बेहद लंबी होती है। इसलिए इस ब्लॉग पर आपका स्वागत है। आइए,शुरू करें जिरह।
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Sunday, January 26, 2014

इतना भी बुरा नहीं यह वक्त, जितना सब कोसते हैं

इतना भी बुरा नहीं यह वक्त, जितना सब कोसते हैं
कल की कल देखेंगे, हम तो बस आज की सोचते हैं

बेफिक्र होकर तू सपने पाल, भर ले अपनी उड़ान पूरी
अपनी जिद पर अड़े हम, शायद कुछ ज्यादा सोचते हैं

दिल्ली में तो रोशनी है, पर गांव का है मेरे बुरा हाल
कैसे छोड़ आए बूढ़े बाबा को, रात-दिन हम सोचते हैं

चमचमाती सड़कों से भली अक्सर लगती हैं पगडंडियां
थोड़े पैसे जुट जाएं तो टिकट कटाने की हम सोचते हैं

पहाड़ों-सी रात गुजरी, गुजर गया जो था गया-गुजरा
चलिए अब संभलने की राह ढूंढें, आप क्या सोचते हैं

बड़े शहर में दर्द बड़ा है, बेफिक्र होकर तुम लौटो गांव
मिलकर दुख साझा करेंगे, यहां हमसब ऐसा सोचते हैं

Friday, January 24, 2014

खूबसूरत शहर की यह अजब बात है

खूबसूरत शहर की यह अजब बात है
संभलो यारो, कदम-दर-कदम घात है।

मेरे दिए खून से बची जिसकी जिंदगी
वही मुझसे पूछता है, तेरी क्या जात है।

खुद ही सबको लड़नी है अपनी लड़ाई
किसका भरोसा, अब किसका साथ है।

तू सिर्फ अपना काम किए चला चल
मत सोच जिंदगी शह या कि मात है।

मेरी हिम्मत का राज अब तू भी सुन
मेरी पीठ पर यारो, अपना ही हाथ है।

Thursday, January 23, 2014

दिल की बात कहो जब, बंद किवाड़ समझते हैं

दिल की बात कहो जब, बंद किवाड़ समझते हैं
अजब अहमक हैं वो, तिल को ताड़ समझते हैं

कितनी बार कहा कि खुली हवा में घूम आएं
घर में बैठे हैं और घर को तिहाड़ समझते हैं

तकलीफें तो हैं, पर मन है अब भी हरा-भरा
उनसे क्या कहूं जो मुझको उजाड़ समझते हैं

यह उसका असर नहीं, आपमें बसा वह डर है
कि उसके मिमियाने को भी दहाड़ समझते हैं

डूबने से डरता था, पर जब उतरा तो डूबकर तैरा
इंसानी तमीज देखो कि राई को पहाड़ समझते हैं

Tuesday, January 21, 2014

मन की बात बोलना कोई मर्ज नहीं

मन की बात बोलना कोई मर्ज नहीं
मुझसे कुछ भी बोलो, कोई हर्ज नहीं

सीधेपन पर मेरे तुम मत करो शक
घटनाएं याद हैं, नाम कोई दर्ज नहीं

हां यह सही है कि मैं जिद्दी हूं बहुत
उतारूंगा सारे, रखूंगा कोई कर्ज नहीं

जरूरी नहीं कि तुम रखो मेरा ख्याल
लगे जो मजबूरी, वह कोई फर्ज नहीं

अनगढ़ रास्तों पर मैंने चलना सीखा
पर अपनायी अब तक कोई तर्ज नहीं

ला दे मुझको तू अपनी सारी उदासी
कि यह हक है मेरा, कोई अर्ज नहीं

Monday, January 20, 2014

गले मिल कर जो दबा देते हैं गला
जरा सोचो कैसे करेंगे आपका भला।

जाने का उसके नहीं कोई अफसोस
माहौल रहेगा खुशनुमा, शैतान टला।

छांछ भी पीता है वह फूंक-फूंककर
अब सतर्क है बहुत, दूध का जला।

अब भी मुझे प्यारे हैं सारे दोस्त
यह बात है जुदा कि सबने छला।

इतना तल्ख न हो, ऐसा खौफ न पाल
कि खुशियां भी दिखने लगें तुम्हें बला।

तू हंसता है तो लगता है बेहद अच्छा
देख जलाने वालों का दिल अब जला।

अपनी बेगुनाही बड़ी देर तक समझाई
अब जो समझना है समझ, मैं चला।

दूसरों का दोष क्यों ढोता है दिल पर
देख, कहा मेरा मान, खुद को न गला।

शिकवा किसी से, न शिकायत कोई
यारो! सीख गया मैं, जीने की कला।

Monday, August 19, 2013

मुट्ठी भर प्यार, हाशिए पर नफरत

प्यार क्या है
एक अदृश्य ताकत?
जो आपको खड़ा होने की हिम्मत देता है खिलाफ बह रही तमाम हवाओं के खिलाफ
जो आपको सिखाता है कि जीना है तो मरने के लिए रहो हरदम तैयार
और आप मेमने को खाने पर अड़े भूखे शेर से भी लड़ने को हो जाते हैं खड़े
जब तक यह अदृश्य ताकत आपके भीतर बहती है
तेज से तेज बहाव वाली नदी, बड़े से बड़ा समुद्र और ऊंचे से ऊंचा पहाड़
आपको अपने कदमों पर लोटता नजर आता है
आप डंके की चोट पर कहते हैं कि अभी सूरज को नहीं दूंगा डूबने

प्यार क्या है
एक अदृश्य बेड़ी?
जो अनुकूल बहती हवाओं में भी सूंघती फिरती है तरह-तरह की आशंकाएं
जो पिंजरे में रहने की देती है हरदम नसीहत और उड़ने से रोकती है आपको खुले आकाश में,
और तब आप अपने वटवृक्ष होने की संभावनाओं को लतर के पौधे में बदल देते हैं
जब तक यह अदृश्य बेड़ी बांधे होती है आपके पांव
आप सिर्फ जीना चाहते हैं, जीने के लिए भूल जाते हैं मरने का दांव
और फिर हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि छोटी नाली लगती है विकराल नदी,
राई भी नजर आते हैं पहाड़
डंके की चोट पर कहना तो दूर, आप घुटने के बल रेंगने को होते हैं मजबूर

नफरत क्या है
अदृश्य चारदीवारी?
जो आपको देती है अपनी बनाई मान्यताओं के साथ जीने की इजाजत।
जो आपके हक में उठाती है लाठी और श्रेष्ठतम बताती है आपकी कदकाठी।
जो हांकती है आपको आस्था की लाठी से और बुनती है आत्ममुग्धता का मकड़जाल
जिससे बाहर आते ही आपको अपना अस्तित्व खाक होता नजर आता है
जब तक घिरे होते हैं आप इस चारदीवारी से
नई रोशनी आपको गैरवाजिब हस्तक्षेप लगती है
और आप पूरी ताकत झोंक देते हैं
कि कोई बाहर की रोशनी आकर आपके अंधेरे को रोशन न कर सके।
क्योंकि आपको अंधेरा पसंद है,
दरअसल यही अंधेरा नफरत की निगाह में उसका उजाला है।

नफरत क्या है
अंधा प्यार?
जो आपसे सही या गलत की पहचान दुराग्रही आंखों से करवाता है।
जो सम्मान की रक्षा के नाम पर सम्मान का गला घोंट देने से भी नहीं करता गुरेज।
और आपको पता भी नहीं चलता कि कब आप इंसानियत के कस्बे से निकल हैवानियत के जंगल में अपना ठौर बना चुके हैं
जब तक डूबे होते हैं आप इस अंधे प्यार में
आदिम उसूल और बासी विचारों का लबादा आपको लगता है सबसे प्यारा
और आप उसे जायज ठहराने के लिए दूसरों पर लादने तक की कोशिश करते हैं
ऐसे में जब कोई आपके पैबंदों को दिखाने की ईमानदार कोशिश करता है
वह दुनिया, देश और समाज का सबसे बेईमान और खतरनाक आदमी लगता है

इस तरह अगर देखें तो एक सच यह भी दिखता है
कि ऐसे किसी भी एक तत्व से जीने का भ्रम बनाया जा सकता हो भले
जीवन रचा नहीं जा सकता
यही वजह है कि जो लोग करते हैं नफरत से नफरत और प्यार से प्यार
या फिर जो प्यार से करते हैं नफरत और नफरत से करते हैं प्यार
वे रच नहीं पाते कोई प्यारा सा, सुंदर-सलोना संसार
इसीलिए मैं पालना चाहता हूं अपने भीतर मुट्ठी भर प्यार
और अपने हाशिये पर रखना चाहता हूं थोड़ी सी नफरत
ताकि जिंदा रहे मेरे भीतर का इनसान
जो बसा सके प्यार से भरी-पूरी एक दुनिया।

Wednesday, February 13, 2013

हम ओढ़ते हैं बोझ

जरूरी नहीं कि सारे सच कहे ही जाएं
या कि देखे जाएं
सच कहना नहीं चाहते तो न कहें
नहीं देखना चाहते, तो न देखें
पर ऐसा कुछ भी करने से
सच का चेहरा जरा भी नहीं बदलता

जो बदलाव होता है वह आप में होता है
कि आप जानते हैं कि सच आपने नहीं देखा
कि आप जानते हैं कि सच आपने नहीं सुना
कि आप जानते हैं कि सुन कर भी आपने अनसुना कर दिया
कि आप जानते हैं कि देख कर भी अनदेखा कर दिया
ऐसे में पुरजोर कोशिश करके आप खुद से मुंह चुराते फिरते हैं
क्योंकि आपको हर वक्त याद रहता है
कि आपने सच सुनने, बोलने, देखने, दिखाने में
झूठ के कौशल का सहारा लिया

सच है कि सच बोलने के लिए जितना हौसला चाहिए
सुनने के लिए भी उतना ही है जरूरी
और किसी सच को सहने के लिए तो उससे भी ज्यादा हौसले की जरूरत पड़ती है
तो फिर क्यों हम अक्सर
झूठ के अपने कौशल का सहारा ले
झूठी शान का तानाबाना रचते हैं अपने चारों तरफ
जबकि हमारे भीतर
झूठ बोले जाने के अहसास का सच
हमेशा सिर उठाए रहता है
ऐसे में हम अपनी ही निगाह में गड़े होते हैं
इस गड़े होने को जीवन भर सहते हैं
जबकि हम सब जानते हैं
कि सच सहने के लिए
सच बोलने से ज्यादा हौसले की दरकार पड़ती है।

Tuesday, October 28, 2008

अंधेरा जब बढ़ता है


ओ साथी,
अपने भीतर जब अंधेरा बढ़ता है
वह अहं, राग और द्वेष का
किला गढ़ता है।
सच मानें
यही तो जड़ता है।
फिर भीतर ही भीतर
सारा कुछ सड़ता है
और आदमी
धीरे-धीरे मरता है।

हां साथी, इससे पहले
कि संवेदनाओं से लबरेज हमारा चेहरा
किसी भीड़ में गुम हो जाये,
और व्यवस्था को बदलने के लिए निकला जुलूस
किसी शवयात्रा में तब्दील हो
अपने भीतर
आस्था का दीया जलाएं।
इसकी टिमटिमाती लौ
खत्म कर देती है सारी आशंकाएं
हां साथी,
स्वीकार करें दीपावली पर
हमारी शुभाशंसाएं ।

Tuesday, September 23, 2008

यह कैसा शख्स है मेरे यारो

खिले-खिले, पर घुटे-घुटे
तने-तने, पर झुके-झुके
मिले हुए, पर कटे-कटे
ये कैसे लोग हैं मेरे यारो

साफ-साफ, पर धुआं-धुआं
भेड़चाल और हुआं-हुआं
हंसी-हंसी में जलाभुना
यह कैसा वक्त है मेरे यारो

बहुत-बहुत, पर जरा-जरा
डरा-डरा, पर हरा-भरा
जगा-जगा, पर मरा-मरा
यह कैसा रूप है मेरे यारो

प्यार-प्यार में मारो-काटो
रौद्र रूप भी और तलवे चाटो
तारीफ के बजाए डांटो-डांटो
यह कैसा शख्स है मेरे यारो

चापलूसी में है सना-सना
जगह-जगह है, घना-घना
तू कर इसे अब मना-मना
यही है वक्त का तकाजा यारो

Wednesday, August 13, 2008

बहुत दिनों बाद

किसी कविता को सुनाने या पढ़ाने से पहले उसके बारे में अगर कवि को अपनी ओर से कुछ कहने की जरूरत पड़े तो यह उस कविता का कमजोर पक्ष हो सकता है। जाहिर है इस कविता के बारे में मैं अपनी ओर से कुछ कहना नहीं चाहता। पर यह भरोसा है कि पाठकों की ओर से भी इस पर कई नई बातें आ सकती हैं। कुछ ऐसी बातें जिन पर संभवतः मेरी निगाह भी नहीं गई है। फिलहाल पेश है कविता 'बहुत दिनों बाद' :



Wednesday, August 6, 2008

प्रियदर्शन की कविता 'गुस्सा और चुप्पी'

पता नहीं क्यों प्रियदर्शन की यह कविता मुझे बेहद लुभाती है। जब भी अकेला महसूस करता हूं यह कविता मुझे बल देती है। नतीजा है कि इसे पढ़कर आपको सुनाने के लोभ का संवरण नहीं कर पाया। प्रियदर्शन वाकई लाजवाब लिखता है। उसकी व्यस्तता मैंने बेहद करीब से देखी है, पर समझ नहीं पाया कि इतना सोचने का वक्त उसे कब मिलता है। मैं यह भी पूरे दावे के साथ नहीं कह सकता कि वह लिखने के पहले काफी सोचता-विचारता है। और यह भी नहीं कि वह बगैर सोचे लिख डालता है। जाहिर है उसकी रचना प्रक्रिया मेरे लिए रहस्य जैसी है। कुतुहल पैदा करने जैसी है। विस्मय में डाल देने जैसी है। बहरहाल, उसकी कविता सुनें।





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