जिरह पढ़ें, आप अपनी लिपि में (Read JIRAH in your own script)

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जिरह करने की कोई उम्र नहीं होती। पर यह सच है कि जिरह करने से पैदा हुई बातों की उम्र बेहद लंबी होती है। इसलिए इस ब्लॉग पर आपका स्वागत है। आइए,शुरू करें जिरह।
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Wednesday, August 13, 2008

बहुत दिनों बाद

किसी कविता को सुनाने या पढ़ाने से पहले उसके बारे में अगर कवि को अपनी ओर से कुछ कहने की जरूरत पड़े तो यह उस कविता का कमजोर पक्ष हो सकता है। जाहिर है इस कविता के बारे में मैं अपनी ओर से कुछ कहना नहीं चाहता। पर यह भरोसा है कि पाठकों की ओर से भी इस पर कई नई बातें आ सकती हैं। कुछ ऐसी बातें जिन पर संभवतः मेरी निगाह भी नहीं गई है। फिलहाल पेश है कविता 'बहुत दिनों बाद' :



4 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत सुंदर .जितनी जोश पूर्ण यह लिखी गई उतने ही दिल से आपने इसको बोला है ..

अनुराग said...

वाकई ...कविता अपने आप बोल रही है.....

Cyril Gupta said...

आज सुबह यही तो महसूस किया था मैंने... ऐसी मौंजू कविता लाये हैं आप.

आज के दौर पर सटीक प्रश्न हैं.

Udan Tashtari said...

कुछ भी कहने की आवश्यक्ता नहीं-रचना खुद सब कुछ कह गई. बहुत उम्दा.