जिरह पढ़ें, आप अपनी लिपि में (Read JIRAH in your own script)

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जिरह करने की कोई उम्र नहीं होती। पर यह सच है कि जिरह करने से पैदा हुई बातों की उम्र बेहद लंबी होती है। इसलिए इस ब्लॉग पर आपका स्वागत है। आइए,शुरू करें जिरह।
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Tuesday, August 5, 2008

अपने मीत की नकल

मीत भाई की नकल कर खुशी हुई। मैंने दूसरों का इस तरह का ब्लॉग नहीं देखा है। मीत की नकल कर ही कोशिश की एक पोस्ट करने की। अविनाश से रास्ता पूछा। उसने तरीका बताया। और एक नई पोस्ट इस तरह। इन दोनों का आभार।


6 comments:

सुजाता said...

अरे वाह ! आपकी आवाज़ जँच रही है । नया अन्दाज़ है यह कमेंटरी और गीत की मिक्सिंग । अब हम भी आते हैं इस राह पर जल्द ही !

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत अच्छा प्रयोग शुरुआत बहुत सुंदर की है आपने ...आवाज़ बहुत अच्छी है आपकी ..गाना भी बेहद सुंदर है :)

Cyril Gupta said...

जितना आनन्द गीत में आया, उतना ही कमेंट्री में भी! देखिये, अब इस सिरीज़ को चालू रखना है, कम से कम एक-दो गीत ऐसी ही भावपूर्ण कमेंट्री के साथ सुनवाइये

ये रही मेरी फर्माइशें

1. हो के मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा...
2. जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहां हैं

सुनीता शानू said...

सबसे पहले धन्यवाद। एक खूबसूरत गीत के लिये,दूसरे बहुत-बहुत बधाई एक रोबदार, प्रभावशाली आवाज़ के धनी है आप...:)

अनुराग said...

लगे रहिये ....हजूर.....

Udan Tashtari said...

बहुत बधाई. जबरदस्त रहा यह पोडकास्ट. भविष्य मे और उम्मीद है सुनने की.