किसी कविता को सुनाने या पढ़ाने से पहले उसके बारे में अगर कवि को अपनी ओर से कुछ कहने की जरूरत पड़े तो यह उस कविता का कमजोर पक्ष हो सकता है। जाहिर है इस कविता के बारे में मैं अपनी ओर से कुछ कहना नहीं चाहता। पर यह भरोसा है कि पाठकों की ओर से भी इस पर कई नई बातें आ सकती हैं। कुछ ऐसी बातें जिन पर संभवतः मेरी निगाह भी नहीं गई है। फिलहाल पेश है कविता 'बहुत दिनों बाद' :
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Wednesday, August 13, 2008
बहुत दिनों बाद
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
at
5:20 PM
4
प्रतिक्रियाएं
Labels: आदमी, इनसान, कविता, कृष्ण, मिथकीय चरित्र, लोकतंत्र, सवाल
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