जिरह पढ़ें, आप अपनी लिपि में (Read JIRAH in your own script)

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जिरह करने की कोई उम्र नहीं होती। पर यह सच है कि जिरह करने से पैदा हुई बातों की उम्र बेहद लंबी होती है। इसलिए इस ब्लॉग पर आपका स्वागत है। आइए,शुरू करें जिरह।
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Monday, September 22, 2008

जिंदगी मांगती रही है हिसाब

उम्र के
इसी पड़ाव पर
जिंदगी पूछने लगी मुझसे,
सच-सच बता
मुझे आखिर तूने कितना जिया

जिंदगी जब
मांगने लगे,
हर किये-धरे का
ऐसे हिसाब
मै जानता हूं
सुख गुम होता है
दुख तो खैर बेहिसाब

अब
तू तो ये न पूछ मुझसे
कि दिल्ली आकर क्या किया
सचमुच यारो,
जीने की आदत छूट गई,
मरने का सलीका सीख लिया।

10 comments:

डॉ .अनुराग said...

सबका यही हाल है बंधू..दिल्ली हो या कोई ओर शहर....

seema gupta said...

"merne ka sleekha seekh liya"

"very touching and appreciable poetry"

Regards

pallavi trivedi said...

bahut badhiya...marne ka saleeka seekh lena bhi bahut badi baat hai.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

यह हिसाब तो कभी खत्म नही होता :) अच्छी ,सच्ची लगी यह

Pooja Prasad said...

मै सोच रही हू अब तक मैने ही ज़िन्दगी से सवाल किए है, अगर ज़िन्दगी ने कभी मुझसे भी ये सवाल कर लिआ तो 2-4 चीज़े गिनाकर....


वैसे दिल्ली बेचारी का इससे कोइ लेना देना नही. मै तो यही की हू और जानती हू दिल्ली ने कुछ नही किया है. सब हमारा और हमे बाधने वाली paristithiyon का है..

रंजन said...

जीने की आदत छूट गई,
मरने का सलीका सीख लिया..

खुब..

Reetesh Gupta said...

अच्छा है मित्र ...अच्छा लिखा है ...बधाई

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा, बहुत बढिया.

dahleez said...

अापकी किवता वाकई ममॆस्पशीॆ है। बुहत िदनों बाद अनुराग को पुराने फामॆ में देख रहा हूं। वक्त िमले तो मेरी दहलीज पर भी अाइये।

संगीता मनराल said...

अलग तरह की रचना लेकिन बहुत खूब!