उम्र के
इसी पड़ाव पर
जिंदगी पूछने लगी मुझसे,
सच-सच बता
मुझे आखिर तूने कितना जिया
जिंदगी जब
मांगने लगे,
हर किये-धरे का
ऐसे हिसाब
मै जानता हूं
सुख गुम होता है
दुख तो खैर बेहिसाब
मांगने लगे,
हर किये-धरे का
ऐसे हिसाब
मै जानता हूं
सुख गुम होता है
दुख तो खैर बेहिसाब
अब
तू तो ये न पूछ मुझसे
कि दिल्ली आकर क्या किया
सचमुच यारो,
जीने की आदत छूट गई,
मरने का सलीका सीख लिया।
तू तो ये न पूछ मुझसे
कि दिल्ली आकर क्या किया
सचमुच यारो,
जीने की आदत छूट गई,
मरने का सलीका सीख लिया।



