विवेक ने एक बेहद खूबसूरत कविता लिखी है। यह कविता उसने हरियाणा से लौटने के बाद लिखी थी। शीर्षक है - कत्ल से पहले बहनें, बहनों के कत्ल के बाद। उसके ब्लॉग 'थोड़ा सा इंसान' पर 27 जुलाई की पोस्ट है यह। बेशक संवेदना को झकझोर कर रख देने वाली कविता है। आप भी सुनें। पर सिर्फ सुने ही नहीं, बल्कि यह भी सोचें कि यह जो भाई नाम का जीव है वह बहनों के कत्ल से पहले भी मर्द है और बहनों के कत्ल के बाद भी मर्द है, आखिर क्यों? कैसे बदले यह स्थिति, कैसे बदले उसका मर्दवादी सोच?
Friday, August 28, 2009
अब विवेक की कविता उड़ा ली गई
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अनुराग अन्वेषी
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11:53 AM
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Tuesday, July 28, 2009
उसका सुख मेरे सुख से बड़ा कैसे?
यह है मणिराम। हिंदी में एमए पास का दावा करनेवाले इस रिक्शेवाले से मेरी मुलाकात तकरीबन 10 दिन पहले हुई थी। पिछले शनिवार को नवभारत टाइम्स के कॉलम 'आंखों देखी' में इसे जगह मिली। हालांकि आज जब मैं इसे अपने ब्लॉग पर पब्लिश कर रहा हूं, तीखी धूप को कल रात हुई बारिश बहा ले गई है। पर मणिराम से मिलने के बाद जो कसक पैदा हुई मन में उसका तीखापन अब भी बरकरार है।
-अनुराग अन्वेषी
अब मुझे लगा कि उससे उसका परिचय तो पूछ ही लूं। उसने बताया मध्यप्रदेश का रहने वाला है वह। नाम है मणिराम। हिंदी में एमए कर रखा है उसने। पर कोई रोजगार नहीं मिला, तो अपने एक परिचित के साथ चला आया गाजियाबाद के वसुंधरा में। मैट्रिक तक पढ़ी उसकी पत्नी दूसरों के घरों में बर्तन-बासन, झाड़ू-पोंछा करती है। वह खुद रिक्शा चलाता है। दोनों मिलकर महीने में तकरीबन 5000 रुपये कमा लेते हैं।
उसके पढ़े-लिखे होने की बात सुन लेने के बाद इस व्यवस्था के प्रति मन इतना खट्टा हो जाता है कि मेरे पास कहने को कुछ नहीं रह जाता। बावजूद, जबर्दस्ती बातचीत जारी रखता हूं। किस दौर की कविता तुम्हें ज्यादा पसंद है, मैं पूछता हूं मणिराम से। पर सच है कि मैं उसका परिचय सुनने के बाद अपने से जिरह करने लग गया हूं। मैं भी हिंदी में एमए पास हूं। सोचता हूं वह पढ़ाई-लिखाई में जितना भी गया गुजरा होगा तो भी कई ऐसे लोगों से बेहतर होगा जो आज उसका दस गुणा कमा रहे हैं। पर मणिराम अपनी स्थिति से संतुष्ट है। उसे जिंदगी से शिकायत नहीं। एक तरफ मेरे जैसे लोग हैं जो शिकायतों का पुलिंदा लेकर बैठे हैं। जरा सी कोई बात हुई नहीं कि काट खाने को दौड़ेंगे। मैं पसीने से तरबतर हो चुका हूं। जेब से रुमाल निकालता हूं चेहरा पोंछने के लिए और मणिराम इस भरी दोपहर में पूरे इत्मीनान के साथ रिक्शा खींच रहा है। जयशंकर प्रसाद की पंक्तियां सुनाता हुआ - हिमाद्री तुंग श्रृंग से, प्रबुद्ध शुद्ध भारती, स्वयं प्रभा समुज्वला, स्वतंत्रता पुकारती, अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़ प्रतिज्ञ सोच लो, प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो-बढ़े चलो... साब जी मंडी आ गयी। यहीं मेरी तंद्रा टूटती है। रिक्शे से उतर कर मणिराम को पैसे देता हूं। ऑटो वाला मेरे इशारे पर रुक चुका है। ऑटो में बैठ कर जा रहा हूं, पर मुझे लगता है कि मैं अब भी रुका हूं मणिराम के पास, अपनी खुशियां, अपनी संतुष्टि तलाशता हुआ। लगता है, एमए बहुत दूर की बात है, मैंने तो अभी जिंदगी की पहली कक्षा की भी पढ़ाई नहीं की।
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अनुराग अन्वेषी
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9:43 PM
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Tuesday, June 30, 2009
दफ्तर में करने को कुछ नहीं, ये है न !
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अनुराग अन्वेषी
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10:34 PM
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Labels: क्षमा याचना के साथ, मजाक
Tuesday, June 2, 2009
सात सुरों की धुन (पापा का ब्लॉग)
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अनुराग अन्वेषी
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12:16 PM
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Wednesday, May 27, 2009
आप भी देखें मेरी दुर्दशा
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अनुराग अन्वेषी
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10:22 AM
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Thursday, May 7, 2009
मत करें दान, करें मतदान
गीदड़ कहता शेर से
नया जमाना देख
एक वोट तेरा पड़ा
मेरा भी है एक
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अनुराग अन्वेषी
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1:01 AM
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Wednesday, May 6, 2009
संकोच में फंस गया हूं
नमिता जोशी मेरी अच्छी दोस्त हैं। उन्होंने मुझे एक मेल किया और जिद ठान ली कि इसे मैं पोस्ट के रूप में अपने ब्लॉग पर डालूं। संकोच के साथ मैं उनकी इस जिद भरी गुजारिश पूरी कर रहा हूं।
-अनुराग
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अनुराग अन्वेषी
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Sunday, May 3, 2009
आगरा हो या दिल्ली : हालात हर जगह एक से हैं
नमिता शुक्ला को दिल्ली आए हुए अब साल भर होने जा रहा है। स्वभाव से वह निर्भीक हैं और पेशे से पत्रकार। वह मानती हैं कि डर नाम का भाव हम सबों के भीतर बसा होता है। और कोई भी छोटी-सी घटना उस डर को उभार सकती है। तकरीबन दो साल पहले आगरा के एक अखबार से बतौर क्राइम रिपोर्टर उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की थी। वहां वह फोटोग्राफर की भूमिका भी निभाती थीं। आगरा का एक संस्मरण वह यहां शेयर कर रही हैं।
थोडी देर बाद ही मुझे लगा कि कोई गाड़ी मेरा पीछा कर रही है। मैंने पीछे मुड़कर देखा तो मेरा शक सही निकला। एक टाटा सूमो में बैठे कुछ लोग मेरा पीछा कर रहे थे। मैंने अपनी एक्टिवा की स्पीड बढ़ा दी। इसके साथ ही टाटा सूमो की भी स्पीड बढ़ गयी। अनिष्ट की आशंका से पलक झपकते ही मेरा मन बुरी तरह घबरा गया। बगैर विचारे मेरी गाड़ी की स्पीट 70-80 होने लगी। पर यह काफी नहीं थी। सूमोसवार मेरी बगल में पहुंच चुके थे। उसमें से कुछ लड़के सिर बाहर निकालकर चिल्लाने लगे। उस वक्त मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे। लेकिन शायद मुसीबत सामने होती है तो हिम्मत अपने आप ही आ जाती है। मैंने गाड़ी की स्पीड और बढा दी। अपनी अब तक की लाइफ में सबसे तेज़ गाड़ी उसी दिन चलायी थी। सिकंदरा आने से कुछ पहले ही रास्ते में पंछी पेठे कि दुकान पड़ती है। मैंने देखा वहां काफी लोग खड़े हैं, दुकान पर अच्छी खासी भीड़ थी। वहां मैंने अपनी गाड़ी रोक दी। दुकान पर भीड़ देख सूमो वाले आगे निकल गये।
हिम्मत नहीं हो रही थी पर मैंने घर जाने के लिए शॉर्टकट रास्ते का इस्तेमाल किया। सकुशल घर पहुँचते ही सबसे पहले छत पर गयी और खूब रोई। मुझे उस वक्त घर के एक-एक लोग बेहद याद आए। उस दिन मुझे अहसास हुआ कि समाज चाहे कितना भी प्रगतिशील क्यों न हो जाए, हम लड़कियां कई बंधनों में जकड़ी हैं। असुरक्षा का टोप पहन हमें इस आजाद समाज में रहना है...
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अनुराग अन्वेषी
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3:17 AM
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Thursday, April 30, 2009
ब्लॉगर साथियो से अपील
अभिनीत मेरा भांजा है। उम्र से महज 12 साल, पर बुद्धि से 21 साल वालों बड़ा। पटना में रहता है। सेवेंथ का स्टूडेंट है। बगैर किसी की मदद के उसने बना लिया है अपना ब्लॉग। खास बात यह कि उसे ब्लॉग बनाने की प्रेरणा मिली अपनी मां को ब्लॉगिंग करते देख, जो पेशे से डॉक्टर हैं। कहना पड़ेगा एक बार फिर कि वाकई किसी बच्चे की पहली शिक्षिका मां ही होती है। एक बाल मन का ब्लॉग कैसा होता है - देखना हो तो एक बार जरूर देखें : गिरह
मेरी गुजारिश है कि गिरह पर जाकर अपनी राय से अभिनीत को जरूर अवगत कराएं। जाहिर है इससे उसका हौसला बढ़ेगा।
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अनुराग अन्वेषी
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12:47 AM
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Tuesday, April 21, 2009
मां की गोद का जादू
आज पता नहीं क्यों, सुबह से ही मन काफी अशांत था। बचपन की तमाम यादें सिरहाने आकर बैठ गयी थीं। उन दिनों में लौटने को जी मचल-मचल जा रहा था। पर यह मुमकिन न था। इन सब के बीच मां बेतरह याद आती रही। जाहिर है मेरी बेचैनी दुनी हो गई। क्या करता, अपनी पुरानी कविताएं पढ़ने लगा। इसी बीच मां को याद कर लिखी कविता मेरे सामने आ गई। हालांकि वह कविता इस ब्लॉग पर काफी पहले डाल चुका हूं, पर एक बार फिर से इसे दूसरे रूप में आपके सामने रखने की चाह हुई।
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अनुराग अन्वेषी
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10:56 PM
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दिल्ली इज नॉट सेफ फॉर गर्ल्स
डर सिर्फ स्त्रियों को ही नहीं लगता, डरते पुरुष भी हैं इस माहौल में। आने वाले दिनों में इस ब्लॉग पर पुरुषों के भी ऐसे अनुभव आपको पढ़ने को मिलेंगे। फिलहाल कात्यायनी उप्रेती ने अपना यह अनुभव हम सबों के लिए लिख भेजा है। वह दिल्ली में रहकर पत्रकारिता कर रही हैं :
-अनुराग अन्वेषी
दिल्ली इज नॉट सेफ फॉर गर्ल्स'। राजधानी में लड़कियों की सेफ्टी पर जब भी बात उठती है, इसी लाइन से शुरू होकर इसी पर खत्म होती है। लड़कियों से पूछा जाए, तो शायद हर लड़की किसी न किसी ऐसी घटना से गुजरी है, जिसे हमारा कानून 'क्राइम' कहता है। खुद की बात करूं, तो जब भी इस इश्यू पर सोचती हूं, तो मुझे मेरे और दोस्तों-परिचितों के कई अनुभव याद आते हैं। वे अनुभव जो बार-बार कहते हैं कि इस समाज का बड़ा हिस्सा आज भी लड़कियों को ऑब्जेक्ट मानता है।
अभी कुछ दिनों पहले की तो बात है। मेरा ऑफ डे था और इंडियन हैबिटैट सेंटर में शाम 7 बजे से एक प्रोग्राम। जाने का मन था लेकिन दिमाग ने सवाल किया - लौटने में प्रॉब्लम तो नहीं होगी? मन ने कहा - चल यार...। दिन में मां से फोन पर बात हुई, तो प्रोग्राम की बात निकल गई। वह फट से बोली - रहने दे, रात हो जाएगी... वैसे भी दिल्ली सेफ नहीं। खैर, मैं चली गई। प्रोग्राम और लोगों से मुलाकातें अच्छी लगीं। लेकिन मेरी नजरें रह-रहकर घड़ी देखने लग जाती थी। रात 8:30 बजे मैं मेन रोड पर थी। सड़क पर अभी लोग दिख रहे थे। तीन ऑटो दिखे, मजबूरी का फायदा उठाने के लिए तैयार, अपने दोगुने दामों के साथ। मैंने बस से जाना तय किया। कुछ कदम आगे रोड के किनारे एक गाड़ी के सामने खड़े 32-33 साल के शख्स से पूछा - एक्स्क्यूज मी, सामने जो स्टैंड है वहां से साउथ एक्स के लिए बस मिलेगी? आदमी ने एक चीप स्माइल पास की और बोला - कितने पैसे दोगी मैडम, मैं अपनी ही गाड़ी में छोड़ दूंगा। देखने से वह गाड़ी का ड्राइवर लगा। मेरे भीतर गुस्सा और डर ने फौरन सिर उठाया। उसकी बेशर्म मुस्कान बरकरार थी और वह जवाब के इंतजार में था। उसके चेहरे के भाव देखकर मेरे डर को ओवरटेक करता हुआ गुस्सा मेरे पास आ गया, जिसने हिम्मत जनरेट कर दी और मैंने कहा - अभी 100 नंबर पर फोन करूंगी, पुलिस की गाड़ी फ्री में घर छोड़ेगी। यह सुनते ही फट से वह दूसरी गाडिय़ों के पीछे होते हुए ओझल हो गया। एक मिनट बाद मैं स्टैंड में थी और दो मिनट बाद एक ठसी बस में। बस में चढ़ते ही मैंने अपने जेंडर की तलाश की। दो दिखीं तो चैन मिला। घर पहुंचते ही सही सलामत घर पहुंचने की खबर मां को दी।
ऐसे छोटे-छोटे मामले तो हम लड़कियां तकरीबन हर रोज झेलती हैं। कई बार सोचती हूं कि चलो अच्छा है, इसी बहाने कुछ बुरे लोगों को डराने का गुर तो सीख हैं हम। पर इसी के साथ दूसरा ख्याल आता है कि ये छोटे मामले ही कई बार बड़े बन जाते हैं। सड़क छाप मजनुओं को डराने की कोशिश कई बार किसी बड़ी मुसीबत खड़ी कर देती है। जाहिर है इस शहर में हर लड़की अंधेरे में तो क्या, उजाले में भी खुद को सेफ नहीं मानती। लड़कियां हैरान, परेशान, सावधान हैं। उनके लिए शाम को अकेले निकलना, ऑटो लेना, दिन में भी सुनसान सड़क में जाना जैसी तमाम चीजों के आगे 'अवॉइड करें' जोड़ दिया जाता है। लेकिन अवॉइड करना क्या सही सॉल्यूशन है? इससे तो वे दुनिया के कई पहलुओं से महरूम हो जाएंगी। आखिर हम अपने इस लापरवाह सिस्टम के लूपहोल्स को कैसे भर सकते हैं? लड़कियों की सिक्युरिटी को लेकर बना हर नियम-कानून इम्प्लिमेंटेशन मांगता है। इन नियम-कानून को इंम्प्लिमेंट करवाने वाले जब तक एक्टिव नहीं होंगे और जब तक इन्हें तोडऩे वालों को तुरंत सजा नहीं मिलेगी, तब तक लड़कियां अवॉइड करेंगी। फिर चाहे वह शाम को घर से निकलना हो या बस में लगने वाले अननैचरल धक्का। और जब भी वे इस दुनिया में अपने सपनों को पाने के लिए बाहर निकलेंगी, समाज के ये सभ्य पुरुष उन्हें घेरेंगे और इस शहर को 'दिल्ली इज नॉट सेफ फॉर गर्ल्स' का दर्द सहना पड़ेगा।
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
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12:37 AM
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Friday, April 17, 2009
मैंने रंजू की कविता चुराई
आज मैंने रंजना भाटिया की कविता चुरा ली। वह कविता जो उन्होंने अपने ...वें जन्मदिन (उम्र नहीं बतायी जाती) पर लिखी थी। उनकी ही कविता उन्हें जन्मदिन पर गिफ्ट कर रहा हूं।
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
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12:53 PM
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Wednesday, April 15, 2009
हुस्न हाजिर है
हुस्न हाजिर है मुहब्बत की सजा पाने को। पर ये पंक्तियां सुनकर सजा देने के लिए बढ़े पांव जड़ हो जाते हैं। मुझे लगता है... अरे कहां मैं अपनी बात सुनाने में लग गया ! मेरे लगने को मारें गोली, आपको क्या लगता है यह जरूर बताएं...
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
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12:35 AM
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Monday, April 13, 2009
हां, लगता है मुझे डर
अचानक कोई आता दिखा। मेरी धडक़न बढ़ गई। दरवाजा बंद करने को तेजी से उठी तो देखा सामने से प्यून आ रहा था। उसे देखते ही सांस में सांस आई। मैंने उसे जोर से डांटा कि तुम्हें यहां काम करने के पैसे मिलते हैं, बाहर घूमने के नहीं। उसने कुछ जवाब नहीं दिया लेकिन मैं जानती थी कि मैं उसे डांटकर मैंने अपना डरा चेहरा छुपाने की कोशिश की थी।
मन में बढ़ती जा रही असुरक्षा की भावना का नतीजा ही है कि रात तो दूर दिन के उजाले में भी किसी जगह पर अकेली रह जाऊं तो मन में न जाने कितने बुरे ख्याल आ जाते हैं। ऐसा ही कुछ उस रोज हुआ। मास कम्यूनिकेशन में पोस्ट ग्रैजुएशन डिप्लोमा कोर्स करने के बाद एक प्रॉडक्शन हाउस जाइन किया था। मैं न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी में रहती थी और ऑफिस कालकाजी में था, सो आने- जाने में ज्यादा समय नहीं लगता था। उस सुबह करीब आठ बजे अपने ऑफिस के लिए निकली। सुबह की ठंडी हवा प्यारी लग रही थी, अपने ख्यालों में डूबी ऑफिस के पास पहुंच चुकी थी। तभी मेरी नजर ऑफिस के मेन गेट से कुछ कदमों की दूरी पर खड़े दो लोगों पर पड़ी। लड़िकियों को यह सब भी पढ़ाया नहीं जाता, वे तो बड़े होते हुए लोगों की नजरों और उनके छूने की कोशिशों से बचते हुए अपने आप अच्छे और बुरे में फर्क करना सीख लेती हैं। सो मैं भी समझ चुकी थी कि दोनों युवक भले इरादे नहीं रखते थे। मैं तेजी से ऑफिस की ओर बढ़ी। सामने देखा तो शटर बंद था। मैं परेशान होती उससे पहले प्यून आता दिखाई दिया। उसने शटर खोला और मैं अंदर दाखिल हो गई। ऑफिस बेसमेंट में था, उस पर मेरा केबिन एकदम आखिर में। मैंने केबिन में पहुंचर लंबी सांस ली। क्योंकि शनिवार था इसलिए बाकी साथी कुछ लेट आने वाले थे। अचानक मन में ख्याल आया कि इस वक्त इलाके में न तो ज्यादा चहल-पहल है और न ही साथ के ऑफिस खुले हैं। ऐसे में अगर दो बदमाश दिख रहे लोग यहां घुस आए तो मेरी तो चीख तक बाहर नहीं जा पाएगी। ये सोचते ही मैं झट से फ्रंट ऑफिस में आ गई। यहां आई तो देखा प्यून न जाने कहां गायब हो गया था।
मैंने नजरें सामने के शीशे पर टिका दीं, जहां से आने-जाने वाले साफ दिख सकते थे। दिल जोर से धडक़ रहा था। मुझे पसीना आ गया। न जाने कितनी खबरें याद आ गईं। पहले सोचा ऑफिस का दरवाजा अंदर से बंद कर लूं, फिर सोचा ऐसे बात-बात पर घबरा जाना बेवकूफी है। कुछ देर बाद तो सब आ ही जाएंगे और फिर यह वही ऑफिस है जहां रोजाना घंटों गुजारती हूं। डरने जैसी कोई बात नहीं, लेकिन डर दूर नहीं हुआ। अचानक कोई आता दिखा। मेरी धडक़न बढ़ गई। दरवाजा बंद करने को तेजी से उठी तो देखा सामने से प्यून आ रहा था। उसे देखते ही सांस में सांस आई। मैंने उसे जोर से डांटा कि तुम्हें यहां काम करने के पैसे मिलते हैं, बाहर घूमने के नहीं। उसने कुछ जवाब नहीं दिया लेकिन मैं जानती थी कि मैं उसे डांटकर मैंने अपना डरा चेहरा छुपाने की कोशिश की थी। अपने ऑफिस में कुछ घंटे जल्दी पहुंच जाना किसी मुसीबत की वजह नहीं है। लेकिन हादसों को ऐसे ही कुछ मिनटों की दरकार होती है।
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
at
11:49 AM
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Tuesday, April 7, 2009
दिल्ली में डरा-सहमा मन- 2
डर एक मनोभाव है, बेहद स्वाभाविक मनोभाव। पर जब यह दूसरे मनोभावों पर हावी होने लगे, तो बात चिंताजनक होने लगती है। लड़कियों का मन बेहद कोमल होता है, बल्कि कहना यह चाहिए कि मन के दो रूप हैं - कोमल और कठोर। कोमल मनोभाव स्त्री मनोभाव है और कठोर, पुरुष मनोभाव। जरूरी नहीं कि यह कठोर तत्व पुरुष शरीर में ही मौजूद हो और कोमल तत्व स्त्री शरीर में। जाहिर है कहना यह चाहता हूं कि दिल्ली हो या मुंबई, रांची हो या करांची - हर तरफ यह कोमल मन डरा सहमा है। फिलहाल, पेश है दीपा पवार का एक संस्मरण। वह पेशे से पत्रकार हैं। :
-अनुराग अन्वेषी
एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि मेरे भीतर मर चुका डर अचानक अपना सिर उठा बैठा। मैं ब्लूलाइन बस में बैठकर सीपी जा रही थी। दिन का वक़्त था। फिर भी बस में बहुत कम मुसाफिर थे। ड्राइवर, कंडक्टर और उनके एक साथी के आलावा कुल 5-6 लोग। बसों में आना-जाना सामान्य सी बात थी मेरे लिए। जब मैं बस में बगैर किसी साथी के होती हूं तो अक्सर किसी न किसी विषय पर सोचती रहती हूं। उस दिन भी किसी टॉपिक पर खुद से विचार-विमर्श कर रही थी। अचनाक मैंने महसूस किया कि बस के कंडक्टर ने अपने साथी को कुछ इशारा किया। कंडक्टर ठीक मेरे आगे वाली सीट पर बैठा था। मुझे लगा कंडक्टर का यह इशारा कुछ मुझसे जुड़ा है। यह सब कुछ सोच ही रही थी कि अगले पल उसका साथी जो दूसरी तरफ बैठा था, उसने मेरी ओर देखा फिर कंडक्टर की ओर देख कर उसे उसने ओके का इशारा किया। मेरी चेतना जो तभी से मुझसे बहस करती चल रही थी, वह इस पल भर के इशारों पर आकर केंद्रित हो गई। कंडक्टर और उसके साथी का इशारा मुझे बेहद भद्दा और डरावना लगा। अब बस का ड्राइवर भी मुझे घूरने लगा था। मैं बस में आगे ही बैठी थी, इसलिए मुझे यह भी ध्यान नहीं था कि बस में अब कितने मुसाफिर बैठे हैं। मुझे लगा कि कहीं बस में मैं अकेली तो नहीं बच गई हूं? बेहद तनाव में आ चुकी थी मैं। ड्राइवर, कंडक्टर और उसके साथी आपस में फूहड़ हंसी-मजाक कर रहे थे। इस बीच मैंने उनसे अपनी आंखें चुरा बस में बैठे यात्रियों की संख्या का जायजा लिया। थोड़ी राहत मिली। बमुश्किल 5 लोग बैठे थे। सवारियों में एक लड़की को देखकर जान में जान आयी। मैंने उसी वक़्त फैसला किया कि जहां यह लड़की उतरेगी मैं भी वहीं उतर जाऊंगी। मुझे बारहखंबा रोड जाना था। पर उनके इशारों और फूहड़ हंसी-मजाक ने मुझे इतना चिंतित कर दिया था कि मैं तिलक ब्रिज पर ही उस लड़की के साथ उतर गयी। उसके बाद मैंने डीटीसी की भरी हुई बस से आगे का सफर तय किया।
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
at
11:43 AM
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Saturday, April 4, 2009
दिल्ली में डरी-सहमी लड़कियां
नौकरीपेशा लड़कियों के करेक्टर पर दबी जुबान चर्चा हमेशा होती रही है, अगर नौकरी की अनिवार्य शर्त हो नाइट शिफ्ट, तब तो चर्चा ज्यादा रंगीन हो जाया करती है। पर इन नौकरीपेशा लड़कियों की परेशानियों की चर्चा को यह समाज हमेशा हाशिये पर रख कर चला है। देश की राजधानी में नाइट शिफ्ट में काम करने वाली ऐसी ही दो लड़कियों की हत्या अभी हाल के महीने में हुई है, यह अलग बात है कि दोनों हत्याकांड के अभियुक्त पकड़े जा चुके हैं। इन हत्याओं के बाद इस महानगर की लड़कियों के भीतर कैसा डर घर कर गया है - यह सवाल भी मीडिया में अपनी जगह बनाता रहा। मीडिया में स्पेस की कमी है, इसलिए वहां विस्तार से ऐसे मुद्दों पर बात नहीं होती। पर ब्लॉग में यह चर्चा की जा सकती है। आज एक ऐसी ही लड़की की बात इस ब्लॉग पर रख रहा हूं, जो पेशे से पत्रकार हैं। पर इन दो हत्याकांड के बाद उनका विश्वास भी एक रात डगमगा गया, जब बारिश हो रही सड़क पर उन्होंने खुद को अकेला पाया। परिचय और नाम जानबूझ कर नहीं दे रहा हूं। क्योंकि मकसद शख्स को सामने लाना नहीं, बल्कि आशंका और उस डर को सामने लाना है जो इस राजधानी की आबोहवा से बना है :
-अनुराग अन्वेषी
यह सही है कि अब मैं उस डर से उबर चुकी हूं। पर वह बीस-पच्चीस मिनट का अकेलापन मुझे ताउम्र याद रहेगा। इस घटना से पहले मैं नहीं जानती थी कि डर कहते किसे हैं। पर उस पच्चीस मिनट ने सिखाया कि अकेली लड़की कैसे डरती होगी किसी सुनसान सड़क पर बांह पसारे पेड़ों की छाया से। दिल्ली के मिजाज का कोई भरोसा नहीं, कब वह झुलसा देने वाली गर्मी बरसाने लगे और कब, शुरू हो रही गर्मी पर बारिश की फुहार छोड़ दे।
अभी चंद रोज पहले की ही तो बात है। जिगीषा मर्डर केस सुर्खियों में रहा था। ऑफिस हो या घर - हर तरफ इस केस की ही चर्चा थी। नाइट शिफ्ट ड्यूटी का डर। लड़की होने का डर। इन चर्चाओं में मैंने भी हिस्सा लिया था लेकिन तब तक किसी डर को कभी महसूस नहीं किया था और न ही वह मुझे छू पाया था कभी। यहां तक कि जिगीषा हत्याकांड के बाद जब कामकाजी लड़कियॊं की सेफ्टी पर स्टॊरी लिखने के लिए कहा गया, तब मैंने अपने बॉस से पूछा कि फिर उसी पुराने राग को अलापने से कोई लाभ होगा? उन्होंने कहा कि तुम एक्सपर्ट्स से ये बात करो कि सोल्युशन क्या है। तब मैंने पूछा था कि क्राइम क्या सिर्फ लड़कियॊं के ही साथ हो रहा है। अगर नहीं तो फिर क्यों ये सब बार-बार लिखकर लोगों को डराएं। इस पर उन्होंने समझाया कि नहीं, क्राइम हर किसी के साथ हो रहा है लेकिन लड़कियों को सॉफ्ट टारगेट मान कर बदमाश उन पर आसानी से हमला कर देते हैं। मैं उनकी बात से कनविंस नहीं हुई थी, पर हां, स्टोरी जरूर लिख दी। 
लेकिन उस शाम प्रोग्राम खत्म होने के बाद होटल अशोक से 8:30 बजे जब बाहर निकली, हल्की बारिश हो रही थी। इस इलाके में सन्नाटा पसरने लगा था। पर खुद पर इतना भरोसा था कि सड़क पर निकल आई। सोचा कि बारिश रुकने का इंतजार करने से बेहतर होगा कि ऑटो लेकर ऑफिस पहुंच जाऊं। ऑटो के चक्कर में सड़क पर आगे बढ़ती गई। अब तक बारिश तेज हो चुकी थी, अंधेरा और आंधी भी बारिश का साथ दे रहे थे। दूर-दूर तक सड़क पर सन्नाटा पसरा था। अंधेरा ऐसा कि परिचित जगह भी अनजान लगने लगे। मुझे यह अंदाजा भी नहीं लग रहा था कि मैं सही सड़क पर चल रही हूं या गलत। पंद्रह मिनट तक तो मेरे दिमाग में सिर्फ जल्दी ऑटॊ मिलने का ख्याल था, लेकिन खराब मौसम की वजह से ऑटॊवाले भी आते-जाते नहीं दिख रहे थे। जो एक-दो दिखे, उन्होंने जाने से इनकार कर दिया। अब तक मैं काफी आगे निकल आई थी। सड़क के अंधेरे को कभी कभार चीर दे रही थीं गुजरने वाली बड़ी गाड़ियों की मुंह चिढ़ाती लाइटें। ऐसे में अब मुझे घबराहट होने लगी थी।
घबराहट इस कदर बढ़ गई कि घर के लोग याद आने लगे। मीडिया में पसरे जोखिमों की वजह से यह नौकरी न करने की पापा की सलाह याद आने लगी। जॉब छोड़कर पढ़ाई पूरी कर लेने की भाई की नसीहत बुरी नहीं लगी इस वक्त। और बॉस की बात कानों में गूंजने लगी कि लड़कियों को बदमाश सॉफ्ट टारगेट समझते हैं। सब कुछ दिमाग में घूमने लगा और समझ नहीं पा रही थी कि क्या करूं। उस वक्त मैं जरूरत से ज्यादा चौकन्नी हो गई थी। पेड़ों के बीच से तेज हवा के गुजरने से आती सांय-सांय की आवाज मेरे भीतर और घबराहट पैदा करने लगी। बांह पसारे खड़े लंबे पेड़ दैत्य की तरह लगने लगे। कोई गाड़ी दूर से आती दिखती, तो सांसें थम जाती। अपने आत्मविश्वास को बनाए रख मैं अब भी आगे बड़ी जा रही थी पर पता नहीं क्यों मुझे रोना आ रहा था। अपने को समझाने की कॊशिश कर रही थी कि मैं रिपॊर्टर हूं, मुझे ऎसे डरना नहीं चाहिए। लेकिन फिर ख़याल आता - आखिर हूं तॊ लड़की ही। जर्नलिस्ट सौम्या का चेहरा आंखों के सामने से गुजर जाता। डिवाइडर से टकरा कर रुकी उसकी कार दिखने लगी। जिगीषा का नाम ध्यान आते ही मेरे घबराहट दोगुनी हो गई। उस डर के साथ गुस्सा भी बहुत आ रहा था घरवालॊं की बात न मानने के लिए अपने आप पर। और लड़कियां सॉफ्ट टारगेट हॊती हैं यह जानते हुए ऑफिस से रात में अकेले रिपोर्टिंग के लिए भेजने के फैसले पर। अचानक दिमाग में आया कि बहुत हॊ गई ये नॊकरी अब और नहीं। फिर मैंने बॉस को फोन लगाया। अपनी हालत बताई। बॉस ने तुरंत ही एक कलिग को मेरा लोकेशन बता निकलने का आदेश दिया और फिर लगातार मेरे से फोन संपर्क में रहे।
यह ठीक है कि अब मैं उस रोज के डर से उबर चुकी हूं। और यह मैं खूब अच्छी तरह से जानती हूं कि रिपोर्टिंग के ऐसे अवसर आते ही रहेंगे और मैं जाती भी रहूंगी। पर इस शहर की व्यवस्था से उपजे सवाल का कोई जवाब मैं ढूंढ़ नहीं पा रही हूं कि देश की राजधानी में अगर लड़कियां इस कदर डर का शिकार बनी हैं, तो देश के दूसरे हिस्सों का क्या हाल होगा?
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
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9:14 PM
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Monday, March 23, 2009
हर तरह की गैरबराबरी के खिलाफ

हमें डॉ. लोहिया को इसलिए भी याद रखना चाहिए कि आज भी समाज को लोहिया की जरूरत है। कोई भी समाज जब थक-हार जाता है, उसके तेवर चुकने लगते हैं, उसकी ऊर्जाएं शेष होने लगती हैं
इसमें कोई संदेह नहीं कि डॉ. लोहिया आजाद भारत के सबसे प्रखर और मौलिक राजनीतिक चिंतक होने के साथ ही एक संघर्षशील, कल्पनाशील व सतत सक्रिय राजनेता थे। जरा देखिए कि लोहिया ने कैसी राजनीतिक पार्टी की कल्पना की थी - 'मैं चाहता हूं कि हमारी पार्टी ऐसी हो जाये कि वह पिटती रहे, पर डटी रहे। आखिर वह कौन-सी ताकत थी, जो तीन सौ वर्ष तक ईसाई मजहब को बार-बार पिटने के बाद भी चलाती रही? समाजवादी आंदोलन के पिछले 25 वर्ष के इतिहास को आप देखेंगे, तो पायेंगे कि सबसे बड़ी चीज जिसकी इसमें कमी है, वह यह कि यह पिटना नहीं जानते। जब भी पिटते हैं, धीरज छोड़ देते हैं। मन टूट जाता है। और हर सिद्धांत और कार्यक्रम को बदलने के लिए तैयार हो जाते हैं।'
उनके इसी विचार को अगर हम और विस्तारित अर्थ 'संस्था' के रूप में देखें, तो इसकी प्रासंगिकता आज और जबर्दस्त नजर आयेगी। आज की सामिजिक संस्था मूल्यहीनता के दौर से गुजर रही है। इस इकाई के परिचित चेहरे आत्ममुग्ध और आत्मरति के शिकार हो गये हैं। आत्मश्लाधाओं में जीते ये लोग इतने व्यक्तिवादी होते गये हैं कि हमारी अपनी संस्कृति हाशिए पर आ गयी है।
समाजवादी व्यवस्था के हिमायती थे डॉ. लोहिया। उनकी कामना थी कि वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था की जगह पर नयी समाजवादी व्यवस्ता की स्थापना हो। निजी पूंजी और विषमताओं के खिलाफ लोहिया की यह दृष्टि युगांतकारी थी। पूंजीवादी व्यवस्था के संदर्भ में उनका निष्कर्ष था कि यह व्यवस्था औद्योगिक क्रांति से निकली सभ्यता की संतान है। उनकी दृष्टि यह भी कहती थी कि यह सभ्यता लगातार मरणासन्न है और इसकी जगह पर नयी सभ्यता की स्थापना हर हाल में होनी है। डॉ. लोहिया के भीतर ऐसी आशंका 1950-51 में पैदा हो गयी थी और उन्होंने उसी समय अपने मित्रों के आमंत्रण पर की गयी अमेरिका की यात्रा में कई जगहों पर अपनी इस आशंका को व्यक्त भी किया था। 13 जुलाई 1951 को न्यूयॉर्क के आईडल वाइल्ड हवाई अड्डे पर उन्होंने कहा, 'अमेरिकी जनता के प्रति मेरे मन में बहुत प्यार है, लेकिन आधुनिक सभ्यता के बारे में, जिसकी चरम सीमा अमेरिका है, मेरे मन में कई संदेह हैं। मैं यहां यह देखने आया हूं कि प्रमुख क्या है - प्रेम या संदेह?' 35वें दिन अपनी अमेरिका यात्रा के समापन पर उन्होंने कहा, 'अमेरिकी जनता के प्रति मेरे अनुराग में वृद्धि हुई है, पर वर्तमान सभ्यता के प्रति मेरे मन में पल रही आशंका भी बड़ी हो गई है।' उसी यात्रा के दौरान उन्होंने एक बार कहा था - 'मैं फोर्ड और स्टालिन में कोई फर्क नहीं देखता। दोनों बड़े पैमाने के उत्पाद, बड़े पैमाने की प्रौद्योगिकी और केंद्रीकरण पर विश्वास करते हैं, जिसका मतलब है कि दोनों एक ही सभ्यता के पुजारी हैं।' अपनी आशंका को और पुख्ता ढंग से डॉ. लोहिया ने कहा, 'हमें यह बात समझ लेनी चाहिए कि यह सभ्यता मर चुकी है, किंतु लाश के रूप में अगले 50 वर्षों तक बनी रह सकती है और युद्धादि की क्रूर घटनाओं को जन्म दे सकती है।'
औद्योगिक क्रांति से उपजी हुई इस सभ्यता के बारे में जो संशय डॉ. लोहिया के भीतर पनपे थे, उन संशयों को वर्तमान में मूर्त रूप में देखा जा सकता है। बताने की जरूरत नहीं कि यूरोपीय और अमेरिकी समाज इन दिनों प्रयोजनहीनता का दंश झेल रहा है। वहां के दो-तीन दशकों के साहित्य प्रयोजनहीनता और उद्देश्यहीनता को अभिव्यक्त कर रहे हैं। वहां 'विचारों के अंत' और 'इतिहास के अंत' की बातें मुखर हो रही हैं। फ्रांस के लेखक जूनियन ग्रीन का कहना है कि 'पेरिस बुझ रहा है और इसकी सारी रोशनियां मद्धिम पड़ गयी हैं।' साहित्य अकादेमी की संगोष्ठी में भाग लेने के लिए भारत आयी वहां की युवा लेखिका लोरांस कोसे ने एक लेख में कहा था, 'आज फ्रांस के साहित्य में विचारों के अंत की अभिव्यक्ति, विचार मात्र के प्रति तिरस्कार, उद्देश्यों के प्रति संदेह, अप्रतिबद्धता और अपने भीतर सिमटने की प्रवृति के रूप में दिखाई पड़ रही है। अब न तो गुस्से से भरे लेखक हैं, न न्याय के लिए लड़ने वाले लेखक और न ही मातृ भाव बढ़ानेवाले लेखक हैं। यहां तक कि उनमें लिखने का उत्साह नहीं है।' यह हाल सिर्फ फ्रांस का नहीं है, पश्चिमी सभ्यता के लगभग सभी देशों का है। वहां के सारे दर्शन और तमाम विचार फीके पड़ते जा रहे हैं। यही वजह है कि बुद्धजीवियों की निगाह में इतिहास का अंत होता जा रहा है। इतिहास का ऐसा अंत तो दुखद है ही, लेकिन गौरतलब बात यह है कि इसकी वजहें वही हैं, जो डॉ. लोहिया ने काफी पहले बतायी थीं।
लोहिया नास्तिक थे और गांधी पूर्णतः आस्तिक। गांधी की ईश्वरीय आस्तिकता ऐसी गहरी थी कि मृत्यु के क्षणों में भी उनके आराध्य का नाम उनकी जुबान पर था। किंतु लोहिया ऐसी किसी भी ईश्वरीय शक्ति के प्रति पूरी तरह नास्तिक थे। लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि वे आस्थावान नहीं थे। उनकी आस्था उन्हें गहरे जोड़ती थी - मनुष्यों से, इनसानियत से। उनकी यह आस्था इतनी गहरी थी कि सान्निपातिक क्षणों में भी वे जब-तब भूखे-लाचारों के बारे में बड़बड़ा उठते थे। उनकी आस्था थी - समाज और सुदृढ़ समाज के तेवरों में। और उनकी यह आस्था नारी के समक्ष जाकर श्रद्धा का रूप ले लेती थी। प्रसाद की भाषा में कहा जाये तो 'नारी तुम केवल श्रद्धा हो।' उन्होंने समाज में नारी के समान अधिकार के लिए, उनके अधिकारों की रक्षा के लिए जो तेवर अपनाया, वह निस्संदेह परंपराभंजक ही था। उनका मानना था कि सीता-सावित्री नहीं, बल्कि द्रौपदी इस देश की प्रतिनिधि नारी है। उनकी कामना थी कि द्रौपदी की तेजस्विता इनमें पुनः स्थापित हो और रजिया की तरह वे पुनः सत्ता की केंद्र बनें।
समाज में महिलाओं की तात्कालीन स्थिति उन्हें सालती थी। वे चाहते थे कि समाज पर पुरुष का जो वर्चस्व कायम है वह टूटे। यहां महिला और पुरुष की समान भागीदारी हो।
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
at
1:48 AM
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