जिरह पढ़ें, आप अपनी लिपि में (Read JIRAH in your own script)

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Tuesday, April 7, 2009

दिल्ली में डरा-सहमा मन- 2

डर एक मनोभाव है, बेहद स्वाभाविक मनोभाव। पर जब यह दूसरे मनोभावों पर हावी होने लगे, तो बात चिंताजनक होने लगती है। लड़कियों का मन बेहद कोमल होता है, बल्कि कहना यह चाहिए कि मन के दो रूप हैं - कोमल और कठोर। कोमल मनोभाव स्त्री मनोभाव है और कठोर, पुरुष मनोभाव। जरूरी नहीं कि यह कठोर तत्व पुरुष शरीर में ही मौजूद हो और कोमल तत्व स्त्री शरीर में। जाहिर है कहना यह चाहता हूं कि दिल्ली हो या मुंबई, रांची हो या करांची - हर तरफ यह कोमल मन डरा सहमा है। फिलहाल, पेश है दीपा पवार का एक संस्मरण। वह पेशे से पत्रकार हैं। :

-अनुराग अन्वेषी


खबार पढ़ने की जब लत लग रही थी, मेरा सबसे ज्यादा ध्यान क्राइम की खबरों पर जाता था। लूट, चोरी और छेड़खानी जैसी छोटी खबर भी मुझे बहुत बड़ी लगती थी। उन दिनों भी अखबार रेप, अपहरण, छेड़छाड़, लूट और हत्या की खबरों से अंटे रहते थे। इन खबरों को पढ़ने के बाद इनसानी रिश्ते मुझे बकवास की तरह लगने लगते। सारा शहर मुझे जानवर सरीखा लगने लगता। फिर जब मन खबरों से बाहर आता, मैं खुद से जिरह करती। कई बार लगता था कि ये स्त्रियां खुद को इतना कमजोर क्यों मानती हैं? डटकर मुकाबला क्यों नहीं कर सकतीं? आखिर बस जैसी सार्वजनिक जगह में कोई कैसे किसी को छेड़कर बच निकलेगा? जरा-सा शोर मचाने की हिम्मत तो महिलाओं में होनी ही चाहिए, फिर देखें वे कि कैसे इन मजनुओं का कचूमर निकालती है पब्लिक। पर धीरे-धीरे ये खबरें मेरे लिए आम होती गईं। अपनी ओर ध्यान भी नहीं खींच पाती थीं वे, पढ़ने के लिए बाध्य करना तो दूर की बात। एक तरह से मान बैठी कि डरपोक स्त्रियों की नियति है यह।

वक्त बीतता रहा और ऐसी खबरों को जीवन के हाशिये पर छोड़ती चली। अचानक एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि मेरे भीतर मर चुका डर अचानक अपना सिर उठा बैठा। मैं ब्लूलाइन बस में बैठकर सीपी जा रही थी। दिन का वक़्त था। फिर भी बस में बहुत कम मुसाफिर थे। ड्राइवर, कंडक्टर और उनके एक साथी के आलावा कुल 5-6 लोग। बसों में आना-जाना सामान्य सी बात थी मेरे लिए। जब मैं बस में बगैर किसी साथी के होती हूं तो अक्सर किसी न किसी विषय पर सोचती रहती हूं। उस दिन भी किसी टॉपिक पर खुद से विचार-विमर्श कर रही थी। अचनाक मैंने महसूस किया कि बस के कंडक्टर ने अपने साथी को कुछ इशारा किया। कंडक्टर ठीक मेरे आगे वाली सीट पर बैठा था। मुझे लगा कंडक्टर का यह इशारा कुछ मुझसे जुड़ा है। यह सब कुछ सोच ही रही थी कि अगले पल उसका साथी जो दूसरी तरफ बैठा था, उसने मेरी ओर देखा फिर कंडक्टर की ओर देख कर उसे उसने ओके का इशारा किया। मेरी चेतना जो तभी से मुझसे बहस करती चल रही थी, वह इस पल भर के इशारों पर आकर केंद्रित हो गई। कंडक्टर और उसके साथी का इशारा मुझे बेहद भद्दा और डरावना लगा। अब बस का ड्राइवर भी मुझे घूरने लगा था। मैं बस में आगे ही बैठी थी, इसलिए मुझे यह भी ध्यान नहीं था कि बस में अब कितने मुसाफिर बैठे हैं। मुझे लगा कि कहीं बस में मैं अकेली तो नहीं बच गई हूं? बेहद तनाव में आ चुकी थी मैं। ड्राइवर, कंडक्टर और उसके साथी आपस में फूहड़ हंसी-मजाक कर रहे थे। इस बीच मैंने उनसे अपनी आंखें चुरा बस में बैठे यात्रियों की संख्या का जायजा लिया। थोड़ी राहत मिली। बमुश्किल 5 लोग बैठे थे। सवारियों में एक लड़की को देखकर जान में जान आयी। मैंने उसी वक़्त फैसला किया कि जहां यह लड़की उतरेगी मैं भी वहीं उतर जाऊंगी। मुझे बारहखंबा रोड जाना था। पर उनके इशारों और फूहड़ हंसी-मजाक ने मुझे इतना चिंतित कर दिया था कि मैं तिलक ब्रिज पर ही उस लड़की के साथ उतर गयी। उसके बाद मैंने डीटीसी की भरी हुई बस से आगे का सफर तय किया।

इस छोटी-सी घटना के बाद घर लौटकर मैंने अपने डर का विश्लेषण किया।

मैं क्यों डरी, मेरे पास तो मोबाइल फोन है। किसी अयाचित स्थिति में मैं 100 नंबर डायल कर पुलिस को बुला सकती थी।

- दरअसल, कई खबरें पढ़ चुकी हूं ऐसी कि मदद के लिए 100 नंबर पर कॉल करते रहे पीड़ित और पुलिस मौके पर पहुंची डेढ़-दो घंटे बाद।

ठीक है कि 100 नंबर का भरोसा बहुत मजबूत नहीं है। पर खुद पर तो भरोसा है न, इतना आतंकित होने की जरूरत क्या थी?

- खबरें बताती हैं कि दिनदहाड़े हत्या हुई, पर आश्चर्य, किसी को नहीं दिखता हत्यारा। न पकड़ पाते हैं, न उसके खिलाफ गवाही देते हैं। मेरी मदद को कौन आता?

रही बात आतंकित होने की, तो स्त्री होने का अहसास, उसकी मजबूरियां, उसकी सीमाएं जो घुट्टी के तौर छुटपन से ही पिलाई जाती हैं, उसी का नतीजा था मेरा डर। यह अलग बात है कि मैंने अपनी इच्छा शक्ति से, अपने साथियों की हौसलाआफजाई से और अपनी समझदारी से उस डर को मार दिया था, पर उसे अपने से बाहर नहीं कर पाई थी। और जैसे ही मैं थोड़ी कमजोर पड़ी कि वह डर सिर उठाकर सामने आ खड़ा हुआ। पर मुझे खुशी है कि मैं अतिविश्वास की शिकार नहीं, मैंने बिल्कुल सही फैसला किया तिलक ब्रिज पर उतरने का। आपका क्या ख्याल है?

8 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

आपने जो किया वह ठीक किया ..पर इस घटना को पढ़ते हुए सहज ही एक बात दिल में आई कि आपके साथ सिर्फ एक ही लड़की और थी बस में ... उसका क्या हुआ होगा ? या तो आप उसको भी साथ ही उतार लेती जब आपको उन लोगों की नीयत ठीक नहीं लग रही थी तो ...?

अनुराग अन्वेषी said...

रंजना जी की टिप्पणी के बाद मैंने देखा कि दीपा ने मेल में लिखा था पर एडिटिंग के दौरान 'उस लड़की के साथ' शब्द मेरे से छूट गए। ध्यान दिलाने का और ध्यान रखने का शुक्रिया रंजना जी।

परमजीत बाली said...

समय के अनुसार अपने बचाव के लिए जो भी फैसला लिया जाता है वह उचित ही है।

lalit said...

फैसला तो आपका सही ही कहा जाना चाहिए लेकिन यहां कुछ और बातें भी कहना चाहूंगा। कमजोर होने का डर सिर्फ लड़की होने से ही नहीं आ जाता। आपने जो लास्ट में प‍ॉइंटआउट किया है असली जड़ वह है। खुदा न करे आपके साथ बस में कुछ हो भी जाता तो कोई गारंटी नहीं कि वे पांच-छह लोग कुछ मदद करते। ऎसे मामलों में आंखें मूंद लेने के पीछे वजहें क्या होती हैं यह बहस बहुत लंबी हो सकती है पर यह तय है ऎसे में मदद न करने वाले लोगों के विचारों की नपुंसकता एक दिन ऎसा समाज बना डालेगी कि इंसानियत के नाते मदद जैसे शब्द खत्म हो जाएंगे। हादसे में लहूलुहान आदमी सड़क पर पड़ा है पर तुम आंखें मूंद लो वरना यूं ही पुलिस के पचड़ों में पड़ना पड़ेगा। पचड़ा कीमती है किसी की जान नहीं। लड़की को किसी ने छेड़ा तुम्हें क्या तुम्हारी कौन सी बहन लगती है। तुम आंखें मूंद लो और चलते रहो अपनी राह मुर्दा बने हुए। यह सही है कि दूसरे की मदद करने में पचड़े बहुत होते हैं पर कुछ तो करना होगा ना। वरना किसी दिन आपका भाई सड़क पर घायल पड़ा रहेगा कोई पूछेगा नहीं। आपकी बहन को कोई छेड़ेगा वह आकर आपको बताएगी। आप पब्लिक को मां बहन की गाली देते रहिएगा।
-ललित

संगीता पुरी said...

आपने जो फैसला किया ... वह सही माना जा सकता है ... क्‍योंकि जहां किसी प्रकार का शक हो ... वहां सावधानी आवश्‍यक होती है ।

nilay said...

Yeh saari ghatna bas isi baat ki or ishara hai ki aaj bhi humare samaaj mein ladkiyan apne aap ko kitna surakshit mahsoos kartii hain!!..agar ek padhi-likhi,reporter[jinhein apne aas-pass ke saare sam-samaajik ghatnaa-kramo ka bhan hota hai,jinse hum kisi bhi paristhiti anuroop apne aap ko dhaal kar sarwottam nirnay lene ki ummid kar sakte hain..],ke saath jab aisi ghatna ghat saktii hai...aur aise mauke pe woh apne aap ko asurakshit mahsoos kar saktin hai toh fir baki ladkiyon ke baare mein toh hum kayaas bhi nahi lagaa sakte....
Aur aisaa bhi nahi hai ki yeh ghatna kisi akeli ya weeran jagah pe ghat rahi hai...balki yeh uss blueline bas ka nazara hai jahan aadhi se jyada delhi safar karti hai...woh bhi ek do din nahi...saal ke 365 din...24 ghante...
Kya aisi paristhiti ko taalne ke liye koi kargar upay nahi talashaa ja saktaa hai jissekal ho ke humein kisi bhi ladki ki aankhein khauf-jadaa na dikhein...kya aise asaamajik tatwon ke wirudhh koi karya-waahi nahi ki ja sakti jo ki inke hosh faqta kar de...inhe aisaa sonchne ke khyal se hi pasina aa jaye...taaki yeh bhi mahilaon aur ladkiyon ko ek haad-mans ki kath-putli ki nahi...kisi ki maa,behen ya beti ki sammanit nazar se dekhein...Taaki kal ho ke kisi bhi ladki ka udas ya dara hua chehra dekh kar humein apne hi nazaron mein sharmindagii na jhelni pade....
issliye iss saar ghatna-kram ko saamne laane ke liye aur samaj ka asli aaina dikhane ke liye aapko bahut-bahut shukriya...aur ek achhi pehel ke liye haardik badhaiyan....

nilay said...

Yeh saari ghatna bas isi baat ki or ishara hai ki aaj bhi humare samaaj mein ladkiyan apne aap ko kitna surakshit mahsoos kartii hain!!..agar ek padhi-likhi,reporter[jinhein apne aas-pass ke saare sam-samaajik ghatnaa-kramo ka bhan hota hai,jinse hum kisi bhi paristhiti anuroop apne aap ko dhaal kar sarwottam nirnay lene ki ummid kar sakte hain..],ke saath jab aisi ghatna ghat saktii hai...aur aise mauke pe woh apne aap ko asurakshit mahsoos kar saktin hai toh fir baki ladkiyon ke baare mein toh hum kayaas bhi nahi lagaa sakte....
Aur aisaa bhi nahi hai ki yeh ghatna kisi akeli ya weeran jagah pe ghat rahi hai...balki yeh uss blueline bas ka nazara hai jahan aadhi se jyada delhi safar karti hai...woh bhi ek do din nahi...saal ke 365 din...24 ghante...
Kya aisi paristhiti ko taalne ke liye koi kargar upay nahi talashaa ja saktaa hai jissekal ho ke humein kisi bhi ladki ki aankhein khauf-jadaa na dikhein...kya aise asaamajik tatwon ke wirudhh koi karya-waahi nahi ki ja sakti jo ki inke hosh faqta kar de...inhe aisaa sonchne ke khyal se hi pasina aa jaye...taaki yeh bhi mahilaon aur ladkiyon ko ek haad-mans ki kath-putli ki nahi...kisi ki maa,behen ya beti ki sammanit nazar se dekhein...Taaki kal ho ke kisi bhi ladki ka udas ya dara hua chehra dekh kar humein apne hi nazaron mein sharmindagii na jhelni pade....
issliye iss saar ghatna-kram ko saamne laane ke liye aur samaj ka asli aaina dikhane ke liye aapko bahut-bahut shukriya...aur ek achhi pehel ke liye haardik badhaiyan....

Ek ziddi dhun said...

vivek ke sath uthaya gaya kadam hi bahaduri hai.