जिरह पढ़ें, आप अपनी लिपि में (Read JIRAH in your own script)

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जिरह करने की कोई उम्र नहीं होती। पर यह सच है कि जिरह करने से पैदा हुई बातों की उम्र बेहद लंबी होती है। इसलिए इस ब्लॉग पर आपका स्वागत है। आइए,शुरू करें जिरह।
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Tuesday, April 21, 2009

मां की गोद का जादू

आज पता नहीं क्यों, सुबह से ही मन काफी अशांत था। बचपन की तमाम यादें सिरहाने आकर बैठ गयी थीं। उन दिनों में लौटने को जी मचल-मचल जा रहा था। पर यह मुमकिन न था। इन सब के बीच मां बेतरह याद आती रही। जाहिर है मेरी बेचैनी दुनी हो गई। क्या करता, अपनी पुरानी कविताएं पढ़ने लगा। इसी बीच मां को याद कर लिखी कविता मेरे सामने आ गई। हालांकि वह कविता इस ब्लॉग पर काफी पहले डाल चुका हूं, पर एक बार फिर से इसे दूसरे रूप में आपके सामने रखने की चाह हुई।


3 comments:

श्यामल सुमन said...

शब्दों में करना कठिन माता का गुणगान।
माँ की गोदी में मिले सुख भी स्वर्ग समान।।


सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत भावुक कर देने वाली कविता है ...माँ की गोद का जादू कब भूल पाता है मन ..

आदर्श राठौर said...

मैं पहले भी इस कविता को पढ़ चुका था लेकिन इस नए रूप में सुनकर अच्छा लगा। आपका अंदाज़ प्रभावी लगा... भावों के अनुरूप आवाज़ में उतार-चढ़ाव लाया है।