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Tuesday, April 21, 2009

दिल्ली इज नॉट सेफ फॉर गर्ल्स


डर सिर्फ स्त्रियों को ही नहीं लगता, डरते पुरुष भी हैं इस माहौल में। आने वाले दिनों में इस ब्लॉग पर पुरुषों के भी ऐसे अनुभव आपको पढ़ने को मिलेंगे। फिलहाल कात्यायनी उप्रेती ने अपना यह अनुभव हम सबों के लिए लिख भेजा है। वह दिल्ली में रहकर पत्रकारिता कर रही हैं :

-अनुराग अन्वेषी

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दिल्ली इज नॉट सेफ फॉर गर्ल्स'। राजधानी में लड़कियों की सेफ्टी पर जब भी बात उठती है, इसी लाइन से शुरू होकर इसी पर खत्म होती है। लड़कियों से पूछा जाए, तो शायद हर लड़की किसी न किसी ऐसी घटना से गुजरी है, जिसे हमारा कानून 'क्राइम' कहता है। खुद की बात करूं, तो जब भी इस इश्यू पर सोचती हूं, तो मुझे मेरे और दोस्तों-परिचितों के कई अनुभव याद आते हैं। वे अनुभव जो बार-बार कहते हैं कि इस समाज का बड़ा हिस्सा आज भी लड़कियों को ऑब्जेक्ट मानता है।

अभी कुछ दिनों पहले की तो बात है। मेरा ऑफ डे था और इंडियन हैबिटैट सेंटर में शाम 7 बजे से एक प्रोग्राम। जाने का मन था लेकिन दिमाग ने सवाल किया - लौटने में प्रॉब्लम तो नहीं होगी? मन ने कहा - चल यार...। दिन में मां से फोन पर बात हुई, तो प्रोग्राम की बात निकल गई। वह फट से बोली - रहने दे, रात हो जाएगी... वैसे भी दिल्ली सेफ नहीं। खैर, मैं चली गई। प्रोग्राम और लोगों से मुलाकातें अच्छी लगीं। लेकिन मेरी नजरें रह-रहकर घड़ी देखने लग जाती थी। रात 8:30 बजे मैं मेन रोड पर थी। सड़क पर अभी लोग दिख रहे थे। तीन ऑटो दिखे, मजबूरी का फायदा उठाने के लिए तैयार, अपने दोगुने दामों के साथ। मैंने बस से जाना तय किया। कुछ कदम आगे रोड के किनारे एक गाड़ी के सामने खड़े 32-33 साल के शख्स से पूछा - एक्स्क्यूज मी, सामने जो स्टैंड है वहां से साउथ एक्स के लिए बस मिलेगी? आदमी ने एक चीप स्माइल पास की और बोला - कितने पैसे दोगी मैडम, मैं अपनी ही गाड़ी में छोड़ दूंगा। देखने से वह गाड़ी का ड्राइवर लगा। मेरे भीतर गुस्सा और डर ने फौरन सिर उठाया। उसकी बेशर्म मुस्कान बरकरार थी और वह जवाब के इंतजार में था। उसके चेहरे के भाव देखकर मेरे डर को ओवरटेक करता हुआ गुस्सा मेरे पास आ गया, जिसने हिम्मत जनरेट कर दी और मैंने कहा - अभी 100 नंबर पर फोन करूंगी, पुलिस की गाड़ी फ्री में घर छोड़ेगी। यह सुनते ही फट से वह दूसरी गाडिय़ों के पीछे होते हुए ओझल हो गया। एक मिनट बाद मैं स्टैंड में थी और दो मिनट बाद एक ठसी बस में। बस में चढ़ते ही मैंने अपने जेंडर की तलाश की। दो दिखीं तो चैन मिला। घर पहुंचते ही सही सलामत घर पहुंचने की खबर मां को दी।

ऐसे छोटे-छोटे मामले तो हम लड़कियां तकरीबन हर रोज झेलती हैं। कई बार सोचती हूं कि चलो अच्छा है, इसी बहाने कुछ बुरे लोगों को डराने का गुर तो सीख हैं हम। पर इसी के साथ दूसरा ख्याल आता है कि ये छोटे मामले ही कई बार बड़े बन जाते हैं। सड़क छाप मजनुओं को डराने की कोशिश कई बार किसी बड़ी मुसीबत खड़ी कर देती है। जाहिर है इस शहर में हर लड़की अंधेरे में तो क्या, उजाले में भी खुद को सेफ नहीं मानती। लड़कियां हैरान, परेशान, सावधान हैं। उनके लिए शाम को अकेले निकलना, ऑटो लेना, दिन में भी सुनसान सड़क में जाना जैसी तमाम चीजों के आगे 'अवॉइड करें' जोड़ दिया जाता है। लेकिन अवॉइड करना क्या सही सॉल्यूशन है? इससे तो वे दुनिया के कई पहलुओं से महरूम हो जाएंगी। आखिर हम अपने इस लापरवाह सिस्टम के लूपहोल्स को कैसे भर सकते हैं? लड़कियों की सिक्युरिटी को लेकर बना हर नियम-कानून इम्प्लिमेंटेशन मांगता है। इन नियम-कानून को इंम्प्लिमेंट करवाने वाले जब तक एक्टिव नहीं होंगे और जब तक इन्हें तोडऩे वालों को तुरंत सजा नहीं मिलेगी, तब तक लड़कियां अवॉइड करेंगी। फिर चाहे वह शाम को घर से निकलना हो या बस में लगने वाले अननैचरल धक्का। और जब भी वे इस दुनिया में अपने सपनों को पाने के लिए बाहर निकलेंगी, समाज के ये सभ्य पुरुष उन्हें घेरेंगे और इस शहर को 'दिल्ली इज नॉट सेफ फॉर गर्ल्स' का दर्द सहना पड़ेगा।

11 comments:

Anil said...

भेड़ियों से बचने के लिये कात्यायनी जी ने जो हिम्मत दिखायी, वही हिम्मत भारत की हर महिला दिखाये तो क्या बात! फिर कल घुघूति बासूती जी की सैंडल वाली बात भी याद आती है!

vijay gaur/विजय गौड़ said...

किसी भी अन्य शहर में, चाहे वह हमारे देहरादून शहर से १००० किमी की दूरी पर हो, बेशक भाषा में अन्जाना हो, पर वहां डर नहीं लगता लेकिन दिल्ली की हवा में ही एक अन्जाना भय तैरता हुआ हमेशा दिखता है। बल्कि हमेशा एक अपरिचित जगह पर होने का अहसास बना रहता है और सच कहूं तो अपरिचित होने का यह अहसास किसी अन्य हिन्दी भाषी शहर में होने पर भी लगता ही है, हां दिल्ली जैसा अन्जाना डर बेशक वहां उतना न लगे। क्या हम हिन्दी बैल्ट के लोगों के भीतर ही तो यह असुरक्छाबोध तो नहीं जो दिल्ली में ज्यादा हिंसक नजर आता है क्योंकि वहां तो अपनी पहचान के छुपा ले जाना का खासा मामला है ?

सुजाता said...

एक अच्छी शुरुआत है यह शृंखला जिसमे अब तक मैने चार लेख पढ लिए हैं।लेकिन मै क्या लिखूँ कि इस तरह का अनुभव कोई एक नही है, यह शहर अपनी बदसूरती मे चरम पर होता है जब आप सुनसान दोपहरी में सड़क पर चल रही हों या अन्धेरा होने पर घर जाने के रास्ते पर निकली हों।ऐसे मे दुर्घटना से बचे रहना लक बाय चांस ही नज़र आता है !

संगीता पुरी said...

जब देश की राजधानी में ये हाल हो ... तो अन्‍य शहरों में महिलाएं कितनी सुरक्षित होंगी ... इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है।

कुश said...

दिल्ली में ही मेरी एक मित्र को खींच कर कार में ले जाने की कोशिश की कुछ लड़को ने लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी और जूझती रही बहुत देर तक जब वो कार के साथ रगड़ती हुई सड़क पर काफी दूर तक गयी तो उन लड़को ने उसे छोड़ दिया.. बहुत दिन अस्पताल में ही बीते थे.. ऐसे कई किस्से मेरी कई दोस्तों के साथ हो चुके है..

अनुराग अन्वेषी said...

कुश भाई, आपके मित्र के साहस की चर्चा विस्तार से होनी चाहिए। चाहूंगा कि आप थोड़ी मेहनत हमारे लिए करें और वे संस्मरण इस ब्लॉग का हिस्सा बनें। संस्मरण के इंतजार में...
आपका अनुराग अन्वेषी

अविनाश वाचस्पति said...

सेफ तो सेफ शब्‍द भी नहीं है आज

नारी की तो छोडि़ए

पुरुष ही कहां सेफ हैं

लुट तो वे भी रहे हैं

लूटे जा रहे हैं सब

लुट तो वो जनता भी नहीं है

जिसे पता लगता नहीं और

नेता उनका वोट लूट ले जाते हैं

लूट ही हावी है

सर्वोपरि है

दस्‍तूर है

पर कसूरवार

सूअर नहीं

हम ही हैं

हम सब।

Ek ziddi dhun said...

Upreti, kaisi ho?
Duniya behtar ho, ye jimmedari purushon ki bhi hai par ve ise badnuma karne mein lage hue hain.

कुश said...

@Anurag Ji
shayad main fir se us par baat na kar paau.. but kabhi laga to zaroor share karunga..

रंजना [रंजू भाटिया] said...

इस तरह के किस्से से दो चार होना ही पड़ता है ..बस होश और हिम्मत नहीं गुम करने चाहिए ..

Ritesh Purohit said...

yeh keval dilli ki nahi, poor desh ki hi problem hai. hamare ki lakho buraiyon me se yeh bhi ek hai. jab tak hamare pakhandi deshvasiyon ka mansik star uncha nahi hoga, is tarah ki problem solve nahi ho sakte.