जिरह पढ़ें, आप अपनी लिपि में (Read JIRAH in your own script)

Hindi Roman(Eng) Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam

 
जिरह करने की कोई उम्र नहीं होती। पर यह सच है कि जिरह करने से पैदा हुई बातों की उम्र बेहद लंबी होती है। इसलिए इस ब्लॉग पर आपका स्वागत है। आइए,शुरू करें जिरह।
'जिरह' की किसी पोस्ट पर कमेंट करने के लिए यहां रोमन में लिखें अपनी बात। स्पेसबार दबाते ही वह देवनागरी लिपि में तब्दील होती दिखेगी।

Tuesday, July 28, 2009

उसका सुख मेरे सुख से बड़ा कैसे?

यह है मणिराम। हिंदी में एमए पास का दावा करनेवाले इस रिक्शेवाले से मेरी मुलाकात तकरीबन 10 दिन पहले हुई थी। पिछले शनिवार को नवभारत टाइम्स के कॉलम 'आंखों देखी' में इसे जगह मिली। हालांकि आज जब मैं इसे अपने ब्लॉग पर पब्लिश कर रहा हूं, तीखी धूप को कल रात हुई बारिश बहा ले गई है। पर मणिराम से मिलने के बाद जो कसक पैदा हुई मन में उसका तीखापन अब भी बरकरार है।

-अनुराग अन्वेषी



ती
खी धूप है। दफ्तर जाने के लिए सोसाइटी से बाहर निकला हूं। रिक्शावाला पूछता है - कहां जाना है? मैंने चुटकी ली, जाना तो है बहुत दूर, कहां पहुंचा सकते हो? रिक्शावाला हाजिरजवाब निकला, कहता है जिन्हें मंजिल का पता होता है, वह दूसरों के सहारे के बगैर ही पहुंचते हैं। मुझे अच्छी लगी उसकी हाजिरजवाबी। बात जारी रखता हूं। पूछता हूं कि गर्मी का क्या हाल है? तपाक से कहता है, लोग पिघल रहे हैं, भगवान नहीं। मन ही मन चौंकता हूं, पर उसके सामने जाहिर नहीं होने देता। थोड़ी चुप्पी बन गई। फिर मैंने उससे पूछा, सिगरेट जलाना है, माचिस है तुम्हारे पास? छूटते ही उसने कहा, जलाते हो सिगरेट, जलते हो आप, क्यों साब? कैसा है यह हिसाब?

अब मुझे लगा कि उससे उसका परिचय तो पूछ ही लूं। उसने बताया मध्यप्रदेश का रहने वाला है वह। नाम है मणिराम। हिंदी में एमए कर रखा है उसने। पर कोई रोजगार नहीं मिला, तो अपने एक परिचित के साथ चला आया गाजियाबाद के वसुंधरा में। मैट्रिक तक पढ़ी उसकी पत्नी दूसरों के घरों में बर्तन-बासन, झाड़ू-पोंछा करती है। वह खुद रिक्शा चलाता है। दोनों मिलकर महीने में तकरीबन 5000 रुपये कमा लेते हैं।

उसके पढ़े-लिखे होने की बात सुन लेने के बाद इस व्यवस्था के प्रति मन इतना खट्टा हो जाता है कि मेरे पास कहने को कुछ नहीं रह जाता। बावजूद, जबर्दस्ती बातचीत जारी रखता हूं। किस दौर की कविता तुम्हें ज्यादा पसंद है, मैं पूछता हूं मणिराम से। पर सच है कि मैं उसका परिचय सुनने के बाद अपने से जिरह करने लग गया हूं। मैं भी हिंदी में एमए पास हूं। सोचता हूं वह पढ़ाई-लिखाई में जितना भी गया गुजरा होगा तो भी कई ऐसे लोगों से बेहतर होगा जो आज उसका दस गुणा कमा रहे हैं। पर मणिराम अपनी स्थिति से संतुष्ट है। उसे जिंदगी से शिकायत नहीं। एक तरफ मेरे जैसे लोग हैं जो शिकायतों का पुलिंदा लेकर बैठे हैं। जरा सी कोई बात हुई नहीं कि काट खाने को दौड़ेंगे। मैं पसीने से तरबतर हो चुका हूं। जेब से रुमाल निकालता हूं चेहरा पोंछने के लिए और मणिराम इस भरी दोपहर में पूरे इत्मीनान के साथ रिक्शा खींच रहा है। जयशंकर प्रसाद की पंक्तियां सुनाता हुआ - हिमाद्री तुंग श्रृंग से, प्रबुद्ध शुद्ध भारती, स्वयं प्रभा समुज्वला, स्वतंत्रता पुकारती, अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़ प्रतिज्ञ सोच लो, प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो-बढ़े चलो... साब जी मंडी आ गयी। यहीं मेरी तंद्रा टूटती है। रिक्शे से उतर कर मणिराम को पैसे देता हूं। ऑटो वाला मेरे इशारे पर रुक चुका है। ऑटो में बैठ कर जा रहा हूं, पर मुझे लगता है कि मैं अब भी रुका हूं मणिराम के पास, अपनी खुशियां, अपनी संतुष्टि तलाशता हुआ। लगता है, एमए बहुत दूर की बात है, मैंने तो अभी जिंदगी की पहली कक्षा की भी पढ़ाई नहीं की।

9 comments:

Udan Tashtari said...

चरमराई व्यवस्था के चलते ऐसे मणिराम गली गली घूम रहे हैं, कोई देखने सुनने वाला नहीं. आपका साधुवाद आप सामने लाये.

संगीता पुरी said...

सब व्‍यवस्‍था का दोष है .. एक के दोष का फल दूसरा भुगतने को मजबूर है।

अनामदास said...

बहुत सुंदर, असरदार पोस्ट.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

मणिराम ने आप को रिक्षे से एक स्थान से दूसरे तक पहुँचाया। क्या उस का श्रम इतना कमजोर था कि उस पर व्यवस्था को शर्म आए। हम श्रम को हमेशा नीचा क्यों समझते हैं? उसे बराबरी का दर्जा क्यों नहीं देते? व्यवस्था का दोष तो इस में है कि वह श्रम को निचले दर्जे का मानती है।

डॉ .अनुराग said...

कभी एक शेर लिखा था अनुराग जी.....वही अर्ज कर रहा हूँ...क्यूंकि कहने को मेरे पास भी कुछ नहीं है ....

"रोटी दाल की फ़िक्र में गुम गये
मुफलिसी ने कितने हुनर जाया किये "

Siddharth Rai said...

क्या हम उस व्यवस्था का हिस्सा नहीं हैं?क्या हमने मौका मिलते ही विदेश जाने और फुर्सत मिलते ही सो जाने की आदत नहीं बना ली है?
खैर मनीराम ने तो व्यवस्था से पार पाने का तरीका निकल ही लिया पर हम सिर्फ कोस रहे हैं?

Aadarsh Rathore said...

एक बार मेरी मुलाकात ऐसे ही एक ऑटो चालक से हुई। उनकी शिक्षा का तो नहीं पता लेकिन उन्हें इतिहास का जबर्दस्त ज्ञान था।
वाकई व्यवस्था बहुत जालिम हो चुकी है।

रचना गौड़ ’भारती’ said...

आज़ादी की 62वीं सालगिरह की हार्दिक शुभकामनाएं। इस सुअवसर पर मेरे ब्लोग की प्रथम वर्षगांठ है। आप लोगों के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष मिले सहयोग एवं प्रोत्साहन के लिए मैं आपकी आभारी हूं। प्रथम वर्षगांठ पर मेरे ब्लोग पर पधार मुझे कृतार्थ करें। शुभ कामनाओं के साथ-
रचना गौड़ ‘भारती’

सागर नाहर said...

कुछ वर्षों पूर्न जब मैं सुरत/गुजरात में था, मैं जिनके यहां पेइंग गेस्ट था उनके मकान में कुछ काम चल रहा था। जब मजदूर दोपहर को खाना खाकर कुछ दे्र सुस्ता रहे थे, एक मजदूर वहां पड़े रद्दी अंग्रेजी अखबार को निकाल कर देख रहा था। मैने मजाख में पूछ लिया मामा क्या पढ़ रहे हो? पढ़ना आता है या यूं ही?
मामा ने फर्राटे से वह अंग्रेजी अखबार मुझे पढ़ कर सुना दिया, बाद में पता चला वह भी एम ए पास था।