जिरह पढ़ें, आप अपनी लिपि में (Read JIRAH in your own script)

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जिरह करने की कोई उम्र नहीं होती। पर यह सच है कि जिरह करने से पैदा हुई बातों की उम्र बेहद लंबी होती है। इसलिए इस ब्लॉग पर आपका स्वागत है। आइए,शुरू करें जिरह।
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Sunday, May 3, 2009

आगरा हो या दिल्ली : हालात हर जगह एक से हैं

नमिता शुक्ला को दिल्ली आए हुए अब साल भर होने जा रहा है। स्वभाव से वह निर्भीक हैं और पेशे से पत्रकार। वह मानती हैं कि डर नाम का भाव हम सबों के भीतर बसा होता है। और कोई भी छोटी-सी घटना उस डर को उभार सकती है। तकरीबन दो साल पहले आगरा के एक अखबार से बतौर क्राइम रिपोर्टर उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की थी। वहां वह फोटोग्राफर की भूमिका भी निभाती थीं। आगरा का एक संस्मरण वह यहां शेयर कर रही हैं।

-अनुराग अन्वेषी

बा

त दो साल पहले की है, मैंने आगरा में नौकरी ज्वॉइन की थी। रहने का ठौर मिला था मौसी के पास। मेरे घर के लोग भी इतमिनान में थे कि चलो, बेटी अपनी मौसी के घर में रह रही है। मौसी का घर सिकंदरा में था जबकि मेरा ऑफिस संजय प्लेस में। दिन भर की नौकरी बजा कर रात तकरीबन 8 बजे घर लौटती थी अपनी एक्टिवा बाइक से। सब कुछ सामान्य चल रहा था। एक रोज मुझे ऑफिस से निकलने में थोडी देर हो गयी। तकरीबन 8:30 बजे मैं घर के लिए निकली। सिकंदरा हाइवे से होते हुए घर जा रही थी।

थोडी देर बाद ही मुझे लगा कि कोई गाड़ी मेरा पीछा कर रही है। मैंने पीछे मुड़कर देखा तो मेरा शक सही निकला। एक टाटा सूमो में बैठे कुछ लोग मेरा पीछा कर रहे थे। मैंने अपनी एक्टिवा की स्पीड बढ़ा दी। इसके साथ ही टाटा सूमो की भी स्पीड बढ़ गयी। अनिष्ट की आशंका से पलक झपकते ही मेरा मन बुरी तरह घबरा गया। बगैर विचारे मेरी गाड़ी की स्पीट 70-80 होने लगी। पर यह काफी नहीं थी। सूमोसवार मेरी बगल में पहुंच चुके थे। उसमें से कुछ लड़के सिर बाहर निकालकर चिल्लाने लगे। उस वक्त मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे। लेकिन शायद मुसीबत सामने होती है तो हिम्मत अपने आप ही आ जाती है। मैंने गाड़ी की स्पीड और बढा दी। अपनी अब तक की लाइफ में सबसे तेज़ गाड़ी उसी दिन चलायी थी। सिकंदरा आने से कुछ पहले ही रास्ते में पंछी पेठे कि दुकान पड़ती है। मैंने देखा वहां काफी लोग खड़े हैं, दुकान पर अच्छी खासी भीड़ थी। वहां मैंने अपनी गाड़ी रोक दी। दुकान पर भीड़ देख सूमो वाले आगे निकल गये।

हिम्मत नहीं हो रही थी पर मैंने घर जाने के लिए शॉर्टकट रास्ते का इस्तेमाल किया। सकुशल घर पहुँचते ही सबसे पहले छत पर गयी और खूब रोई। मुझे उस वक्त घर के एक-एक लोग बेहद याद आए। उस दिन मुझे अहसास हुआ कि समाज चाहे कितना भी प्रगतिशील क्यों न हो जाए, हम लड़कियां कई बंधनों में जकड़ी हैं। असुरक्षा का टोप पहन हमें इस आजाद समाज में रहना है...

5 comments:

P.N. Subramanian said...

बात का बुरा न माने. महिलाओं के लिए देर रात बाहर रहना असुरक्षित ही है. जंगली जानवर ही सड़कों पे मिलेंगे. इसीलिये माँ बाप अपनी लड़कियों को हमेशा समझाते रहते हैं. यह भारत ही नहीं दूसरे सभ्य देशों में भी है.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

एक डर तो बना ही रहता है हर वक़्त ..बाते चाहे कितनी तरक्की को हो जाए ..पर असुरक्षा की भावना खत्म नहीं हो पाती

डॉ .अनुराग said...

भय सेक्स में भेदभाव नहीं करता अनुराग जी....मेरे एक डॉ मित्र सपरिवार चंडीगढ़ से वापसी के लिए सहारनपुर निकले ...रास्ते में एक ढाबे से ४ लोग गाड़ी से उनके पीछे चल दिए .यमुना नगर से उसने मुझे फोन किया उसे यद् आया की मेरे एक मित्र डॉ यमुना नगर में है....वे वहां गए ...वहां मेरे दोस्त ने एक पुलिस वाला उनके साथ सहारनपुर तक भेजा..

आदर्श राठौर said...

महिला होने की मजबूरी पर चीख-पुकार मचाना आदत बन गई है....
समस्या सभी के साथ है.... भले ही आप दुनिया के किसी भी देश में चले जाएं।

namita said...

main baaton ka bura nahi manti, agar aap raat ke 8:30 ko der raat mante hain to iska to kuchh kiya hi nahi jaa sakta. ladkiyon ke liye raat mein nikalna safe nahi yah kahna aasan hai kya kabhi kisi ne is par dhyan diya hai ki aisa kyun hai? hum sab bolte hain ki ladke kadkiyon ko samaj mein saman sthan mila hai. ya to hum ye bolna chhod den ya fir ye bolna chhod de ki ladkiyon ke liye kya behtar hai aur kya nahi?
adarsh rathore ji rona gana nahi yahan sirf ek anubhav share kiya gaya hai. mana smasya duniya ke har kone mein hai lekin unka samadhan bhi har desh nikal chuke hain. humein bhi wahi karna hai....