जिरह पढ़ें, आप अपनी लिपि में (Read JIRAH in your own script)

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Wednesday, October 7, 2009

मुंहबोली बहन से रिश्ता अवैध है?

आज से नवभारत टाइम्स डॉट कॉम ने अपनी वेबसाइट पर ब्लॉग की शुरुआत कर दी है। कुल 12 ब्लॉगर्स हैं फिलहाल। जाहिर है यह संख्या बढ़ेगी। सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक या कह लें कि तमाम तरह के मुद्दों पर वहां चर्चा होगी। मेरा यह लेख नवभारत टाइम्स डॉट कॉम पर आया है।

-अनुराग अन्वेषी



लां की पत्नी फलां के साथ भाग गई या फलां के पति का फलां से अवैध संबंध है - ऐसी बातें हम और आप अक्सर सुनते आए हैं। कई बार तो इसे अफवाह कहकर हम लोग लाइटली लेते हैं, पर कई बार ऐसी बातों पर हुआ रिऐक्शन सारी हदें पार कर जाता है। कुछ की जान जाती है, कुछ घायल होते हैं। बाद में पूरा प्रकरण जब मीडिया में आता है तो उसे अवैध संबंधों के खिलाफ उपजे आक्रोश की परिणति के तौर पर लोग स्वीकार कर लेते हैं।

पर अक्सर मेरे मन में एक सवाल कुलबुलाता है कि क्या कोई संबंध अवैध भी हो सकता है। दरअसल, संबंध तो अच्छे और बुरे होते हैं। अवैध तो उसे हमारा स्टेटमेंट करार देता है। यानी, जिन रिश्तों का हम पुरजोर विरोध करना चाहते हैं, जिन रिश्तों का बनना और बने रहना हमें कुबूल नहीं होता उनके लिए विशेषण के तौर पर अवैध शब्द का इस्तेमाल हम कर लेते हैं। अपनी नफरत और नापसंद को व्यक्त करने वाला कोई शब्द तलाशने की बजाए हम उस रिश्ते को खारिज करने की कोशिश करते हैं। उसे सामाजिक संदर्भ में इलीगल घोषित कर देते हैं। गौर से देखें तो 'अवैध' शब्द हमारे नफरत के एक्स्प्रेशन को नहीं रखता, बल्कि हमारे द्वारा जारी किए गए फतवे को रखता है। यह अलग बात है कि सामाजिक ठेकेदारों द्वारा घोषित इस फतवे को हम फतवे की तरह नहीं समझते बल्कि उसका सामाजिक संदर्भ तलाशते हुए जस्टिफाई करते हैं। क्योंकि अवैध करार देने के फतवे के बारे में 'निठल्ला चिंतन' करने का वक्त भेड़चाल में शामिल लोगों के पास बेहद कम होता है।

ऐसे शब्द का इस्तेमाल करने वालों का विरोध जताने के लिए क्या मुझे यह कहना चाहिए कि अवैध शब्द का इस्तेमाल वे अवैध तरीके से कर रहे हैं? मेरी निगाह में इस शब्द का इस्तेमाल मुझे इस संदर्भ में नहीं करना चाहिए।

क्या किसी ऐसे रिश्ते को हमें 'वैध' कहना चाहिए जिसमें पति-पत्नी दोनों साथ तो रहते हों, पर जब भी साथ चलते हों एक-दूसरे का पैर कुचलते हों, लड़खड़ा कर बार-बार गिरते हों और हर बार घायल होकर फिर खड़े होते हों, साथ चलने के लिए नहीं, लड़ने के लिए? या उस रिश्ते को 'वैध' कहना चाहिए जहां परस्पर दो अजनबियों के बीच पहचान बनती है, फिर वह बढ़ती है, एक-दूसरे का सुख-दुख समझती है, साझा करती है, तमाम दुख और तकलीफ के बीच साझे सुख की तलाश करती है?

जब रिश्तों की बात चल निकली है तो यह जरूर बताएं कि रिश्तों को 'अवैध' घोषित करने का आपका पैमाना क्या है? क्या वंश परंपरा के खांचे में जिन रिश्तों को देखते-सुनते आए हैं, या समाज के पारंपरिक ढांचे में जिन रिश्तों को जीते आए हैं, सिर्फ वही 'वैध' हैं? उससे इतर सारे रिश्ते 'अवैध'? वाकई, अगर आपका पैमाना यही है, तो कहना चाहूंगा कि अपने भीतर की इस जड़ता को जितनी जल्द हो सके तोड़ डालें। बंधु! रिश्तों की दुनिया बहुत बड़ी और बहुत जटिल है। इसका बहाव आपके छोटे-मोटे फतवे नहीं रोक सकते। किसी रिश्ते को यूं खारिज भी नहीं कर सकते आप।

क्या अब तक किसी ऐसे बाप के खिलाफ आवाज बुलंद करने की कोशिश की है आपने, जिसने 'वैध' बेटी के साथ बलात्कार किया? या किसी ऐसे 'वैध' भाई, मामा, चाचा... की गर्दन पकड़ी है आपने, जिसने अपनी करतूत से अपनी 'वैध' बहन, भगिनी, भतीजी... को डर और घृणा के जंगल में पहुंचा दिया? क्या ऐसे नामाकूलों के रिश्ते वाकई 'वैध' हैं? क्या ऐसे लोग रिश्ते का एक कतरा भी पहचानते हैं? आए दिन वंश परंपरा और सामाजिक खांचे को तोड़ने वाली खबरें आपके 'वैध रिश्तों' की पोल खोलती हैं। फिर भी आप वैध और अवैध के पचड़े से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।

इस 'अवैध' का पैमाना तलाशने में एक संदेह और सिर उठा रहा है। दो अलग-अलग वर्ण, समुदाय या देश के लड़का और लड़की एक-दूसरे के परिचित हो जाएं और एक-दूसरे को भाई-बहन मानें, तो आपकी निगाह में यह भी 'अवैध रिश्ता' होगा। होना ही चाहिए, क्योंकि इन दोनों के रिश्ते में न तो कोई एक वंश परंपरा है, न कोई समाज परंपरा। तब तो फिर इस अर्थ में तमाम मुंहबोली बहनों और मुंहबोले भाइयों के रिश्ते 'अवैध' हैं?

उम्मीद है यहां पर आपका जवाब 'ना' होगा। और इस 'ना' के पीछे तर्क होगा कि भाई-बहन के रिश्ते पवित्र होते हैं, इस रिश्ते में सेक्स की कोई जगह नहीं होती। यानी, ले-देकर फिर आप अपने उसी मर्दवादी नजरिए के साथ खड़े हो गए, जहां वैध-अवैध रिश्तों को परिभाषित कर रहा है गैर स्त्री-पुरुष से बना शारीरिक संबंध।

जरा सोचें, एक स्त्री या पुरुष का शारीरिक संबंध दूसरे पुरुष या स्त्री से क्यों बन जाता है। इसकी पड़ताल के लिए हमें सामाजिक ढांचे की ओर लौटना होगा। इस समाज में हर शख्स एक साथ कई-कई भूमिकाओं में जीता है। स्त्री है, तो वह किसी की मां होगी, किसी की बेटी, किसी की बहू, किसी की सास, किसी की पत्नी, किसी की बहन, किसी की दोस्त किसी की दुश्मन भी....। इसी तरह पुरुष भी कई भूमिकाओं को जीता है। कई भूमिकाओं की जरूरत क्यों पड़ जाती है? इसीलिए तो कि मन और तन की तमाम परतों की अलग-अलग जरूरतें हैं। इन जरूरतों को किसी एक भूमिका में रहते हुए किसी एक चरित्र के साथ पूरा नहीं किया जा सकता।

जीवन में सेक्स की पूर्ति उतनी ही अनिवार्य है जितना जिंदा रहने के लिए सांस लेना। पैदा हुआ बच्चा जब मां का दूध पीता है तो उसका एक हाथ अपनी मां की छाती पर होता है। मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक, ऐसा करने से बच्चे के भीतर सहज रूप से (पर अचेतन में) बह रही सेक्स की भूख शांत होती है। बच्चे के अंगूठा पीने को मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि ऐसा होने की वजह 'कामक्षुधा की पूर्ति' है।

जब यह काम तत्व हमारे जीवन में बचपन से रचा-बसा है, तो इसकी आधी-अधूरी पूर्ति किसी भी शख्स को भटका सकती है। आपका तर्क हो सकता है कि ऐसा नहीं है वर्ना भटकने वालों की भीड़ दिखती रहती। मैं भी सहमत हूं आपकी बात से। पर यह भी देखें कि भटकने वालों की बड़ी जमात तो नहीं है इस देश में, पर न भटकने की वजह से तरह-तरह के अवसादों से घिरे लोगों की जमात तो है ही अपने सामने। हां, भटकने वालों का परसेंटेज कम है। पर इन 'कम लोगों' के भटक जाने का दोषी आखिर है कौन? जाहिर तौर पर उनका पार्टनर। अगर उसने अपने बेचैन और अतृप्त पार्टनर का ख्याल रखा होता तो भटकने की नौबत तो नहीं ही आती, आपको अवैध का फतवा भी जारी नहीं करना पड़ता। यहां पर एक सवाल और - फिर भटकने वाला दोषी कैसे हुआ? जाहिर है यहां मैं अब भी आपके खिलाफ और 'अवैध' संबंध वालों के पक्ष में खड़ा हूं। यह बहुत सहज-स्वाभाविक धारा है, इसे समझने की कोशिश करें, फतवे जारी कर रोकने की नहीं।

चलते-चलते बचपन में सुनी एक बात आपसे शेयर करता चलूं। एक छींक का मतलब होता है - शुभ। दूसरी छींक का अशुभ, तीसरी छींक घोर अशुभ। चौथी-पांचवीं-छठी-सातवीं-आठवीं छींक लगातार आए तो शुभ-अशुभ के फेर से निकल आएं और तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें क्योंकि ये जुकाम होने के संकेत हैं। कहने का मतलब यह कि किसी के एक-दो से अगर किसी के शारीरिक संबंध बन भी गए हों, तो उसे नजरअंदाज करें, पर अगर ऐसे संबंधों की संख्या तीन, चार, पांच, दस होने लगे, तो मेरी गुजारिश है; कृपया मेरे तर्कों को नजरअंदाज कर मान लें कि यह गंभीर केमिकल लोचा है, जिसे हम व्यभीचार के रूप में जानते हैं।

Friday, August 28, 2009

अब विवेक की कविता उड़ा ली गई

विवेक ने एक बेहद खूबसूरत कविता लिखी है। यह कविता उसने हरियाणा से लौटने के बाद लिखी थी। शीर्षक है - कत्ल से पहले बहनें, बहनों के कत्ल के बाद। उसके ब्लॉग 'थोड़ा सा इंसान' पर 27 जुलाई की पोस्ट है यह। बेशक संवेदना को झकझोर कर रख देने वाली कविता है। आप भी सुनें। पर सिर्फ सुने ही नहीं, बल्कि यह भी सोचें कि यह जो भाई नाम का जीव है वह बहनों के कत्ल से पहले भी मर्द है और बहनों के कत्ल के बाद भी मर्द है, आखिर क्यों? कैसे बदले यह स्थिति, कैसे बदले उसका मर्दवादी सोच?

Tuesday, July 28, 2009

उसका सुख मेरे सुख से बड़ा कैसे?

यह है मणिराम। हिंदी में एमए पास का दावा करनेवाले इस रिक्शेवाले से मेरी मुलाकात तकरीबन 10 दिन पहले हुई थी। पिछले शनिवार को नवभारत टाइम्स के कॉलम 'आंखों देखी' में इसे जगह मिली। हालांकि आज जब मैं इसे अपने ब्लॉग पर पब्लिश कर रहा हूं, तीखी धूप को कल रात हुई बारिश बहा ले गई है। पर मणिराम से मिलने के बाद जो कसक पैदा हुई मन में उसका तीखापन अब भी बरकरार है।

-अनुराग अन्वेषी



ती
खी धूप है। दफ्तर जाने के लिए सोसाइटी से बाहर निकला हूं। रिक्शावाला पूछता है - कहां जाना है? मैंने चुटकी ली, जाना तो है बहुत दूर, कहां पहुंचा सकते हो? रिक्शावाला हाजिरजवाब निकला, कहता है जिन्हें मंजिल का पता होता है, वह दूसरों के सहारे के बगैर ही पहुंचते हैं। मुझे अच्छी लगी उसकी हाजिरजवाबी। बात जारी रखता हूं। पूछता हूं कि गर्मी का क्या हाल है? तपाक से कहता है, लोग पिघल रहे हैं, भगवान नहीं। मन ही मन चौंकता हूं, पर उसके सामने जाहिर नहीं होने देता। थोड़ी चुप्पी बन गई। फिर मैंने उससे पूछा, सिगरेट जलाना है, माचिस है तुम्हारे पास? छूटते ही उसने कहा, जलाते हो सिगरेट, जलते हो आप, क्यों साब? कैसा है यह हिसाब?

अब मुझे लगा कि उससे उसका परिचय तो पूछ ही लूं। उसने बताया मध्यप्रदेश का रहने वाला है वह। नाम है मणिराम। हिंदी में एमए कर रखा है उसने। पर कोई रोजगार नहीं मिला, तो अपने एक परिचित के साथ चला आया गाजियाबाद के वसुंधरा में। मैट्रिक तक पढ़ी उसकी पत्नी दूसरों के घरों में बर्तन-बासन, झाड़ू-पोंछा करती है। वह खुद रिक्शा चलाता है। दोनों मिलकर महीने में तकरीबन 5000 रुपये कमा लेते हैं।

उसके पढ़े-लिखे होने की बात सुन लेने के बाद इस व्यवस्था के प्रति मन इतना खट्टा हो जाता है कि मेरे पास कहने को कुछ नहीं रह जाता। बावजूद, जबर्दस्ती बातचीत जारी रखता हूं। किस दौर की कविता तुम्हें ज्यादा पसंद है, मैं पूछता हूं मणिराम से। पर सच है कि मैं उसका परिचय सुनने के बाद अपने से जिरह करने लग गया हूं। मैं भी हिंदी में एमए पास हूं। सोचता हूं वह पढ़ाई-लिखाई में जितना भी गया गुजरा होगा तो भी कई ऐसे लोगों से बेहतर होगा जो आज उसका दस गुणा कमा रहे हैं। पर मणिराम अपनी स्थिति से संतुष्ट है। उसे जिंदगी से शिकायत नहीं। एक तरफ मेरे जैसे लोग हैं जो शिकायतों का पुलिंदा लेकर बैठे हैं। जरा सी कोई बात हुई नहीं कि काट खाने को दौड़ेंगे। मैं पसीने से तरबतर हो चुका हूं। जेब से रुमाल निकालता हूं चेहरा पोंछने के लिए और मणिराम इस भरी दोपहर में पूरे इत्मीनान के साथ रिक्शा खींच रहा है। जयशंकर प्रसाद की पंक्तियां सुनाता हुआ - हिमाद्री तुंग श्रृंग से, प्रबुद्ध शुद्ध भारती, स्वयं प्रभा समुज्वला, स्वतंत्रता पुकारती, अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़ प्रतिज्ञ सोच लो, प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो-बढ़े चलो... साब जी मंडी आ गयी। यहीं मेरी तंद्रा टूटती है। रिक्शे से उतर कर मणिराम को पैसे देता हूं। ऑटो वाला मेरे इशारे पर रुक चुका है। ऑटो में बैठ कर जा रहा हूं, पर मुझे लगता है कि मैं अब भी रुका हूं मणिराम के पास, अपनी खुशियां, अपनी संतुष्टि तलाशता हुआ। लगता है, एमए बहुत दूर की बात है, मैंने तो अभी जिंदगी की पहली कक्षा की भी पढ़ाई नहीं की।

Tuesday, June 30, 2009

दफ्तर में करने को कुछ नहीं, ये है न !

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Tuesday, June 2, 2009

सात सुरों की धुन (पापा का ब्लॉग)

साथियो, आज से मेरे पापा ने भी ब्लॉगिंग शुरू कर दी। ब्लॉग का नाम रखा है सात सुरों की धुन। उनका इरादा है कि इस ब्लॉग पर वह अपनी कविता, गीत और गजल पोस्ट किया करेंगे। लेख, कहानी, आलोचना या समीक्षा के लिए एक दूसरा ब्लॉग वह तैयार कर रहे हैं। उसका नाम दिया है उन्होंने - जो अनकहा रहा।
तो फिर आप देखें उनका पहला ब्लॉग - सात सुरों की धुन

Wednesday, May 27, 2009

आप भी देखें मेरी दुर्दशा


रमणजीत के हर इलस्ट्रेशन में एक नई चमक दिखती है, एक नया आयाम दिखता है। उन्होंने मेरे आग्रह पर यह इलस्ट्रेशन तैयार किया। और सच कहूं तो इस इलस्ट्रेशन को देखने के बाद मेरा परिचय मेरे चेहरे की कुछ लकीरों से हुआ। कितना रोमांचक होता है अपने चेहरे को दूसरे के ब्रश से जानना! वाकई, रमणजीत बढ़िया कलाकार हैं।

Thursday, May 7, 2009

मत करें दान, करें मतदान

गीदड़ कहता शेर से
नया जमाना देख
एक वोट तेरा पड़ा
मेरा भी है एक

पता नहीं किसकी पंक्तियां हैं यह। पर यह सच है कि वह जमाना लद गया जब शेर जैसे लोग बाकी तमाम लोगों को गीदड़ सरीखा समझते थे। अपनी गीदड़ भभकियों से सबको डराते फिरते थे। साथियो, लोकतंत्र का यह पर्व इस बार हमारे लिए शर्मनाक हादसा न बने, इसके लिए बेहद जरूरी है कि हम अपनी खोल से बाहर निकलें। विचार करें, अंधों की जमात में बैठे किस काने राजा को वोट देना है। ऐसे ही बदलेंगी स्थितियां। आज अंधों में काना राजा दिख रहे हैं कल कानें राजाओं के बीच आंख वाले सेवक दिखलायी देंगे। इस बदल रही व्यवस्था को पूरी तरह हम और आप ही बदल सकते हैं इसलिए वाकई यह जरूरी है कि तमाम जरूरी काम को हाशिये पर रख इस जरूरी महापर्व में हम शरीक हों। अंत में कहना सिर्फ इतना है कि मत करें दान, करें मतदान।

Wednesday, May 6, 2009

संकोच में फंस गया हूं

नमिता जोशी मेरी अच्छी दोस्त हैं। उन्होंने मुझे एक मेल किया और जिद ठान ली कि इसे मैं पोस्ट के रूप में अपने ब्लॉग पर डालूं। संकोच के साथ मैं उनकी इस जिद भरी गुजारिश पूरी कर रहा हूं।

-अनुराग


आज आप सब लोग जिरह के सरताज अनुराग अन्वेषी जी को जन्मदिन की शुभकामनाये दे सकते हैं. आज ही के दिन इस कलाकार ने इस धरती पर कदम रखा था. शब्दों के जादूगर अनुराग को मेरी ओर से happy Birthday .. इसके साथ ही आज के दिन आप सब यह भी बताये की अनुराग जी के बारे में आप क्या सोचते हैं...
-namita

Sunday, May 3, 2009

आगरा हो या दिल्ली : हालात हर जगह एक से हैं

नमिता शुक्ला को दिल्ली आए हुए अब साल भर होने जा रहा है। स्वभाव से वह निर्भीक हैं और पेशे से पत्रकार। वह मानती हैं कि डर नाम का भाव हम सबों के भीतर बसा होता है। और कोई भी छोटी-सी घटना उस डर को उभार सकती है। तकरीबन दो साल पहले आगरा के एक अखबार से बतौर क्राइम रिपोर्टर उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की थी। वहां वह फोटोग्राफर की भूमिका भी निभाती थीं। आगरा का एक संस्मरण वह यहां शेयर कर रही हैं।

-अनुराग अन्वेषी

बा

त दो साल पहले की है, मैंने आगरा में नौकरी ज्वॉइन की थी। रहने का ठौर मिला था मौसी के पास। मेरे घर के लोग भी इतमिनान में थे कि चलो, बेटी अपनी मौसी के घर में रह रही है। मौसी का घर सिकंदरा में था जबकि मेरा ऑफिस संजय प्लेस में। दिन भर की नौकरी बजा कर रात तकरीबन 8 बजे घर लौटती थी अपनी एक्टिवा बाइक से। सब कुछ सामान्य चल रहा था। एक रोज मुझे ऑफिस से निकलने में थोडी देर हो गयी। तकरीबन 8:30 बजे मैं घर के लिए निकली। सिकंदरा हाइवे से होते हुए घर जा रही थी।

थोडी देर बाद ही मुझे लगा कि कोई गाड़ी मेरा पीछा कर रही है। मैंने पीछे मुड़कर देखा तो मेरा शक सही निकला। एक टाटा सूमो में बैठे कुछ लोग मेरा पीछा कर रहे थे। मैंने अपनी एक्टिवा की स्पीड बढ़ा दी। इसके साथ ही टाटा सूमो की भी स्पीड बढ़ गयी। अनिष्ट की आशंका से पलक झपकते ही मेरा मन बुरी तरह घबरा गया। बगैर विचारे मेरी गाड़ी की स्पीट 70-80 होने लगी। पर यह काफी नहीं थी। सूमोसवार मेरी बगल में पहुंच चुके थे। उसमें से कुछ लड़के सिर बाहर निकालकर चिल्लाने लगे। उस वक्त मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे। लेकिन शायद मुसीबत सामने होती है तो हिम्मत अपने आप ही आ जाती है। मैंने गाड़ी की स्पीड और बढा दी। अपनी अब तक की लाइफ में सबसे तेज़ गाड़ी उसी दिन चलायी थी। सिकंदरा आने से कुछ पहले ही रास्ते में पंछी पेठे कि दुकान पड़ती है। मैंने देखा वहां काफी लोग खड़े हैं, दुकान पर अच्छी खासी भीड़ थी। वहां मैंने अपनी गाड़ी रोक दी। दुकान पर भीड़ देख सूमो वाले आगे निकल गये।

हिम्मत नहीं हो रही थी पर मैंने घर जाने के लिए शॉर्टकट रास्ते का इस्तेमाल किया। सकुशल घर पहुँचते ही सबसे पहले छत पर गयी और खूब रोई। मुझे उस वक्त घर के एक-एक लोग बेहद याद आए। उस दिन मुझे अहसास हुआ कि समाज चाहे कितना भी प्रगतिशील क्यों न हो जाए, हम लड़कियां कई बंधनों में जकड़ी हैं। असुरक्षा का टोप पहन हमें इस आजाद समाज में रहना है...

Thursday, April 30, 2009

ब्लॉगर साथियो से अपील

साथियो,
अभिनीत मेरा भांजा है। उम्र से महज 12 साल, पर बुद्धि से 21 साल वालों बड़ा। पटना में रहता है। सेवेंथ का स्टूडेंट है। बगैर किसी की मदद के उसने बना लिया है अपना ब्लॉग। खास बात यह कि उसे ब्लॉग बनाने की प्रेरणा मिली अपनी मां को ब्लॉगिंग करते देख, जो पेशे से डॉक्टर हैं। कहना पड़ेगा एक बार फिर कि वाकई किसी बच्चे की पहली शिक्षिका मां ही होती है। एक बाल मन का ब्लॉग कैसा होता है - देखना हो तो एक बार जरूर देखें : गिरह
मेरी गुजारिश है कि गिरह पर जाकर अपनी राय से अभिनीत को जरूर अवगत कराएं। जाहिर है इससे उसका हौसला बढ़ेगा।

Tuesday, April 21, 2009

मां की गोद का जादू

आज पता नहीं क्यों, सुबह से ही मन काफी अशांत था। बचपन की तमाम यादें सिरहाने आकर बैठ गयी थीं। उन दिनों में लौटने को जी मचल-मचल जा रहा था। पर यह मुमकिन न था। इन सब के बीच मां बेतरह याद आती रही। जाहिर है मेरी बेचैनी दुनी हो गई। क्या करता, अपनी पुरानी कविताएं पढ़ने लगा। इसी बीच मां को याद कर लिखी कविता मेरे सामने आ गई। हालांकि वह कविता इस ब्लॉग पर काफी पहले डाल चुका हूं, पर एक बार फिर से इसे दूसरे रूप में आपके सामने रखने की चाह हुई।


दिल्ली इज नॉट सेफ फॉर गर्ल्स


डर सिर्फ स्त्रियों को ही नहीं लगता, डरते पुरुष भी हैं इस माहौल में। आने वाले दिनों में इस ब्लॉग पर पुरुषों के भी ऐसे अनुभव आपको पढ़ने को मिलेंगे। फिलहाल कात्यायनी उप्रेती ने अपना यह अनुभव हम सबों के लिए लिख भेजा है। वह दिल्ली में रहकर पत्रकारिता कर रही हैं :

-अनुराग अन्वेषी

दि

दिल्ली इज नॉट सेफ फॉर गर्ल्स'। राजधानी में लड़कियों की सेफ्टी पर जब भी बात उठती है, इसी लाइन से शुरू होकर इसी पर खत्म होती है। लड़कियों से पूछा जाए, तो शायद हर लड़की किसी न किसी ऐसी घटना से गुजरी है, जिसे हमारा कानून 'क्राइम' कहता है। खुद की बात करूं, तो जब भी इस इश्यू पर सोचती हूं, तो मुझे मेरे और दोस्तों-परिचितों के कई अनुभव याद आते हैं। वे अनुभव जो बार-बार कहते हैं कि इस समाज का बड़ा हिस्सा आज भी लड़कियों को ऑब्जेक्ट मानता है।

अभी कुछ दिनों पहले की तो बात है। मेरा ऑफ डे था और इंडियन हैबिटैट सेंटर में शाम 7 बजे से एक प्रोग्राम। जाने का मन था लेकिन दिमाग ने सवाल किया - लौटने में प्रॉब्लम तो नहीं होगी? मन ने कहा - चल यार...। दिन में मां से फोन पर बात हुई, तो प्रोग्राम की बात निकल गई। वह फट से बोली - रहने दे, रात हो जाएगी... वैसे भी दिल्ली सेफ नहीं। खैर, मैं चली गई। प्रोग्राम और लोगों से मुलाकातें अच्छी लगीं। लेकिन मेरी नजरें रह-रहकर घड़ी देखने लग जाती थी। रात 8:30 बजे मैं मेन रोड पर थी। सड़क पर अभी लोग दिख रहे थे। तीन ऑटो दिखे, मजबूरी का फायदा उठाने के लिए तैयार, अपने दोगुने दामों के साथ। मैंने बस से जाना तय किया। कुछ कदम आगे रोड के किनारे एक गाड़ी के सामने खड़े 32-33 साल के शख्स से पूछा - एक्स्क्यूज मी, सामने जो स्टैंड है वहां से साउथ एक्स के लिए बस मिलेगी? आदमी ने एक चीप स्माइल पास की और बोला - कितने पैसे दोगी मैडम, मैं अपनी ही गाड़ी में छोड़ दूंगा। देखने से वह गाड़ी का ड्राइवर लगा। मेरे भीतर गुस्सा और डर ने फौरन सिर उठाया। उसकी बेशर्म मुस्कान बरकरार थी और वह जवाब के इंतजार में था। उसके चेहरे के भाव देखकर मेरे डर को ओवरटेक करता हुआ गुस्सा मेरे पास आ गया, जिसने हिम्मत जनरेट कर दी और मैंने कहा - अभी 100 नंबर पर फोन करूंगी, पुलिस की गाड़ी फ्री में घर छोड़ेगी। यह सुनते ही फट से वह दूसरी गाडिय़ों के पीछे होते हुए ओझल हो गया। एक मिनट बाद मैं स्टैंड में थी और दो मिनट बाद एक ठसी बस में। बस में चढ़ते ही मैंने अपने जेंडर की तलाश की। दो दिखीं तो चैन मिला। घर पहुंचते ही सही सलामत घर पहुंचने की खबर मां को दी।

ऐसे छोटे-छोटे मामले तो हम लड़कियां तकरीबन हर रोज झेलती हैं। कई बार सोचती हूं कि चलो अच्छा है, इसी बहाने कुछ बुरे लोगों को डराने का गुर तो सीख हैं हम। पर इसी के साथ दूसरा ख्याल आता है कि ये छोटे मामले ही कई बार बड़े बन जाते हैं। सड़क छाप मजनुओं को डराने की कोशिश कई बार किसी बड़ी मुसीबत खड़ी कर देती है। जाहिर है इस शहर में हर लड़की अंधेरे में तो क्या, उजाले में भी खुद को सेफ नहीं मानती। लड़कियां हैरान, परेशान, सावधान हैं। उनके लिए शाम को अकेले निकलना, ऑटो लेना, दिन में भी सुनसान सड़क में जाना जैसी तमाम चीजों के आगे 'अवॉइड करें' जोड़ दिया जाता है। लेकिन अवॉइड करना क्या सही सॉल्यूशन है? इससे तो वे दुनिया के कई पहलुओं से महरूम हो जाएंगी। आखिर हम अपने इस लापरवाह सिस्टम के लूपहोल्स को कैसे भर सकते हैं? लड़कियों की सिक्युरिटी को लेकर बना हर नियम-कानून इम्प्लिमेंटेशन मांगता है। इन नियम-कानून को इंम्प्लिमेंट करवाने वाले जब तक एक्टिव नहीं होंगे और जब तक इन्हें तोडऩे वालों को तुरंत सजा नहीं मिलेगी, तब तक लड़कियां अवॉइड करेंगी। फिर चाहे वह शाम को घर से निकलना हो या बस में लगने वाले अननैचरल धक्का। और जब भी वे इस दुनिया में अपने सपनों को पाने के लिए बाहर निकलेंगी, समाज के ये सभ्य पुरुष उन्हें घेरेंगे और इस शहर को 'दिल्ली इज नॉट सेफ फॉर गर्ल्स' का दर्द सहना पड़ेगा।

Friday, April 17, 2009

मैंने रंजू की कविता चुराई

आज मैंने रंजना भाटिया की कविता चुरा ली। वह कविता जो उन्होंने अपने ...वें जन्मदिन (उम्र नहीं बतायी जाती) पर लिखी थी। उनकी ही कविता उन्हें जन्मदिन पर गिफ्ट कर रहा हूं।

Wednesday, April 15, 2009

हुस्न हाजिर है

हुस्न हाजिर है मुहब्बत की सजा पाने को। पर ये पंक्तियां सुनकर सजा देने के लिए बढ़े पांव जड़ हो जाते हैं। मुझे लगता है... अरे कहां मैं अपनी बात सुनाने में लग गया ! मेरे लगने को मारें गोली, आपको क्या लगता है यह जरूर बताएं...


Monday, April 13, 2009

हां, लगता है मुझे डर

सोनिया वर्मा

मैं
अगस्त 2006 में कानपुर से दिल्ली आई थी। मेरे जैसी न जाने कितनी लड़कियां अपने छोटे से शहर से देश की राजधानी में बेहतर करियर बनाने का सपना संजोए आई होंगी, लेकिन यहां आने के बाद वे भी इस बड़े शहर की कुछ कड़वी सचाइयों से वाकिफ हुई होंगी। यहां शाम होते ही रास्ते में अकेली चल रही लडक़ी का मन न जाने कितनी आशंकाओं से घिर जाता है। मैं डरपोक नहीं, लेकिन हर रोज अखबार में छपी घटनाओं, न्यूज चैनलों में घंटों चलने वाली खबरों ने मेरा मन शंकाओं से जरूर भर दिया है।

अचानक कोई आता दिखा। मेरी धडक़न बढ़ गई। दरवाजा बंद करने को तेजी से उठी तो देखा सामने से प्यून आ रहा था। उसे देखते ही सांस में सांस आई। मैंने उसे जोर से डांटा कि तुम्हें यहां काम करने के पैसे मिलते हैं, बाहर घूमने के नहीं। उसने कुछ जवाब नहीं दिया लेकिन मैं जानती थी कि मैं उसे डांटकर मैंने अपना डरा चेहरा छुपाने की कोशिश की थी।


मन में बढ़ती जा रही असुरक्षा की भावना का नतीजा ही है कि रात तो दूर दिन के उजाले में भी किसी जगह पर अकेली रह जाऊं तो मन में न जाने कितने बुरे ख्याल आ जाते हैं। ऐसा ही कुछ उस रोज हुआ। मास कम्यूनिकेशन में पोस्ट ग्रैजुएशन डिप्लोमा कोर्स करने के बाद एक प्रॉडक्शन हाउस जाइन किया था। मैं न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी में रहती थी और ऑफिस कालकाजी में था, सो आने- जाने में ज्यादा समय नहीं लगता था। उस सुबह करीब आठ बजे अपने ऑफिस के लिए निकली। सुबह की ठंडी हवा प्यारी लग रही थी, अपने ख्यालों में डूबी ऑफिस के पास पहुंच चुकी थी। तभी मेरी नजर ऑफिस के मेन गेट से कुछ कदमों की दूरी पर खड़े दो लोगों पर पड़ी। लड़िकियों को यह सब भी पढ़ाया नहीं जाता, वे तो बड़े होते हुए लोगों की नजरों और उनके छूने की कोशिशों से बचते हुए अपने आप अच्छे और बुरे में फर्क करना सीख लेती हैं। सो मैं भी समझ चुकी थी कि दोनों युवक भले इरादे नहीं रखते थे। मैं तेजी से ऑफिस की ओर बढ़ी। सामने देखा तो शटर बंद था। मैं परेशान होती उससे पहले प्यून आता दिखाई दिया। उसने शटर खोला और मैं अंदर दाखिल हो गई। ऑफिस बेसमेंट में था, उस पर मेरा केबिन एकदम आखिर में। मैंने केबिन में पहुंचर लंबी सांस ली। क्योंकि शनिवार था इसलिए बाकी साथी कुछ लेट आने वाले थे। अचानक मन में ख्याल आया कि इस वक्त इलाके में न तो ज्यादा चहल-पहल है और न ही साथ के ऑफिस खुले हैं। ऐसे में अगर दो बदमाश दिख रहे लोग यहां घुस आए तो मेरी तो चीख तक बाहर नहीं जा पाएगी। ये सोचते ही मैं झट से फ्रंट ऑफिस में आ गई। यहां आई तो देखा प्यून न जाने कहां गायब हो गया था।

मैंने नजरें सामने के शीशे पर टिका दीं, जहां से आने-जाने वाले साफ दिख सकते थे। दिल जोर से धडक़ रहा था। मुझे पसीना आ गया। न जाने कितनी खबरें याद आ गईं। पहले सोचा ऑफिस का दरवाजा अंदर से बंद कर लूं, फिर सोचा ऐसे बात-बात पर घबरा जाना बेवकूफी है। कुछ देर बाद तो सब आ ही जाएंगे और फिर यह वही ऑफिस है जहां रोजाना घंटों गुजारती हूं। डरने जैसी कोई बात नहीं, लेकिन डर दूर नहीं हुआ। अचानक कोई आता दिखा। मेरी धडक़न बढ़ गई। दरवाजा बंद करने को तेजी से उठी तो देखा सामने से प्यून आ रहा था। उसे देखते ही सांस में सांस आई। मैंने उसे जोर से डांटा कि तुम्हें यहां काम करने के पैसे मिलते हैं, बाहर घूमने के नहीं। उसने कुछ जवाब नहीं दिया लेकिन मैं जानती थी कि मैं उसे डांटकर मैंने अपना डरा चेहरा छुपाने की कोशिश की थी। अपने ऑफिस में कुछ घंटे जल्दी पहुंच जाना किसी मुसीबत की वजह नहीं है। लेकिन हादसों को ऐसे ही कुछ मिनटों की दरकार होती है।

Tuesday, April 7, 2009

दिल्ली में डरा-सहमा मन- 2

डर एक मनोभाव है, बेहद स्वाभाविक मनोभाव। पर जब यह दूसरे मनोभावों पर हावी होने लगे, तो बात चिंताजनक होने लगती है। लड़कियों का मन बेहद कोमल होता है, बल्कि कहना यह चाहिए कि मन के दो रूप हैं - कोमल और कठोर। कोमल मनोभाव स्त्री मनोभाव है और कठोर, पुरुष मनोभाव। जरूरी नहीं कि यह कठोर तत्व पुरुष शरीर में ही मौजूद हो और कोमल तत्व स्त्री शरीर में। जाहिर है कहना यह चाहता हूं कि दिल्ली हो या मुंबई, रांची हो या करांची - हर तरफ यह कोमल मन डरा सहमा है। फिलहाल, पेश है दीपा पवार का एक संस्मरण। वह पेशे से पत्रकार हैं। :

-अनुराग अन्वेषी


खबार पढ़ने की जब लत लग रही थी, मेरा सबसे ज्यादा ध्यान क्राइम की खबरों पर जाता था। लूट, चोरी और छेड़खानी जैसी छोटी खबर भी मुझे बहुत बड़ी लगती थी। उन दिनों भी अखबार रेप, अपहरण, छेड़छाड़, लूट और हत्या की खबरों से अंटे रहते थे। इन खबरों को पढ़ने के बाद इनसानी रिश्ते मुझे बकवास की तरह लगने लगते। सारा शहर मुझे जानवर सरीखा लगने लगता। फिर जब मन खबरों से बाहर आता, मैं खुद से जिरह करती। कई बार लगता था कि ये स्त्रियां खुद को इतना कमजोर क्यों मानती हैं? डटकर मुकाबला क्यों नहीं कर सकतीं? आखिर बस जैसी सार्वजनिक जगह में कोई कैसे किसी को छेड़कर बच निकलेगा? जरा-सा शोर मचाने की हिम्मत तो महिलाओं में होनी ही चाहिए, फिर देखें वे कि कैसे इन मजनुओं का कचूमर निकालती है पब्लिक। पर धीरे-धीरे ये खबरें मेरे लिए आम होती गईं। अपनी ओर ध्यान भी नहीं खींच पाती थीं वे, पढ़ने के लिए बाध्य करना तो दूर की बात। एक तरह से मान बैठी कि डरपोक स्त्रियों की नियति है यह।

वक्त बीतता रहा और ऐसी खबरों को जीवन के हाशिये पर छोड़ती चली। अचानक एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि मेरे भीतर मर चुका डर अचानक अपना सिर उठा बैठा। मैं ब्लूलाइन बस में बैठकर सीपी जा रही थी। दिन का वक़्त था। फिर भी बस में बहुत कम मुसाफिर थे। ड्राइवर, कंडक्टर और उनके एक साथी के आलावा कुल 5-6 लोग। बसों में आना-जाना सामान्य सी बात थी मेरे लिए। जब मैं बस में बगैर किसी साथी के होती हूं तो अक्सर किसी न किसी विषय पर सोचती रहती हूं। उस दिन भी किसी टॉपिक पर खुद से विचार-विमर्श कर रही थी। अचनाक मैंने महसूस किया कि बस के कंडक्टर ने अपने साथी को कुछ इशारा किया। कंडक्टर ठीक मेरे आगे वाली सीट पर बैठा था। मुझे लगा कंडक्टर का यह इशारा कुछ मुझसे जुड़ा है। यह सब कुछ सोच ही रही थी कि अगले पल उसका साथी जो दूसरी तरफ बैठा था, उसने मेरी ओर देखा फिर कंडक्टर की ओर देख कर उसे उसने ओके का इशारा किया। मेरी चेतना जो तभी से मुझसे बहस करती चल रही थी, वह इस पल भर के इशारों पर आकर केंद्रित हो गई। कंडक्टर और उसके साथी का इशारा मुझे बेहद भद्दा और डरावना लगा। अब बस का ड्राइवर भी मुझे घूरने लगा था। मैं बस में आगे ही बैठी थी, इसलिए मुझे यह भी ध्यान नहीं था कि बस में अब कितने मुसाफिर बैठे हैं। मुझे लगा कि कहीं बस में मैं अकेली तो नहीं बच गई हूं? बेहद तनाव में आ चुकी थी मैं। ड्राइवर, कंडक्टर और उसके साथी आपस में फूहड़ हंसी-मजाक कर रहे थे। इस बीच मैंने उनसे अपनी आंखें चुरा बस में बैठे यात्रियों की संख्या का जायजा लिया। थोड़ी राहत मिली। बमुश्किल 5 लोग बैठे थे। सवारियों में एक लड़की को देखकर जान में जान आयी। मैंने उसी वक़्त फैसला किया कि जहां यह लड़की उतरेगी मैं भी वहीं उतर जाऊंगी। मुझे बारहखंबा रोड जाना था। पर उनके इशारों और फूहड़ हंसी-मजाक ने मुझे इतना चिंतित कर दिया था कि मैं तिलक ब्रिज पर ही उस लड़की के साथ उतर गयी। उसके बाद मैंने डीटीसी की भरी हुई बस से आगे का सफर तय किया।

इस छोटी-सी घटना के बाद घर लौटकर मैंने अपने डर का विश्लेषण किया।

मैं क्यों डरी, मेरे पास तो मोबाइल फोन है। किसी अयाचित स्थिति में मैं 100 नंबर डायल कर पुलिस को बुला सकती थी।

- दरअसल, कई खबरें पढ़ चुकी हूं ऐसी कि मदद के लिए 100 नंबर पर कॉल करते रहे पीड़ित और पुलिस मौके पर पहुंची डेढ़-दो घंटे बाद।

ठीक है कि 100 नंबर का भरोसा बहुत मजबूत नहीं है। पर खुद पर तो भरोसा है न, इतना आतंकित होने की जरूरत क्या थी?

- खबरें बताती हैं कि दिनदहाड़े हत्या हुई, पर आश्चर्य, किसी को नहीं दिखता हत्यारा। न पकड़ पाते हैं, न उसके खिलाफ गवाही देते हैं। मेरी मदद को कौन आता?

रही बात आतंकित होने की, तो स्त्री होने का अहसास, उसकी मजबूरियां, उसकी सीमाएं जो घुट्टी के तौर छुटपन से ही पिलाई जाती हैं, उसी का नतीजा था मेरा डर। यह अलग बात है कि मैंने अपनी इच्छा शक्ति से, अपने साथियों की हौसलाआफजाई से और अपनी समझदारी से उस डर को मार दिया था, पर उसे अपने से बाहर नहीं कर पाई थी। और जैसे ही मैं थोड़ी कमजोर पड़ी कि वह डर सिर उठाकर सामने आ खड़ा हुआ। पर मुझे खुशी है कि मैं अतिविश्वास की शिकार नहीं, मैंने बिल्कुल सही फैसला किया तिलक ब्रिज पर उतरने का। आपका क्या ख्याल है?

Saturday, April 4, 2009

दिल्ली में डरी-सहमी लड़कियां

नौकरीपेशा लड़कियों के करेक्टर पर दबी जुबान चर्चा हमेशा होती रही है, अगर नौकरी की अनिवार्य शर्त हो नाइट शिफ्ट, तब तो चर्चा ज्यादा रंगीन हो जाया करती है। पर इन नौकरीपेशा लड़कियों की परेशानियों की चर्चा को यह समाज हमेशा हाशिये पर रख कर चला है। देश की राजधानी में नाइट शिफ्ट में काम करने वाली ऐसी ही दो लड़कियों की हत्या अभी हाल के महीने में हुई है, यह अलग बात है कि दोनों हत्याकांड के अभियुक्त पकड़े जा चुके हैं। इन हत्याओं के बाद इस महानगर की लड़कियों के भीतर कैसा डर घर कर गया है - यह सवाल भी मीडिया में अपनी जगह बनाता रहा। मीडिया में स्पेस की कमी है, इसलिए वहां विस्तार से ऐसे मुद्दों पर बात नहीं होती। पर ब्लॉग में यह चर्चा की जा सकती है। आज एक ऐसी ही लड़की की बात इस ब्लॉग पर रख रहा हूं, जो पेशे से पत्रकार हैं। पर इन दो हत्याकांड के बाद उनका विश्वास भी एक रात डगमगा गया, जब बारिश हो रही सड़क पर उन्होंने खुद को अकेला पाया। परिचय और नाम जानबूझ कर नहीं दे रहा हूं। क्योंकि मकसद शख्स को सामने लाना नहीं, बल्कि आशंका और उस डर को सामने लाना है जो इस राजधानी की आबोहवा से बना है :

-अनुराग अन्वेषी


हां,

यह सही है कि अब मैं उस डर से उबर चुकी हूं। पर वह बीस-पच्चीस मिनट का अकेलापन मुझे ताउम्र याद रहेगा। इस घटना से पहले मैं नहीं जानती थी कि डर कहते किसे हैं। पर उस पच्चीस मिनट ने सिखाया कि अकेली लड़की कैसे डरती होगी किसी सुनसान सड़क पर बांह पसारे पेड़ों की छाया से। दिल्ली के मिजाज का कोई भरोसा नहीं, कब वह झुलसा देने वाली गर्मी बरसाने लगे और कब, शुरू हो रही गर्मी पर बारिश की फुहार छोड़ दे।

अभी चंद रोज पहले की ही तो बात है। जिगीषा मर्डर केस सुर्खियों में रहा था। ऑफिस हो या घर - हर तरफ इस केस की ही चर्चा थी। नाइट शिफ्ट ड्यूटी का डर। लड़की होने का डर। इन चर्चाओं में मैंने भी हिस्सा लिया था लेकिन तब तक किसी डर को कभी महसूस नहीं किया था और ही वह मुझे छू पाया था कभी। यहां तक कि जिगीषा हत्याकांड के बाद जब कामकाजी लड़कियॊं की सेफ्टी पर स्टॊरी लिखने के लिए कहा गया, तब मैंने अपने बॉस से पूछा कि फिर उसी पुराने राग को अलापने से कोई लाभ होगा? उन्होंने कहा कि तुम एक्सपर्ट्स से ये बात करो कि सोल्युशन क्या है। तब मैंने पूछा था कि क्राइम क्या सिर्फ लड़कियॊं के ही साथ हो रहा है। अगर नहीं तो फिर क्यों ये सब बार-बार लिखकर लोगों को डराएं। इस पर उन्होंने समझाया कि नहीं, क्राइम हर किसी के साथ हो रहा है लेकिन लड़कियों को सॉफ्ट टारगेट मान कर बदमाश उन पर आसानी से हमला कर देते हैं। मैं उनकी बात से कनविंस नहीं हुई थी, पर हां, स्टोरी जरूर लिख दी।

लेकिन उस शाम प्रोग्राम खत्म होने के बाद होटल अशोक से 8:30 बजे जब बाहर निकली, हल्की बारिश हो रही थी। इस इलाके में सन्नाटा पसरने लगा था। पर खुद पर इतना भरोसा था कि सड़क पर निकल आई। सोचा कि बारिश रुकने का इंतजार करने से बेहतर होगा कि ऑटो लेकर ऑफिस पहुंच जाऊं। ऑटो के चक्कर में सड़क पर आगे बढ़ती गई। अब तक बारिश तेज हो चुकी थी, अंधेरा और आंधी भी बारिश का साथ दे रहे थे। दूर-दूर तक सड़क पर सन्नाटा पसरा था। अंधेरा ऐसा कि परिचित जगह भी अनजान लगने लगे। मुझे यह अंदाजा भी नहीं लग रहा था कि मैं सही सड़क पर चल रही हूं या गलत। पंद्रह मिनट तक तो मेरे दिमाग में सिर्फ जल्दी ऑटॊ मिलने का ख्याल था, लेकिन खराब मौसम की वजह से ऑटॊवाले भी आते-जाते नहीं दिख रहे थे। जो एक-दो दिखे, उन्होंने जाने से इनकार कर दिया। अब तक मैं काफी आगे निकल आई थी। सड़क के अंधेरे को कभी कभार चीर दे रही थीं गुजरने वाली बड़ी गाड़ियों की मुंह चिढ़ाती लाइटें। ऐसे में अब मुझे घबराहट होने लगी थी।

घबराहट इस कदर बढ़ गई कि घर के लोग याद आने लगे। मीडिया में पसरे जोखिमों की वजह से यह नौकरी करने की पापा की सलाह याद आने लगी। जॉब छोड़कर पढ़ाई पूरी कर लेने की भाई की नसीहत बुरी नहीं लगी इस वक्त। और बॉस की बात कानों में गूंजने लगी कि लड़कियों को बदमाश सॉफ्ट टारगेट समझते हैं। सब कुछ दिमाग में घूमने लगा और समझ नहीं पा रही थी कि क्या करूं। उस वक्त मैं जरूरत से ज्यादा चौकन्नी हो गई थी। पेड़ों के बीच से तेज हवा के गुजरने से आती सांय-सांय की आवाज मेरे भीतर और घबराहट पैदा करने लगी। बांह पसारे खड़े लंबे पेड़ दैत्य की तरह लगने लगे। कोई गाड़ी दूर से आती दिखती, तो सांसें थम जाती। अपने आत्मविश्वास को बनाए रख मैं अब भी आगे बड़ी जा रही थी पर पता नहीं क्यों मुझे रोना रहा था। अपने को समझाने की कॊशिश कर रही थी कि मैं रिपॊर्टर हूं, मुझे ऎसे डरना नहीं चाहिए। लेकिन फिर ख़याल आता - आखिर हूं तॊ लड़की ही। जर्नलिस्ट सौम्या का चेहरा आंखों के सामने से गुजर जाता। डिवाइडर से टकरा कर रुकी उसकी कार दिखने लगी। जिगीषा का नाम ध्यान आते ही मेरे घबराहट दोगुनी हो गई। उस डर के साथ गुस्सा भी बहुत रहा था घरवालॊं की बात मानने के लिए अपने आप पर। और लड़कियां सॉफ्ट टारगेट हॊती हैं यह जानते हुए ऑफिस से रात में अकेले रिपोर्टिंग के लिए भेजने के फैसले पर। अचानक दिमाग में आया कि बहुत हॊ गई ये नॊकरी अब और नहीं। फिर मैंने बॉस को फोन लगाया। अपनी हालत बताई। बॉस ने तुरंत ही एक कलिग को मेरा लोकेशन बता निकलने का आदेश दिया और फिर लगातार मेरे से फोन संपर्क में रहे।

यह ठीक है कि अब मैं उस रोज के डर से उबर चुकी हूं। और यह मैं खूब अच्छी तरह से जानती हूं कि रिपोर्टिंग के ऐसे अवसर आते ही रहेंगे और मैं जाती भी रहूंगी। पर इस शहर की व्यवस्था से उपजे सवाल का कोई जवाब मैं ढूंढ़ नहीं पा रही हूं कि देश की राजधानी में अगर लड़कियां इस कदर डर का शिकार बनी हैं, तो देश के दूसरे हिस्सों का क्या हाल होगा?