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जिरह करने की कोई उम्र नहीं होती। पर यह सच है कि जिरह करने से पैदा हुई बातों की उम्र बेहद लंबी होती है। इसलिए इस ब्लॉग पर आपका स्वागत है। आइए,शुरू करें जिरह।
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Thursday, March 20, 2008

बैटलफ़ील्ड फॉर लीडरशिप ऑन गूगल

फागुन के नशे में BLOG का कोई दूसरा अर्थ नहीं दिख रहा साथियो। हां, कुछ रोज़ पहले तक यह मुझे और मेरे जैसे कई साथियों को ब्यूटिफुल लिटरेचर ऑन गूगल का अर्थ भी देता रहा है। ऐसा नहीं कि यह अर्थ ख़त्म हो गया है। पर फिलहाल, जब होली सिर चढ़कर बोलने को तैयार हो तो मन का थोड़ा भटक जाना स्वाभाविक है। यही सोचकर भटकने दिया इस मन को और एक बीत चुके प्रकरण पर थोड़ी चुटकी ली है। क्षमायाचना सहित पेश है 'बुरा न मानो होली है' : इलेक्ट्रॉनिक कलम हाथ में थाम लेने से कोई अगुवा या मठाधीश नहीं बन जाता। स्वयंभू मठाधीश तो हम हो सकते हैं, पर स्वीकृत नहीं। इसके लिए नायकों वाले गुण भी दिखने चाहिए।
कलम से गर्दन नहीं टूटती। यह अहसास होने के बाद अपनी करनी पर गर्दन झुक जरूर जाती है। और एक सच तो यह कि हम जो कुछ भी लिखते हैं, बोलते हैं वही हमारा चेहरा दूसरों के सामने बनाता है/बिगाड़ता है। किसी ने लिखा है :

मैं आदमी को शक्ल-ओ-सूरत से नहीं
शब्दों से जानता हूं
क्योंकि सामने जब शब्द होते हैं
तो आदमी नहीं, आदमी के ईमान बोलते हैं।

और अंत में फिर वही धारणा...

Tuesday, March 18, 2008

इच्छाओं का होलिका दहन

मेरे साथियों पर होली का खुमार छाया है और मेरी हालत यह है कि होली के नाम से ही बुखार छूटने लगता है, पसीने आने लगते हैं। इस महानगर में रम और रंग की होली देखी है। दरअसल रम में पैसे का खर्च ज्यादा है और रंग छुड़ाने में वक्त का। इससे बेहतर तो हमारे गांव में था। न रम का झंझट न रंग का। चढ़ाओ ठर्रा और हो जाओ मस्त। इस देसी शराब के नशे के बाद तो होली के दिन गांव की नालियां रंगों की बाल्टी बन जाती थीं। पूरी आत्मीयता के साथ उसे शरीर पर पोतो और फिर नहाने के वक्त भी कोई झंझट नहीं। देह पर एक बाल्टी पानी मारो और सारा कीचड़ धुल गया। पर यहां तो हालत यह हो जाती है कि रगड़-रगड़ कर चमड़ी छील डालो पर रंग दिखता ही रह जाता है।

वैसे, मुझे आज भी याद है जब मैं होली के मौके पर पहली बार ससुराल जा रहा था। कितनी नाक रगड़ने के बाद बॉस ने छुट्टी दी थी। उस कमबख्त का दिया सारा दर्द भूल गया मैं अपनी उस ससुराल यात्रा में। बस स्टैंड पर ही साले साहब मुझे रिसीव करने पहुंच गये थे। बिल्कुल नई चमचमाती बैलगाड़ी लेकर आए थे वह। मैं बैलगाड़ी के पास पहुंचा, साले साहब मेरा सामान लाद ही रहे थे कि दोनों बैलों ने सिर हिलाकर और पूंछ को चंवर की तरह डुलाकर मेरा अभिवादन किया। पता नहीं इन बैलों को कैसे ट्रेंड कर देते हैं गांव के लोग। जिसने मुझे कभी देखा नहीं था, उसने भी पहचान लिया। सिर्फ पहचाना ही नहीं मुझे देख सिर भी हिलाया, चंवर भी डुलाया। मैं भावविभोर हो गया। शहर के बैल याद आए। वहां इतने कीमती स्कूल। पर वहां पढ़कर भी इंसान की औलाद इंसान नहीं बन पाई, बैल ही रह गई। वे बैल न किसी को पहचानते हैं न किसी के सामने नतमस्तक होते हैं। चचा दिखें या दिखें चाची, होठ में दबा सिगरेट न छुपाने की जरूरत समझते हैं न ही छुपाते हैं। बस मुंह से धुएं के गोल-गोल छल्ले निकालते रहते हैं। यही सब याद कर मन ही मन मैं कोस रहा था उन सबों को जो अपनी कार से मेरे चेहरे पर धूल उड़ाते और चिढ़ाते निकल जाते थे। तभी साले ने टोका 'कहां खो गये जीजा जी। गांव नजीके है अब।'

मेरी तंद्रा टूटी। देखा, बच्चों का झुंड हमारी बैलगाड़ी की ओर दौड़ा चला आ रहा है। हवा में हाथ लहराते वे चिल्ला रहे हैं 'दिलवाले जी आ गए, दिलवाले जी आ गए।' साले ने बताया कि ये चिल्ला रहे हैं कि दिल्ली वाले जीजा जी आ गये। फिर कहने लगा 'अरे जीजा जी, बड़ा क्रेज है हियां आपका। बड़, बूढ़, जवान, चेंगना-मेंगना सभे आपसे होली खेलने का पिलान बना लिए हैं।'

यह सुनकर मैं घबराया। मुझे अपने मोहल्ले की होली याद आ गई। होली के बाद सड़कों पर फटे कपड़े बिखरे रहते थे। हर होली में लगभग नंगा होकर ही मैं घर पहुंचता था। पर यह तो ससुराल है, यहां अगर ऐसा-वैसा कुछ हो गया तो? मैंने अपने को संयत कर कहा, 'साले साहब, मैं तो पूरी शालीनता के साथ होली खेलूंगा।'

उसने कहा, 'हां जीजा जी, जरूरे खेलिएगा। आखिर नता साली है आपकी।' फिर थोड़ा चौंकते हुए उसने पूछ 'पर जरा इ तो बताइए कि नता को आप कइसे जानते हैं। उ भी छटपटाई है होली खेलने के लिए। बहुत सयानी है, पूरा रंग देगी आपको। अच्छा, जरूर दीदी ने बताया होगा उसके बारे में। उसकी पक्की सहेली है उ।' चौंकने की बारी मेरी थी, 'किसकी बात कर रहे हैं आप?' उसने कहा 'अरे उसी नता के बारे में। अभिए न आप कहें कि मैं तो सिर्फ साली नता के साथ होली खेलूंगा।' मैंने साफ किया 'अरे भाई, मैंने किसी साली नता के बारे में नहीं कहा, मैंने तो कहा शालीनता के साथ होली खेलूंगा।' 'ओहो.. होहो....जीजा जी, का करें हम थोड़ा कनफूजिया गए', उसने कहा। इतने में हमारी बैलगाड़ी गांव में पहुंच गई। सड़क के कूबड़ पर बैल अपनी मस्त चाल में चल रहे थे। बच्चों की टोली ने मेरे विजिटिंग कार्ड का काम किया। गांव में पहले ही खबर हो गई थी कि 'दिलवाले जी' आ गए हैं। कुछ महिलाएं अपने दामाद को देखने के लिए अपने-अपने घर के दरवाजे की ओट में खड़ी दिखीं, तो कुछ सिर पर पल्लू डाले मुंह में साड़ी का एक किनारा दबाए घर के बाहर निकल आई थीं। मैं नई-नवेली दुलहन की तरह संकोच से भरा था। पर महानगर की अपनी आदत से बाज नहीं आ सका। कनखियों से उन्हें निहारता रहा। सब आपस में कानाफूसी कर रही थीं। चुहल उनके चेहरे पर साफ झलक रहा था। मैं मन ही मन रोमांचित हो रहा था। इतनी प्यारी-प्यारी और ढेर सारी सासें। सालियों की संख्या इनसे दोगुनी तो जरूर होगी - यह सोच ही रहा था कि आवाज आई 'परनाम जीजा जी'। साले ने बताया 'झुनकी है'। फिर उसने बैलगाड़ी पर ही परिचय देना शुरू कर दिया 'ऊ है पायल...और ऊ... हुंआ जो दूर में खड़ी है.... ऊ पांचों के बीच में... ऊ है सुगनी, अरे सुगनी देख तेरे जीजा जी को हम ले आए।' सलज्ज मुस्कान के साथ उधर से अभिवादन मिला। पर बाकियों में से किसी एक ने कहा 'हां रे जोधन, पकड़ के रखना। कल पता चलेगा जीज्जा जी को...अइसा पटकेंगे कुंइयां वाले कीच में की यादे रहेगा।' 'अरे, अइसा काहे बोलती है। सहर वाले जीज्जा जी हैं। देखती नई, केतना गोर हैं। कीच लग गया तो करिया हो जाएंगे' यह दूसरी ने कहा। तीसरी ने कहा 'चिंता न करना जीज्जा जी। आप करिया हो जाएंगे, तो हम अपने हाथों से बढ़िया से नहला कर साफ कर देंगे, फिर अइसने ही सहर वाला दिखने लगेंगे आप।' इनकी बात सुन के सचमुच सिहर गया मैं। जोधन ने डांटा, 'चल हट हियां से। बेसी बकर-बकर मत कर। अभिये से लक्षन मत दिखा अपन।' लड़कियों की इस ठिठोली के बीच से हमारी बैलगाड़ी गुजर गई। बैल ने एक बार उन्हें घूरकर देखा। इस घूरने को साले साहब ने भी देख लिया। दांत निपोर कर बोले, 'अभी घूर कर देख रहे हो जीज्जा जी, कल तो मटियामेट कर देंगी ये आपको। इनके मुंह मत लगना।' मैं सकपकाया। खैर, मैं ससुराल के दरवाजे पर खड़ा था। बच्चों का झुंड मुझे किसी दूसरे ग्रह से आए प्राणी की तरह समझ रहा था। सालियों की संख्या न पूछें जनाब। लग रहा था गांव की तमाम लड़कियां यहां इकट्ठा हो आई हैं। गांव के मेरे तमाम सास-ससुर वहां मौजूद थे। यह सब देखकर मेरा मिजाज बेसुरा होने लगा। एक तो सफर की थकान थी, दूसरा, बैलगाड़ी की सवारी और जब अब आराम करने का वक्त मिलना चाहिए, आधे घंटे से महिलाओं ने नौटंकी कर रखी है। कभी अक्षत छींटती हैं तो कभी गोबर से गाल सेंकती हैं। ऊपर से सालियों का कमेंट सो अलग 'हां जीजा जी, अभी तो गोबर से पुजा रहे हैं, कल गोबरे में सानेंगे आपको।'
बहरहाल, मुझे कमरे में ले जाया गया। बच्चों को तो बाहर से ही हुड़का दिया गया। पर सालियों ने पीछा नहीं छोड़ा था। बीवी इस भीड़ में कहीं दिख नहीं रही थी। सालियों की चिलपों को तो बर्दाश्त भी किया जा सकता था। पर मेरा साला कुछ ज्यादा ही हुलस गया था। उसे बर्दाश्त करना मुश्किल हो रहा था। तभी उसने सवाल दागा 'और जीजा जी, शहर में कैसा कट रहा था?' चिढ़ा हुआ तो था ही मैं। टका सा जवाब दिया 'कटना क्या है। बीवी महीने भर से मायके में थी, वहां मैं शांति और सुकून के साथ रह रहा था।' इसी बीच सासू मां आईं और फिर गईं। इस तीखे जवाब और तेवर के बाद सालियां भी खिसक गईं और साला भी। थोड़ी देर बाद लगा जैसे ससुराल में कोहराम मच गया है। सासू जी पछाड़ें खा के रो रही हैं। कुछ लोग समझाने में लगे हैं। मेरी समझ में कुछ नहीं आया। तभी बीवी के दर्शन हुए। वह समझा रही थी अपनी मां को। 'अरे, हुआं उ अकेले रहते हैं। शांति और सुकून नाम की कोई लड़की नहीं रहती।' अब समझा मैं कि मैंने जो कहा था कि शांति और सुकून के साथ रहता हूं, उसे उन्होंने किस अर्थ में ले लिया था।

खैर, दोपहर और शाम तक फिर कोई नया हादसा नहीं हुआ। अगजा जल चुका था। मेरा खाना आ चुका था। तरह-तरह की डिश थी। सब चीज मेरी पसंद के थे सिवाए कढ़ी-बरी के। मैंने मन ही मन सोचा कि सबसे पहले इसी घटिया आइटम को खत्म किया जाए, फिर बाकी चीजें प्रेम से खाई जाएंगी। यह सोच कर मैंने कढ़ी-बरी वाला कटोरा उठाया और एक ही सांस में सारा गटक गया। राह का रोड़ा खत्म हो चुका था, अब प्रेम से खाना खाने की बारी थी। पर ये क्या, मेरे कटोरा रखते ही फिर उसे तुरंत भर दिया गया यह सोचकर कि मेहमान को बहुत पसंद है। मन खट्टा हो चुका था। बीवी को मैं कोस रहा था। अब तक कहीं दिख ही नहीं रही है। किसी से पूछने में संकोच हो रहा था। कम से कम वह होती यहां तो इस कढ़ी-बरी को तो दुबारा खत्म नहीं करना पड़ता। मन ही मन सोचा, आने दो कमरे में रात को। तब हर चीज का बदला लूंगा।

रात को साले साहब मुझे कमरे में लेकर आए। मैं महीने भर की जुदाई खत्म होने की घड़ी का इंतजार कर रहा था। तभी साले साहब ने कहा 'बस जीजा जी, पानी पी कर आ रहे हैं। फिर साथे सुतेंगे।' मैं झल्लाकर रह गया। अब रात की बात क्या बताऊं। साले के साथ ही सोना पड़ा। बातचीत में साले साहब ने बताया कि हमारे यहां होली के दिन पूजा होती है उसके बाद ही यहां बेटी-दामाद साथ सोते हैं। मैं ऐसी परंपरा को कोसते-कोसते सो गया।

सुबह आंख भी ठीक से नहीं खुली थी कि हुड़दंगियों का शोर सुनाई पड़ा...सा र..र सा र र सेव सिंघाड़ा, तेरा बाप माखनचोर मेरा खेल बिगाड़ा, जोगीरा सा र र...मेरी नींद टूटी। मुझे लगा बगल में साले साहब सोए हैं। पर यह क्या? मैं तो अपने बड़े भइया के साथ सो रहा हूं। अभी जब उनकी शादी नहीं हुई है, तो मेरी बारी भला कहां से आ गई। इसी बीच फिर बाहर से शोर सुनाई पड़ा....जोगी रा सा र..र...र..।

Thursday, March 13, 2008

सपनों के साथ जीता हुआ आदमी

एक आदमी
जब सपनों में जीता है
गोबर को भी गणेश मान लेता है
वह नहीं जानता
कि शहर में
भेड़ियों की भी जमात है
वह देखता है सिर्फ़
आकाश में उड़ रहे
सफ़ेद कबूतरों को
मैदान में बेख़ौफ भाग रही गायों को।

सपनों में जीता हुआ आदमी
अपनी हर छोटी-सी जीत को
एवरेस्ट की ऊंचाई मान लेता है
उसकी नीली गहरी आंखों में
डल झीलें तैरा करती हैं
उन झीलों में
कई-कई नाव हुआ करते हैं
उन नावों में
सुंदर जोड़े अक्सर घूमते होते हैं
उन जोड़ों में
सपनों में जीते हुए आदमी की
धड़कन धड़कती होती है।

लेकिन जब
सपनों की दुनिया की मौत होती है
आदमी तिलमिला जाता है
नहीं सूझता है उसे कुछ भी
ख़ुद से अपरिचित हो जाता है
अपनी सारी दुनिया से
ख़ुद को काट लेता है
सपनों की दुनिया की मौत होती है जब
आदमी तिलमिला जाता है।

Tuesday, March 11, 2008

टूटती चट्टान की चीख

कल, जब मैं
जीना नहीं चाहता था
तब मिली थी तुम
और जगाई थी
तुमने ही मुझमें
जीने की इच्छा

आज, जब मैं
जीना चाहता हूं
दर्द
पीना चाहता हूं
तो
मुझे मेरे कल को
याद दिलाते लोग
तोड़ देना चाहते हैं
और मैं उन्हें
मोड़ देना चाहता हूं
ऐसे में तुम कहां हो?

मैं कल ही
उस पहाड़ी पर
बैठे-बैठे देख रहा था
एक चट्टान को तोड़ते
कई हाथों को
चट्टान/मैं
जो शायद
यही सोच रहा था
कभी तो थकेंगे
ये तोड़ते हाथ
पर शाम के ढलते-ढलते
चट्टान मजबूर हो गयी
टेक दिये अपने घुटने
हथौड़ों ने तोड़ दिया
उस चट्टान को
और फिर
उस काली भयावह रात को
आग के चारों ओर
नाचते हुए
मजदूरों ने जश्न मनाया
जब पत्थर
पहाड़ी ढलानों से
लुढ़कने लगे थे।

और अब
जब मैं फिर
घुटने टेकने की
तैयारी कर रहा हूं
तो मुझमें
उमंग भरनेवाली तुम
कहां हो? कहां हो? कहां हो?

Monday, March 10, 2008

बोये जाते हैं बेटे

नंदकिशोर हटवाल जी की यह कविता मुझे पढ़वाई थी मेरे साथी मञ्जुल ने। उस वक्त के बाद मैंने न जाने कितने लोगों को और कई-कई बार यह कविता सुनाई और पढ़वाई। हटवाल जी को मैं निजी तौर पर नहीं जानता। उनके बारे में मेरे पास कोई जानकारी नहीं। सचमुच यह मेरा छोटापन है कि जिस कविता से इतना लगाव हो, उसके रचनाकार के बारे में आप न जानें। पर उन्हें मैं उनकी इस अद्भुत रचना के लिए हृदय से धन्यवाद देता हूं।


बोये जाते हैं बेटे
और उग आती हैं बेटियां

खाद-पानी बेटों में
और लहलहाती हैं बेटियां

एवरेस्ट की ऊंचाइयों तक ठेले जाते हैं बेटे
और चढ़ आती हैं बेटियां

कई बार गिरते हैं बेटे
और संभल जाती हैं बेटियां

भविष्य का स्वप्न दिखाते बेटे
यथार्थ दिखाती बेटियां

रुलाते हैं बेटे
और रोती हैं बेटियां

जीवन तो बेटों का है
और मारी जाती हैं बेटियां

- नंदकिशोर हटवाल

Sunday, March 9, 2008

होली से पहले भाई के नाम एक पाती


फाग के महीने में
मन के रंग उड़ गये हैं
बेलौस हुए हैं मौसम
आस्था के रंग सड़ गये हैं

गांव में एक सड़क बनी है
सरपंच और ठीकेदार में तनी है
रमुआ का लड़का बहुत गुनी है
इलाज के अभाव में मां
जली है, भुनी है


अजब है हाल
उठता रहा सवाल
मन में मलाल
तो कैसे खेलें
फिर लोग गुलाल
बच्चे हैं बेहाल
सारे चेहरे लाल-लाल
जीना हुआ मुहाल


ख़ैर, तुम अपनी सुनाओ
सब सही है, सलामत है
या फिर,
कोई कयामत है?


वैसे, जानता हूं
सब जगह होती है
एक ही कहानी
लोगों की ज़बानी
उनकी परेशानी
नौकरी करो या करो किसानी
जब भी सोचोगे सुंदर भविष्य
तो मरती है नानी

पढ़े हुए बच्चे, नौकरी करते बच्चे
अपना परिवार, सुंदर-सी बीवी
घर में हो रेडियो-टीवी...
ये सब सपने हैं
थोड़े-बहुत अपने हैं

साहब ने खाया पपीता
मन तुम्हारा क्यों हुआ तीखा
अपनी-अपनी क़िस्मत है
मेरी आंखें विस्मित हैं
साहब खाते हैं दूध-मलाई
इलाज के बग़ैर
मरती है सुंदर की भौजाई।
यह कहां का इंसाफ है?
पुण्य है यह या कि पाप है?
यहां तो समय पर गधा भी बाप है।


शेष सब कुशल है
फिर भी मन विकल है
संसार है समंदर
तो जीवन है नाव
क्या करूं?

ढूंढ़ रहा हूं अपनी ठांव।
(प्रसारित)

Monday, March 3, 2008

एक मरा फोटोग्राफर, जो ज़िंदा हो गया था


यह तस्वीर केविन कार्टर नाम के एक साउथ अफ्रीकन फोटोजर्नलिस्ट ने खींची थी। बात मार्च 1993 की है। तब सूडान अकाल से जूझ रहा था। पत्रकारों की एक टीम में शामिल कार्टर उस समय सूडान गये थे। उन्होंने भूख से लड़ते सूडानियों को देखा और जुट गये कुछ ख़ास की तलाश में। उनकी तलाश पूरी हुई वहां के अयोड गांव में। उन्होंने देखा एक सूडानी बच्ची को। भूख से बेहाल हुए लोगों की मदद के लिए बने फीडिंग सेंटर की ओर वह ख़ुद को किसी तरह घिसट ले जा रही थी। अपनी इस कोशिश में वह अशक्त बच्ची बुरी तरह थक चुकी थी। सो वह रुक कर अपनी ताक़त फिर जुटाने लगी। कार्टर ने देखा कि उसके आसपास गिद्ध मंडरा रहे हैं। वह वहां रुक कर इंतज़ार करने लगे अपने संभावित दुर्लभ तस्वीर के लिए किसी ख़ास सिक्वेंस का। शायद उन्हें इंतज़ार था कि गिद्ध या तो बच्ची पर हमला करे या फिर अपने पंख फैलाये ताकि शिकार की एक जीवंत तस्वीर वह ले सकें। उन्होंने उस ख़ास दृश्य के लिए तक़रीबन 20 मिनट तक इंतज़ार किया। पर बात पूरी नहीं बनते देख उन्होंने अंत के इंतज़ार में बैठे गिद्ध और बच्ची की तस्वीर खींच ली और चलते बने।

पर यह तस्वीर नायाब बन गयी। द न्यू यॉर्क टाइम्स ने 26 मार्च 1993 के अपने अंक में इसे छापा, इस कैप्शन के साथ कि इस तस्वीर में फोटोग्राफर भी एक गिद्ध है।
जाहिर है, तस्वीर का लोगों के मन पर गहरा असर हुआ। कई-कई लोगों ने अखबार के दफ्तर में फोन कर बच्ची के बारे में जानना चाहा। सब के सवाल एक से थे कि बच्ची बची या नहीं। उस बच्ची का आखिरकार क्या हुआ। पर इन सवालों का कोई सटीक जवाब अखबार के पास नहीं था। पर फोन इतने ज़्यादा लोगों के आये कि अखबार को स्पेशल एडिटर्स नोट छापना पड़ा। उन्होंने उस नोट में लोगों को बताया कि बच्ची में इतनी ताक़त बची थी कि वह उस गिद्ध से दूर चली जाये। पर आख़िरकार उस बच्ची का क्या हुआ, यह नहीं पता।

इन सारी बातों के लगभग एक साल बाद। न्यू यॉर्क टाइम्स के पिक्चर एडिटर नैन्सी ब्रूस्की ने 2 अप्रैल 1994 के दिन कॉर्टर को फोन कर सूचित किया कि उसकी इस नायाब तस्वीर ने उसे फीचर फोटोग्राफी के लिए पुलित्जर प्राइज़ दिला दिया है। 23 मई 1994 के दिन कार्टर को कोलंबिया यूनिवर्सिटी के लॉ मेमोरियल लाइब्रेरी में पुरस्कार से नवाज़ा गया।

सम्मान समारोह के लगभग दो महीने बाद कॉर्टर ने खुदकुशी कर ली। मरने के कुछ रोज़ पहले उन्होंने अपने दोस्तों के सामने कुबूल किया था कि वह उस बच्ची की मदद करना चाहते थे। पर उस समय सूडान गये उनके दल को बीमारी के डर से आगाह किया गया था कि वे लोग अकाल के शिकार बने लोगों के शरीर को न छूएं।

कार्टर ने 27 मई 1994 को खुदकुशी की थी। उसने स्यूसाइड नोट में लिखा था :
"I am depressed ... without phone ... money for rent ... money for child support ... money for debts ... money!!! ... I am haunted by the vivid memories of killings & corpses & anger & pain ... of starving or wounded children, of trigger-happy madmen, often police, or killer executioners...I have gone to join Ken if I am that lucky. "

जिस तस्वीर की वजह से कार्टर को पुलित्जर अवॉर्ड मिला था, उसी तस्वीर की आलोचना ने उनकी चेतना को झकझोर कर रख दिया। उस तस्वीर से उन्हें इतनी पीड़ा हुई कि वह उससे उबर नहीं सके। हताशा के भंवर में वह डूबते चले गये। इस निराशा की नीम पर उनके अजीज़ साथी केन ऑस्टरब्रोक की मौत ने चढ़े करैले का काम किया। केन की मौत अप्रत्याशित थी। वह 18 अप्रैल 1994 को टोकोजा में भड़के दंगे को कवर करने गये थे। उसी दंगे में वह मारे गये। कुल मिलाकर इन दोनों सदमों ने उन्हें मौत के रास्ते पर ले जाकर पटक दिया। कार्टर को जीवित हालत में आखिरी बार केन की विधवा मोनिका ने देखा था।

आइए, आपको कुछ और 'जीवंत' तस्वीरें दिखाता हूं। ये सारी तस्वीरें आप पहले भी देख चुके होंगे। और देखा होगा तो भूल नहीं सकते। ये तस्वीरें भी कुछ वैसे फोटोग्राफरों ने खींची होंगी, जो अपने प्रफेशन के लिए पूरी तरह कमीटेड रहे होंगे।


ऐसे पांव अंगद के पांव नहीं, जिसे आप हिला नहीं सकते।
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आप आपस में हाथ मिलाकर तो देखें। ऐसे हाथ बड़ी आसानी से बांह के साथ उखड़ जाएंगे।
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ये तस्वीरें हैं 24 नवंबर 2007 को जल रहे असम की। इन आदिवासी औरतों को गुवाहाटी में मर्दों ने पीटा। मर्दों ने तस्वीरें उतारीं। मर्दों ने सारा कुछ घटते देखा। नामर्द घर में घुसे रहे। बचाने के लिए कोई हितैषी सामने नहीं आया। यहां पुलिसवाले भी थे, लेकिन संख्या में कम। शायद इसलिए उनमें हिम्मत नहीं हुई इस नंगी भीड़ का सामना करने की।
ज़रा सोचें।
भीड़ के मुकाबले संख्या में कम होने की वजह से पुलिस बेबस थी। उस शहर में सारे के सारे दंगाई नहीं थे। दंगाइयों से ज़्यादा बड़ी संख्या मूकदर्शकों की थी। अगर इन मूकदर्शकों के भीतर की आत्मा बोल जाती, तो सचमुच दंगाइयों की खाट खड़ी हो जाती।

ज़रा एक बार और सोचें।
- जो फोटोग्राफर वहां मौजूद थे और अपने प्रफेशन के लिए कमिटेड होकर तस्वीरें उतारते रहे बगैर दंगाइयों से डरे। अगर भीड़ की चपेट में उनकी मां, बहन, पत्नी, प्रेमिका, बेटी... कोई होती, तो भी क्या वे अपने प्रफेशन के लिए इतना ही कमीटेड होकर महज फोटो खींचते रहते?
- जो पुलिसवाले कम संख्या में होने का रोना रो रहे हैं, या वहां होते हुए भी न होने की बात कर रहे हैं अगर उनके घर की कोई महिला इस भीड़ में फंसी होती, तो क्या वहां अपने न होने की बात कह उससे नज़र मिला सकते थे वे?
- जो महज लोग मूकदर्शक बने रहे, अगर उनके घर का कोई इस तरह ज़लील होता रहता, तब भी क्या उनकी आत्मा सोई रहती?

कार्टर तो ख़ैर जीवित इंसान निकला, इसलिए उसे अपने किये का पछतावा रहा। मैं यह नहीं कहता कि ज़िदा होने के बाद उसने जो किया बहुत बढ़िया किया। बेशक उसने जो किया उसे पलायन ही कहेंगे। पर मर कर उसने अपने ज़िंदा होने का परिचय तो दिया।

गुवाहाटी के वारदात को महीनों बीत गये। पर कोई ऐसा सामने नहीं आया जिसने दंगाइयों को पहचानने का दावा किया हो, या खुद के दंगाई होने की बात कही हो। दरअसल, ये सब के सब मरे लोग हैं। अपने में मस्त। आत्मरति के शिकार। आत्ममुग्ध लोग। ऐसे में प्रियदर्शन की कविता 'अहंकारी धनुर्धर' की याद आती है :

सिर्फ़ चिड़िया की आंख देखते हैं अहंकारी धनुर्धर
आंख के भीतर बसी हुई दुनिया नहीं देखते
नहीं देखते विशाल भरा-पूरा पेड़
नहीं देखते अपने ही वजन से झुकी हुई डाली
नहीं देखते पत्ते जिनके बीच छुपा होता है चिड़िया का घोंसला
नहीं देखते कि वह कितनी मेहनत से बीन-चुन कर लाए गए तिनकों से बना है
नहीं देखते उसके छोटे-छोटे अंडे
जिनके भीतर चहचहाहटों की कई स्निग्ध मासूम संभावनाएं
मातृत्व के ऊष्ण परों के नीचे
सिंक रही होती हैं
वे देखते हैं सिर्फ़ चिड़िया
जो उनकी निगाह में महज एक निशाना होती है
अपनी खिंची हुई प्रत्यंचा और अपने तने हुए तीर
और चिड़िया के बीच
महज उनकी अंधी महत्त्वाकांक्षा होती है
जो नहीं देखती पेड़, डाली, घोंसला, अंडे
जो नहीं देखती चिड़िया की सिहरती हुई देह
जो नहीं देखती उसकी आंख के भीतर नई उड़ानों की अंकुरित होती संभावनाएं
वह नहीं देखती यह सब
क्योंकि उसे पता है कि देखेगी
तो चूक जाएगा वह निशाना
जो उनके वर्षों से अर्जित अभ्यास और कौशल के चरम की तरह आएगा
जो उन्हें इस लायक बनाएगा
कि जीत सकें जीवन का महाभारत
दरअसल यह देखने की योग्यता नहीं है
न देखने का कौशल है
जिसकी शिक्षा देते हैं
अंधे धृतराष्ट्रों की नौकरी बजा रहे बूढ़े द्रोण
ताकि अठारह अक्षौहिणी सेनाएं अठारह दिनों तक
लड़ सकें कुरुक्षेत्र में
और एक महाकाव्य रचा जा सके
जिसमें भले कोई न जीत सके
लेकिन चिड़िया को मरना हो।

Saturday, March 1, 2008

विद्रोह की धुन

अब मत कहो : मत।
इस जंग खाई व्यवस्था से
सचमुच अब है
जंग की ज़रूरत।

ठीक है।
देख लो, समझ लो
और लो परख।
नहीं कोई बहुत हड़बड़ी।
नहीं करनी तुरंत।
पर जब बीत जाए मौसम
और बदल जाए वक़्त,
फिर कुछ नहीं हो सकता
भले हो लो तुम
कितना भी सख्त।

हां मेरे भाई,
यही है सचाई
कि खुशियों के पल में
डूबे रहे लोग
और किसी को
मेरी याद नहीं आई।
अब सब करते हैं
मेरी बड़ाई।

यही तो है असली लड़ाई।
कि दो और दो होते हैं चार
तुमने जाना
पर नहीं की तुमने
तीन-पांच करने की पढ़ाई।
अब आ बैठे हो उन्हीं के बीच।
तलवारें उन्होंने ली हैं खींच।
बारी है तुम्हारी
जबड़े लो भींच
तान लो मुट्ठी
गर्म है भट्ठी
झोंक दो सारी ऊर्जा
मत सोचो
कि रहोगे दिल्ली
या भेजे जाओगे खुर्जा।

Wednesday, February 27, 2008

शरीफ़ शहरी की शान

शहरी होना बड़ी बात नहीं, शहरी का शरीफ़ होना बड़ी बात है। आप सोच रहे होंगे कि यह कैसी बेतुकी बात कर दी मैंने। शहरी और शरीफ़ शहरी में कोई अंतर होता है क्या? यक़ीनन, अंतर होता है और बहुत ही गंभीर और गहरा अंतर होता है। रूप और बनावट में दोनों दिखते एक से हैं पर शरीफ़ शहरी बड़ी शार्प चीज़ होता है। वह इतनी तेज़ छुरी होता है कि आपकी गरदन काट ले जाए और आपको दर्द तक का अहसास न होने दे। इसे आप आसानी से ऐसे समझें कि यह शरीफ़ शहरी की बातों का जादू होता है कि आप अपनी गरदान बार-बार और सहर्ष उसके सामने प्रस्तुत करते हैं कि ले भाई, काट ले जा मेरी गरदन।

ख़ैर। चलिए, आज आपको थोड़ा विस्तार से बतलाता हूं कि क्या अंतर है इन दोनों कैटिगरी में। शहर में रहनेवाले शहरी कहलाते हैं। लेकिन सच है कि शहरी होना संक्रमणकाल से गुज़रने जैसा होता है। यानी, इस दौर में आपके भीतर गांव या क़स्बे की सादगी और वहां का भोलापन ज़िंदा होता है। आप चाहते हैं कि आपकी सादगी पर महानगर की रंगीनी चढ़े। इसके लिए आप तमाम मशक्कत करते हैं। बेवजह भिंगाकर मारा गया जूता हो या फिर हो चांदी का; आप दोनों को बर्दाश्त करते हुए कंठलंगोट लगा दांत निपोरकर खी-खी करते नज़र आते हैं। पर कंठलंगोट का असली इस्तेमाल आपको तब सूझता है, जब मारे गए जूते से आपके चेहरे पर पसीने चुहचुहा रहे हों। कहने का मतलब यह कि तमाम तरह के दिखावे के बाद भी आपके भीतर गांव का वह बालक छुपा बैठा होता है जो पूरी सहजता से अपने आस्तीन से अपनी नाक पोंछता था।

ऐसी कई-कई रासायनिक प्रक्रियाओं से गुज़र कर ही आप शरीफ़ शहरी होने का ठप्पा अपने ऊपर लगवा पाते हैं। इसलिए कहता हूं कि शरीफ़ शहरी बनना यक़ीनन बड़े धैर्य का काम है। वह इतना आसान नहीं कि आज आपने सोच लिया और कल से आप शरीफ़ शहरी बन गये। जो भी सज्जन फिलहाल इस टिप्पणी को पढ़ रहे हैं, उनके बारे में मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूं कि वे शहरी तो हैं पर शरीफ़ शहरी नहीं। क्योंकि शरीफ़ शहरी पढ़ने के रोग से बिल्कुल मुक्त होता है। वह सिर्फ़ पट्टी पढ़ाना जानता है। वह किसी भी वक़्त, किसी के भी ख़िलाफ़, किसी को कोई भी पट्टी बड़ी आसानी से पढ़ा सकता है।

शहरी और शरीफ़ शहरी का एक मोटा फर्क़ आप इस रूप में समझ सकते हैं कि अधिकतर शहरी किसी न किसी स्टॉप पर बस का इंतज़ार करता हुआ दिख जाता है। महीने के अंत में उसके घर में क्लेश थोड़ा बढ़ जाता है। किसी तरह अपनी इज़्जत बचाए रखने की कोशिश में उसके चलने, उठने-बैठने का अंदाज़ उस तिलचट्टे की तरह हो जाता है, जिसपर कई टन यातनाओं का दबाव हो और तिसपर रेंगने की बेपनाह मजबूरी।

जबकि शरीफ़ शहरी के पास खूब पैसा होता है, गाड़ियां होती हैं, शोहरत होती है। इज़्जत तो वह इस क्रम में खरीद ही लेता है, खरीदने से न मिले तो वह इज़्जत लूटने से गुरेज़ भी नहीं करता। वह अपनी धुन का पक्का होता है। बड़ी से बड़ी कुर्बानियां देने को वह तैयार रहता है। मसलन, ज़मीन खरीदने की धुन हो या मकान। वह उसे हर कीमत पर पूरा कर ही लेता है, भले ही इस क्रम में वह अपनी ज़मीन से उखड़ जाए या उसका बसा-बसाया घर उजड़ जाए।
शरीफ़ शहरी की एक बड़ी खासियत यह होती है कि वह सबकी "हां" में "हां" मिलाता है। राग दरबारी पर उसका एकाधिकार होता है। गरीब की जोरू मजबूरी में सबकी भौजी हो जाती है, पर शरीफ़ शहरी जानता है कि इस भौजी से कब, कहां और कैसे मिलना है। मुहावरों की ज़बान में बात की जाए तो शरीफ़ शहरी के कई-कई मौसेरे भाई होते हैं। आपकी ज़रूरत के वक़्त वह बड़े इतमीनान से नौ दो ग्यारह हो जाता है। लेकिन कभी उसे आपकी ज़रूरत पड़े तो वह बारह दस बाइस की स्पीड से आपके पास दौड़ा चला आएगा। यानी अपना काम निकालने के लिए वह हर तरह का नौ छौ करने को तैयार रहता है। साथ ही आपके बन रहे काम को तीन तेरह करने में उसे दो मिनट भी नहीं लगते। महानगरों में शरीफ़ शहरी बनने का फैशन अपने पूरे उफान पर है। शराफ़त का यह किटाणु अब गांवों और कस्बों में भी अपनी ज़मीन तलाशने लगा है। तो तय करें आप कि आप शहरी बनना पसंद करेंगे या शरीफ़ शहरी।

अंतर

मैं

तुम्हारे लिए
उपमाएं चुनता हूं
शब्द ढूंढ़ता हूं
और
अपनी तमाम खुशी
तुम्हारे नाम करता हूं

पर तुम
मेरे लिए पेश करती हो
सिर्फ कुंठा
हताशा
निराशा
और भटकाव।

Sunday, February 24, 2008

महाभिनिष्क्रमण के बाद

सब कहते हैं

और मैं भी मानता हूं
बहुत बड़े संन्यासी थे तुम
राजा पिता की सारी जायदाद छोड़कर
जंगल-जंगल भटकते रहे
सत्य की तलाश में।

इसके पीछे वजह यह भी रही
कि बचपन में
तुम्हारी हर जरूरत पूरी होती रही
तुम्हारे घर-आंगन में
दूध-दही की नदी बही।

अगर तुम किसी फुटपाथ पर
पैदा होते
तो यकीन मानो
तुम्हारी पहली ज़रूरत
पेट की होती
शायद, सच की तलाश के लिए
सोच भी नहीं पाते तुम
डरे हुए जानवर की तरह
दबाये रखते अपनी दुम।

चूंकि तुम्हारा उदर भरता रहा
इसलिए तुमने जाना
कि लोभ दुख का कारण है
कभी एक शाम
भूखे रहना तुम्हारी मजबूरी बन जाए
और दिहाड़ी मजदूर की समस्या
तुम्हारी समस्या बन जाए
तो फिर देखना
ये सारे आदर्श हवा हो जाएंगे।

दरअसल,
दुख के और भी कई कारण हैं
जिनसे तुम्हारा वास्ता नहीं पड़ा
तुम्हें नहीं मालूम
कि जब
दरवाजे के कब्जे की कील
उखड़ी पड़ी हो
तो घर की तिमारदारी
है कितनी जरूरी
कि शहर में
लंपटों की टोली ने
रोटी पर कब्जा किया हुआ है...
.......... ।
और भी कई-कई तनाव हैं
कि शहर में हर तरफ
खतरनाक उदबिलाव हैं।

मौसम का मिजाज
फिर उखड़ा है।
शहर पाले का शिकार हुआ है
और हर आदमी ठिठुर रहा है।

भ्रूण का वक्तव्य

मां,
तुम ख़ुद स्त्री हो
इसलिए जानती हो
इस कटखने समाज में
पल-बढ़ रही स्त्री का दर्द।

चूंकि इस वक्त मैं
तुम्हारे भीतर पल रही हूं
इसलिए जान भी रही हूं
समाज के इस कड़वे स्वाद को
और आज
तुम्हारी उस हताशा को भी
मैंने महसूसा
जब तुम्हें पता चला
कि तुम्हारे भीतर पलता भ्रूण
स्त्रीलिंगी है।

ओ मां,
मैं जानती हूं
कि घर की माली स्थिति
खराब है
और मेरे लिए दहेज की चिंता,
समाज के बिगड़ैलों से
मेरी हिफाजत का तनाव...
से घबराकर तुम
मुझे जन्म देना नहीं चाहती

लेकिन मां,
शायद यह
तुम्हें नहीं पता होगा
कि मैं
तुम्हारे अंतरंग क्षणों की साक्षी
बन चुकी हूं
तुम मेरे उस दर्द को भी
नहीं जान सकती
जब तुमने पिता से कहा
कि तुम्हारे गर्भ में
लड़की है और उसे तुम जन्म...

लेकिन मां,
इन सबके बावजूद
मुझे अपनी कोख से जन्म दो न!

Friday, February 8, 2008

मां को समर्पित पांच कविताएं

ये मेरी मां है। शैलप्रिया। 1 दिसंबर 1994 की रात दिल्ली में ही कैंसर से लड़ते हुए मां की मौत हुई थी। उस वक़्त मैं रांची में था। पापा, भइया और छोटी बहन - तीनों मां के पास थे। मैं रांची में अपनी बूढ़ी दादी के पास उनकी देखभाल कर रहा था। हम चारों - पापा (विद्याभूषण), पराग भइया (प्रियदर्शन) और छोटी बहन रेमी (अनामिका) - के अलावा सिर्फ़ डॉक्टरों को ही पता था कि मां को कैंसर ने जकड़ रखा है। नवंबर 94 के आखिरी सप्ताह में आकाशवाणी (रांची) से कविताओं की रिकॉर्डिंग के लिए मुझे अनुबंध पत्र मिला। ये कविताएं उसी दौरान लिखी गयी थीं। संभवतः इनका प्रसारण 9 दिसंबर को होना था। पर मां की मौत के बाद उनके जन्मदिन (11 दिसंबर) को इनका प्रसारण हुआ। मां की कविताओं के दो संकलन 'अपने लिए' और 'चांदनी आग है' उनके जीवन काल में ही आ चुके थे। मौत के बाद तीन किताबें और आईं - घर की तलाश में यात्रा, जो अनकहा रहा और शेष है अवशेष । इसी बीच प्रसंग का 'शैलप्रिया स्मृति अंक' भी आ चुका था।
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परिवेश : एक
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ओ मां,
तुम्हें याद होगा
कि बादलों की गड़गड़ाहट से घबराकर मैं
हमेशा सिमट जाया करता था
तुम्हारी गोद में।
और यहीं सिमटे हुए
बहुत बार
कई-कई लड़ाइयां लड़ी हैं मैंने
और कई बार पीट चुका हूं
उस राक्षस को भी
जो तुम्हारी कहानियों की परियों को
सताया करता था।

संभव है,
तुम्हें याद न हो
पर मैंने तुम्हें बताया था
कि एक रात मैं अचानक
कृष्ण बन गया
और मेरे हाथों
कंस की हत्या हो गयी।

सचमुच मां,
अब समझता हूं
वह तुम्हारी गोद का जादू था
कि मैं निःशंक होकर
बैठे-बैठे लड़ लिया करता था
अपनी तमाम काल्पिनक दुःश्चिंताओं से
अपने को तमाम लोककथाओं का
नायक समझता हुआ
धीरे-धीरे बड़ा होता गया
तुम्हारी कहानियों के नायकों के
सारे पोल खुलते गये
उनके खल पात्रों को
जीवन में कई बार देखा।

हां मां,
उम्र की इस यात्रा से
गुज़रते हुए
चीज़ों को बहुत क़रीब से देखा है
बातें बहुत साफ हुई हैं
अब मैं
अपने बच्चों को
तुम्हारी कहानी सुनाता हूं
कि कैसे पैसे के अभाव में तुम
घुलती रही ताउम्र
इस जंगलतंत्र में
विवश हुए लोग हैं
इन वर्षों में
बहुत जटिल होती गयी है ज़िंदगी
समूचे मानदंड बदल चुके हैं
अमन और शांति
दूर के ढोल हैं
नेताओं के बोल हैं
आदमी की क़ीमत
मिट्टी के मोल है।
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परिवेश : दो
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ओ मां,
बचपन से तुम्हें
अपने पास देखता रहा
और फैलता गया मैं
समूचे आकाश में।
फिर रास्ते के पहाड़
राई बन गये
और मैं
राई से पहाड़।

तुमने कहा
नियति नहीं है पहले से तय।
और सचमुच
लड़ता गया मैं
अपनी तमाम वर्जनाओं से
दुश्चिंताओं के घेर से बाहर आकर
मैंने तय की अपनी नियति
और बुनता गया ढेरों सपने।

लेकिन अब भी
अकेले में अक्सर
एक आदमकद सच्चाई
दबोचती है मुझे
सवालों के कटघरे में
बींध जाते हैं
मेरे तमाम विचार
कि दूसरों के भोग का अवशेष
मैं झेलूं कब तक?
प्रश्नों की सीमा में बंधा आदमी
हमेशा आदमी नहीं रह जाता
पर तय है
कि रेगिस्तान में
मृगमरीचिका का संबल
जीवन देता है कई-कई बार।
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परिवेश : तीन
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जब सवालों से
छीजने लगता है मन
व्यवस्थाएं होने लगती हैं
उलट-पलट
धूल-गर्द और गर्म हवाओं को भी
फांकते हुए
नहीं मिल पाता है
जीने का कोई सही अर्थ
तो फैलने लगता है
अवश विद्रोह।

नींद खुलते ही
हर रोज़ देखता हूं
बिस्तर पर दर्द से लेटी मां।
रसोईघर से जूझती
बूढ़ी दादी।
और पिता के ललाट पर
परेशानियों की लकीरें।

नहीं देख पाया कभी
कि सुबह की शुरुआत हुई हो
मां की हंसी से।
इसीलिए भी
चंद लम्हें
आंखें बंद किये पड़े रहता हूं दोस्तो
कि शायद कभी
कल्पनाओं में आ जाये
पिता का हंसता चेहरा
और मां की वेदनारहित हंसी।
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परिवेश : चार
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बातें सीमित हैं
चंद पारिभाषिक शब्दों से
बताता चलता हूं
तुम्हारी पीड़ा।
कि तुम
सूने आकाश को ताकती हो सिर्फ़
कि तुम्हें कविताएं
बेमानी लगने लगी हैं
लेखों में तुम्हारी कोई रुचि नहीं रही
कि हम सब
तुम्हारी परेशानियों में
घुल रहे हैं।

पापा की पेशानी
भाई का चेहरा
और छोटी की आंखें
नहीं देख पाता अब।
सिर्फ़ चाहता हूं
कि तुम्हारी ताज़गी लौट आये
तो लिखूं एक लंबी कविता
अजनबी होते शब्दों को
फिर प्यार करूं।

ओ मां,
कैसे हो जाती हैं
स्थितियां इतनी अनियंत्रित
कि कोई सही शब्द नहीं सूझता?
कि शब्दों के बाज़ार में?
सही शब्द नहीं मिलते?
कि दिनचर्या बंध जाती है?
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परिवेश : पांच
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जीवन के संदर्भ में
अपने ख़याली दर्शन पर
कई-कई बार आत्ममुग्ध हुआ हूं मैं।

अपने ज्ञान की शेखी बघारता
न जाने कितनी बार
मैंने मौत को लताड़ा है।
स्वजन के मृत्युदंश से आहत
कई लोगों को
बड़ी आसानी से
समझाया/बहलाया/फुसलाया है।

लेकिन आज स्थितियां बदल गईं
ज़िंदगी और मौत से
रस्साकसी करते अपनी मां को देख।
जबकि जानता हूं
कि एक दिन
छोड़ जाना हैं हमें
सारा कुछ
बन जाना है इतिहास
फिर कभी कोई पलटेगा
हमारी कतरनों को
और तार-तार होकर
निकलेगी हमारी कविता।
सचमुच, कतरनों की हिफ़ाज़त के लिए
चिंतित हूं मैं।
(प्रसारित)

Thursday, February 7, 2008

युद्धरत आम आदमी


यारो, यह ग़ज़ब कैसे हो गया?
इस बार यह नदी
पूरी सूख गयी
या यकायक
पूरी नदी ही बह गयी?

मैं देख रहा हूं
हमारे पांवों तले की ज़मीन
खिसक रही है
हमारे हिस्से की रोटी
हमारी थाल से ग़ायब हो रही है
हमारी हर चीज़
जो हमें बहुत प्यारी थी
उस पर बिचौलियों ने
क़ब्ज़ा जमा लिया है।

पेट की धमनभट्ठी में
हम झुलस रहे हैं
और तिसपर हमारी अंतड़ियां
हमसे जो सवाल कर रही हैं
उनका एक भी कोई सही जवाब
नहीं है हमारे पास।

हमारे शरीर की हर ऐंठन
हमारे इर्द-गिर्द एक तिलिस्म
बुन रही है
जिसका तोड़ और जिसका हिसाब
हम ख़ुद भूलते जा रहे हैं।

हमारी थाल से
अगर रोटियां ग़ायब हो रही हैं
तो यह क़तई नहीं साबित होता
कि हमारे मलिकान
बहुत चालाक हैं।
अगर ठंड भरी सुबह में
हमारी ललाट पर
पसीने चुहचुहा रहे हैं
तो यही साबित हो रहा है
कि हमने
बेजा मेहनत की है।
जाड़े में बहता
यह पसीना
बहुत दुर्गंधित है साथी
असह्य है एयरकंडिशंड में
बैठे लोगों का होना।
हमारी हर ज़रूरत पर
पिस्सू की तरह चिपके ये लोग
बड़े सुघड़ भले दिख रहे हैं
पर इनकी असलियत
कुछ और है।
गुलाब की खेती करने वाले
ये बहरुपिये
हम सबों के बीच
मतभेद बो रहे हैं।
इसलिये अपनी तमाम चुनौतियों के बीच
थोड़ा समय निकाल यह सोचें
कि हमारी कैक्टस हुई
ज़िंदगी का राज़
कहां छुपा है।

धनिए की महक
और मकई के बाले
बेटे की तुतलाती ज़बान
और पत्नी की पनीली आंखें
ये सारा कुछ छोड़कर
हम आये थे यारो
अपने प्यारे से गांव से
सोचा था
शहर में
सपनों की बगीया लगेगी
और गांव में बेटा जवान होगा
मगर
कुपोषण के शिकार हुए
दोनों के दोनों।

यारो, बहुत सह लिया
अब चलो
हमारी ज़रूरतें
जिनके लिए मज़ाक़ हैं
अपनी करनी से
उनके चेहरे तराश दें
उन्हें बतायें
कि हम अपने पसीने से
तुम्हारी ईंटें जोड़ सकते हैं
तो हमारे पसीने में
तुम्हारे मकान
बह भी सकते हैं।

यारो,
हम युद्धरत आम आदमी हैं
अपनी ज़रूरतों को
अपनी आंखों से देखेंगे
और तमाम रणनीतियां भी
अब अपनी बनायी हुई होंगी।
पहले की ग़लती
हमें फिर नहीं दुहरानी
कि बकरियों को
बुरी निगाह से बचाने के लिए
उन्हें हम कसाईबाड़े में रख दें।

हमारे शरीर वज्र के बने हों
और हमारे इरादों में
फौलाद साफ-साफ झलके
इसके लिए ज़रूरी है
कि युद्धरत हो जाओ।

हर ख़ास को अब
आम बना देना है
ख़ास बने रहने की चाह
बहुत बड़ी कमज़ोरी है
यही से शुरू होता है
व्यवस्था के ढांचों का
ढीला पड़ते जाना।

यक़ीनन, इस लंबी यात्रा में
हमें कई घाटियों से गुज़रना है
जहां कई तीखे मोड़ हैं
लेकिन चिंता की कोई बात नहीं
सुरक्षा के सारे इंतज़ाम
कर लिये गये हैं
तुम बेख़ौफ़ बढ़े चलो।

सुबह का सूरज
अब पीली रोशनी नहीं फेंकेगा
दहकते हुए आदमी की
हां में हां मिलायेगा वह
तुम इतमीनान में रहो
कि हर सुबह अब सूरज
पहले तुम्हारी झोपड़ियों में उगेगा।

सिपाहियों की बंदूकें
घबराई हैं यह सोचकर
कि कल जब तुम
अचानक कमर कस लोगे
उनके ख़िलाफ और पूछोगे
बेवजह ढाये गये ज़ुल्म की वजह
तो क्या जवाब देंगी वे।

यारो, अब उदास होने की ज़रूरत नहीं
क्योंकि सचमुच
जीवन के हर मोर्चे पर
युद्धरत है आम आदमी।

Tuesday, February 5, 2008

कलमुंही का पत्र



प्रिय अखिल,
पहला पत्र इसलिए लिखा था कि मेरे जिंदा होने की जानकारी तुम सबों के पास हो। दूसरा पत्र लिखने की इच्छा नहीं थी। पर तुम्हारा पत्र मिलने के बाद लिखना जरूरी लगा। अपनी सफाई देने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि औरतों के बारे में सोचने का तुम्हारा तरीका बदले। साथ ही तुम यह जान सको कि तुम्हारी यह 'कलमुंही' बहन घर से क्यों भागी थी।

तब तुम सिर्फ12 साल के थे, आज 22 के हो। इन दस सालों का सच है कि मैंने दस घाट का पानी पी लिया। 27 की हो गई, पर लगता है अनुभव मेरे पास 67 से भी ज्यादा के हो गए। तुम्हारी उम्र पर ध्यान इसलिए चला गया मेरे भाई, कि तुम्हारे पत्र में 'मर्द' की बू थी। मर्द जिसे मैंने 17 की उम्र में झेला था पहली बार।

तुमने लिखा था कि मेरे नाम की चर्चा होने से ही चाचा हत्थे से उखड़ जाते हैं; उखड़ें भी क्यों नहीं, आखिर उन्होंने ही उखाड़ा था न मुझे। अखिल, मैं याद नहीं करना चाहती उस पल को... पर बुरी तरह टूट गई थी मैं उस रोज। अब तो उन्हें चाचा कहते हुए भी उबकाई आती है।

खैर, छोड़ो उस बात को। हां, तो मैं भाग कर आ गई थी दिल्ली। हर तरफ ऊंची-ऊंची, चौड़ी-चौड़ी सड़कें, तेज भागतीं गाड़ियां; इस नए तरह के शहर को देख बदहवास हो गई थी। सड़क पार करने की कोशिश में किसी गाड़ी की चपेट में आ गई। पता नहीं किसने, कैसे और कब मुझे एम्स पहुंचा दिया। दस दिनों तक भर्ती रही। सिर में चोट लगी थी। दो दिनों तक बेहोश रही। होश में आने पर लोगों ने नाम, पता-ठिकाना पूछा। मैं चुप रही। लोगों ने समझा, याददाश्त चली गई है। पहुंचा दिया निश्छल छाया के नारी निकेतन में। साल भर रही वहां। मर्दो की छाया से भी डरती थी। धीरे-धीरे सामान्य हुई। कब तक बैठी रहती नारी निकेतन में, निकलना शुरू किया। शहर में काम और भविष्य की तलाश में कई दफ्तरों के चक्कर काटे। इस भटकाव ने आंखों को अभ्यस्त बना दिया मर्दों की घूरती निगाहों को सहने का। नौकरी मिली एक प्रकाशक के पास, किताबों की प्रूफ रीडिंग करने की। लगभग 9 साल गुजर गए यहां।

धर्म-अध्यात्म, समाज-राजनीति, संबंधों की दुनिया की किताबें चाटती रही। पढ़ती रही और खूब पढ़ी। खुद-ब-खुद विचार भी पनपते रहे। सबको संजोती हुई आज अपने को मच्योर्ड महसूस करती हूं। डरावनी छायाएं अब मेरा पीछा नहीं करतीं।
घर में भी देखती थी कि औरतों को फैसला करने की इजाज़त नहीं थी। शुरू में समझती थी कि यह स्थिति सिर्फ हमारे घर में है; लेकिन अखिल, यह तो घर-घर की कहानी है। हो भी क्यों नहीं, इस समाज में तो पुरुषों का राज चलता है न। लेकिन इस समाज में मैंने अपना फैसला किया और उस पर अमल भी। फैसले करने का अपना सुख होता है।

प्रूफ रीडिंग का काम करते हुए 'प्राचीन शिव पुराण' पढ़ने का मौका मिला। उसके उमा संहिता के चौबीसवें अध्याय में औरतों को लेकर जो टिप्पणियां हैं, उन्हें पढ़कर खून खौल जाता हैं। उसका सार संक्षेप यही है कि औरतें मंदबुद्धि और नीच होती हैं। हर पाप की जड़ में औरत है। परंपरागत शिष्टाचार की मर्यादा को नहीं निबाहतीं और वे पतियों का साथ इसलिए नहीं छोड़तीं कि उन्हें कोई दूसरा मर्द घास नहीं डालता। जानते हो, इस किताब को पूरी आस्था के साथ संभाल कर रखा था कि यह पुराण है। जबसे यह चैप्टर पढ़ा, मुझे इससे और ऐसी तमाम किताबों से घृणा हो गई।

तुम्हारे पत्र से जाना कि घर के लोगों को इस 'कलमुंही' का जिंदा रहना अखर गया। 'कलमुंही' संबोधन इसीलिए न कि मैं अकेले रहती हूं, पता नहीं कितनों से मेरे संबंध बने होंगे? अपने चाचा को कहना अखिल, जरा भी आशंकित न हों। मैं बाहर रह कर बेहद सुरक्षित हूं।

ओ भाई, मुझे बताओ कि तुम मर्दों ने ऐसी धारणा क्यों पाल ली है कि अगर कोई लड़की अकेली है तो उसे आसानी से पाया जा सकता है? क्या इसलिए कि वह 'असूर्यपश्या' वाली छवि तोड़ कर घर की दहलीज से निकली; कि तुम्हें अपना वर्चस्व टूटता नजर आ रहा है; कि नई पीढ़ी ने पुरुषों की पोशाक धारण कर ली है?
जानते हो अखिल, यहां जब मैं पहली बार टी-शर्ट और जींस पहन कर निकली, बड़ी असहज थी। सकुचाई हुई, यह सोच कर कि लोगों को हास्यास्पद लग रहा होगा। कुछ वैसा ही, जैसे मुझे हनुमान जी की कोई तस्वीर मिल जाए, जिसमें वे पतलून पहने दिख रहे हों। लेकिन बता नहीं सकती कि उस रोज बसयात्रा में कितनी सहूलियत हुई। इन वर्षों में जाना कि बड़ा से बड़ा परिवर्तन जरूरत की वजह से ही होता है। सहूलियत भी जरूरत का ही एक रूप है। शेर के नख और हरिण की टांगें उनकी जरूरत के मुताबिक ही विकसित हुए हैं। स्त्री आज अगर एक नए रूप में दिख रही है, तो यह नया रूप भी जरूरतों ने ही बनाया है। 'पढि़ए गीता और बनिए सीता' जैसी सीख अब उसके लिए बेमानी होती जा रही है। आज अगर उसके नख बढ़ गए हैं, अगर इतनी आक्रामक हो गई है, तो जाहिर है कि इस समाज में अपने अस्तित्व को बचाए रखने की उसने जरूरत समझी हो।

हो सकता है, मेरी बातें तुम्हें नागवार लगें। लेकिन भाई, मुझे बताओ; तुम मर्दों की जमात जब भी स्त्रियों की आधुनिकता और परंपरा की चर्चा करती है, तो ऐसा क्यों लगता है कि चुंबक के साउथ और नॉर्थ पोल की चर्चा हो रही है? तुम्हारी बहसों में लगता है कि परंपरा और आधुनिकता दो बिल्कुल अलग चीजें हैं, प्रकृति और रूप दोनों स्तरों पर। आधुनिकता को देखने की तुम्हारी यह दृष्टि कि यह परंपरा के खिलाफ संघर्ष है - आधुनिक नहीं है मेरे भाई। मुझे लगता है कि आधुनिकता कोई नई चीज़ नहीं, बल्कि वह तो परंपरा का एक्सटेंशन है। प्रकृति और रूप दोनों स्तरों पर परिमार्जित एक्सटेंशन।
जरा बताओ, जिस वक्त नरगिस फिल्मों में काम कर रही थीं, क्या वह उस दौर के लिए आधुनिक नहीं थीं? आधुनिकता और बोल्डनेस को जो लोग मल्लिका सेहरावत के कम कपड़ों में देखते हैं, उनके लिए यह विचारणीय होगा कि क्या ब्लू फिल्मों की नायिका को अति आधुनिक मान लिया जाए? तुम इन्हें 'मॉडर्न' ख्यालों वाली लड़की की बात कहकर शायद टाल जाने की कोशिश करो। लेकिन यह सच है कि फिल्म या जीवन में किसी नायिका के मार्फत आधुनिकता को समझने के क्रम में पुरुषों की निगाह फिसल कर उनके कम कपड़ों पर अटक जाती है, जबकि हकीकत है कि कपड़े में ही आधुनिकता नहीं होती। अगर ऐसा होता, तो मदर टेरेसा, इंदिरा गांधी, कल्पना चावला को आधुनिक माना ही नहीं जाना चाहिए था।

आधुनिकता का संबंध तो दृष्टि, विचार और कृत्य से होता है। हमारी दृष्टि वक्त की नब्ज पर अपनी पकड़ रखती है, विचार हमें उसका परिमार्जित रूप दिखाते हैं और हमारे कृत्य आनेवाली पीढ़ी के लिए दृष्टि, विचार और कृत्य के लिए जगह बनाते चलते हैं। यह तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाला सिलसिला है। इसी प्रक्रिया के तहत समाज आधुनिक होता चलता है।

एक और बात, तुम मर्दों की दुनिया हमेशा औरतों को औजार की तरह क्यों इस्तेमाल करती है? उसे साध्य बनाने की बजाय साधन क्यों बनाती है, आश्रय की जगह आलंबन क्यों? कबीर की दृष्टि धर्म, प्रेम और ईश्वर को लेकर आधुनिक और तार्किक दिखती है, लेकिन स्त्रियों के मामले में वह इतने अनुदार क्यों हैं, तुम्हारी तरह? उन्होंने ही लिखा है 'नारी की झाईं पड़त अंधा होत भुजंग। कबिरा तिनकी कौन गति, जे नित नारी संग'। एक तरफ नारी के प्रति ऐसी दृष्टि और फिर परमात्मा से संबंध बनाने के लिए उन्होंने खुद को उसकी बहुरिया (स्त्री रूप) में पेश किया। कैसी है तुम्हारे मर्दों की दुनिया रे अखिल!

देख न अखिल, पिताजी ने तेरा नाम अखिल रखा था और मेरा बिंदु। उनके लिए तू संसार था, मैं तो महज बिंदु। लेकिन आज मैं वृत्त बन गई अपने में सिमटी हुई।
घर से भागने का अफसोस सिर्फ यह है कि मेरे न होने से तू स्त्रियों के मनोभावों को समझने में अपरिपक्व रह गया; तेरी दृष्टि सामंती हो गई। बड़ी दीदी होने का कोई दायित्व मैं नहीं निभा सकी। पर पता नहीं क्यों, तुझसे इतनी उम्मीद करती हूं कि स्त्रियों का सम्मान करना सीख, चाहे वह तेरी मां हो, पत्नी, बहन या फिर पड़ोसन।

तुम्हारी दीदी
बिंदु
(प्रकाशित)

समीकरण

तुमने कहा 'दुनिया'
और मुझे कसाईबाड़े की याद आई
तुमने कहा 'जनता'
और मुझे
लाचार मेमनों की याद आई।

यक़ीन मानो,
अब और कोई भी शब्द
तुम्हारे मुंह से
सुनने की तबीयत नहीं।
क्योंकि प्रजातंत्र जब हाशिये की चीज़ हो जाए
और तुम हमें
सिखाने लगो
कि दो और दो
पांच होते हैं
तो दुनिया और जनता की बात
तुम्हारे मुंह से सुनना
भद्दे मज़ाक की तरह लगती है।

यह घटिया मज़ाक
तुमने बहुत दिनों तक कर लिया
और हर बार हमने
ज़हर का घूंट पीया।
लेकिन कहते हैं न
कि जब आक्रोश की आंखें
सुलगती हैं
तो समुद्र को भी
रास्ता देना पड़ता है।
इसलिए देखो,
हम सब तहज़ीब में
परिवर्तन कर रहे हैं
भजन-कीर्तन छोड़कर
अब आग का समर्थन कर रहे हैं।

(प्रसारित)

Monday, February 4, 2008

महानगर

इस कस्बे में
समझौता नहीं होता
किसी चीज़ की
कोई सीमा नहीं।
सिर्फ़
मतलब के साथ
भटकते लोग हैं
सिपाही हैं, सलाहकार हैं
पटवारी हैं, बनवारी हैं
और हर तरफ़
ज़िंदगी
आदमी पर भारी है।

यहां
न कोई किसी का बाप है
न कोई किसी की मां
न कोई भाई है
और न कोई बहन
दरअसल,
सभी अपने सपने में
मस्त हैं
इंसानियत का खंभा
ध्वस्त है।

(प्रसारित)

Sunday, February 3, 2008

बंद घड़ी के कांटे

मेरा कमरा
जिसमें एक विशेष गंध
तैरती है
जो दूसरे कमरों में नहीं।
मुझे बेहद लगाव है
कमरे में टंगी
मोनालिसा से
ठहरी हुई गंध से

खिड़की से दिखता
आसमान का टुकड़ा
जैसे सारा यथार्थ
वहीं कहीं अटका होगा
और मैं ढूंढ़ने लगता हूं
उस टुकड़े में ज़िंदगी।
एक संपूर्ण ज़िंदगी
सुख-दुख, पाप-पुण्य
आत्मा-परमात्मा...
इन सब से भी परे कुछ

उस टुकड़े में
कई तस्वीरें बनती हैं-मिटती हैं
मेरे सोच के साथ-साथ।
तभी एक चित्र दिखता है,
मैं पहचानने की कोशिश करता हूं,
वहां मेरे कमरे की गंध है,
बंद पड़ी घड़ी है,
ठहरा हुआ समय है,
समूचा मेरा कमरा है,
कमरे में मैं हूं,
और मुझे देखकर
मुस्कुराती हुई मोनालिसा है।

(प्रसारित/प्रकाशित)