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Monday, March 3, 2008

एक मरा फोटोग्राफर, जो ज़िंदा हो गया था


यह तस्वीर केविन कार्टर नाम के एक साउथ अफ्रीकन फोटोजर्नलिस्ट ने खींची थी। बात मार्च 1993 की है। तब सूडान अकाल से जूझ रहा था। पत्रकारों की एक टीम में शामिल कार्टर उस समय सूडान गये थे। उन्होंने भूख से लड़ते सूडानियों को देखा और जुट गये कुछ ख़ास की तलाश में। उनकी तलाश पूरी हुई वहां के अयोड गांव में। उन्होंने देखा एक सूडानी बच्ची को। भूख से बेहाल हुए लोगों की मदद के लिए बने फीडिंग सेंटर की ओर वह ख़ुद को किसी तरह घिसट ले जा रही थी। अपनी इस कोशिश में वह अशक्त बच्ची बुरी तरह थक चुकी थी। सो वह रुक कर अपनी ताक़त फिर जुटाने लगी। कार्टर ने देखा कि उसके आसपास गिद्ध मंडरा रहे हैं। वह वहां रुक कर इंतज़ार करने लगे अपने संभावित दुर्लभ तस्वीर के लिए किसी ख़ास सिक्वेंस का। शायद उन्हें इंतज़ार था कि गिद्ध या तो बच्ची पर हमला करे या फिर अपने पंख फैलाये ताकि शिकार की एक जीवंत तस्वीर वह ले सकें। उन्होंने उस ख़ास दृश्य के लिए तक़रीबन 20 मिनट तक इंतज़ार किया। पर बात पूरी नहीं बनते देख उन्होंने अंत के इंतज़ार में बैठे गिद्ध और बच्ची की तस्वीर खींच ली और चलते बने।

पर यह तस्वीर नायाब बन गयी। द न्यू यॉर्क टाइम्स ने 26 मार्च 1993 के अपने अंक में इसे छापा, इस कैप्शन के साथ कि इस तस्वीर में फोटोग्राफर भी एक गिद्ध है।
जाहिर है, तस्वीर का लोगों के मन पर गहरा असर हुआ। कई-कई लोगों ने अखबार के दफ्तर में फोन कर बच्ची के बारे में जानना चाहा। सब के सवाल एक से थे कि बच्ची बची या नहीं। उस बच्ची का आखिरकार क्या हुआ। पर इन सवालों का कोई सटीक जवाब अखबार के पास नहीं था। पर फोन इतने ज़्यादा लोगों के आये कि अखबार को स्पेशल एडिटर्स नोट छापना पड़ा। उन्होंने उस नोट में लोगों को बताया कि बच्ची में इतनी ताक़त बची थी कि वह उस गिद्ध से दूर चली जाये। पर आख़िरकार उस बच्ची का क्या हुआ, यह नहीं पता।

इन सारी बातों के लगभग एक साल बाद। न्यू यॉर्क टाइम्स के पिक्चर एडिटर नैन्सी ब्रूस्की ने 2 अप्रैल 1994 के दिन कॉर्टर को फोन कर सूचित किया कि उसकी इस नायाब तस्वीर ने उसे फीचर फोटोग्राफी के लिए पुलित्जर प्राइज़ दिला दिया है। 23 मई 1994 के दिन कार्टर को कोलंबिया यूनिवर्सिटी के लॉ मेमोरियल लाइब्रेरी में पुरस्कार से नवाज़ा गया।

सम्मान समारोह के लगभग दो महीने बाद कॉर्टर ने खुदकुशी कर ली। मरने के कुछ रोज़ पहले उन्होंने अपने दोस्तों के सामने कुबूल किया था कि वह उस बच्ची की मदद करना चाहते थे। पर उस समय सूडान गये उनके दल को बीमारी के डर से आगाह किया गया था कि वे लोग अकाल के शिकार बने लोगों के शरीर को न छूएं।

कार्टर ने 27 मई 1994 को खुदकुशी की थी। उसने स्यूसाइड नोट में लिखा था :
"I am depressed ... without phone ... money for rent ... money for child support ... money for debts ... money!!! ... I am haunted by the vivid memories of killings & corpses & anger & pain ... of starving or wounded children, of trigger-happy madmen, often police, or killer executioners...I have gone to join Ken if I am that lucky. "

जिस तस्वीर की वजह से कार्टर को पुलित्जर अवॉर्ड मिला था, उसी तस्वीर की आलोचना ने उनकी चेतना को झकझोर कर रख दिया। उस तस्वीर से उन्हें इतनी पीड़ा हुई कि वह उससे उबर नहीं सके। हताशा के भंवर में वह डूबते चले गये। इस निराशा की नीम पर उनके अजीज़ साथी केन ऑस्टरब्रोक की मौत ने चढ़े करैले का काम किया। केन की मौत अप्रत्याशित थी। वह 18 अप्रैल 1994 को टोकोजा में भड़के दंगे को कवर करने गये थे। उसी दंगे में वह मारे गये। कुल मिलाकर इन दोनों सदमों ने उन्हें मौत के रास्ते पर ले जाकर पटक दिया। कार्टर को जीवित हालत में आखिरी बार केन की विधवा मोनिका ने देखा था।

आइए, आपको कुछ और 'जीवंत' तस्वीरें दिखाता हूं। ये सारी तस्वीरें आप पहले भी देख चुके होंगे। और देखा होगा तो भूल नहीं सकते। ये तस्वीरें भी कुछ वैसे फोटोग्राफरों ने खींची होंगी, जो अपने प्रफेशन के लिए पूरी तरह कमीटेड रहे होंगे।


ऐसे पांव अंगद के पांव नहीं, जिसे आप हिला नहीं सकते।
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आप आपस में हाथ मिलाकर तो देखें। ऐसे हाथ बड़ी आसानी से बांह के साथ उखड़ जाएंगे।
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ये तस्वीरें हैं 24 नवंबर 2007 को जल रहे असम की। इन आदिवासी औरतों को गुवाहाटी में मर्दों ने पीटा। मर्दों ने तस्वीरें उतारीं। मर्दों ने सारा कुछ घटते देखा। नामर्द घर में घुसे रहे। बचाने के लिए कोई हितैषी सामने नहीं आया। यहां पुलिसवाले भी थे, लेकिन संख्या में कम। शायद इसलिए उनमें हिम्मत नहीं हुई इस नंगी भीड़ का सामना करने की।
ज़रा सोचें।
भीड़ के मुकाबले संख्या में कम होने की वजह से पुलिस बेबस थी। उस शहर में सारे के सारे दंगाई नहीं थे। दंगाइयों से ज़्यादा बड़ी संख्या मूकदर्शकों की थी। अगर इन मूकदर्शकों के भीतर की आत्मा बोल जाती, तो सचमुच दंगाइयों की खाट खड़ी हो जाती।

ज़रा एक बार और सोचें।
- जो फोटोग्राफर वहां मौजूद थे और अपने प्रफेशन के लिए कमिटेड होकर तस्वीरें उतारते रहे बगैर दंगाइयों से डरे। अगर भीड़ की चपेट में उनकी मां, बहन, पत्नी, प्रेमिका, बेटी... कोई होती, तो भी क्या वे अपने प्रफेशन के लिए इतना ही कमीटेड होकर महज फोटो खींचते रहते?
- जो पुलिसवाले कम संख्या में होने का रोना रो रहे हैं, या वहां होते हुए भी न होने की बात कर रहे हैं अगर उनके घर की कोई महिला इस भीड़ में फंसी होती, तो क्या वहां अपने न होने की बात कह उससे नज़र मिला सकते थे वे?
- जो महज लोग मूकदर्शक बने रहे, अगर उनके घर का कोई इस तरह ज़लील होता रहता, तब भी क्या उनकी आत्मा सोई रहती?

कार्टर तो ख़ैर जीवित इंसान निकला, इसलिए उसे अपने किये का पछतावा रहा। मैं यह नहीं कहता कि ज़िदा होने के बाद उसने जो किया बहुत बढ़िया किया। बेशक उसने जो किया उसे पलायन ही कहेंगे। पर मर कर उसने अपने ज़िंदा होने का परिचय तो दिया।

गुवाहाटी के वारदात को महीनों बीत गये। पर कोई ऐसा सामने नहीं आया जिसने दंगाइयों को पहचानने का दावा किया हो, या खुद के दंगाई होने की बात कही हो। दरअसल, ये सब के सब मरे लोग हैं। अपने में मस्त। आत्मरति के शिकार। आत्ममुग्ध लोग। ऐसे में प्रियदर्शन की कविता 'अहंकारी धनुर्धर' की याद आती है :

सिर्फ़ चिड़िया की आंख देखते हैं अहंकारी धनुर्धर
आंख के भीतर बसी हुई दुनिया नहीं देखते
नहीं देखते विशाल भरा-पूरा पेड़
नहीं देखते अपने ही वजन से झुकी हुई डाली
नहीं देखते पत्ते जिनके बीच छुपा होता है चिड़िया का घोंसला
नहीं देखते कि वह कितनी मेहनत से बीन-चुन कर लाए गए तिनकों से बना है
नहीं देखते उसके छोटे-छोटे अंडे
जिनके भीतर चहचहाहटों की कई स्निग्ध मासूम संभावनाएं
मातृत्व के ऊष्ण परों के नीचे
सिंक रही होती हैं
वे देखते हैं सिर्फ़ चिड़िया
जो उनकी निगाह में महज एक निशाना होती है
अपनी खिंची हुई प्रत्यंचा और अपने तने हुए तीर
और चिड़िया के बीच
महज उनकी अंधी महत्त्वाकांक्षा होती है
जो नहीं देखती पेड़, डाली, घोंसला, अंडे
जो नहीं देखती चिड़िया की सिहरती हुई देह
जो नहीं देखती उसकी आंख के भीतर नई उड़ानों की अंकुरित होती संभावनाएं
वह नहीं देखती यह सब
क्योंकि उसे पता है कि देखेगी
तो चूक जाएगा वह निशाना
जो उनके वर्षों से अर्जित अभ्यास और कौशल के चरम की तरह आएगा
जो उन्हें इस लायक बनाएगा
कि जीत सकें जीवन का महाभारत
दरअसल यह देखने की योग्यता नहीं है
न देखने का कौशल है
जिसकी शिक्षा देते हैं
अंधे धृतराष्ट्रों की नौकरी बजा रहे बूढ़े द्रोण
ताकि अठारह अक्षौहिणी सेनाएं अठारह दिनों तक
लड़ सकें कुरुक्षेत्र में
और एक महाकाव्य रचा जा सके
जिसमें भले कोई न जीत सके
लेकिन चिड़िया को मरना हो।

10 comments:

Beji said...

मन को झकझोर दे ऐसी पोस्ट है.....पर मैं चाह कर भी जजमेंटल नहीं हो पा रही....इतने पहलू...कितने पहलू...

avinash said...

अनुराग भैया, आपने संवेदना को झकझोर देने वाला प्रसंग उठाया है।

कमलेश मदान said...

बस इसी एक पोस्ट का इंतजार था जो दिखा सके कि मानवीय संवेदनायें क्या होती हैं और उनका मर जाना क्या होता है,
आपने पत्रकारिता और विश्व के एक झूठे मुखौटे को उतारने की जो कोशिश की है वो सराहनीय है...आप से आगे भी ऐसी ही हम उम्मीद करते हैं.

आपका
कमलेश मदान

mamta said...

उफ़ ! इतना भयानक और दर्दनाक ।

रश्मि said...

adbhut. man me aakrosh jaga de,esi prastuti hai. ham sab roj in bato se do-char hote hai, magar apni savedna ko ese shabd nahi de pate jo auro ko bi udhelit kar de. bahut badhiya aur bhaiya ki kavita to lajawab hai.

प्रियदर्शन said...

अच्छी और मार्मिक टिप्पणी है। लेकिन असम की वीभत्स तस्वीरों से बचना चाहिए था। वीभत्सता का यह प्रदर्शन त्वरित-तात्कालिक प्रतिक्रिया पैदा करने में उपयोगी तो है, लेकिन हमारे कहीं ज़्यादा वास्तविक विक्षोभ को वह दीर्घकालीन नहीं बना पाता। लेकिन मूल बात टिप्पणी में आ गई है।

priyankas said...

अद्भुत! बहुत अच्छा

Reetesh Gupta said...

बहुत अच्छा लिखा है आपने ...सच्चाई को प्रस्तुत किया है...कविता बहुत पसंद आई...धन्यवाद

narender said...

अनुराग भाई आपने मरे हुए मर्दों की अच्छी तस्वीर दिखायी है. काश ये सब तमाशा देखने वालों की संवेदना भी जिंदा होती !

Priya Ranjan Jha said...

mere man mein kuchh kuchh ho raha hai...... shayad aap apane maksad mein safal rahe hain.