फाग के महीने में
मन के रंग उड़ गये हैं
बेलौस हुए हैं मौसम
आस्था के रंग सड़ गये हैं
गांव में एक सड़क बनी है
सरपंच और ठीकेदार में तनी है
रमुआ का लड़का बहुत गुनी है
इलाज के अभाव में मां
जली है, भुनी है
अजब है हाल
उठता रहा सवाल
मन में मलाल
तो कैसे खेलें
फिर लोग गुलाल
बच्चे हैं बेहाल
सारे चेहरे लाल-लाल
जीना हुआ मुहालख़ैर, तुम अपनी सुनाओ
सब सही है, सलामत है
या फिर,
कोई कयामत है?
वैसे, जानता हूं
सब जगह होती है
एक ही कहानी
लोगों की ज़बानी
उनकी परेशानी
नौकरी करो या करो किसानी
जब भी सोचोगे सुंदर भविष्य
तो मरती है नानी
पढ़े हुए बच्चे, नौकरी करते बच्चे
अपना परिवार, सुंदर-सी बीवी
घर में हो रेडियो-टीवी...
ये सब सपने हैं
थोड़े-बहुत अपने हैं
साहब ने खाया पपीता
मन तुम्हारा क्यों हुआ तीखा
अपनी-अपनी क़िस्मत है
मेरी आंखें विस्मित हैं
साहब खाते हैं दूध-मलाई
इलाज के बग़ैर
मरती है सुंदर की भौजाई।
यह कहां का इंसाफ है?
पुण्य है यह या कि पाप है?
यहां तो समय पर गधा भी बाप है।
शेष सब कुशल है
फिर भी मन विकल है
संसार है समंदर
तो जीवन है नाव
क्या करूं?
Sunday, March 9, 2008
होली से पहले भाई के नाम एक पाती
ढूंढ़ रहा हूं अपनी ठांव।
(प्रसारित)
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
at
2:22 AM
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6 comments:
शेष सब कुशल है
फिर भी मन विकल है
संसार है समंदर
तो जीवन है नाव
क्या करूं?
ढूंढ़ रहा हूं अपनी ठांव।
बहुत सुंदर कविता लगी...अच्छा लगा पढ़कर...बधाई
वाह!! इस बेहतरीन रचना के लिये बधाई.
bahut bhavuk sundar
आपको पहली बार पढ़ा। अच्छा लगा। इलाज के बगैर मरती है सुंदर की भौजाई। दिल को छू लेने वाली पंक्ति है।
मैं भी (डालटनगंज) झारखंड से हूं। पेशा भी आपका ही है। मुहल्ला भी वसुंधरा, गाजियाबाद का है।
ख़ैर, तुम अपनी सुनाओ
सब सही है, सलामत है
या फिर,
कोई कयामत है?
hal kahte aur poochte dar lagta hai, ab to duniya bhar ham jaiso ka ek hi haal hai..
duniya bani hai unka ganv
ढूंढ़ रहा हूं अपनी ठांव।
Aapki kavitaye sach mei dil ko chuti hai. Aabhari hoon ek ziddi dhun ki jnke blog badaulat aap tak pahunchi.
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