जिरह पढ़ें, आप अपनी लिपि में (Read JIRAH in your own script)

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जिरह करने की कोई उम्र नहीं होती। पर यह सच है कि जिरह करने से पैदा हुई बातों की उम्र बेहद लंबी होती है। इसलिए इस ब्लॉग पर आपका स्वागत है। आइए,शुरू करें जिरह।
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Sunday, May 25, 2008

धरती अब भी घूम रही है

भाषा की गति लोक व्यवहार से तय होती है। इसी के आधार पर मानक बनते हैं और तब तैयार होता है उसका व्याकरण। ठीक ऐसी ही बात परंपरा के लिए भी कही जा सकती है। बदलते वक्त के साथ परंपराएं भी बदलती हैं और उनका व्याकरण भी। तो बदल रही परंपराओं और बन रहीं मान्यताओं की ओर इशारा करता संजय खाती का यह नजरिया पेश है आपके लिए :

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गुजरा हफ्ता हमारे लिए बेहद तकलीफदेह रहा। नोएडा में आरुषि मर्डर केस खबरों पर छाया रहा, जिसमें तमाम अटकलों के बाद पुलिस इस नतीजे पर पहुंची कि चौदह साल की इस प्यारी सी बच्ची की हत्या उसके पिता ने की। उधर मुंबई में एक प्रेमी-प्रेमिका ने मिलकर एक युवक का बेदर्दी से कत्ल कर दिया। ये दोनों केस पुलिस के दावे पर आधारित हैं और जैसा कि आप जानते हैं, पुलिस के दावों को भी अदालत में सही साबित करना होता है और तभी इस बात का फैसला होता है कि कसूरवार कौन था। लेकिन फिलहाल जो डिटेल्स सामने आए हैं, वे आम नागरिक का दिल दहला देने वाले हैं और जाहिर है, यह सवाल उठे बिना नहीं रहता कि हमारे समाज को क्या हो गया है?

इस नतीजे पर पहुंचना बेहद आसान है कि हमारे समाज का नैतिक पतन हो रहा है। मीडिया ने जिन एक्सपर्ट्स से बात की है, उनकी भी राय यही है कि सोशल वैल्यू सिस्टम में गिरावट आ रही है, समाज का नैतिक तानाबाना बिखर रहा है, क्योंकि लोग स्वार्थी होते जा रहे हैं। वे अपनी सुख-सुविधा के आगे किसी चीज की कीमत नहीं समझते, लिहाजा हर तरह के अपराध बढ़ रहे हैं, यहां तक कि पवित्र रिश्तों की इज्जत भी बची नहीं रही।

मेरा मानना है कि यह एक आसान जवाब है, और जैसा कि होता है, आसान जवाब सही जवाब नहीं होते। वे हमें इसलिए पसंद आते हैं कि हमें ज्यादा सिर खपाने से फुर्सत मिल जाती है। यह सही है कि पुराना वैल्यू सिस्टम बिखर रहा है, लेकिन सिर्फ इतने से ही जुर्म बढ़ने का दावा साबित नहीं हो जाता। सबसे पहले तो यह बात ही बहस में है कि जुर्म बढ़ रहे हैं।

हमारे पास जो आंकड़े हो सकते हैं, वे काफी नए हैं। मसलन हम यह पता नहीं लगा सकते कि बीस, पचास या सौ साल पहले अपराध कम होते थे या ज्यादा। इसकी वजह रिपोर्टिंग सिस्टम है। आज का समाज कहीं ज्यादा संगठित है, लोग ज्यादा जागरूक हैं और सिस्टम ज्यादा कारगर है, इसलिए अनगिनत ऐसे केस भी अब दर्ज होने लगे हैं, जो पहले नहीं हो पाते थे।

मुझे लगता है कि जुर्म तब भी होते थे और बड़ी तादाद में होते थे, लेकिन वे पुलिस केस नहीं बनते थे। जिन मामलों को आज हम वैल्यू सिस्टम टूटने की मिसाल मानते हैं, वे भी हर युग में हुए हैं। इतिहास और पुराणों को देखिए, जहां राजपाट के लिए भाइयों और पिता की हत्या के किस्से आम हैं, बल्कि जायज ठहराए गए हैं। परिवार के भीतर बदकारी (इंसेस्ट) के आरोप से तो देवता भी बरी नहीं हैं।

परिवार और समाज का विकास होने के बाद भी उनकी नैतिकता को लगातार चैलेंज किया जाता रहा है। पिछड़े समाजों में ऐसे-ऐसे अत्याचार होते हैं कि रूह कांप जाए। पाकिस्तान के कबाइली इलाकों में किसी कुनबे को सजा देने के लिए उस कुनबे की महिला से सामूहिक बलात्कार का मामला हाल में इंटरनैशनल मुद्दा बन गया था, जब मुख्तारन माई ने बगावत कर दी थी।

जिन्हें क्राइम ऑफ पैशन कहा जाता है, यानी जज्बाती अपराध जैसे कि नोएडा और मुंबई के केस हो सकते हैं, उनकी भी कमी कभी नहीं रही। शहरों से दूर ऐसे किस्से सैकड़ों मिल जाएंगे, जिन्हें इज्जत के नाम पर दबा दिया जाता है।

यहां तक कि शहरों में भी ऐसे केस हमेशा होते आए हैं। फर्क यह है कि वे हाई प्रोफाइल केस नहीं होते। ज्यादा से ज्यादा वे पुलिस फाइलों में गुम हो जाते हैं, मीडिया उन्हें तवज्जो नहीं देता। लेकिन जब उसे कोई हाई प्रोफाइल सनसनीखेज मामला मिल जाता है, तो उसके शोर की इंतहा नहीं रहती। इस शोर का असर हम पर जबर्दस्त होता है और हम डिप्रेशन के शिकार हुए बिना नहीं रहते। हमें लगने लगता है कि दुनिया ने अपनी धुरी पर घूमना छोड़ दिया है। हम नरक में जा रहे हैं। सब कुछ खत्म हो रहा है।

यह एक बुजुर्ग सोच है। हर उम्रदराज शख्स को लगता है कि उसका जमाना बेहतर था और अब अच्छाई खत्म होती जा रही है। ऐसा क्यों होता है? क्योंकि उम्र बढ़ने के साथ जीवन का जोश धीमा पड़ने लगता है, थकान और ऊब के धुंधलके के पार नए जमाने की हलचलें भुतहा दिखने लगती हैं। हर पुरानी पीढ़ी को नई पीढ़ी उद्दंड, बदतमीज और बेसब्र नजर आती है।

वक्त की करवटें गुजरे जमाने की शरारतों को इतना मासूम बना देती हैं कि उनके बरक्स मौजूदा दौर हाहाकारी लगने लगता है। लेकिन सच तो यही है कि हर नया जमाना पहले से ज्यादा बिंदास, तरक्कीपसंद, शौकीन और मेहनती साबित होता है। इसीलिए समाज आगे बढ़ता है, वह कभी जंगलों की ओर नहीं लौटता।

तो समाज के पतन की थ्योरी को गलत मानते हुए मैं दो नतीजों तक पहुंचना पसंद करूंगा। एक तो यह कि समाज नीचे नहीं जा रहा, वह अपने रास्ते पर है, जैसी कि उसकी फितरत है, और दूसरा, नैतिकता की जिस गिरावट का रोना हम रोते रहते हैं, वह असल में नैतिकता के मतलब बदल जाने से पैदा हुई गलतफहमी और तानव का मामला है।

इस दूसरे मुद्दे का थोड़ा सा खुलासा शायद जरूरी है। नए जमाने में पुराने पैमाने टूट रहे हैं, जैसे कि विवाह और परिवार की संस्थाएं। जाहिर है, इसके साथ रिश्तों के मायने भी बदलेंगे। लेकिन इसमें वक्त लगता है। भारत जैसे समाज में, जहां परंपरा काफी मजबूत रही है, यह काम और भी मुश्किल होगा। लिहाजा पुराने मूल्यों को बचाने की जिद भी होगी, नए का लालच भी और डर भी।

विवाह से पहले और विवाहेतर रिश्ते आम बात होते जा रहे हैं, लेकिन उनके साथ जुड़ी उलझनें भी। अगर हम पुलिस के दावे को मानें, तो आरुषि के मर्डर जैसा केस अमेरिकी समाज में नहीं घट सकता, जबकि भारत में उसके पूरे चांस हैं। पश्चिम में परिवार की थीम इतनी कमजोर पड़ चुकी है कि पिता को अपना रिश्ता छिपाने और इज्जत बचाने के लिए इस हद तक जाने की जरूरत नहीं होती। उसे बेटी के किसी रिश्ते पर भी नाराज होने का हक नहीं होता।

इसी तरह मुंबई वाले मामले का निपटारा भी वहां दूसरे तरीके से हो सकता था। अलबत्ता उस केस से जुड़ी बेरहमी जरूर चौंकाने वाली बात है, लेकिन ऐसा पागलपन कब नहीं था? क्राइम ऑफ पैशन हर जमाने और हर समाज में होते रहेंगे। इंसान सृष्टि का सबसे अक्लमंद जीव है। उसके गिरने की कोई हद नहीं है, लेकिन आखिरकार अपनी सामूहिकता में वह ऊपर ही उठता देखा गया है। दिन-रात हमें घेरे हुए इन डरावने किस्सों और तमाम अपशकुनों के बावजूद इस सचाई पर भरोसा क्यों नहीं किया जाना चाहिए?
साभार : नवभारत टाइम्स

Friday, May 16, 2008

दहलाने वाली दृष्टि

आज चोखेर बाली पर सुरेश जी का 'दहल' जाना पढ़ा और दूसरों को 'दहलाने की उनकी कोशिश' भी देखी। सुरेश जी कितने संवेदनशील हैं इस बात का पता इससे ही चल जाता है कि उन्होंने इतनी भयंकर वारदात को महज 'घटना' माना है। आपने लिखा है 'यह नारी अशिक्षित नहीं है. उसने अंग्रेजी में एम् ऐ किया है. ' सुरेश जी, शिक्षित होने का संबंध जो लोग डिग्रियों से तौलते हैं, मुझे उनके शिक्षित होने पर संदेह होने लगता है। आपको ढेर सारे ऐसे लोगों के उदाहरण अपने समाज में मिल जाएंगे, जिन्होंने स्कूल-कॉलेज का चेहरा तक नहीं देखा, पर उनकी शालीनता और उनके संस्कार के सामने डिग्रीधारी भी बौने नजर आने लगते हैं।

आपने लिखा 'उसके पिता ने अपनी इस एकलौती बेटी को बेटों जैसा प्यार दिया. शिक्षा पूरी होने पर उसे एक स्कूल में अध्यापिका की जॉब दिला दी.'


दो-तीन बातें इन दो वाक्यों पर। पहली बात तो यह कि उस पिता ने सिर्फ प्यार दिया। यह आकलन आपका है क्या कि बेटों जैसा प्यार दिया? जो परिवार अपनी बेटी को एमए तक की पढ़ाई करने का अवसर दे, वह दकियानूसी नहीं हो सकता। दकियानूस दृष्टि यह है कि हम उसे कहें कि उसे बेटों जैसा प्यार दिया। खतरनाक बात यह कि अध्यापक पिता ने अपनी बेटी को पढ़ा तो दिया पर उसके भीतर समझ पैदा नहीं कर सका, संस्कार पैदा नहीं कर सका। और तो और आपके मुताबिक 'शिक्षा पूरी होने पर उसे एक स्कूल में अध्यापिका की जाब दिला दी।' गौर करें सुरेश जी, वह लड़की इतनी भी शिक्षित नहीं थी कि एक छोटी-सी जॉब पा सके। आपके मुताबिक, उसके टीचर पिता ने उसे जॉब दिलाई थी। एक दुखद बात और कि जो टीचर अपने घर के बच्चे को सही और गलत के अंतर को समझ पाने की दृष्टि नहीं दे सका, वह समाज को क्या सिखलाएगा? और आखिर में एक कुतर्क, अगर बाप ने बेटी को बेटों जैसा प्यार दिया, तो बेटी ने भी उस प्यार का सम्मान करते हुए बेटों जैसा काम किया। बहरहाल, अपराध न बेटा (पुरुष) करता है, न बेटी (स्त्री)। यह आपको भी समझना चाहिए।


आपने लिखा 'मैंने भी जब इस के बारे में सुना... '। पर आपने हमें जो सुनाया, वह तो लाइव कमेंट्री की तरह है। लगा ऐसा कि हत्याएं हो रही हैं और आप वहां खड़े होकर बारीक तरीके से वारदात के हर स्टेप को अपनी डायरी में दर्ज कर रहे हों। दरअसल, आपने इस वारदात को अपनी ओर से रोचक बनाने की अथक कोशिश की है। हां सुरेश जी, अपराध की प्रकृति ही ऐसी होती है कि वह रोचक नहीं हो सकता, वह घृणित ही रहेगा। उसे रोचक अंदाज में पेश करने की कोशिश उससे भी ज्यादा घृणित। ऐसी किसी वारदात को स्त्री-पुरुष से जोड़कर देखने वाली दृष्टि इस समाज के लिए कितनी खतरनाक है, इस पर अगर आप विचार कर सकें (मुझे संदेह है) तो करें। और फिर बताएं कि यह अपराध किसी स्त्री ने किया या किसी पुरुष ने?

Thursday, May 15, 2008

विकास का भेंग

मैं रहता हूं गाजियाबाद के वसुंधरा (यूपी) में। नौकरी करता हूं दिल्ली के एक अखबार में। मेरे बड़े भाई का घर भी वसुंधरा की इसी जनसत्ता सोसाइटी में है। वह नौकरी करते हैं एक न्यूज चैनल में। मेरी छोटी बहन धनबाद (झारखंड) के एक कॉलेज में हिंदी की लेक्चरर है। मां को गुजरे अब 13 साल बीत चुके हैं। पापा रांची (झारखंड की राजधानी) में रहते हैं। अपना मकान है। पांच किरायेदार हैं।

भइया 92 में ही दिल्ली आ गया था। मैं आया हूं महज चार साल पहले। भइया को दिल्ली भेजने के बाद पापा यही कहा करते थे कि वह नौकरी की तलाश में नहीं, भविष्य की तलाश में गया है। मैं इतने वर्ष टिका रहा रांची में तो सिर्फ अपनी जिद पर कि पापा के साथ रहना है। पर आखिरकार मुझे भी दिल्ली का रुख करना पड़ा। मुझे भेजते वक्त पापा की अभिव्यक्ति थी 'जब पराग को भेजा था दिल्ली, तो लगा मेरा दिमाग मुझसे अलग हुआ। रेमी की शादी की, तो लगा कोई मेरा दिल मुझसे अलग कर ले गया। और अब तुम्हें भेज रहा हूं तो जान रहा हूं कि मैं अपाहिज हो जाऊंगा, क्योंकि तुम्ही तो मेरे हाथ-पांव हो।'

यह कहानी सिर्फ मेरे परिवार की कहानी नहीं है। यह इस देश के हर तीसरे-चौथे-पांचवें परिवार की कहानी है। गांव का बेटा बेहतर की तलाश में शहर की ओर भाग रहा है, शहर का बेटा इसी बेहतर की तलाश में महानगर का रुख करता है और महानगर का बेटा भाग रहा है विदेश। यानी हम सब भाग रहे हैं, हांफ रहे हैं, खीज रहे हैं, जूझ रहे हैं। इस जूझने से हासिल हो रहा है थोड़ा ज्यादा पैसा, थोड़ा ज्यादा तनाव और बुरी तरह अपने और अपने परिवार से कटते जाने का संत्रास।

इस देश में हर वह शख्स जो अपने पिता होने का दायित्व निभाता है, अपना पूरा वर्तमान और भविष्य के तमाम सपने झोंक देता है अपने बच्चों पर। इस झोंकने के पीछे कहीं वह सोच भी काम करती है कि यही बच्चे तो हमारे बुढ़ापे का सहारा होंगे। बच्चे भी पिता के सपनों पर खरा उतरने की कोशिश करते हैं। पर बदले हुए वक्त और इस वक्त की जरूरत के मद्देनजर उन्हें भी कई समझौते करने पड़ते हैं। इन समझौतों के बीच बड़ा हुआ बच्चा अपने बच्चों का बाप बन चुका होता है और फिर वह उस बच्चे के लिए अपना वर्तमान और भविष्य झोंकने लगता है। यानी, कुल मिलाकर यह चक्र हर मध्यवर्गीय भारतीय को पीसता रहता है।

सच यह है कि ऐसे हालात पीड़ा पैदा करते हैं। अनामदास ने ठीक कहा है यह पीड़ा अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य को एक साथ जीने का संघर्ष है। जो मुड़कर देखना नहीं चाहते, वह खुश हैं। बच्चों की प्रगति देखकर अलग रह रहा पिता भी खुश होता है। पर यह खुशी उसके अकेलेपन पर भारी पड़ती है।

आखिर, बेहतर की तलाश में हो रहा विस्थापन हम क्यों स्वीकार करते हैं। दरअसल, इंसान की अतृप्ति उसे बेहतर की तलाश में भटकाती है। जैसे ही एक अतृप्ति तृप्त होती है, उसकी जगह फिर कोई नई अतृप्ति आ जाती है। क्योंकि यह इंसान जानता है कि तृप्त जानवर होने से बेहतर है अतृप्त आदमी बन कर रहना। तो अपने को आदमी बनाये रखने के लिए बहुत सहज रूप में वह अपने भीतर नई अतृप्तियां भरता जाता है। ऐसे ही समय में बेहतर की परिभाषा भी बिल्कुल व्यक्तिपरक हो जाती है। कोई अपनी बेहतरी दिल्ली छोड़कर यूपी के किसी कस्बे में बसने में देखता है तो कोई किसी कस्बे को छोड़कर विदेश में बस जाने में। यानी, विस्थापन की वजहें कई सारी हैं। कई बार बिल्कुल ही निजी भी।

इन सब के बीच, विस्थापन की एक बड़ी वजह है विकास की अधकचरी योजना। हो रहे विस्थापन का 60-70 प्रतिशत हिस्सा इसी का नतीजा है। यह वह देश है जहां किसी शहर में मेट्रो की लाइन बिछ रही होती है और कई इलाके साइकल चल सकने लायक सड़क के लिए तरसते रह जाते हैं। कुछ शहरों में आधुनिकतम संसाधन हैं तो कई इलाके बुनियादी साधनों का इंतजार कर रहे हैं। एक तरफ ऋण में डूबे किसान आत्महत्या कर रहे हैं तो दूसरी तरफ करोड़ों टन अनाज गोदाम में सड़ रहा है। यानी, विकास की भेंगी दृष्टि देश के हर हिस्से को नहीं देख पा रही है। विकास का यह भेंग जब तक दूर नहीं होता, लोगों का विस्थापन होता रहेगा। हम पलायन करते रहेंगे सिर्फ अपने इलाके से नहीं बल्कि देश और समाज के प्रति अपने दायित्वों से भी।

Tuesday, May 13, 2008

बता री सजनी


बिन मौसम मुझे याद तेरी क्यों आई
हां री सजनी, अब हो गई तेरी सगाई

न कर नम अपनी ये प्यारी-प्यारी आंखें
हां री सजनी, दुआएं लिए खड़ी है माई

चल उठ, छोड़ अतीत देख अब सिर्फ आगे
हां री सजनी, मत कह अब दुहाई है दुहाई

मत कोस किसी को, नहीं बदलेगा कुछ भी
हां री सजनी, अब न बाप सुनेंगे न भाई

मेरी सांसों की हर आहट, भर रही है घबराहट
बता री सजनी, ये दिल क्यों निकला हरजाई

Wednesday, May 7, 2008

बेटा करे डिनर, पिता खाए 'बन'

आज मेरा 38वां जन्मदिन है। संयोग से मेरे वीकली ऑफ का दिन भी। बच्चों की जिद थी कि डिनर के लिए होटल चलें। उनकी जिद पूरी कर दी। उन्होंने खूब चाव से खाना खाया। यह देखकर मुझे भी संतोष हुआ। पर साथ ही मेरे जेहन में यह बात भी कौंध रही थी कि मेरे पिता आज घर पर बिल्कुल अकेले हैं। चौबीस घंटे घर में रहनेवाली मेड सरहूल का पर्व मनाने गांव गई है। दो-चार दिन में लौटना है। उसकी अनुपस्थिति में पापा ने आज सुबह दूध-चूड़े पर गुजारा किया। दोपहर में कुछ भी नहीं खाया और डिनर के लिए दुकान से बन (एक तरह की पावरोटी) मंगवा ली है। मैं अपने बच्चों के साथ होटल में चिकन और बटरनान खा कर लौटा हूं। और मेरे पिता अपने बच्चों से दूर ब्रेड खाकर काम चला रहे हैं।

यह अयाचित स्थिति क्यों बन जाती है जिंदगी में। आज मनःस्थिति ऐसी नहीं कि इस पर चर्चा कर सकूं। पर किसी पोस्ट में यह चर्चा होनी है कि रोजगार की वजह से हो रहा विस्थापन भी दर्द के नए प्रदेश में हमें ले जाता है।

Saturday, April 26, 2008

प्रथम चुंबन

शिराओं में
खून की गति
कम हो तो ज़रूरी नहीं
कि आदमी उदास, हताश या निराश है।

कई क्षण ऐसे होते हैं
जहां वक़्त रुक जाता है,
शिराओं में खून जम जाता है,
और ज़िंदगी
हसीन लगने लगती है।

तल्ख अनुभवों को
ताक पर रख
अगर वक़्त को महसूसा जाये
तो सचमुच
वक़्त भी धड़कता है
और इस वक़्त की नब्ज
हमारे हाथों में है
जिसकी नक्काशी
न जाने कितने संदर्भों को
जन्म देती है
जहां पल-पल अहसास होता है
कि हम ज़िंदा हैं।

Friday, April 25, 2008

बच्चे कहते हैं

ओ पिता,
तुम बहुत गंदे हो
तुम मेरे साथ नहीं खेलते।
खेलने के लिए कहता हूं
तो डांट कर मुंह फेर लेते हो।


पहले तुम
इतने गुस्सैल तो नहीं थे!
अब अम्मा पर भी
झल्लाने लगे हो!
तुम्हें क्या मालूम
तुम्हारे पीछे
अम्मा कितना रोती हैं!

ओ पिता,
तुम इतना झुक कर
क्यों चलने लगे?
तुम्हारे केश
इतने सफ़ेद और
चेहरा
इतना रूखा क्यों हो गया?

अब तो मैं
तुम्हारे साथ खेलूंगा भी नहीं।
बूढ़ों के साथ बच्चे
कहीं खेलते हैं भला!

Monday, April 21, 2008

उनके इंतजार में

उनके इंतजार में जाने कब से खड़ा हूं उसी मोड़ पर
अब है उन्हें ही रंज, जो गये थे खुद मुझे छोड़ कर

सही वक्त नहीं यह किसी से शिकवा-शिकायत का
देख, मातम मना रहे हैं लोग, अब रिश्ते तोड़ कर

गर तू चाहता है जीतना अब भी, हारी हुई यह जंग
फिर छोड़ दे ये रोना-धोना, अब दुश्मनों से होड़ कर

बहुत मुश्किल नहीं है मेरे भाई, झुकेंगे ये कसाई
तू शुरू तो कर अपनी चाल, सारी शक्ति जोड़ कर

Sunday, April 20, 2008

टेक केअर ऑफ माई आइज़

यह एसएमएस मुझे मेरे बेहद करीबी एक साथी ने भेजा। लघुकथा के कलेवर का यह एसएमएस मनुष्य की मानसिक बुनावट की जटिलताओं की ओर ध्यान खींचता है। इनसान जब ख़ुद को निरीह पाता है, तो वह सबसे घुल-मिल कर रहता है और दूसरों से सहयोग की भी अपेक्षा करता है। उसे अपना दुख सबमें नज़र आता है और सबका दुख ख़ुद में महसूस करता है। पर जैसे ही उसकी स्थिति मजबूत होती है, वह अपनी पुरानी ज़िंदगी भूल जाना चाहता है। निरीह और लाचार तमाम लोग उसे अब बोझ लगने लगते हैं। तो पढ़ें इस एसएमएस को जो मनुष्य के त्याग और स्वार्थ की पराकाष्ठा को दिखला रहा है :

There was a blind boy, who used to
hate every one except his girlfriend.
He always used to say that l'll marry u
if i could see!! Suddenly 1 day someone
donated him eyes n then when he saw
his glfriend, he was astonished to see
that his glfriend was also blind!
His glfriend then asked
"WILL U MARRY ME NOW?
he simply refused....
his glfriend went away saying...
"JUST TAKE CARE OF MY EYES."

Thursday, April 17, 2008

यौन पवित्रता : जड़ता टूटनी चाहिए (अंतिम)

स्त्री पर पुरुष का हक जैसी धारणाएं स्त्री को भयमुक्त होकर खुली हवा में जीने नहीं देतीं। खुली हवा में जीने का मतलब यह कतई नहीं होता कि जब चाहा, जिसके साथ चाहा हमबिस्तर हो लिये। यह तो एक तरह की यौन उच्छृंखलता होगी। खुली हवा में सांस लेने का मतलब सिर्फ़ इतना है कि स्त्री मान ले और समाज स्वीकार ले कि जिस तरह पुरुष निडर और निःसंकोच होकर कहीं भी घूम सकता है, स्त्री भी घूम सकती है। लूट की वारदातें अपनी जगह पर हैं। लूटनेवाला तो कभी भी और कुछ भी लूट सकता है, तो क्या इस डर से स्त्री अपना कार्यक्षेत्र सीमित कर ले?

बलात्कार एक विकृत मानसिकता है। विभिन्न सर्वेक्षणों के मुताबिक अधिकतर मामलों में पीड़िता के आसपास के लोग ही होते हैं बलात्कारी। स्त्री के संबंध में मर्दों का इतिहास सचमुच बहुत गंदा रहा है और यही समाज स्त्री से अपनी यौन पवित्रता को किसी भी कीमत पर बचाये रखने की अपेक्षा करता है। स्त्री से यौन पवित्रता की यह मांग बहुत अस्वाभाविक है और इसे इज्जत से जोड़ कर देखने की हमारी दृष्टि उतनी ही दकियानूसी भी।

समाज का कोई घिनौना चरित्र किसी स्त्री को जब पूरी बस्ती में नंगा घुमा देता है, तो क्या इस हादसे को पीड़िता की इज्जत से जोड़कर देखने की ज़रूरत है या फिर इसे उस बस्ती के मुर्दा होने से जोड़ कर देखा जाना चाहिए? महिला को नग्न किये जाने से महिला की इज्जत उतर गई या फिर वह पूरी बस्ती ही नंगी हुई? क्या इस वारदात से बस्ती के सारे मर्द नंगे नहीं हुए?

बलात्कार को इज्जत से जोड़कर देखने की एक वजह पीड़िता की 'प्राइवेसी' का भंग होना भी हो सकता है। लेकिन कई दूसरी परिस्थितयों में भी तो लोगों की प्राइवेसी ख़त्म होती है, उस वक़्त उनका नज़रिया क्यों बदल जाता है? जहां तक 'इज्जत' का प्रश्न है, तो वह उम्र भर कमाया गया धन होती है। किसी की भी इज्जत होती है तो किसी एक वजह से नहीं। बल्कि उस स्त्री या पुरुष को लोग उसकी पूरी समग्रता में देखते हैं।

बलात्कार को स्तब्ध कर देने वाला अपराध मानने के पीछ मुख्य चिंता स्त्री के कौमार्य की सुरक्षा की हो सकती है। समाज में यह धारणा बलवती है कि वही स्त्री विवाह योग्य है, जिसका पहले किसी पुरुष से यौन संबंध न हुआ हो। इसके ठीक उलट पुरुष के लिए ऐसी किसी कौमार्य की बाध्यता समाज में नहीं है। कहीं न कहीं स्त्री और उसकी यौन शुचिता के प्रति हमारी यह एकांगी दृष्टि बलात्कार को ख़ास अपराध में तब्दील कर देती है।

विचार करने की एक बात यह भी है कि इस वारदात को कितना ख़ास माना जाये? इस दुष्कृत्य को रोकने के लिए किसी स्त्री से कितनी शारीरिक क्षति स्वीकार करने की अपेक्षा आप करेंगे? क्या सचमुच बलात्कार इतना जघन्य है कि उसके लिए स्त्री को अपनी जान की बाज़ी लगा देनी चाहिए? दुखद यह है कि आज समाज उस स्त्री को अपने सिर-माथे पर बिठा लेगा, जिसने बलात्कारी के मंसूबों को नाकाम कर दिया हो। भले ही इसके लिए उसे अपने हाथ-पांव गवांने पड़े हों। और दूसरी तरफ, किसी के साथ अगर यह वारदात सफल हो गई, तो समाज उस स्त्री को शक की निगाह से देखेगा। समाज का यह नज़रिया कितना सही है? दरअसल यह सारी हाय-तौबा इसीलिए है कि हमारी महान संस्कृति ने स्त्री को असूर्यपश्या के रूप में जड़ दिया है। जड़ता की यह स्थिति टूटनी चाहिए।

Wednesday, April 16, 2008

यौन पवित्रता : जड़ता टूटनी चाहिए (एक)

बलात्कार की वारदात मुंबई की लोकल ट्रेन में हो या मरीन ड्राइव की किसी पुलिस चौकी पर, दिल्ली की सड़कों पर रात में दौड़ती कार में हो या फिर किसी छोटे से शहर के किसी हिस्से में; वह जब भी सुर्खियों में आती है, सबके भीतर डर छोड़ जाती है। ऐसी खबरों के बाद यह समाज पुलिस की निष्क्रियता पर मर्सिया गाता है और सुरक्षा व्यवस्था को जम कर कोसता है। इसके साथ ही वह ऐसी वारदातों के होने की वजह तलाशता है। अक्सर सन्नाटा, परिचित, रिश्तेदार या फिर बदले की (दुः) भावना वजह बनते हैं। अकेली क्यों गई थी, किसी को साथ क्यों नहीं ले गई... पता नहीं कितने सवाल नाचते रहते हैं, पर कोई सही जवाब नहीं मिल पाता। और आखिरकार हम वहीं के वहीं खड़े रह जाते हैं। अपनी दुनिया में मस्त। दरअसल, ये सवाल और ये चिंताएं महज तात्कालिक हैं, जो उभरते-डूबते रहते हैं। बलात्कार से जुड़ी असल समस्या इससे कहीं ज़्यादा गहरी है।

जनता की सुरक्षा या पुलिस की सक्रियता पर चिंता इस लेख का विषय नहीं। चिंता की बात यह है कि बलात्कार की हर वारदात को हमारा समाज पीड़िता की इज्जत से जोड़ कर क्यों देखता है? दुखद पहलू यह कि पढ़ा-लिखा तबका भी इसे 'इज्जत की लूट' का नाम देता है। यह विचारने की ज़रूरत है कि क्या ऐसी वारदात से पीड़िता की इज्जत वाकई तार-तार हो जाती है? यहां पर यह सवाल सिर उठाने लगता है कि यह 'इज्जत' क्या है? क्या पुरुष और महिलाओं की इज्जत के मापदंड अलग-अलग होते हैं? लूटनेवाला तो वहशी होता है, दरिंदा होता है। अगर वह दरिंदा 'होमो' हुआ तो जाहिर तौर पर उसकी दरिंदगी का शिकार पुरुष होगा। क्या उस स्थिति में भी हम कहेंगे कि फलां पुरुष की इज्जत लूट ली गई? पुरुष वर्चस्व वाला यह समाज कतई ऐसा नहीं कहेगा। बल्कि वह इस दरिंदगी को 'अप्राकृतिक यौनाचार' का नाम देगा।

इस समाज में मर्दों को परंपराओं से यह सीख मिलती रही है कि हर स्त्री पर किसी न किसी मर्द का अधिकार है। यह अलग बात है कि इस मर्द के चेहरे वक़्त के साथ बदलते जाते हैं। यानी शादी से पहले स्त्री पिता के अधिकार क्षेत्र में होती है और शादी के बाद यह सत्ता हस्तांतरित कर दी जाती है स्त्री के पति के नाम। इस सत्ता के मद में चूर भारतीय मर्द बलात्कार को इज्जत से जोड़ कर इसलिए भी देखता है कि उसे लगता है बलात्कार की घटना (वारदात नहीं) उसके अधिकार क्षेत्र में किसी दूसरे पुरुष द्वारा किया गया हमला है। यानी स्त्री की मानसिक पीड़ा को नज़रअंदाज कर मर्द इस वारदात को अपनी प्रतिष्ठा पर किया गया हमला मानता है। उसे इस वारदात से अपनी पराजय का बोध होता है।

ज़्यादा दूर जाने की ज़रूरत नहीं। हाल के वर्षों में हुए सांप्रदायिक दंगों को याद करें। महिलाओं के साथ हुई दुराचार की वारदातें ताज़ा हो जाएंगी। आख़िर दंगाइयों के निशाने पर महिलाएं क्यों आईं? इसीलिए कि दंगाई मर्दों की निगाह में किसी ख़ास कौम को पराजयबोध कराने का सबसे सरल तरीका यही दिखा।


दूसरी तरफ, इस समाज में स्त्री भी अपने आप को किसी और की थाती मानकर बढ़ने देती है। घर में ही उसे शोषण सहने की सीख दी जाती है। उसे स्त्रीयोचित तमाम गुण सिखाये जाते हैं। उसे बताया जाता है कि तेज़ दौड़ना, खिलखिलाकर हंसना या फिर पलटकर सवाल करना स्त्रीयोचित नहीं होता। यानी, हर क़दम पर एक नये स्त्रीयोचित गुण से उसके व्यक्तित्व को निखारा जाता है। इन सारी नसीहतों को घुट्टी की तरह पीकर वह संकोच, दब्बूपन और कायरता के सांचे में ढलती हुई जीती-जागती मूर्ति बनती है। हमारा मर्दवादी समाज अपनी गढ़ी हुई इस मूर्ति पर सीना तानकर कहता है, देखो, उसमें लज्जा है, शील है, सहनशीलता है।

Thursday, April 10, 2008

विरोध की भाषा

विरोध की एक भाषा
मुझे भी आती है
पर सिर उठाने से पहले
मुझे बार-बार समझाती है
और मैं,
जो हाथ में थाम
ज़बान का खंजर
उठ खड़ा हुआ था
अभी-अभी अचानक
मिमियाता हुआ-सा
घुस जाता हूं अपने खोल में
रूह कांप जाती है
और कांप जाता है पंजर
हर तरफ दिखता है
सिर्फ़ उजाड़ और बंजर।

सोचा था,
मेरी आवाज़ पर जुटेंगे लोग
पर देखो
गिद्धों की टोली में
मैं अकेला
और निरीह खड़ा हूं
खड़ा भी कहां
सिर्फ़ पड़ा हूं
सड़ा हूं, सड़ा हूं और सचमुच सड़ा हूं
पर अपनी बात पर
अब भी अड़ा हूं
कि थके-हारे लोग
आज नहीं तो कल
जुटेंगे
हमें तोड़ने की चाह रखनेवाले
ख़ुद टूटेंगे
अपनी इसी आस्था के कारण
उनकी छाती में मैं
कील-सा गड़ा हूं
मुझे समझाने वाली भाषा के लिए
मैं चिकना घड़ा हूं
महसूस करता हूं
कि किसी भी साजिश के ख़िलाफ
वाकई मैं बड़ा हूं
देखो यारो, देखो
एक बार फिर मैं
पूरी ढिठाई के साथ खड़ा हूं।

Monday, April 7, 2008

तेरे साथ का मतलब


जाने ये कैसी अजब रात है
भीतर गहरे दबी कोई बात है

नाकाम हैं तुम्हें भूलने की कोशिशें
कि कोशिशों पर यादों का घात है

तू अपनी धुन में काम किये चला चल
मत सोच कि ज़िंदगी शह या कि मात है

मेरी हिम्मत का राज़ तू भी सुन
मेरी पीठ पर अपना ही हाथ है

वाकई मौत से भी भिड़ता रहूंगा मैं
जिंदगी में जब तलक तेरा साथ है

Tuesday, April 1, 2008

डेथ नोट

मैं जानता हूं

मेरे मर जाने के बाद भी
ऐसा कुछ नहीं होगा
जो मैं चाहता रहा हूं
बरसों से।
मेरी आंखों में दौड़ रहा है
इन दिनों लगातार जो रीतापन
यह हृदय की स्पंदनों में
बरसों से छुपा था
यह अलग बात है
कि तुम सब बेखबर थे।

मेरी मौत
पता नहीं कितनी नयी बातों को
जन्म देगी
दोस्त/दुश्मन के शिनाख्त की
एक बिल्कुल नयी तहजीब
तुम्हें बताएगी।
लेकिन इससे पहले
जरूरी है कि तुम ख़ुद को पहचानो।
यही बात तुमसे नहीं होगी।

दरअसल साथी,
ख़ुद को पहचानने के लिए
ज़रूरी है ख़ुद से जिरह करना
और जब भी करोगे तुम ख़ुद से जिरह
अपने को पाओगे
मेरे क़त्ल की साजिश में शरीक।

साथी,
यह काली रात
और गहराती जा रही है।
सुबह की उम्मीद में
जगा रहना चाहता हूं मैं
पर तुम्हारे भीतर जो डर
गहराया है
उसे दूर करने के लिए
बेहद ज़रूरी है कि मैं मर जाऊं।
शायद मेरा मरना
तुम्हारे भीतर एक नया इनसान गढ़ सके।

साथी,
कल तुम्हारा जन्मदिन है
तुम्हारे इस जन्मदिन पर मैं
अपनी ज़िंदगी
तुम्हें दे देना चाहता हूं।
मेरे अक्षरों से उगेंगे अगर
लाल रंग
उसे सिंदूर की तरह लगा लेना।
बड़ी खूबसूरत लगती हो तुम,
तुम्हारी हंसी, तुम्हारी बोली
तुम्हारा रूठना, तुम्हारा रोना
तुम्हारा गुस्साना, तुम्हारा...
तुम्हारे भीतर जो कुछ भी है
वाकई, सब बहुत प्यारा है
और जब भी
तुम्हारे भीतर देखता हूं
वहां मेरी आकृति भी दिखती है
जो पूरी बेशर्मी के साथ
तुम्हारे भीतर बैठी है
और तुम उसे बेतरह प्यार कर रही हो।
ऐसे में मेरा अस्तित्व नंगा होता है।
और अपनी नंगई से घबराकर
मैं सचमुच मर जाना चाहता हूं।

गर मेरा मर जाना यह साबित कर सके
कि सचमुच मैं ज़िंदा आदमी था
तो मुझे, मर ही जाना चाहिए
मेरी आंखों में तुम तैर रही हो
मेरी रगो में तुम दौड़ रही हो
मेरे विचारों को पापा का प्यार
रौंद रहा है
और मेरी मृत्यु के रास्ते में
मेरा डर खड़ा है
पापा और तुम्हारा रूप लिये हुए।

Monday, March 31, 2008

पाश की निगाह में भगत सिंह





"जिस दिन उसे फांसी लगी उसकी कोठरी से उसी दिन लेनिन की एक किताब बरामद हुई थी जिसका एक पन्ना मोड़ा हुआ था देश की जवानी को उसके आखरी दिन के मोड़े हुए पन्ने से आगे बढ़ना है।"
-पाश

भगत सिंह और पाश की शहादत की तारीख़ एक ही है पर वर्ष अलग। वैसे, पंजाबी कवि पाश अपने जीवनकाल में क्रांतिकारी देशभक्त भगत सिंह को बेहद पसंद करते रहे होंगे, इसमें शक़ नहीं। 23 मार्च 1982 को पाश ने भगत सिंह को कुछ यूं याद किया था :

उसकी शहादत के बाद बाक़ी लोग
किसी दृश्य की तरह बचे
ताज़ा मुंदी पलकें देश में सिमटती जा रही झाकी की
देश सारा बचा रहा बाक़ी
उसके चले जाने के बाद
अपने भीतर खुलती खिड़की में
लोगों की आवाज़ें जम गईं
उसकी शहादत के बाद
देश की सबसे बड़ी पार्टी के लोगों ने
अपने चिहरे से आंसू नहीं, नाक पोंछी
गला साफ़ कर बोलने की
बोलते ही जाने की मशक की
उससे संबंधित अपनी उस शहादत के बाद
लोगों के घरों में, उनके तकियों में छिपे हुए
कपड़े की महक की तरह बिखर गया
शहीद होने की घड़ी में वह अकेला था ईश्वर की तरह
लेकिन ईश्वर की तरह वह निस्तेज न था।

Friday, March 28, 2008

पाश का 'लोहा'

आप लोहे की कार का आनंद लेते हो
मेरे पास लोहे की बंदूक है
मैंने लोहा खाया है
आप लोहे की बात करते हो
लोहा जब पिघलता है
तो भाप नहीं निकलती
जब कुठाली उठाने वालों के दिल से
भाप निकलती है
तो पिघल जाता है
पिघले हुए लोहे को
किसी भी आकार में
ढाला जा सकता है

कुठाली में देश की तकदीर ढली होती है
यह मेरी बंदूक
आपके बैंकों के सेफ;
और पहाड़ों को उल्टाने वाली मशीनें,
सब लोहे के हैं।
शहर से उजाड़ तक हर फ़र्क
बहिन से वेश्या तक हर अहसास
मालिक से मुलाजिम तक हर रिश्ता,
बिल से कानून तक हर सफ़र,
शोषणतंत्र से इंकलाब तक हर इतिहास,
जंगल, कोठरियों व झोपड़ियों से पूछताछ तक हर मुक़ाम
सब लोहे के हैं।

लोहे ने बड़ी देर इंतज़ार किया है
कि लोहे पर निर्भर लोग
लोहे की पंत्तियां खाकर
ख़ुदकुशी करना छोड़ दें
मशीनों में फंसकर फूस की तरह उड़नेवाले
लावारिसों की बीवियां
लोहे की कुर्सियों पर बैठे वारिसों के पास
कपड़े तक भी ख़ुद उतारने के लिए मजबूर न हों।

लेकिन आख़िर लोहे को
पिस्तौलों, बंदूकों और बमों की
शक्ल लेनी पड़ी है
आप लोहे की चमक में चुंधियाकर
अपनी बेटी को बीवी समझ सकते हैं
(लेकिन) मैं लोहे की आंख से
दोस्तों के मुखौटे पहने दुश्मन
भी पहचान सकता हूं
क्योंकि मैंने लोहा खाया है
आप लोहे की बात करते हो।

अनुवाद - चमनलाल

Tuesday, March 25, 2008

पाश को मार कर भी नहीं मार सके आतंकवादी

यह हैं पाश। अवतार सिंह संधू 'पाश'। आज से बीस साल पहले (23 मार्च 1988 को) खालिस्तानी आतंकवादियों ने इनकी हत्या कर दी थी। इस पंजाबी कवि का अपराध (?) यही था कि यह इस जंगलतंत्र के जाल में फंसी सारी चिड़ियों को लू-शुन की तरह समझाना चाह रहे थे। चिड़ियों को भी इनकी बात समझ आने लगी थी। और वे एकजुट होकर बंदूकवाले हाथों पर हमला करने ही वाली थीं कि किसिम-किसिम के चिड़ियों का हितैषी मारा गया। उस वक्त पाश महज 37 बरस के थे।

वैसे, यह बेहद साफ़ है कि कोई भी किसी की हत्या तभी करता है, जब उसे सामनेवाले से अपने अस्तित्व पर संकट नज़र आता है। यानी, कोई भी हत्या डर का परिणाम है। पाश की क़लम से डरे हुए आतंकवादियों ने उनकी हत्या कर दी। पाश बेशक ज़िंदादिल इनसान थे। उनकी जिंदादिली की पहचान हैं उनकी बोलती-बतियाती कविताएं। पाश की कविताएं महज कविताएं नहीं हैं, बल्कि विचार हैं। उनका साहित्य पूरी दृष्टि है। ज़िंदगी को क़रीब से देखने का तरीका है। कुल मिलाकर वह ऐसी दूरबीन है जिससे आप दोस्तों की खाल में छुपे दुश्मनों को भी पहचान सकते हैं।
पाश की पहली कविता 1967 में छपी थी। इसी वक़्त वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े और बाद में नागा रेड्डी गुट से भी। पर ख़ुद को हिंसा से हमेशा दूर रखा। 1970 में वह जेल में थे और वहीं से उन्होंने कविता संकलन 'लौह कथा' छपने के लिए भेजा। इस संकलन में उनकी कुल 36 कविताएं थीं। इस संकलन के आने के साथ ही अवतार सिंह संधू 'पाश' पंजाबी कवियों में 'लाल तारा' बन गये। 1971 में पाश जेल से छूटे। इस बीच जेल में ही उन्होंने ढेर सारी कविताएं लिखीं और हस्तलिखित पत्रिका 'हाक' का संपादन किया। 1974 में पाश के 'उड्डदे बाजां मगर', 1978 में 'साडे समियां विच' और 1988 में 'लड़ांगे साथी' कविता संकलन छपकर आये। अपने 21 वर्षों की काव्य-यात्रा में पाश ने कविता के पुराने पड़ रहे कई प्रतिमानों को तोड़ा और अपने लिए एक नयी शैली तलाशी। संभवतः अपने इसी परंपराभंजक तेवर के कारण पाश ने लिखा है :

तुम्हें पता नहीं
मैं शायरी में किस तरह जाना जाता हूं
जैसे किसी उत्तेजित मुजरे में
कोई आवारा कुत्ता आ जाये
तुम्हें पता नहीं
मैं कविता के पास कैसे जाता हूं
कोई ग्रामीण यौवना घिस चुके फैशन का नया सूट पहने
जैसे चकराई हुई शहर की दुकानों पर चढ़ती है।

पाश की कविताओं में विषय-वैविध्य भरपूर है, किंतु उनके केंद्रीय भाव हमेशा एक हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह रही है कि पाश ने जिंदगी को बहुत करीब से देखा। तहजीब की आड़ में छूरे के इस्तेमाल को उन्होंने हमेशा दुत्कारा, साथ ही मानवता और उसकी सच्चाई को उन्होंने गहरे आत्मसात किया। पाश के लिए ये पंक्तियां लिखते हुए उनकी कविता 'प्रतिबद्धता' याद आती है, जिसका करारा सच प्रतिबद्धता के नाम पर लिखी ढेर सारी कविताओं को मुंह चिढ़ाता है :

हम चाहते हैं अपनी हथेली पर कोई इस तरह का सच
जैसे गुड़ की चाशनी में कण होता है
जैसे हुक्के में निकोटिन होती है
जैसे मिलन के समय महबूब के होठों पर
कोई मलाई जैसी चीज होती है।

गुड़ की चाशनी, हुक्के की निकोटिन और महबूब के होठों की मलाई - ये बिंब पाश जैसे कवि को ही सूझ सकते हैं। यह अलग बात है कि कविता के नासमझ आलोचक इसे बेमेल बिंबों की अंतर्योजना कह कर खारिज करना चाहें। पाश ने खेतों-खलिहानों में दौड़ते-गाते, बोलते बतियाते हुए हाथों की भूमिका भी सीखी :

हाथ अगर हों तो
जोड़ने के लिए ही नहीं होते
न दुश्मन के सामने खड़े करने के लिए ही होते हैं
यह गर्दनें मरोड़ने के लिए भी होते हैं
हाथ अगर हों तो
'हीर' के हाथों से 'चूरी' पकड़ने के लिए ही नहीं होते
'सैदे' की बारात रोकने के लिए भी होते हैं
'कैदो' की कमर तोड़ने के लिए भी होते हैं
हाथ श्रम करने के लिए ही नहीं होते
लुटेरे हाथों को तोड़ने के लिए भी होते हैं।

इस अंदाज में अपनी बात वही कवि रख सकता है जिसे पता हो कि वह कहां खड़ा है और सामनेवाला कितने पानी में है :

जा, तू शिकायत के काबिल होकर आ
अभी तो मेरी हर शिकायत से
तेरा कद बहुत छोटा है।

मनुष्य और उसके सपने, उसकी ज़िंदादिली और इन सबसे भी पहले अपने आसपास की चीजों के प्रति उसकी सजगता पाश को बहुत प्यारी थी :

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
लोभ और गद्दारी की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाये पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी सी चुप्पी में जकड़े जाना बुरा तो है
किसी जुगनू की लौ में पढ़ना बुरा तो है
कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
पर सबसे ख़तरनाक नहीं होता।
सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
न होना तड़प का, सब कुछ सहन कर लेना
घर से निकलना काम पर और काम से घर लौट जाना
सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना...।

पाश के लिए कविता प्रेम-पत्र नहीं है और जीवन का अर्थ शारीरिक और भौतिक सुख भर नहीं। बल्कि इन सबसे परे पाश की दृष्टि एक ऐसे कोने पर टिकती है, जिसे आज के भौतिकतावादी समाज ने नकारने की कोशिश की है - वह है उसकी आज़ादी के सपने। आज़ादी सिर्फ तीन थके रंगों का नाम नहीं और देश का मतलब भौगोलिक सीमाओं में बंधा क्षेत्र विशेष नहीं। आज़ादी शिद्दत से महसूसने की चीज़ है और देश, जिसकी नब्ज भूखी जनता है, उसके भीतर भी एक दिल धड़कता है। इसलिए पाश हमेशा इसी सर्वहारा के पक्ष में खड़े दिखते हैं।

वैसे तो पाश की राजनीतिक गतिविधियां काफी तेज रही हैं। विभिन्न पार्टियों से जुड़कर आमजन के लिए लड़ना उनका धर्म रहा है। पर उनकी मुख्य पहचान किसी राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में नहीं बनी, बल्कि एक क्रांतिकारी और जुझारू कवि के रूप में बनी। पार्टियों के बदलते स्टैंड और वहां पैठी अवसरवादिता पाश को कचोटती थी। यह पाश की खीज ही थी जो हमारे समय में पूरे चरम पर दिखती है :

यह शर्मनाक हादसा हमारे साथ ही होना था
कि दुनिया के सबसे पवित्र शब्द ने
बन जाना था सिंहासन की खड़ाऊं
मार्क्स का सिंह जैसा सिर
दिल्ली के भूलभुलैयों में मिमियाता फिरता
हमें ही देखना था
मेरे यारो, यह कुफ्र हमारे समयों में होना था...


पाश ने अपने पहले काव्य संग्रह का नाम रखा था - लौहकथा। इस नाम को सार्थक करनेवाली उनकी कविता है लोहा। कवि ने इस कविता में लोहे को इस क़दर पेश किया है कि समाज के दोनों वर्ग सामने खड़े दिखते हैं। एक के पास लोहे की कार है तो दूसरे के पास लोहे की कुदाल। कुदाल लिये हुए हाथ आक्रोश से भरे हैं, जबकि कारवाले की आंखों में पैसे का मद है। लेकिन इन दोनों में पाश को जो अर्थपूर्ण अंतर दिखता है, वह यह है कि :

आप लोहे की चमक में चुंधियाकर
अपनी बेटी को बीवी समझ सकते हैं
लेकिन) मैं लोहे की आंख से
दोस्तों के मुखौटे पहने दुश्मन
भी पहचान सकता हूं
क्योंकि मैंने लोहा खाया है
आप लोहे की बात करते हो।

पाश की कविताओं से गुज़रते हुए एक खास बात यह लगती है कि उनकी कविता की बगल से गुज़रना पाठकों के लिए मुश्किल है। इन कविताओं की बुनावट ऐसी है, भाव ऐसे हैं कि पाठक बाध्य होकर इनके बीच से गुज़रते हैं और जहां कविता ख़त्म होती है, वहां आशा की एक नई रोशनी के साथ पाठक खड़े होते हैं। यानी, तमाम खिलाफ़ हवाओं के बीच भी कवि का भरोसा इतना मुखर है, उसका यकीन इतना गहरा है कि वह पाठक को युयुत्सु तो बनाता ही है, उसकी जिजीविषा को बल भी देता है।

मैं किसी सफ़ेदपोश कुर्सी का बेटा नहीं
बल्कि इस अभागे देश की भावी को गढ़ते
धूल में लथपथ हज़ारों चेहरों में से एक हूं
मेरे माथे पर बहती पसीने की धारों से
मेरे देश की कोई भी नदी बेहद छोटी है।
किसी भी धर्म का कोई ग्रंथ
मेरे जख्मी होठों की चुप से अधिक पवित्र नहीं है।
तू जिस झंडे को एड़ियां जोड़कर देता है सलामी
हम लुटे हुओं के दर्द का इतिहास
उसके तीन रंगों से ज्यादा गाढ़ा है
और हमारी रूह का हर एक जख़्म
उसके बीच वाले चक्र से बहुत बड़ा है
मेरे दोस्त, मैं मसला पड़ा भी
तेरे कीलों वाले बूटों तले
माउंट एवरेस्ट से बहुत ऊंचा हूं
मेरे बारे में ग़लत बताया तेरे कायर अफसरों ने
कि मैं इस राज्य का सबसे खतरनाक महादुश्मन हूं
अभी तो मैंने दुश्मनी की शुरुआत भी नहीं की
अभी तो हार जाता हूं मैं
घर की मुश्किलों के आगे
अभी मैं कर्म के गड्ढे
कलम से आट लेता हूं
अभी मैं कर्मियों और किसानों के बीच
छटपटाती कड़ी हूं
अभी तो मेरा दाहिना हाथ तू भी
मुझसे बेगाना फिरता है।
अभी मैंने उस्तरे नाइयों के
खंज़रों में बदलने हैं
अभी राजों की करंडियों पर
मैंने लिखनी है वार चंडी की।

उन्होंने अपनी लंबी कविता 'पुलिस के सिपाही से' में स्पष्ट कहा है :

मैं जिस दिन रंग सातों जोड़कर
इंद्रधनुष बना
मेरा कोई भी वार दुश्मनों पर
कभी ख़ाली नहीं जाएगा।
तब फिर झंडीवाले कार के
बदबू भरे थूक के छींटे
मेरी ज़िंदगी के घाव भरे मुंह पर
चमकेंगे...


और इसके लिए बेहद ज़रूरी है :

मैं उस रोशनी के बुर्जी तक
अकेला पहुंच नहीं सकता
तुम्हारी भी जरूरत है
तुम्हें भी वहां पहुंचना पड़ेगा...


1974 में प्रकाशित 'उड्डदे बाजां मगर' में पाश की निगाह बेहद पैनी हो गयी है और शब्द उतने ही मारक। इसी संकलन की कविता है - हम लड़ेंगे साथी ।

हम लड़ेंगे साथी उदास मौसम से
हम लड़ेंगे साथी गुलाम इच्छाओं से
हम चुनेंगे साथी ज़िंदगी के सपने


पाश ने देश के प्रति अपनी कोमल भावना का इज़हार पहले काव्य संग्रह की पहली कविता में किया है

भारत
मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द
जहां कहीं भी इस्तेमाल होता है
बाकी सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं...

पर पाश इस भारत को किसी सामंत पुत्र का भारत नहीं मानते। वह मानते हैं कि भारत वंचक पुत्रों का देश है। और भारत को अपने लिए सम्मान मानने वाले पाश कहते हैं :

इस शब्द के अर्थ
किसी दुष्यंत से संबंधित नहीं
वरन खेतों में दायर है
जहां अनाज उगता है
जहां सेंध लगती है...


नवंबर '84 के सिख विरोधी दंगों से सात्विक क्रोध में भर कर पाश ने 'बेदखली के लिए विनयपत्र' जैसी रचना भी की। इस कविता में मारे गये निर्दोष सिखों के प्रति गहरी सहानुभूति थी, तो दूसरी तरफ सत्ता की गलत नीतियों के प्रति विद्रोह भी।

मैंने उम्रभर उसके खिलाफ़ सोचा और लिखा है
अगर उसके अफ़सोस में पूरा देश ही शामिल है
तो इस देश से मेरा नाम खारिज कर दें ...
... इसका जो भी नाम है - गुंडों की सल्तनत का
मैं इसका नागरिक होने पर थूकता हूं
मैं उस पायलट की चालाक आंखों में
चुभता हुआ भारत हूं
हां, मैं भारत हूं चुभता हुआ उसकी आंखों में
अगर उसका अपना कोई खानदानी भारत है
तो मेरा नाम उसमें से अभी खारिज कर दो।

पाश की हत्या ने उनकी एक कविता की तरफ लोगों का ध्यान विशेष रूप से आकर्षित किया। 'मैं अब विदा लेता हूं' शीर्षक इस कविता में पाश ने अपनी सामाजिक भूमिका का उल्लेख करते हुए मृत्यु से 10 साल पहले ही अपनी अंतिम परिणति का ज़िक्र किया था :

...तुम यह सब भूल जाना मेरे दोस्त
सिवाय इसके
कि मुझे जीने की बहुत लालसा थी
कि मैं गले तक ज़िंदगी में डूबना चाहता था
मेरे हिस्से का भी जी लेना मेरे दोस्त
मेरे भी हिस्से का जी लेना।

संभवतः यही एक ऐसी कविता थी, जिसमें पाश अपने व्यक्तिगत जीवन से संबोधित थे और अपने आसपास के निकटस्थों के लिए लिखा था। सचमुच, उनके भीतर जिंदगी को उसके गले तक जीने की बलवती इच्छा थी।

Thursday, March 20, 2008

बैटलफ़ील्ड फॉर लीडरशिप ऑन गूगल

फागुन के नशे में BLOG का कोई दूसरा अर्थ नहीं दिख रहा साथियो। हां, कुछ रोज़ पहले तक यह मुझे और मेरे जैसे कई साथियों को ब्यूटिफुल लिटरेचर ऑन गूगल का अर्थ भी देता रहा है। ऐसा नहीं कि यह अर्थ ख़त्म हो गया है। पर फिलहाल, जब होली सिर चढ़कर बोलने को तैयार हो तो मन का थोड़ा भटक जाना स्वाभाविक है। यही सोचकर भटकने दिया इस मन को और एक बीत चुके प्रकरण पर थोड़ी चुटकी ली है। क्षमायाचना सहित पेश है 'बुरा न मानो होली है' : इलेक्ट्रॉनिक कलम हाथ में थाम लेने से कोई अगुवा या मठाधीश नहीं बन जाता। स्वयंभू मठाधीश तो हम हो सकते हैं, पर स्वीकृत नहीं। इसके लिए नायकों वाले गुण भी दिखने चाहिए।
कलम से गर्दन नहीं टूटती। यह अहसास होने के बाद अपनी करनी पर गर्दन झुक जरूर जाती है। और एक सच तो यह कि हम जो कुछ भी लिखते हैं, बोलते हैं वही हमारा चेहरा दूसरों के सामने बनाता है/बिगाड़ता है। किसी ने लिखा है :

मैं आदमी को शक्ल-ओ-सूरत से नहीं
शब्दों से जानता हूं
क्योंकि सामने जब शब्द होते हैं
तो आदमी नहीं, आदमी के ईमान बोलते हैं।

और अंत में फिर वही धारणा...

Tuesday, March 18, 2008

इच्छाओं का होलिका दहन

मेरे साथियों पर होली का खुमार छाया है और मेरी हालत यह है कि होली के नाम से ही बुखार छूटने लगता है, पसीने आने लगते हैं। इस महानगर में रम और रंग की होली देखी है। दरअसल रम में पैसे का खर्च ज्यादा है और रंग छुड़ाने में वक्त का। इससे बेहतर तो हमारे गांव में था। न रम का झंझट न रंग का। चढ़ाओ ठर्रा और हो जाओ मस्त। इस देसी शराब के नशे के बाद तो होली के दिन गांव की नालियां रंगों की बाल्टी बन जाती थीं। पूरी आत्मीयता के साथ उसे शरीर पर पोतो और फिर नहाने के वक्त भी कोई झंझट नहीं। देह पर एक बाल्टी पानी मारो और सारा कीचड़ धुल गया। पर यहां तो हालत यह हो जाती है कि रगड़-रगड़ कर चमड़ी छील डालो पर रंग दिखता ही रह जाता है।

वैसे, मुझे आज भी याद है जब मैं होली के मौके पर पहली बार ससुराल जा रहा था। कितनी नाक रगड़ने के बाद बॉस ने छुट्टी दी थी। उस कमबख्त का दिया सारा दर्द भूल गया मैं अपनी उस ससुराल यात्रा में। बस स्टैंड पर ही साले साहब मुझे रिसीव करने पहुंच गये थे। बिल्कुल नई चमचमाती बैलगाड़ी लेकर आए थे वह। मैं बैलगाड़ी के पास पहुंचा, साले साहब मेरा सामान लाद ही रहे थे कि दोनों बैलों ने सिर हिलाकर और पूंछ को चंवर की तरह डुलाकर मेरा अभिवादन किया। पता नहीं इन बैलों को कैसे ट्रेंड कर देते हैं गांव के लोग। जिसने मुझे कभी देखा नहीं था, उसने भी पहचान लिया। सिर्फ पहचाना ही नहीं मुझे देख सिर भी हिलाया, चंवर भी डुलाया। मैं भावविभोर हो गया। शहर के बैल याद आए। वहां इतने कीमती स्कूल। पर वहां पढ़कर भी इंसान की औलाद इंसान नहीं बन पाई, बैल ही रह गई। वे बैल न किसी को पहचानते हैं न किसी के सामने नतमस्तक होते हैं। चचा दिखें या दिखें चाची, होठ में दबा सिगरेट न छुपाने की जरूरत समझते हैं न ही छुपाते हैं। बस मुंह से धुएं के गोल-गोल छल्ले निकालते रहते हैं। यही सब याद कर मन ही मन मैं कोस रहा था उन सबों को जो अपनी कार से मेरे चेहरे पर धूल उड़ाते और चिढ़ाते निकल जाते थे। तभी साले ने टोका 'कहां खो गये जीजा जी। गांव नजीके है अब।'

मेरी तंद्रा टूटी। देखा, बच्चों का झुंड हमारी बैलगाड़ी की ओर दौड़ा चला आ रहा है। हवा में हाथ लहराते वे चिल्ला रहे हैं 'दिलवाले जी आ गए, दिलवाले जी आ गए।' साले ने बताया कि ये चिल्ला रहे हैं कि दिल्ली वाले जीजा जी आ गये। फिर कहने लगा 'अरे जीजा जी, बड़ा क्रेज है हियां आपका। बड़, बूढ़, जवान, चेंगना-मेंगना सभे आपसे होली खेलने का पिलान बना लिए हैं।'

यह सुनकर मैं घबराया। मुझे अपने मोहल्ले की होली याद आ गई। होली के बाद सड़कों पर फटे कपड़े बिखरे रहते थे। हर होली में लगभग नंगा होकर ही मैं घर पहुंचता था। पर यह तो ससुराल है, यहां अगर ऐसा-वैसा कुछ हो गया तो? मैंने अपने को संयत कर कहा, 'साले साहब, मैं तो पूरी शालीनता के साथ होली खेलूंगा।'

उसने कहा, 'हां जीजा जी, जरूरे खेलिएगा। आखिर नता साली है आपकी।' फिर थोड़ा चौंकते हुए उसने पूछ 'पर जरा इ तो बताइए कि नता को आप कइसे जानते हैं। उ भी छटपटाई है होली खेलने के लिए। बहुत सयानी है, पूरा रंग देगी आपको। अच्छा, जरूर दीदी ने बताया होगा उसके बारे में। उसकी पक्की सहेली है उ।' चौंकने की बारी मेरी थी, 'किसकी बात कर रहे हैं आप?' उसने कहा 'अरे उसी नता के बारे में। अभिए न आप कहें कि मैं तो सिर्फ साली नता के साथ होली खेलूंगा।' मैंने साफ किया 'अरे भाई, मैंने किसी साली नता के बारे में नहीं कहा, मैंने तो कहा शालीनता के साथ होली खेलूंगा।' 'ओहो.. होहो....जीजा जी, का करें हम थोड़ा कनफूजिया गए', उसने कहा। इतने में हमारी बैलगाड़ी गांव में पहुंच गई। सड़क के कूबड़ पर बैल अपनी मस्त चाल में चल रहे थे। बच्चों की टोली ने मेरे विजिटिंग कार्ड का काम किया। गांव में पहले ही खबर हो गई थी कि 'दिलवाले जी' आ गए हैं। कुछ महिलाएं अपने दामाद को देखने के लिए अपने-अपने घर के दरवाजे की ओट में खड़ी दिखीं, तो कुछ सिर पर पल्लू डाले मुंह में साड़ी का एक किनारा दबाए घर के बाहर निकल आई थीं। मैं नई-नवेली दुलहन की तरह संकोच से भरा था। पर महानगर की अपनी आदत से बाज नहीं आ सका। कनखियों से उन्हें निहारता रहा। सब आपस में कानाफूसी कर रही थीं। चुहल उनके चेहरे पर साफ झलक रहा था। मैं मन ही मन रोमांचित हो रहा था। इतनी प्यारी-प्यारी और ढेर सारी सासें। सालियों की संख्या इनसे दोगुनी तो जरूर होगी - यह सोच ही रहा था कि आवाज आई 'परनाम जीजा जी'। साले ने बताया 'झुनकी है'। फिर उसने बैलगाड़ी पर ही परिचय देना शुरू कर दिया 'ऊ है पायल...और ऊ... हुंआ जो दूर में खड़ी है.... ऊ पांचों के बीच में... ऊ है सुगनी, अरे सुगनी देख तेरे जीजा जी को हम ले आए।' सलज्ज मुस्कान के साथ उधर से अभिवादन मिला। पर बाकियों में से किसी एक ने कहा 'हां रे जोधन, पकड़ के रखना। कल पता चलेगा जीज्जा जी को...अइसा पटकेंगे कुंइयां वाले कीच में की यादे रहेगा।' 'अरे, अइसा काहे बोलती है। सहर वाले जीज्जा जी हैं। देखती नई, केतना गोर हैं। कीच लग गया तो करिया हो जाएंगे' यह दूसरी ने कहा। तीसरी ने कहा 'चिंता न करना जीज्जा जी। आप करिया हो जाएंगे, तो हम अपने हाथों से बढ़िया से नहला कर साफ कर देंगे, फिर अइसने ही सहर वाला दिखने लगेंगे आप।' इनकी बात सुन के सचमुच सिहर गया मैं। जोधन ने डांटा, 'चल हट हियां से। बेसी बकर-बकर मत कर। अभिये से लक्षन मत दिखा अपन।' लड़कियों की इस ठिठोली के बीच से हमारी बैलगाड़ी गुजर गई। बैल ने एक बार उन्हें घूरकर देखा। इस घूरने को साले साहब ने भी देख लिया। दांत निपोर कर बोले, 'अभी घूर कर देख रहे हो जीज्जा जी, कल तो मटियामेट कर देंगी ये आपको। इनके मुंह मत लगना।' मैं सकपकाया। खैर, मैं ससुराल के दरवाजे पर खड़ा था। बच्चों का झुंड मुझे किसी दूसरे ग्रह से आए प्राणी की तरह समझ रहा था। सालियों की संख्या न पूछें जनाब। लग रहा था गांव की तमाम लड़कियां यहां इकट्ठा हो आई हैं। गांव के मेरे तमाम सास-ससुर वहां मौजूद थे। यह सब देखकर मेरा मिजाज बेसुरा होने लगा। एक तो सफर की थकान थी, दूसरा, बैलगाड़ी की सवारी और जब अब आराम करने का वक्त मिलना चाहिए, आधे घंटे से महिलाओं ने नौटंकी कर रखी है। कभी अक्षत छींटती हैं तो कभी गोबर से गाल सेंकती हैं। ऊपर से सालियों का कमेंट सो अलग 'हां जीजा जी, अभी तो गोबर से पुजा रहे हैं, कल गोबरे में सानेंगे आपको।'
बहरहाल, मुझे कमरे में ले जाया गया। बच्चों को तो बाहर से ही हुड़का दिया गया। पर सालियों ने पीछा नहीं छोड़ा था। बीवी इस भीड़ में कहीं दिख नहीं रही थी। सालियों की चिलपों को तो बर्दाश्त भी किया जा सकता था। पर मेरा साला कुछ ज्यादा ही हुलस गया था। उसे बर्दाश्त करना मुश्किल हो रहा था। तभी उसने सवाल दागा 'और जीजा जी, शहर में कैसा कट रहा था?' चिढ़ा हुआ तो था ही मैं। टका सा जवाब दिया 'कटना क्या है। बीवी महीने भर से मायके में थी, वहां मैं शांति और सुकून के साथ रह रहा था।' इसी बीच सासू मां आईं और फिर गईं। इस तीखे जवाब और तेवर के बाद सालियां भी खिसक गईं और साला भी। थोड़ी देर बाद लगा जैसे ससुराल में कोहराम मच गया है। सासू जी पछाड़ें खा के रो रही हैं। कुछ लोग समझाने में लगे हैं। मेरी समझ में कुछ नहीं आया। तभी बीवी के दर्शन हुए। वह समझा रही थी अपनी मां को। 'अरे, हुआं उ अकेले रहते हैं। शांति और सुकून नाम की कोई लड़की नहीं रहती।' अब समझा मैं कि मैंने जो कहा था कि शांति और सुकून के साथ रहता हूं, उसे उन्होंने किस अर्थ में ले लिया था।

खैर, दोपहर और शाम तक फिर कोई नया हादसा नहीं हुआ। अगजा जल चुका था। मेरा खाना आ चुका था। तरह-तरह की डिश थी। सब चीज मेरी पसंद के थे सिवाए कढ़ी-बरी के। मैंने मन ही मन सोचा कि सबसे पहले इसी घटिया आइटम को खत्म किया जाए, फिर बाकी चीजें प्रेम से खाई जाएंगी। यह सोच कर मैंने कढ़ी-बरी वाला कटोरा उठाया और एक ही सांस में सारा गटक गया। राह का रोड़ा खत्म हो चुका था, अब प्रेम से खाना खाने की बारी थी। पर ये क्या, मेरे कटोरा रखते ही फिर उसे तुरंत भर दिया गया यह सोचकर कि मेहमान को बहुत पसंद है। मन खट्टा हो चुका था। बीवी को मैं कोस रहा था। अब तक कहीं दिख ही नहीं रही है। किसी से पूछने में संकोच हो रहा था। कम से कम वह होती यहां तो इस कढ़ी-बरी को तो दुबारा खत्म नहीं करना पड़ता। मन ही मन सोचा, आने दो कमरे में रात को। तब हर चीज का बदला लूंगा।

रात को साले साहब मुझे कमरे में लेकर आए। मैं महीने भर की जुदाई खत्म होने की घड़ी का इंतजार कर रहा था। तभी साले साहब ने कहा 'बस जीजा जी, पानी पी कर आ रहे हैं। फिर साथे सुतेंगे।' मैं झल्लाकर रह गया। अब रात की बात क्या बताऊं। साले के साथ ही सोना पड़ा। बातचीत में साले साहब ने बताया कि हमारे यहां होली के दिन पूजा होती है उसके बाद ही यहां बेटी-दामाद साथ सोते हैं। मैं ऐसी परंपरा को कोसते-कोसते सो गया।

सुबह आंख भी ठीक से नहीं खुली थी कि हुड़दंगियों का शोर सुनाई पड़ा...सा र..र सा र र सेव सिंघाड़ा, तेरा बाप माखनचोर मेरा खेल बिगाड़ा, जोगीरा सा र र...मेरी नींद टूटी। मुझे लगा बगल में साले साहब सोए हैं। पर यह क्या? मैं तो अपने बड़े भइया के साथ सो रहा हूं। अभी जब उनकी शादी नहीं हुई है, तो मेरी बारी भला कहां से आ गई। इसी बीच फिर बाहर से शोर सुनाई पड़ा....जोगी रा सा र..र...र..।

Thursday, March 13, 2008

सपनों के साथ जीता हुआ आदमी

एक आदमी
जब सपनों में जीता है
गोबर को भी गणेश मान लेता है
वह नहीं जानता
कि शहर में
भेड़ियों की भी जमात है
वह देखता है सिर्फ़
आकाश में उड़ रहे
सफ़ेद कबूतरों को
मैदान में बेख़ौफ भाग रही गायों को।

सपनों में जीता हुआ आदमी
अपनी हर छोटी-सी जीत को
एवरेस्ट की ऊंचाई मान लेता है
उसकी नीली गहरी आंखों में
डल झीलें तैरा करती हैं
उन झीलों में
कई-कई नाव हुआ करते हैं
उन नावों में
सुंदर जोड़े अक्सर घूमते होते हैं
उन जोड़ों में
सपनों में जीते हुए आदमी की
धड़कन धड़कती होती है।

लेकिन जब
सपनों की दुनिया की मौत होती है
आदमी तिलमिला जाता है
नहीं सूझता है उसे कुछ भी
ख़ुद से अपरिचित हो जाता है
अपनी सारी दुनिया से
ख़ुद को काट लेता है
सपनों की दुनिया की मौत होती है जब
आदमी तिलमिला जाता है।