जिरह पढ़ें, आप अपनी लिपि में (Read JIRAH in your own script)

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Wednesday, May 7, 2008

बेटा करे डिनर, पिता खाए 'बन'

आज मेरा 38वां जन्मदिन है। संयोग से मेरे वीकली ऑफ का दिन भी। बच्चों की जिद थी कि डिनर के लिए होटल चलें। उनकी जिद पूरी कर दी। उन्होंने खूब चाव से खाना खाया। यह देखकर मुझे भी संतोष हुआ। पर साथ ही मेरे जेहन में यह बात भी कौंध रही थी कि मेरे पिता आज घर पर बिल्कुल अकेले हैं। चौबीस घंटे घर में रहनेवाली मेड सरहूल का पर्व मनाने गांव गई है। दो-चार दिन में लौटना है। उसकी अनुपस्थिति में पापा ने आज सुबह दूध-चूड़े पर गुजारा किया। दोपहर में कुछ भी नहीं खाया और डिनर के लिए दुकान से बन (एक तरह की पावरोटी) मंगवा ली है। मैं अपने बच्चों के साथ होटल में चिकन और बटरनान खा कर लौटा हूं। और मेरे पिता अपने बच्चों से दूर ब्रेड खाकर काम चला रहे हैं।

यह अयाचित स्थिति क्यों बन जाती है जिंदगी में। आज मनःस्थिति ऐसी नहीं कि इस पर चर्चा कर सकूं। पर किसी पोस्ट में यह चर्चा होनी है कि रोजगार की वजह से हो रहा विस्थापन भी दर्द के नए प्रदेश में हमें ले जाता है।

7 comments:

अनामदास said...

जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ, बात बहुत कचोटने वाली है, इस दर्द से मैं भी अक्सर गुज़रता हूँ. ये अतीत, वर्तमान और भविष्य को एक साथ जीने का संघर्ष है..अत्यंत करुण, बेहद कठिन, बहुत कड़वा और बिल्कुल सच्चा भाव है आपके छोटे से पोस्ट में.

अनूप शुक्ल said...

जन्मदिन की बधाई!

Udan Tashtari said...

अनुराग भाई

आपने तो इतने शुभदिन, जबकि आपका जन्म दिन है और मैं बधाई दे रहा हूँ, मुझे रुला दिया.

कितने ही घर यही हाल है. हमारे पिता जी भी जबलपुर में अकेले हैं और सेवक १० दिन की छुट्टी के बाद कल ही लौटा है.

क्या करें, यही तो जिन्दगी है-आज उनकी, कल हमारी भी बारी आयेगी.

मैं आपकी मनःस्थिति अच्छी तरह समझ सकता हूँ.आपके साथ हूँ.

Beji said...

अरे जन्मदिन आते ही आप तो बड़े बूढ़ों की तरह बात करने लगे....जन्मदिन मुबारक....पोस्ट की जगह या साथ पिताजी को भी एक अच्छा सा खत पोस्ट कर देते...उन्हे भी लगता बेटे ने दिल में स्थापित करके रखा है।
वैसे विस्थापन की पोस्ट का इंतज़ार है....आपके साथ मिल कर सोच लेंगे कि इस समस्या का क्या करें....
शुभकामनायें....इस साल और आगे आप अपने मूल्यों के हिसाब से जिंदगी जी सकें....।

PD said...

कभी बात पलट भी जाती है.. अक्सर किसी ख़ास मौके पर मैं आधा पेट खा कर सोता हूँ और घर में सभी पार्टी मना कर आते रहते हैं.. फिर जब फोन पर पूछते हैं की क्या खाए तो झूठ बोल देता हूँ.. पहले झूठ पकरा जाता था, अब तो उसमे भी उस्ताद हो गया हूँ..
क्या कहियेगा इसी का नाम जिंदगी है..
जन्मदिन की शुभकामनाएं..

अभिषेक ओझा said...

जन्मदिन की बधाई!

रश्मि said...

तुमने पापा के लिए उस दिन सोचा मैं तो आज जिक्र भी कर रही थी पापा के अकेलेपन की बिना तुम्हारा पोस्ट पढे\ वाकई अकेले हो गए हैं वो