जिरह पढ़ें, आप अपनी लिपि में (Read JIRAH in your own script)

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जिरह करने की कोई उम्र नहीं होती। पर यह सच है कि जिरह करने से पैदा हुई बातों की उम्र बेहद लंबी होती है। इसलिए इस ब्लॉग पर आपका स्वागत है। आइए,शुरू करें जिरह।
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Monday, April 21, 2008

उनके इंतजार में

उनके इंतजार में जाने कब से खड़ा हूं उसी मोड़ पर
अब है उन्हें ही रंज, जो गये थे खुद मुझे छोड़ कर

सही वक्त नहीं यह किसी से शिकवा-शिकायत का
देख, मातम मना रहे हैं लोग, अब रिश्ते तोड़ कर

गर तू चाहता है जीतना अब भी, हारी हुई यह जंग
फिर छोड़ दे ये रोना-धोना, अब दुश्मनों से होड़ कर

बहुत मुश्किल नहीं है मेरे भाई, झुकेंगे ये कसाई
तू शुरू तो कर अपनी चाल, सारी शक्ति जोड़ कर

6 comments:

अल्पना वर्मा said...

बहुत खूब !

DR.ANURAG ARYA said...

pahla sher bahut umda hai...

Dr.Bhawna said...

अच्छी रचना है बहुत-बहुत बधाई

Udan Tashtari said...

बढ़िया है, बधाई.

Dr. Chandra Kumar Jain said...

जिस मोड़ पर बिछुड़े थे उस मोड़ पर मिलेंगे
चलकर जहाँ पहुँचे थे अब दौड़कर मिलेंगे
जिस ग़म से हुईं अपनी दुनिया में अलग राहें
उस ग़म के गिले-शिकवे अब छोड़कर मिलेगे.
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अभिव्यक्ति आपकी
हृदय स्पर्शी है .
डा.चंद्रकुमार जैन.

lalit said...

बहुत उम्दा