उनके इंतजार में जाने कब से खड़ा हूं उसी मोड़ पर
अब है उन्हें ही रंज, जो गये थे खुद मुझे छोड़ कर
सही वक्त नहीं यह किसी से शिकवा-शिकायत का
देख, मातम मना रहे हैं लोग, अब रिश्ते तोड़ कर
गर तू चाहता है जीतना अब भी, हारी हुई यह जंग
फिर छोड़ दे ये रोना-धोना, अब दुश्मनों से होड़ कर
बहुत मुश्किल नहीं है मेरे भाई, झुकेंगे ये कसाई
तू शुरू तो कर अपनी चाल, सारी शक्ति जोड़ कर
Monday, April 21, 2008
उनके इंतजार में
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
at
11:20 AM
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6 comments:
बहुत खूब !
pahla sher bahut umda hai...
अच्छी रचना है बहुत-बहुत बधाई
बढ़िया है, बधाई.
जिस मोड़ पर बिछुड़े थे उस मोड़ पर मिलेंगे
चलकर जहाँ पहुँचे थे अब दौड़कर मिलेंगे
जिस ग़म से हुईं अपनी दुनिया में अलग राहें
उस ग़म के गिले-शिकवे अब छोड़कर मिलेगे.
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अभिव्यक्ति आपकी
हृदय स्पर्शी है .
डा.चंद्रकुमार जैन.
बहुत उम्दा
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