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Wednesday, April 16, 2008

यौन पवित्रता : जड़ता टूटनी चाहिए (एक)

बलात्कार की वारदात मुंबई की लोकल ट्रेन में हो या मरीन ड्राइव की किसी पुलिस चौकी पर, दिल्ली की सड़कों पर रात में दौड़ती कार में हो या फिर किसी छोटे से शहर के किसी हिस्से में; वह जब भी सुर्खियों में आती है, सबके भीतर डर छोड़ जाती है। ऐसी खबरों के बाद यह समाज पुलिस की निष्क्रियता पर मर्सिया गाता है और सुरक्षा व्यवस्था को जम कर कोसता है। इसके साथ ही वह ऐसी वारदातों के होने की वजह तलाशता है। अक्सर सन्नाटा, परिचित, रिश्तेदार या फिर बदले की (दुः) भावना वजह बनते हैं। अकेली क्यों गई थी, किसी को साथ क्यों नहीं ले गई... पता नहीं कितने सवाल नाचते रहते हैं, पर कोई सही जवाब नहीं मिल पाता। और आखिरकार हम वहीं के वहीं खड़े रह जाते हैं। अपनी दुनिया में मस्त। दरअसल, ये सवाल और ये चिंताएं महज तात्कालिक हैं, जो उभरते-डूबते रहते हैं। बलात्कार से जुड़ी असल समस्या इससे कहीं ज़्यादा गहरी है।

जनता की सुरक्षा या पुलिस की सक्रियता पर चिंता इस लेख का विषय नहीं। चिंता की बात यह है कि बलात्कार की हर वारदात को हमारा समाज पीड़िता की इज्जत से जोड़ कर क्यों देखता है? दुखद पहलू यह कि पढ़ा-लिखा तबका भी इसे 'इज्जत की लूट' का नाम देता है। यह विचारने की ज़रूरत है कि क्या ऐसी वारदात से पीड़िता की इज्जत वाकई तार-तार हो जाती है? यहां पर यह सवाल सिर उठाने लगता है कि यह 'इज्जत' क्या है? क्या पुरुष और महिलाओं की इज्जत के मापदंड अलग-अलग होते हैं? लूटनेवाला तो वहशी होता है, दरिंदा होता है। अगर वह दरिंदा 'होमो' हुआ तो जाहिर तौर पर उसकी दरिंदगी का शिकार पुरुष होगा। क्या उस स्थिति में भी हम कहेंगे कि फलां पुरुष की इज्जत लूट ली गई? पुरुष वर्चस्व वाला यह समाज कतई ऐसा नहीं कहेगा। बल्कि वह इस दरिंदगी को 'अप्राकृतिक यौनाचार' का नाम देगा।

इस समाज में मर्दों को परंपराओं से यह सीख मिलती रही है कि हर स्त्री पर किसी न किसी मर्द का अधिकार है। यह अलग बात है कि इस मर्द के चेहरे वक़्त के साथ बदलते जाते हैं। यानी शादी से पहले स्त्री पिता के अधिकार क्षेत्र में होती है और शादी के बाद यह सत्ता हस्तांतरित कर दी जाती है स्त्री के पति के नाम। इस सत्ता के मद में चूर भारतीय मर्द बलात्कार को इज्जत से जोड़ कर इसलिए भी देखता है कि उसे लगता है बलात्कार की घटना (वारदात नहीं) उसके अधिकार क्षेत्र में किसी दूसरे पुरुष द्वारा किया गया हमला है। यानी स्त्री की मानसिक पीड़ा को नज़रअंदाज कर मर्द इस वारदात को अपनी प्रतिष्ठा पर किया गया हमला मानता है। उसे इस वारदात से अपनी पराजय का बोध होता है।

ज़्यादा दूर जाने की ज़रूरत नहीं। हाल के वर्षों में हुए सांप्रदायिक दंगों को याद करें। महिलाओं के साथ हुई दुराचार की वारदातें ताज़ा हो जाएंगी। आख़िर दंगाइयों के निशाने पर महिलाएं क्यों आईं? इसीलिए कि दंगाई मर्दों की निगाह में किसी ख़ास कौम को पराजयबोध कराने का सबसे सरल तरीका यही दिखा।


दूसरी तरफ, इस समाज में स्त्री भी अपने आप को किसी और की थाती मानकर बढ़ने देती है। घर में ही उसे शोषण सहने की सीख दी जाती है। उसे स्त्रीयोचित तमाम गुण सिखाये जाते हैं। उसे बताया जाता है कि तेज़ दौड़ना, खिलखिलाकर हंसना या फिर पलटकर सवाल करना स्त्रीयोचित नहीं होता। यानी, हर क़दम पर एक नये स्त्रीयोचित गुण से उसके व्यक्तित्व को निखारा जाता है। इन सारी नसीहतों को घुट्टी की तरह पीकर वह संकोच, दब्बूपन और कायरता के सांचे में ढलती हुई जीती-जागती मूर्ति बनती है। हमारा मर्दवादी समाज अपनी गढ़ी हुई इस मूर्ति पर सीना तानकर कहता है, देखो, उसमें लज्जा है, शील है, सहनशीलता है।

2 comments:

Mired Mirage said...

यह जानकर अच्छा लगा कि आप इस प्रकार सोचते हैं । बलात्कार एक अपराध है जिसमें शिकार को मानसिक व शारीरिक पीड़ा से गुजरना पड़ता है । इसे इज्जत से जोड़कर पीड़ा को और बढ़ाना गलत है । इज्जत की बात करने से हम बलात्कारी को और भी अधिक शक्तिशाली बनाते हैं ।
घुघूती बासूती

Seet Mishra said...

वाकई बेहतरीन सोच है... काश कि सभी पुरुष आपकी तरह सोच पाते। स्त्रियों को आश्रित बनाए रखने के लिए पुरुषों ने कितने षणयंत्र रचे। और वे अब तक कामयाब भी रहे हैं लेकिन अब और नहीं...