Monday, August 19, 2013
मुट्ठी भर प्यार, हाशिए पर नफरत
Saturday, March 9, 2013
इस बहादुर बेटी पर देश कब ध्यान देगा?
इरोम पर आरोप तय करते हुए जज ने कहा कि मैं आपका सम्मान करता हूं लेकिन देश का कानून आपको अपनी जिंदगी खत्म करने की अनुमति नहीं देता। ध्यान रहे कि इरोम ने बार-बार कहा है कि वह खुदकुशी करना नहीं चाहतीं। उनका प्रदर्शन अहिंसक है और एक आम आदमी की तरह जीवन वह भी जीना चाहती हैं। मुमकिन है कि जब आईपीसी की धारा 309 को स्वीकार किया गया होगा, दूर-दूर तक यह अंदेशा न रहा होगा कि कभी इसका इस्तेमाल शांतिपूर्वक जीवन जीने की लोकतांत्रिक मांग के खिलाफ भी करना पड़ सकता है। अपने ऊपर लगे आत्महत्या के इल्जाम से इनकार करते हुए और आरोप तय होने की प्रक्रिया के बीच इरोम ने यह भी भरोसा जताया कि सरकार उन्हें सुनेगी और एएफएसपीए हटाने की मांग मानेगी। इस पर अदालत ने कहा कि यह राजनीतिक प्रक्रिया है। पर सवाल उठता है कि यह कैसी राजनीतिक प्रक्रिया है जिसमें इरोम की बातों के लिए कोई जगह नहीं है?
दरअसल राजनीतिक नेतृत्व को वही मसले परेशान करते हैं जो सीधे-सीधे उसके हितों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। यही वजह है कि जब अन्ना का अनशन शुरू होता है, तो सरकार बौखला जाती है। उसके मंत्री अपने-अपने मोर्चे पर जुट जाते हैं। यही हाल फिलहाल विपक्ष में बैठे लोगों का है जो केजरीवाल के पोल खोल का जवाब तोड़-फोड़ वाले अंदाज में देने लग जाते हैं। पर अपनी मांग पर दृढ़ता से अड़ी इरोम शर्मिला का 12 वर्षों से चला आ रहा अनशन इस पक्ष और विपक्ष को बेवजह और बेतुका लगता है जिस पर वे अपनी राय जताना भी जरूरी नहीं समझते।
ठीक इसके उलट हमारे सिस्टम को इरोम नजर नहीं आती। इरोम का यह संघर्ष अपने लिए नहीं है बल्कि उनके इलाके के लोगों के लिए है जो बार-बार एएफएसपीए का शिकार हो रहे हैं। इरोम ने अपनी भूख हड़ताल तब की थी जब 2 नवंबर के दिन मणिपुर की राजधानी इंफाल के मालोम में असम राइफल्स के जवानों के हाथों 10 बेगुनाह लोग मारे गए थे। कहने का अर्थ यह नहीं कि इरोम की मांग पूरी तरह जायज है उसे आंख मूंदकर मान ही लेना चाहिए। लेकिन इस पर बात तो हो। इरोम की दृढ़ इच्छाशक्ति टूटे उससे पहले उसका सम्मान करते हुए सरकार को बातचीत का रास्ता निकालना चाहिए।
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
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11:47 AM
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Wednesday, February 13, 2013
हम ओढ़ते हैं बोझ
Monday, February 11, 2013
बौड़म तर्क का तनाव बड़ा
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अनुराग अन्वेषी
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12:27 PM
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Sunday, December 30, 2012
बदलना होगा मर्दों का नजरिया और पुलिस का चरित्र
बदलना होगा मर्दों का नजरिया और पुलिस का चरित्र
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
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12:52 AM
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Sunday, December 2, 2012
मुट्ठी भर प्यार, हाशिए पर नफरत
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अनुराग अन्वेषी
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12:34 PM
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Friday, August 26, 2011
हजारे जीतें या हारें - चुनौतियां बड़ी हैं
निराशा से उपजी आस्था
इन सवालों के जवाब किसी के पास नहीं हैं, पर अन्ना की अगुवाई में शुरू हुए इस आंदोलन से यह बात जरूर साफ हो गई है कि राजनीतिक पार्टियों से आम आदमी का मोहभंग हुआ है। नेताओं के झूठे वादों से बार-बार आहत हुई उसकी आस्था को संभावनाओं का नया ठौर अन्ना के रूप में दिख रहा है। अन्ना ने जनता से कोई वादा नहीं किया है, पर जनता उनसे बार-बार वादा कर रही है कि अन्ना हम तुम्हारे साथ हैं। आखिर वजह क्या है जो अनिश्चित, अनसुलझे और अनगढ़ रास्ते पर लोग अन्ना के पीछे भागे चले जा रहे हैं? इस आस्था की वजह है हाल के वर्षों में उपजी निराशा।
और कुछ तीखे सवाल
देश के लगभग हर हिस्से से नेताओं के खाने-कमाने के किस्से एक के बाद एक सामने आते गए। करोड़ों-अरबों के घोटाले होते रहे, पर सरकार कभी दलील देती रही, कभी जांच करवाती रही। सत्तापक्ष हो या विपक्ष, सभी मौके की आंच पर मतलब की रोटी सेंकते रहे लेकिन घोटालों के खिलाफ ठोस नतीजे सिफर रहे। ऐसे नाजुक समय में जब लोगों ने देखा कि 74 बरस का एक बूढ़ा खुद को भूखा रख कर नतीजे पाने के रास्ते गढ़ने की कोशिश कर रहा है, तो खाने-पकाने वालों के खिलाफ देश की
जनता दौड़ पड़ी।
यह जनता जिस रोमांच और उत्साह के साथ दौड़ी है, उसके पीछे किसी अन्ना की ताकत नहीं बल्कि छलावे से मुक्त होने की चाहत और छटपटाहट है। ऐसे में यह आंदोलन अगर औंधे मुंह गिरा तो? इससे भी तीखा सवाल यह है कि आंदोलन अगर कामयाब हुआ और जनता ने जितनी उम्मीदें इससे बांध रखी हैं, वे पूरी होती नहीं दिखीं तो क्या होगा? इन दोनों स्थितियों से दूर रहने के लिए टीम अन्ना को कई काम करने होंगे। पहला यह कि उन्हें लोकपाल विधेयक की जगह जन लोकपाल विधेयक को लागू करवाने के एकसूत्री आंदोलन को बहूसूत्री बनाना होगा। दूसरा यह कि जनता के सामने यह बात बार-बार रखनी होगी कि इस जन लोकपाल विधेयक के लागू हो जाने मात्र से रामराज आने वाला नहीं, यह तो सुधार की दिशा में एक छोटा सा कदम भर होगा। असल सुधार तब होगा जब हम सवालों से घिरे संसदीय लोकतंत्र को स्वच्छ रूप दे सकें, चुनावी राजनीति में पसरे भ्रष्टाचार को दूर कर सकें।
यह आंदोलन वैसा ही है जैसा 74 का जेपी मूवमेंट था, यह समझने की चूक हमें नहीं करनी चाहिए। जेपी की संपूर्ण क्रांति सीधे-सीधे सत्ता परिवर्तन की मांग पर टिकी थी। कहा जा सकता है कि उसका ध्येय वही था, जबकि अन्ना का आंदोलन भ्रष्टाचार को खत्म करने की बात कर रहा है। गौर करें कि भ्रष्टाचार का मुद्दा अकेले कानून की जिम्मेदारी नहीं है। न ही जन लोकपाल विधेयक जैसे किसी बिल के लागू होने मात्र से यह खत्म हो जाएगा। बल्कि इसके लिए लंबे संघर्ष की जरूरत है। हर आदमी अगर खुद के भीतर बैठे भ्रष्टाचार को खत्म करे, तभी यह खत्म हो सकता है।
अन्ना के इस आंदोलन को एक ऐसी चुनौती का भी सामना करना है जो जेपी मूवमेंट के वक्त नहीं थी। उस वक्त भी समाज में जातीयता थी, पर यह अलग-अलग पॉलिटिकल पार्टियों के रूप में नहीं बंटी हीं थी। आज के समाज में अस्मिता की लड़ाई इतनी तेज है और अपनी अलग पहचान की चाहत इतनी बुलंद है कि समाज के हर वर्ग के पास अपनी पार्टी है। हर जगह ये पार्टियां अपनी हिस्सेदारी अपनी अलग पहचान के साथ चाहती हैं। यह बात टीम अन्ना को ध्यान में रखनी होगी ताकि उनके संघर्ष में हर वर्ग शामिल हो सके।
जेपी मूवमेंट के सबक
74 के जेपी मूवमेंट के नतीजे भी टीम अन्ना के जेहन में होने चाहिए। 77 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी थी। जेपी के सुधारवादी आंदोलन का सबसे बड़ा लाभ भारत की कई प्रमुख पार्टियों का विलय कर बनी जनता पार्टी को मिला था, पर आंतरिक मतभेदों के कारण यह पार्टी 1979 में बंट गई। क्या 2014 के चुनाव में 77 दोहराया जाएगा? ऐसा कुछ हो जाए तो बहुत आश्चर्य नहीं। पर इसके लिए जनता किसी ऐसे नेतृत्व को तलाशना चाहेगी जो सच्चा और स्वच्छ हो, जिसकी अगुवाई कोई भरोसे लायक शख्स करे, जिसमें दागदार चेहरों के शामिल होने का डर न हो। टीम अन्ना जनता की इस तलाश पर खरा उतरना चाहेगी या नहीं, यह वक्त बताएगा।
क्षण भर को यह सोचें कि सरकार जन लोकपाल विधेयक को स्वीकार कर लेती है, तो फिर टीम अन्ना किस मुद्दे पर आंदोलन करेगी? क्या इसके बाद वह फिर कोई और नई डिमांड लेकर सामने आएगी? यहां मकसद सिर्फ यह ध्यान दिलाने का है कि टीम अन्ना को इस आंदोलन को जारी रखने के लिए इसे बहुसूत्री बनाना ही होगा। सवाल यह नहीं कि अन्ना और उनके साथ आंदोलन कर रहे लोगों के साथ कितनी बड़ी भीड़ आ जुड़ी है। सवाल यह भी नहीं कि किसी सिस्टम, किसी सरकार या उसके द्वारा कायम व्यवस्था को आप किस तरह से ध्वस्त कर देते हैं। सवाल यह है कि उस ध्वस्त व्यवस्था के मलबे पर आप कोई नई व्यवस्था खड़ी कर पाएंगे कि नहीं। जेपी की बात तो छोड़ दीजिए, गांदी भी देश को आजाद कराने के बाद सत्ता की बंदरबांट देख कर खुश नहीं हो पाए।
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
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9:29 AM
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Labels: अन्ना, अन्ना हजारे, आंदोलन, जनलोकपाल, बाबा, लोकपाल, विधेयक, हजारे
Thursday, September 30, 2010
जलेबी और चाकू
और उसे गप कर जाने से पहले
उसकी खुशबू और उसके रस का पूरा आनंद लेने के बीच
क्या आपने ध्यान दिया है
कि हमारी भाषा
कैसे-कैसे बेख़बर अत्याचार करती है?
अगर किसी को आप जलेबी जैसा सीधा कहते हैं
तो ये उसके टेढ़ेपन पर व्यंग्य भरी टिप्पणी होती है
जबकि सच्चाई यह है
कि अपने रूपाकार को छोड़कर - जिसमें उसका
अपना कोई हाथ नहीं है - वह वाकई सीधी होती है।
पहले रस को अपने भीतर घुलने देती है
और फिर बड़ी आसानी से
मुंह के भीतर घुल जाती है
जो थोड़ा बहुत कुरमुरापन रहता है, वह उसका जायका ही बढ़ाता है।
कभी चाव से जलेबी खाते हुए
और कभी दिल्लगी में दूसरों से अपने जलेबी जैसा सीधा होने की तोहमत सुनते हुए
अक्सर मुझे लगता है
कि वह भाषा भी कितनी सतही होती है
जो बाहरी रूप देखकर
किसी के सीधे या टेढे होने का ऐसा नतीजा तय कर देती है जो घिस-घिस कर मुहावरे में बदल जाता है।
लेकिन यह नादानी है या सयानापन है?
कि लोग जलेबी को टेढा बताते हैं।
यह जानते हुए कि वह कुछ बिगाड़ नहीं सकती
आम तौर पर बाकी पकवानों की तरह हाजमा भी ख़राब नहीं कर सकती।
अगर सिर्फ आकार-प्रकार से तय होना हो
कौन सीधा है, कौन टेढ़ा
तो सीधा-सपाट चाकू कहीं ज्यादा मासूम लगेगा जो
सीधे बदन में धंस सकता है
और जलेबी बेचारी टेढ़ी लगेगी
जो टूट-टूट कर हमारे मुंह में घुलती रहती है।
लेकिन जलेबी और चाकू का यह संयोग
सिर्फ सीधे-टेढ़े के फर्क को बताने के लिए नहीं चुना है
यह याद दिलाने के लिए भी रखा है कि
जलेबी मुंह में ही घुलेगी, चाकू से नहीं कटेगी
और गर चाकू से जलेबी काटना चाहें
तो फिर किसी और को काटने के पहले
चाकू को चाटने की इच्छा पैदा होगी।
यानी चाकू जलेबी को नहीं बदल सकता
जलेबी चाकू को बदल सकती है
हालांकि यह बेतरतीब लगने वाला तर्क
इस तथ्य की उपेक्षा के लिए नहीं बना है
कि जलेबी हो या चाकू - दोनों का अपना एक चरित्र है
जिसे हमें पहचानना चाहिए
और कोशिश करनी चाहिए
कि हमारा रिश्ता चाकू से कम, जलेबी से ज्यादा बने।
लेकिन कमबख्त यह जो भाषा है
और यह जो दुनिया है
वह जलेबी को टेढ़ेपन के साथ देखती है, उसका मजाक बनाती है
और
सीधे सपाट चाकू के आगे कुछ सहम जाती है।
(जी चाहता है यह झूठ सबसे कहूं कि यह कविता मैंने लिखी है। भले लोगों को पता हो कि यह प्रियदर्शन की कविता है और उसके भरोसा ब्लॉग से चुराई गई है।)
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
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11:31 AM
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Sunday, April 11, 2010
आइए, छलें खुद को
मोह जब हो भंग, तो आदमी खुद को ठगा सा महसूस करता है। उसे लगता है कि वह अब तक खुद को छल रहा था। वैसे खुद को छलने वाले लोग भी होते हैं, आत्ममुग्ध, आत्मरति के शिकार। पर जब वाकई दूसरों के हाथों छले जाएं, तो उनकी पीड़ा मुखर हो जाती है। पीड़ा के ऐसे क्षणों में आखिर आदमी क्या करे, कहां जाए, किससे कहे...। जाहिर है कहीं जाने की जरूरत नहीं। आइए एक गीत सुनें...
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
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5:39 PM
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Wednesday, March 24, 2010
पत्नी की गैरमौजूदगी और मेरा ओछापन
मैंने खूब चैन से गुजारे। लगा कि 17 मार्च की खुशियां बरकरार हैं। अगर स्वर्ग होता होगा तो शायद उसका सुख यही है। पर तीसरे दिन से ही मेरा भ्रम टूटने लगा। मुझे मेरा घर अचानक पराया लगने लगा। दफ्तर से लौटता तो यहां का सूनापन मुझे काटने को दौड़ता। डर कर मैं अपने कमरे में मैं सिकुड़ जाता। समझ नहीं पा रहा था कि यह प्यारा सा घर मुझे मकान की तरह क्यों लगने लगा? मेरा स्वर्ग अचानक नर्क में कैसे तब्दील हो गया?जो लोग पत्रकारिता के पेशे में हैं उनके घर लौटने का वक्त बेहद अटपटा होता है। मेरा भी है। देर रात लौटता था, अनिता और बच्चे तब तक सो चुके होते थे। मैं बस चुपचाप उनके कमरे में झांक आता। उन्हें सोया देख (कभी कभार जगा पाकर) बेहद सुकून मिलता। इस सुकून का अहसास तब कभी नहीं हुआ या कहें कि मेरी कमजोर संवेदनाओं ने उन्हें कभी महसूस नहीं किया। इस दफे उनकी अनुपस्थिति में वह अंतर मुझे पता चला। रात घर लौटने के बाद जब मुझे उनका कमरा खाली दिखता तो वह खालीपन मेरे भीतर भी बजने लगता। वाकई मैं बेचैन हो जाता। घर में उन तीनों का न होना मुझे बेहद खटकने लगा।
अनिता के जाने के बाद शुरू की दो रातें मैंने या तो टीवी देखते हुए बिताईं या कुछ पढ़ते हुए। अगली सुबह मैं काफी देर से जगा। देर से जगने का कोई अफसोस नहीं था क्योंकि मैं तो अपनी आजादी में डूबा था। पर धीरे-धीरे मुझे बात समझ में आई कि जिसे मैं आजादी समझ रहा था वह वाकई मेरे सिस्टम का डैमेज हो जाना था। ठीक वैसे ही जैसे जब शरीर का कोई महत्वपूर्ण हिस्सा साथ छोड़ने लगता है तो आपका शरीर आपके वश में नहीं होता। वह तेजी से काम करता है, पर कब कौन सा काम वह करे इस पर न तो आपका वश चलता है न ही आपको अहसास होता है कि वह आपके मुताबिक नहीं चल रहा।
घर में पत्नी और बच्चों के होने से कितना फर्क पड़ जाता है माहौल में। कभी आप बच्चों से खेलते हैं, कभी समझाते हैं और कभी उन्हें डांटते भी हैं। ठीक उसी तरह पत्नी से तमाम तरह की बातें आप शेयर करते हैं - कभी दफ्तर का तनाव, तो कभी किसी सब्जेक्ट पर विचार-विमर्श। और इन स्थितियों के बाद आपका मुकम्मल चरित्र बन कर उभरता है। आप अपने व्यक्तित्व के अधूरेपन को पत्नी और बच्चों के साथ होकर ही पूरा कर पाते हैं।
अभी ध्यान जा रहा है कि इतने वर्षों से मैंने तो अनिता से खुद को शेयर किया। अक्सर अपनी बातें उनसे कीं। पर क्या कभी अनिता की बातें मैंने सुनीं? पत्रकारिता या समाज को लेकर जो सवाल मुझे मथते हैं, क्या वह अनिता को नहीं मथते होंगे? मैं कैसे भूल गया कि उसके भीतर भी पत्रकार बनने की ख्वाहिश थी। इकोनॉमिक्स में एमए और बैचलर ऑफ जर्नलिजम कर लेने के बाद उसे भी अपने करियर की चिंता थी। पर शादी के बाद उसने पूरी दृढ़ता से कहा था कि मैं घर संभालूंगी। आखिर उसने अपने करियर को तिलांजलि दी तो किसके लिए? जाहिर है इस परिवार के लिए। मुझे मुखिया की तरह स्वीकार किया - क्या यह उसकी कमजोरी थी? आज मेरा मानना है कि यह उसकी दृढ़ता थी। दृढ़ता इस अर्थ में कि जो हल्के होते हैं वही उड़ते हैं, जो अपनी धुन के पक्के होते हैं उन्हें अपने फैसलों पर टिके रहना आता है।
और ऐसी नायाब साथी से मैंने कभी जानने की कोशिश नहीं की उसके भीतर की हलचल। उफ्, यह मेरा कौन सा ओछा रूप है? मेरा यह रूप मुझ से छुपा कैसे रहा? मेरे इस ओछेपन को अनिता कितने सहज भाव से स्वीकार करती रही। मैं समय-समय पर उसपर गरजता रहा और वह लगातार त्याग और समर्पण के साथ मुझ पर बरसती रही। क्या त्याग करना सिर्फ औरतों के हिस्से है? यह काम मर्द प्रकृति में क्यों नहीं?
मेरी छोटी-छोटी जरूरतों का ध्यान अनिता कुछ वैसे ही रखती रही है जैसे अपने बच्चों का। इन सात दिनों ने मुझे जीवन के कई पहलुओं से रू-ब-रू कराया है। मेरे ही छुपे हुए कई रूपों को मेरे सामने रखा है। अनिता के बारे में सोचने की नई दृष्टि दी है। मेरे भीतर बसे बेशर्म मर्द को शर्मिंदा किया है। अब तो बस इंतजार है कि अनिता लौटे तो उसे बताऊं कि मैं तुम्हारा पति नहीं बल्कि तुम्हारा साथी हूं। ऐसा साथी जो सिर्फ 'मैं' की भाषा नहीं बोलेगा, वह 'हम' की भाषा बोलेगा। हां अनिता, यह घर मेरा नहीं, हमारा है। हमारा यह घर तुम्हारा बेसब्री से इंतजार कर रहा है। रियली आई लव यू।
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
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8:07 AM
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Thursday, March 18, 2010
खुशियां हैं बरकरार
सुबह 5 बजे सोने गया और अब 10:30 बजे सो कर उठा हूं। कोई शोरगुल नहीं। खूब गहरी नींद आई। सोकर उठा तो मोबाइल में 18 मिस्ड कॉल दिखी। चार बार मेमसाब (मेरी श्रीमती जी) ने फोन किया था। बाकि 14 साथी-संगतियों की कॉल थी। सोचा था इन सात दिनों में पुराने बचे कई काम निबटा लूंगा। कुछ लेख लिखने थे, जिनके तगादे काफी तेज हो गए हैं। बातें जेहन में हैं पर मन आसमां में उड़ रहा है। कैसे लिखूं? लिखने की इच्छा नहीं हो रही। बस इन दिनों वही कर रहा हूं जो इच्छा होती है। लेख लिखने की इच्छा नहीं है तो लिखूंगा भी नहीं। बाकी दिनों में तो यह सोच कर कर लिया करता था कि चलो करियर के रास्ते में कहीं ये चीजें सपोर्टिव होती हैं। पर इन दिनों जब सोचता हूं करियर की बात तो मन से फूटती है आवाज - यार काहे को लफड़ा मोल ले रहा है। चल मस्ती कर। बस फिर क्या? हंसी-ठिठोली। कभी टीवी पर खबरें देख लीं तो कभी चैनल बदल-बदल कर फिल्में। ज्यादा इच्छा हुई तो मनपसंद सीडी निकाली, गाने सुन लिए या फिल्म देख ली।
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
at
10:35 AM
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Wednesday, March 17, 2010
आजादी की पहली सुबह
पिछले कई दिनों से इस सत्रह मार्च का मैं बेसब्री से इंतजार कर रहा था। रोज जीटॉक के स्टेटस मेसेज में इस दिन के इंतजार में मेसेज बदल रहा था। संगी-साथी पूछ रहे थे कि क्या मामला है। मैं क्या बताता उन्हें। डरा मैं भी था कि श्रीमती जी ने कहीं टिकट कैंसल करा दिया तो? बहरहाल, श्रीमती जी सोलह मार्च की शाम मायके गईं। चैन के सात दिन गुजारूंगा। जब से दिल्ली आया। घर में अकेला रहने को तरस गया। इस बार जब से टिकट कटा, दिन काटने मुश्किल हो गए थे। सत्रह तारीख का बेसब्री से इंतजार करता रहा। सोलह की शाम उन्हें ट्रेन में बैठा, दफ्तर आया। वीकली ऑफ होने के बावजूद किसी और दिन दफ्तर आना थकान पैदा कर देता था। पर सोलह को ऐसा कुछ नहीं हुआ। बिल्कुल तरोताजा रहा। घर आया और देर तक इस खुशी को महसूस करता रहा। इन सात दिनों में कोशिश होगी कि अपने इन खूबसूरत दिनों का ब्यौरा यहां पेश करता रहूं। फिलहाल तो ब्लॉगिंग की भी इच्छा नहीं हो रही है। यह तो पहले भी करता रहा। इसके लिए कोई रोक-टोक नहीं थी। हां चलता हूं टीवी देखूंगा। आज मुझे कौन रोकेगा भला। :-)
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
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1:46 AM
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