Wednesday, February 13, 2013
हम ओढ़ते हैं बोझ
Monday, February 11, 2013
बौड़म तर्क का तनाव बड़ा
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अनुराग अन्वेषी
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12:27 PM
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Labels: अदालत, कोर्ट, दामिनी, दिल्ली गैंगरेप, निर्भया, व्यंग्य
Sunday, December 30, 2012
बदलना होगा मर्दों का नजरिया और पुलिस का चरित्र
बदलना होगा मर्दों का नजरिया और पुलिस का चरित्र
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
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12:52 AM
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Sunday, December 2, 2012
मुट्ठी भर प्यार, हाशिए पर नफरत
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
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12:34 PM
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Friday, August 26, 2011
हजारे जीतें या हारें - चुनौतियां बड़ी हैं
निराशा से उपजी आस्था
इन सवालों के जवाब किसी के पास नहीं हैं, पर अन्ना की अगुवाई में शुरू हुए इस आंदोलन से यह बात जरूर साफ हो गई है कि राजनीतिक पार्टियों से आम आदमी का मोहभंग हुआ है। नेताओं के झूठे वादों से बार-बार आहत हुई उसकी आस्था को संभावनाओं का नया ठौर अन्ना के रूप में दिख रहा है। अन्ना ने जनता से कोई वादा नहीं किया है, पर जनता उनसे बार-बार वादा कर रही है कि अन्ना हम तुम्हारे साथ हैं। आखिर वजह क्या है जो अनिश्चित, अनसुलझे और अनगढ़ रास्ते पर लोग अन्ना के पीछे भागे चले जा रहे हैं? इस आस्था की वजह है हाल के वर्षों में उपजी निराशा।
और कुछ तीखे सवाल
देश के लगभग हर हिस्से से नेताओं के खाने-कमाने के किस्से एक के बाद एक सामने आते गए। करोड़ों-अरबों के घोटाले होते रहे, पर सरकार कभी दलील देती रही, कभी जांच करवाती रही। सत्तापक्ष हो या विपक्ष, सभी मौके की आंच पर मतलब की रोटी सेंकते रहे लेकिन घोटालों के खिलाफ ठोस नतीजे सिफर रहे। ऐसे नाजुक समय में जब लोगों ने देखा कि 74 बरस का एक बूढ़ा खुद को भूखा रख कर नतीजे पाने के रास्ते गढ़ने की कोशिश कर रहा है, तो खाने-पकाने वालों के खिलाफ देश की
जनता दौड़ पड़ी।
यह जनता जिस रोमांच और उत्साह के साथ दौड़ी है, उसके पीछे किसी अन्ना की ताकत नहीं बल्कि छलावे से मुक्त होने की चाहत और छटपटाहट है। ऐसे में यह आंदोलन अगर औंधे मुंह गिरा तो? इससे भी तीखा सवाल यह है कि आंदोलन अगर कामयाब हुआ और जनता ने जितनी उम्मीदें इससे बांध रखी हैं, वे पूरी होती नहीं दिखीं तो क्या होगा? इन दोनों स्थितियों से दूर रहने के लिए टीम अन्ना को कई काम करने होंगे। पहला यह कि उन्हें लोकपाल विधेयक की जगह जन लोकपाल विधेयक को लागू करवाने के एकसूत्री आंदोलन को बहूसूत्री बनाना होगा। दूसरा यह कि जनता के सामने यह बात बार-बार रखनी होगी कि इस जन लोकपाल विधेयक के लागू हो जाने मात्र से रामराज आने वाला नहीं, यह तो सुधार की दिशा में एक छोटा सा कदम भर होगा। असल सुधार तब होगा जब हम सवालों से घिरे संसदीय लोकतंत्र को स्वच्छ रूप दे सकें, चुनावी राजनीति में पसरे भ्रष्टाचार को दूर कर सकें।
यह आंदोलन वैसा ही है जैसा 74 का जेपी मूवमेंट था, यह समझने की चूक हमें नहीं करनी चाहिए। जेपी की संपूर्ण क्रांति सीधे-सीधे सत्ता परिवर्तन की मांग पर टिकी थी। कहा जा सकता है कि उसका ध्येय वही था, जबकि अन्ना का आंदोलन भ्रष्टाचार को खत्म करने की बात कर रहा है। गौर करें कि भ्रष्टाचार का मुद्दा अकेले कानून की जिम्मेदारी नहीं है। न ही जन लोकपाल विधेयक जैसे किसी बिल के लागू होने मात्र से यह खत्म हो जाएगा। बल्कि इसके लिए लंबे संघर्ष की जरूरत है। हर आदमी अगर खुद के भीतर बैठे भ्रष्टाचार को खत्म करे, तभी यह खत्म हो सकता है।
अन्ना के इस आंदोलन को एक ऐसी चुनौती का भी सामना करना है जो जेपी मूवमेंट के वक्त नहीं थी। उस वक्त भी समाज में जातीयता थी, पर यह अलग-अलग पॉलिटिकल पार्टियों के रूप में नहीं बंटी हीं थी। आज के समाज में अस्मिता की लड़ाई इतनी तेज है और अपनी अलग पहचान की चाहत इतनी बुलंद है कि समाज के हर वर्ग के पास अपनी पार्टी है। हर जगह ये पार्टियां अपनी हिस्सेदारी अपनी अलग पहचान के साथ चाहती हैं। यह बात टीम अन्ना को ध्यान में रखनी होगी ताकि उनके संघर्ष में हर वर्ग शामिल हो सके।
जेपी मूवमेंट के सबक
74 के जेपी मूवमेंट के नतीजे भी टीम अन्ना के जेहन में होने चाहिए। 77 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी थी। जेपी के सुधारवादी आंदोलन का सबसे बड़ा लाभ भारत की कई प्रमुख पार्टियों का विलय कर बनी जनता पार्टी को मिला था, पर आंतरिक मतभेदों के कारण यह पार्टी 1979 में बंट गई। क्या 2014 के चुनाव में 77 दोहराया जाएगा? ऐसा कुछ हो जाए तो बहुत आश्चर्य नहीं। पर इसके लिए जनता किसी ऐसे नेतृत्व को तलाशना चाहेगी जो सच्चा और स्वच्छ हो, जिसकी अगुवाई कोई भरोसे लायक शख्स करे, जिसमें दागदार चेहरों के शामिल होने का डर न हो। टीम अन्ना जनता की इस तलाश पर खरा उतरना चाहेगी या नहीं, यह वक्त बताएगा।
क्षण भर को यह सोचें कि सरकार जन लोकपाल विधेयक को स्वीकार कर लेती है, तो फिर टीम अन्ना किस मुद्दे पर आंदोलन करेगी? क्या इसके बाद वह फिर कोई और नई डिमांड लेकर सामने आएगी? यहां मकसद सिर्फ यह ध्यान दिलाने का है कि टीम अन्ना को इस आंदोलन को जारी रखने के लिए इसे बहुसूत्री बनाना ही होगा। सवाल यह नहीं कि अन्ना और उनके साथ आंदोलन कर रहे लोगों के साथ कितनी बड़ी भीड़ आ जुड़ी है। सवाल यह भी नहीं कि किसी सिस्टम, किसी सरकार या उसके द्वारा कायम व्यवस्था को आप किस तरह से ध्वस्त कर देते हैं। सवाल यह है कि उस ध्वस्त व्यवस्था के मलबे पर आप कोई नई व्यवस्था खड़ी कर पाएंगे कि नहीं। जेपी की बात तो छोड़ दीजिए, गांदी भी देश को आजाद कराने के बाद सत्ता की बंदरबांट देख कर खुश नहीं हो पाए।
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
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9:29 AM
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Labels: अन्ना, अन्ना हजारे, आंदोलन, जनलोकपाल, बाबा, लोकपाल, विधेयक, हजारे
Thursday, September 30, 2010
जलेबी और चाकू
और उसे गप कर जाने से पहले
उसकी खुशबू और उसके रस का पूरा आनंद लेने के बीच
क्या आपने ध्यान दिया है
कि हमारी भाषा
कैसे-कैसे बेख़बर अत्याचार करती है?
अगर किसी को आप जलेबी जैसा सीधा कहते हैं
तो ये उसके टेढ़ेपन पर व्यंग्य भरी टिप्पणी होती है
जबकि सच्चाई यह है
कि अपने रूपाकार को छोड़कर - जिसमें उसका
अपना कोई हाथ नहीं है - वह वाकई सीधी होती है।
पहले रस को अपने भीतर घुलने देती है
और फिर बड़ी आसानी से
मुंह के भीतर घुल जाती है
जो थोड़ा बहुत कुरमुरापन रहता है, वह उसका जायका ही बढ़ाता है।
कभी चाव से जलेबी खाते हुए
और कभी दिल्लगी में दूसरों से अपने जलेबी जैसा सीधा होने की तोहमत सुनते हुए
अक्सर मुझे लगता है
कि वह भाषा भी कितनी सतही होती है
जो बाहरी रूप देखकर
किसी के सीधे या टेढे होने का ऐसा नतीजा तय कर देती है जो घिस-घिस कर मुहावरे में बदल जाता है।
लेकिन यह नादानी है या सयानापन है?
कि लोग जलेबी को टेढा बताते हैं।
यह जानते हुए कि वह कुछ बिगाड़ नहीं सकती
आम तौर पर बाकी पकवानों की तरह हाजमा भी ख़राब नहीं कर सकती।
अगर सिर्फ आकार-प्रकार से तय होना हो
कौन सीधा है, कौन टेढ़ा
तो सीधा-सपाट चाकू कहीं ज्यादा मासूम लगेगा जो
सीधे बदन में धंस सकता है
और जलेबी बेचारी टेढ़ी लगेगी
जो टूट-टूट कर हमारे मुंह में घुलती रहती है।
लेकिन जलेबी और चाकू का यह संयोग
सिर्फ सीधे-टेढ़े के फर्क को बताने के लिए नहीं चुना है
यह याद दिलाने के लिए भी रखा है कि
जलेबी मुंह में ही घुलेगी, चाकू से नहीं कटेगी
और गर चाकू से जलेबी काटना चाहें
तो फिर किसी और को काटने के पहले
चाकू को चाटने की इच्छा पैदा होगी।
यानी चाकू जलेबी को नहीं बदल सकता
जलेबी चाकू को बदल सकती है
हालांकि यह बेतरतीब लगने वाला तर्क
इस तथ्य की उपेक्षा के लिए नहीं बना है
कि जलेबी हो या चाकू - दोनों का अपना एक चरित्र है
जिसे हमें पहचानना चाहिए
और कोशिश करनी चाहिए
कि हमारा रिश्ता चाकू से कम, जलेबी से ज्यादा बने।
लेकिन कमबख्त यह जो भाषा है
और यह जो दुनिया है
वह जलेबी को टेढ़ेपन के साथ देखती है, उसका मजाक बनाती है
और
सीधे सपाट चाकू के आगे कुछ सहम जाती है।
(जी चाहता है यह झूठ सबसे कहूं कि यह कविता मैंने लिखी है। भले लोगों को पता हो कि यह प्रियदर्शन की कविता है और उसके भरोसा ब्लॉग से चुराई गई है।)
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
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11:31 AM
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Sunday, April 11, 2010
आइए, छलें खुद को
मोह जब हो भंग, तो आदमी खुद को ठगा सा महसूस करता है। उसे लगता है कि वह अब तक खुद को छल रहा था। वैसे खुद को छलने वाले लोग भी होते हैं, आत्ममुग्ध, आत्मरति के शिकार। पर जब वाकई दूसरों के हाथों छले जाएं, तो उनकी पीड़ा मुखर हो जाती है। पीड़ा के ऐसे क्षणों में आखिर आदमी क्या करे, कहां जाए, किससे कहे...। जाहिर है कहीं जाने की जरूरत नहीं। आइए एक गीत सुनें...
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
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5:39 PM
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Wednesday, March 24, 2010
पत्नी की गैरमौजूदगी और मेरा ओछापन
मैंने खूब चैन से गुजारे। लगा कि 17 मार्च की खुशियां बरकरार हैं। अगर स्वर्ग होता होगा तो शायद उसका सुख यही है। पर तीसरे दिन से ही मेरा भ्रम टूटने लगा। मुझे मेरा घर अचानक पराया लगने लगा। दफ्तर से लौटता तो यहां का सूनापन मुझे काटने को दौड़ता। डर कर मैं अपने कमरे में मैं सिकुड़ जाता। समझ नहीं पा रहा था कि यह प्यारा सा घर मुझे मकान की तरह क्यों लगने लगा? मेरा स्वर्ग अचानक नर्क में कैसे तब्दील हो गया?जो लोग पत्रकारिता के पेशे में हैं उनके घर लौटने का वक्त बेहद अटपटा होता है। मेरा भी है। देर रात लौटता था, अनिता और बच्चे तब तक सो चुके होते थे। मैं बस चुपचाप उनके कमरे में झांक आता। उन्हें सोया देख (कभी कभार जगा पाकर) बेहद सुकून मिलता। इस सुकून का अहसास तब कभी नहीं हुआ या कहें कि मेरी कमजोर संवेदनाओं ने उन्हें कभी महसूस नहीं किया। इस दफे उनकी अनुपस्थिति में वह अंतर मुझे पता चला। रात घर लौटने के बाद जब मुझे उनका कमरा खाली दिखता तो वह खालीपन मेरे भीतर भी बजने लगता। वाकई मैं बेचैन हो जाता। घर में उन तीनों का न होना मुझे बेहद खटकने लगा।
अनिता के जाने के बाद शुरू की दो रातें मैंने या तो टीवी देखते हुए बिताईं या कुछ पढ़ते हुए। अगली सुबह मैं काफी देर से जगा। देर से जगने का कोई अफसोस नहीं था क्योंकि मैं तो अपनी आजादी में डूबा था। पर धीरे-धीरे मुझे बात समझ में आई कि जिसे मैं आजादी समझ रहा था वह वाकई मेरे सिस्टम का डैमेज हो जाना था। ठीक वैसे ही जैसे जब शरीर का कोई महत्वपूर्ण हिस्सा साथ छोड़ने लगता है तो आपका शरीर आपके वश में नहीं होता। वह तेजी से काम करता है, पर कब कौन सा काम वह करे इस पर न तो आपका वश चलता है न ही आपको अहसास होता है कि वह आपके मुताबिक नहीं चल रहा।
घर में पत्नी और बच्चों के होने से कितना फर्क पड़ जाता है माहौल में। कभी आप बच्चों से खेलते हैं, कभी समझाते हैं और कभी उन्हें डांटते भी हैं। ठीक उसी तरह पत्नी से तमाम तरह की बातें आप शेयर करते हैं - कभी दफ्तर का तनाव, तो कभी किसी सब्जेक्ट पर विचार-विमर्श। और इन स्थितियों के बाद आपका मुकम्मल चरित्र बन कर उभरता है। आप अपने व्यक्तित्व के अधूरेपन को पत्नी और बच्चों के साथ होकर ही पूरा कर पाते हैं।
अभी ध्यान जा रहा है कि इतने वर्षों से मैंने तो अनिता से खुद को शेयर किया। अक्सर अपनी बातें उनसे कीं। पर क्या कभी अनिता की बातें मैंने सुनीं? पत्रकारिता या समाज को लेकर जो सवाल मुझे मथते हैं, क्या वह अनिता को नहीं मथते होंगे? मैं कैसे भूल गया कि उसके भीतर भी पत्रकार बनने की ख्वाहिश थी। इकोनॉमिक्स में एमए और बैचलर ऑफ जर्नलिजम कर लेने के बाद उसे भी अपने करियर की चिंता थी। पर शादी के बाद उसने पूरी दृढ़ता से कहा था कि मैं घर संभालूंगी। आखिर उसने अपने करियर को तिलांजलि दी तो किसके लिए? जाहिर है इस परिवार के लिए। मुझे मुखिया की तरह स्वीकार किया - क्या यह उसकी कमजोरी थी? आज मेरा मानना है कि यह उसकी दृढ़ता थी। दृढ़ता इस अर्थ में कि जो हल्के होते हैं वही उड़ते हैं, जो अपनी धुन के पक्के होते हैं उन्हें अपने फैसलों पर टिके रहना आता है।
और ऐसी नायाब साथी से मैंने कभी जानने की कोशिश नहीं की उसके भीतर की हलचल। उफ्, यह मेरा कौन सा ओछा रूप है? मेरा यह रूप मुझ से छुपा कैसे रहा? मेरे इस ओछेपन को अनिता कितने सहज भाव से स्वीकार करती रही। मैं समय-समय पर उसपर गरजता रहा और वह लगातार त्याग और समर्पण के साथ मुझ पर बरसती रही। क्या त्याग करना सिर्फ औरतों के हिस्से है? यह काम मर्द प्रकृति में क्यों नहीं?
मेरी छोटी-छोटी जरूरतों का ध्यान अनिता कुछ वैसे ही रखती रही है जैसे अपने बच्चों का। इन सात दिनों ने मुझे जीवन के कई पहलुओं से रू-ब-रू कराया है। मेरे ही छुपे हुए कई रूपों को मेरे सामने रखा है। अनिता के बारे में सोचने की नई दृष्टि दी है। मेरे भीतर बसे बेशर्म मर्द को शर्मिंदा किया है। अब तो बस इंतजार है कि अनिता लौटे तो उसे बताऊं कि मैं तुम्हारा पति नहीं बल्कि तुम्हारा साथी हूं। ऐसा साथी जो सिर्फ 'मैं' की भाषा नहीं बोलेगा, वह 'हम' की भाषा बोलेगा। हां अनिता, यह घर मेरा नहीं, हमारा है। हमारा यह घर तुम्हारा बेसब्री से इंतजार कर रहा है। रियली आई लव यू।
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
at
8:07 AM
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Thursday, March 18, 2010
खुशियां हैं बरकरार
सुबह 5 बजे सोने गया और अब 10:30 बजे सो कर उठा हूं। कोई शोरगुल नहीं। खूब गहरी नींद आई। सोकर उठा तो मोबाइल में 18 मिस्ड कॉल दिखी। चार बार मेमसाब (मेरी श्रीमती जी) ने फोन किया था। बाकि 14 साथी-संगतियों की कॉल थी। सोचा था इन सात दिनों में पुराने बचे कई काम निबटा लूंगा। कुछ लेख लिखने थे, जिनके तगादे काफी तेज हो गए हैं। बातें जेहन में हैं पर मन आसमां में उड़ रहा है। कैसे लिखूं? लिखने की इच्छा नहीं हो रही। बस इन दिनों वही कर रहा हूं जो इच्छा होती है। लेख लिखने की इच्छा नहीं है तो लिखूंगा भी नहीं। बाकी दिनों में तो यह सोच कर कर लिया करता था कि चलो करियर के रास्ते में कहीं ये चीजें सपोर्टिव होती हैं। पर इन दिनों जब सोचता हूं करियर की बात तो मन से फूटती है आवाज - यार काहे को लफड़ा मोल ले रहा है। चल मस्ती कर। बस फिर क्या? हंसी-ठिठोली। कभी टीवी पर खबरें देख लीं तो कभी चैनल बदल-बदल कर फिल्में। ज्यादा इच्छा हुई तो मनपसंद सीडी निकाली, गाने सुन लिए या फिल्म देख ली।
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
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10:35 AM
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Wednesday, March 17, 2010
आजादी की पहली सुबह
पिछले कई दिनों से इस सत्रह मार्च का मैं बेसब्री से इंतजार कर रहा था। रोज जीटॉक के स्टेटस मेसेज में इस दिन के इंतजार में मेसेज बदल रहा था। संगी-साथी पूछ रहे थे कि क्या मामला है। मैं क्या बताता उन्हें। डरा मैं भी था कि श्रीमती जी ने कहीं टिकट कैंसल करा दिया तो? बहरहाल, श्रीमती जी सोलह मार्च की शाम मायके गईं। चैन के सात दिन गुजारूंगा। जब से दिल्ली आया। घर में अकेला रहने को तरस गया। इस बार जब से टिकट कटा, दिन काटने मुश्किल हो गए थे। सत्रह तारीख का बेसब्री से इंतजार करता रहा। सोलह की शाम उन्हें ट्रेन में बैठा, दफ्तर आया। वीकली ऑफ होने के बावजूद किसी और दिन दफ्तर आना थकान पैदा कर देता था। पर सोलह को ऐसा कुछ नहीं हुआ। बिल्कुल तरोताजा रहा। घर आया और देर तक इस खुशी को महसूस करता रहा। इन सात दिनों में कोशिश होगी कि अपने इन खूबसूरत दिनों का ब्यौरा यहां पेश करता रहूं। फिलहाल तो ब्लॉगिंग की भी इच्छा नहीं हो रही है। यह तो पहले भी करता रहा। इसके लिए कोई रोक-टोक नहीं थी। हां चलता हूं टीवी देखूंगा। आज मुझे कौन रोकेगा भला। :-)
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
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1:46 AM
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Sunday, February 14, 2010
हांफती हुई पीढ़ी का वैलंटाइंस डे
जानती है बेटा, अभी रात के २ बज रहे हैं। दरअसल, मैं रात में देर से लौटा हूं। तेरी ममा ने बताया कि तेरे से लंबी चैट हुई उनकी। सुना कि सैटरडे को तेरा शेड्यूल बहुत टाइट था। बेहद थकी हुई थी तू। क्यों इतना स्ट्रेन लेती है रे, एकाध क्लास मिस ही कर जाती तो क्या आफत आ रही थी? पगली।
मुझे पता है कि संडे की सुबह तू देर से उठेगी। उठेगी और लैपटॉप से चिपक कर मेल चेक करेगी। इसीलिए अभी इस खत को मेल कर दूंगा। अरे बेटा! कल तो वैलंटाइन्स डे है। बता-बता, क्या प्लानिंग है तेरी? अभी तक किसी ने मेरी बेटी को प्रपोज किया या नहीं… या मेरी बेटी ने किसी को...?
याद है तुझे... जब तू नर्सरी या प्रेप में थी... तू बेहद परेशान रहती थी कि तेरे चेहरे का कलर ब्राउन क्यों है? क्या तुझे आज भी तेरा ब्राउन कलर परेशान करता है? ना, बेटा ना। ब्राउन कलर हो या वाइट - अगर चेहरे पर ताजगी न हो, उत्साह का कोई रंग वहां न हो, तो वह चेहरा बेजान लगता है। और तू तो शुरू से हर मामले में उत्साही रही है। चाहे काम मुश्किल हो या आसान, छोटा हो या बड़ा – तू उसे लगन से करती रही है। तेरे भीतर यह जो गुण है न – बेशक इसे तूने अपनी ममा से लिया है – यह तुझे भीड़ में भी एक पहचान देता है, तुझे बिल्कुल डिफरेंट लुक देता है।
बेटा, तू अब बड़ी हो चली है। तुझमें संवेदना जितनी गहरी है, विचार उतने ही गंभीर।
इसीलिए तेरे सामने मैं सिर्फ स्थितियां रखा करता हूं, फैसले का अधिकार तुम्हारा होता है। पर बेटा, एक बात ध्यान रखना कि कुछ फैसले ऐसे होते हैं, जिन्हें जब चाहो बदल सकती हो और कुछ ऐसे - जिनके साथ जीने की आदत डालनी पड़ती है। इसे यूं समझ कि जिंदगी गर एक रेलवे स्टेशन है, तो कुछ फैसले इस स्टेशन की दूकाने हैं, जिनके बदलने से स्टेशन का रूप बदलता है, प्रकृति नहीं। पर जब रेलवे ट्रैक की जगह मेट्रो, ट्राम या मोनो रेल की ट्रैक बिछा दी जाए तो रेलवे स्टेशन की प्रकृति बदल जाएगी। इसीलिए ये फैसले ऐसे नहीं होते कि जब चाहा बदल लिया। ऐसे फैसले करने से पहले खूब सोच-विचार करना पड़ता है। अपने को आजमाना पड़ता है। यस या नो के तर्कों को परखना पड़ता है। जीवनसाथी चुनने का फैसला भी ऐसा ही फैसला होता है।
बेटा, कोई इनसान सौ फीसदी सही नहीं होता। सही और गलत की परिभाषा भी नितांत निजी हो सकती है। पर कुछ ऐसे मानक भी हैं जो हमें हमारे समाज से मिले हैं। उसी समाज से, जिसे हमने रचा है। इस बदलते दौर में जब समाज का व्यवहार तेजी से बदला तो इसके मानक भी बदले। पर हमारी पीढ़ी पुराने मानकों को पकड़ कर लटकी है, तुम नए मानकों के साथ उमंग में डूबी झूल रही हो। पीढ़ियों की इस खाई को पाटना बेहद जरूरी है। जानती हो, यह खाई हर दौर में बनती है। जब मैं यूथ था, तब भी मैंने यह खाई देखी थी। मेरे पापा जब यूथ रहे होंगे तो उन्होंने भी ऐसी खाई देखी होगी, मेरे पापा के पापा ने भी...। और हर बार बूढ़ी होती हुई पीढ़ी को हांफते हुए ही सही पर दौड़ना पड़ा होगा। नए बन रहे मानकों के रास्ते के कंकड़-पत्थर चुनने पड़े होंगे। यही तो प्रकृति है, यही तो नेचर है।
बेटा, रील लाइफ हर यूथ को बेहद लुभाती है। वहां की रंगीनियां, वहां के लुभावने पल, वहां की मस्ती खींचती है। उन तीन घंटों में वह भूल जाता है अपनी रीयल लाइफ की दुश्वारियां, वे तकलीफें - जो मध्यवर्गीय परिवारों की पहचान बनती गई हैं। और फिर रील लाइफ के जादूघर से बाहर निकलते ही अचेतन में बस चुके नायक-नायिका उसे मुंह चिढ़ाते हैं। उनकी सम्पन्नता तो वह ईमानदार तरीके से छू नहीं पाता, पर उनका दैहिक प्रेम यूथ के जलते मन और तन को भड़काता है। जब कभी अवसर मिले वह तन-मन को साधने की जुगत में लग जाता है। भावावेश में साथ जीने-मरने की कसमें खाता है। रिश्ते की सामाजिक स्वीकृति की बाध्यता उसे शादी तक पहुंचाती है। पर बहुत जल्द ही अचेतन के नायक-नायिका की छवि टूटती है। जीवन की जरूरतों के सामने भावनाएं आहत होने लगती हैं। जितनी तेजी से जुड़े थे, उतनी ही तेजी से बिखरने लगते हैं। बेटा, इस बिखराव की वजहें तो कई हैं पर उन वजहों पर हम फिर कभी बात करेंगे।
फिलहाल तू जा बेटा, तैयार हो। अपने दोस्तों के साथ एंजॉय कर आज का दिन। और हां, जब लौटकर आना तो मुझे कॉल करना (अगर तू थकी न रहे तो), मैं ऑनलाइन हो जाऊंगा। वैसे भी संडे है। मैटिनी शो लेकर जाऊंगा तेरी ममा को, पर तेरे लौटने से पहले लौट आऊंगा।
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
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2:59 AM
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Saturday, January 23, 2010
क्या यही है न्यूज चैनलों का सच?
काम शुरू करने के कुछ दिन बाद ही उसने किसी बड़े चैनल में जाने का सपना देखना शुरू कर दिया और अपने इसी सपने को पूरा करने के लिए उसने बेतरह मेहनत की। दिन है या रात, सुबह है या शाम जब जरूरत हो फील्ड में जाने को तैयार रहती थी श्रेष्ठा। वहां काम करते हुए उसने जाना, सुना कि चैनल में काम करने वाली कुछ लड़कियां अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए किस हद तक समझौता करने तैयार हो जाती हैं। ऐसे किस्सों से उसे कई बार आश्चर्य होता। वह खुद से सवाल करती कि ये लड़कियां अपने काम के बल पर क्यों आगे नहीं बढ़ना चाहतीं? ऐसी बातें सुनकर श्रेष्ठा का मन बहुत बार ख़राब होता रहा। तब उसने खुद से वादा किया कि इसी चैनल में काम करके वह अपने काम के दम पर आगे बढ़ेगी। वह मुकाम पाने के लिए किसी बॉस से कभी कोई ऐसा समझौता नहीं करेगी, जो खुद की निगाहों में उसे गिरा दे। उसी दिन उसने ब्लैंक डेट का एक रिजिग्नेशन लेटर तैयार किया और अक्सर उसे अपने पास रखने लगी।
उसकी नौकरी को महज़ पांच महीने बीते थे कि एक रोज एक सीनियर अधिकारी ने श्रेष्ठा को अपने केबिन में बुलाया। श्रेष्ठा के दिमाग में पता नहीं क्या आया कि उसने पर्स से निकाल कर अपने रिजिग्नेशन लेटर को जींस पैंट की जेब के हवाले कर लिया। अंदर पहुंचते ही सीनियर ने श्रेष्ठा को बैठने के लिए कहा। श्रेष्ठा का मन आशंकित था। कई सवाल आ-जा रहे थे। आखिर ऐसा क्या हो गया उससे कि सर ने केबिन में बुला लिया? कुछ पल की ख़ामोशी के बाद सीनियर ने श्रेष्ठा के काम की तारीफ़ की पर पता नहीं क्यों श्रेष्ठा को तारीफ का वह अंदाज नहीं जंचा। केबिन में सफोकेशन का अहसास उसे हुआ। उसका मन बेचैन हो रहा था और वह बाहर जाना चाहती थी। अचानक उसके सर ने उससे पूछा - तुम अपने काम के प्रति कितना सीरियस हो? श्रेष्ठा ने तुरंत जवाब दिया - बहुत ज्यादा। पर सर के अगले सवाल ने श्रेष्ठा के पैरों तले की ज़मीन खिसका दी। सर ने पूछा - क्या तुम अपने प्रमोशन के लिए मेरे फार्महाउस पर चलोगी? सवाल सुनकर हतप्रभ थी श्रेष्ठा। नथुने फड़कने लगे। चेहरे पर छाई रहने वाली स्निग्ध मुस्कुराहट की जगह ले ली नफरत ने। उसे लगा अगर कुछ पल वह वहां और खड़ी रह गई तो कोई बड़ा बवाल हो जाएगा। हो सकता है श्रेष्ठा खुद पर काबू न रख सके और कोई वजनी चीज उसके सिर पर मार दे। उसने जेब से हाथ बाहर निकाला। गुस्से में कांप रहे थे हाथ। पर हाथ में थमा पत्र देखते ही पूरी हिम्मत आ गई। उसने अपना रिजिग्नेशन लेटर उसकी टेबल पर फेंका और बाहर आ गई। अपने टेबल से अपना सामान उठाया और बिना किसी से कुछ कहे ऑफिस से निकल गयी। अगले दिन ऑफिस से उसके लिए फ़ोन आने शुरू हो गए, किसी को उसने रिसीव नहीं किया... पर वहां की एक सीनियर मैम के फोन को श्रेष्टा ने रिसीव कर लिया। उन से बात हुई। श्रेष्ठा ने सारी बातें मैम को बताईं,यह सोचकर कि शायद वह एक लड़की के मनोभाव समझ सकें। पर अफसोस महिला होकर भी उन्होंने उस इंसान (?) का पक्ष लिया जिसने श्रेष्ठा को प्रमोशन देने के पीछे शर्त रखी कि फार्महाउस चलो।
सर के केबिन में गुजरे इस मिनट के वक्त ने श्रेष्ठा के पूरे विश्वास को हिला दिया है। इतनी बार इस यातना की चर्चा वह मुझसे कर चुकी है कि केबिन का हर पल मुझे दिखने-सा लगा है। उस यातना को सिर्फ श्रेष्ठा ने नहीं जिया, उसकी मित्र होने के नाते मैंने भी जिया है। सबसे तकलीफदेह बात यह लगी कि श्रेष्ठा को यह लगने लगा है कि चैनल में जो भी लड़कियां ऊंचे पद पर पहुंच गई हैं उन्होंने जरूर अपने किसी सीनियर से समझौता किया होगा। वर्ना वह मैम क्यों नहीं उसकी बात समझतीं? क्यों वह उस राक्षस का पक्ष लेतीं। मैं कहना चाहती हूं श्रेष्ठा से कि सारे लोग तुम्हारे उस बॉस जैसे नहीं होते और न ही चैनल की सारी लड़कियां समझौते करके आगे बढ़ती हैं। पर अभी श्रेष्ठा के भीतर भरोसा जगाने में वक्त लगेगा मुझे। तब तक के लिए मैं भी उसके लिए संदिग्ध हूं, और आप तो खैर हैं ही...
यह टिप्पणी नमिता शुक्ला की है, जो उन्होंने ईमेल के जरिए मुझ तक पहुंचाई । दुआ करें कि वह वक्त लौट आए जब हम और आप किसी श्रेष्ठा की निगाह में संदिग्ध होने को अभिशप्त न हों।
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
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1:20 PM
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Saturday, December 19, 2009
कौन कहता है कि 'पा' अमिताभ बच्चन की फिल्म है
मैं यह नहीं कतई नहीं कह रहा कि पा फिल्म बेकार है। पा फिल्म तो वाकई तारीफ पाने की हकदार है। पर इसलिए नहीं कि वह प्रोजेरिया से पीड़ित एक बच्चे की कहानी है, या इसलिए भी नहीं कि प्रोजेरिया से पीड़ित १२ साल के बच्चे औरो की भूमिका में बिग बी ने 'कमाल' कर दिया है। इसलिए तो कतई नहीं कि जूनियर बी ने बिग बी के पिता का रोल किया।
तारीफ इसलिए होनी चाहिए
- कि इंटरनैशनल मेकअप आर्टिस्ट कर्स्टन टिंबल और डोमिनिक ने अपने कौशल से अमिताभ बच्चन को बिग बी के करेक्टर से बाहर कर दिया है। यह एक बड़ी वजह है कि औरो की भूमिका में दर्शकों को अपने अमिताभ का चेहरा नहीं दिखता। रही सही कसर खुद बिग बी ने पूरी कर दी अपनी वाइस मॉड्यूलेशन से।
- कि ऐड एजेंसी के क्रिएटिव हेड रहे बाल कृष्णन (बाल्की) चूक गये। वह चाहते तो स्क्रिप्ट की डिमांड के तर्क के साथ विद्या बालन और अभिषेक के अंतरंग क्षणों की शूटिंग कर सकते थे। फिल्म के प्रोमो में इन दृश्यों को ठूंस कर दर्शकों का बड़ा हुजूम खींच सकते थे।
- कि बाल्की ने वाकई पा को भुनाने के लिए किसी सस्ते हथकंडे का इस्तेमाल न कर अपनी क्रिएटिविटी पर भरोसा किया।
- कि यह फिल्म सिर्फ औरो की कहानी नहीं है। यह विद्या के संघर्ष की कहानी है। अमोल आम्टे की महत्वाकांक्षा की भी कहानी है। मीडिया की नासमझी-नादानी की भी दास्तां है। तिसपर चारों कहानियां एक साथ चल रही हैं और ऊबने नहीं देतीं। स्क्रिप्ट की बुनावट इतनी सधी और कसी हुई कि इन कहानियों को आप एक-दूसरे से अलग नहीं कर सकते।
- कि निर्देशकीय पकड़ इतनी सख्त है कि फिल्म के करेक्टरों की तमाम मासूमियत आपके साथ चलने लगती है। आप उस अमोल आम्टे के लिए आक्रोश भी नहीं पाल पाते, जिसकी वजह से पैदा हुए तनाव का असर एक बच्चे की जिंदगी पर पड़ता है। यह असर इतना भयंकर है कि बच्चा पैदा हुआ तो अपने को प्रोजेरिया से घिरा पाया। फिल्म हॉल से निकलते ही औरो आपके जेहन में घूम रहा होता है, शेष करेक्टर महज औरो को बुन रहे होते हैं।
नहीं है इसमें बिग बी का चमत्कारिक अभिनय

कुछ फिल्में अपनी शानदार तकनीक की वजह से याद की जाती हैं, तो कुछ शानदार एक्टिंग की वजह से। किसी में स्क्रिप्ट जानदार होती है तो किसी में निर्देशन शानदार। तकनीकों का कमाल अब की हिंदी फिल्मों में दिखने लगा है। गाहे-बगाहे लीक से हटकर किया गया मेकअप भी पब्लिक का ध्यान खींचता रहा है। पर पा में जिस करेक्टर के इर्द-गिर्द पूरी फिल्म घूमती है वह है औरो। इस औरो का मेकअप इतना सटीक है कि दर्शक उसके करेक्टर की खासियतों से बगैर संवाद जुड़ जाता है। किसी करेक्टर को जीवंत बनाने में एक्टिंग का बड़ा योगदान होता है। एक्टिंग के तीन खास पक्ष होते हैं - फेशिअल एक्स्प्रेशन, बॉडी लैंग्वेज और वाइस मोड्यूलेशन। फिल्म की बाकी तमाम चीजें एक्टिंग के इन तीन खास पॉइंट्स का साथ देती हैं। पा में औरो का मेकअप ऐसा है कि फेशियल एक्सप्रेशन की गुंजाइश किसी आर्टिस्ट के लिए बच नहीं पाती। रही बात बॉडी लैंग्वेज की, तो जाहिर है वह अपंग बच्चे जैसी ही होगी। यह काम किसी भी प्रफेशनल आर्टिस्ट के लिए जरा भी मुश्किल नहीं। हां, वाइस मॉड्यूलेशन में सामान्य सी गुंजाइश थी जिसे बिग बी ने आसानी से पूरा किया।
तो फिर ऐसी सामान्य-सी एक्टिंग के लिए बिग बी का ही सिलेक्शन क्यों हुआ? और हुआ भी तो बिग बी जैसे आर्टिस्ट ने इसे स्वीकार क्यों कर लिया?
दरअसल, बाल्की ऐड एजेंसी के हेड रहे हैं। उन्हें खूब पता है कि किसी प्रोडक्ट को बेचने के लिए ऐड कैसा होना चाहिए। पा जैसे प्रोडक्ट (जो लीक से हटकर है) का बाजार बनाना आसान नहीं था। इसे चर्चा में लाने के लिए बिग बी से बड़ा नाम दूसरा हो नहीं सकता था। विज्ञापन की आंखों ने यह भी देखा कि बिग बी की उम्र 70 के आसपास है और पा के औरो की 12 के आसपास। तो उम्र के इस कंट्रास्ट को भुनाया जा सकता है। प्रोडक्ट के बिकने के रास्ते में जो थोड़ी बहुत हिचक रही होगी उसे उन्होंने जूनियर बी को जोड़ कर दूर कर लिया। क्योंकि अब बाल्की के पास प्रचार के लिए करेक्टर और कलाकार का कंट्रास्ट तो था ही, बिग बी (बेटा) और जूनियर बी (बाप) के रोल की केमेस्ट्री भी थी। विज्ञापन की आंखों ने वाकई अपना असर दिखाया।
हर कलाकार की चाहत होती है कि वह खुद को डिफरेंट रंगों में देखे। औरो के असामान्य रंग में खुद को देखने की ख्वाहिश बिग बी की भी रही होगी - यह समझा जाये, तो यह समझ दोषपूर्ण नहीं। हां, यह जरूर है कि इसके अलावा भी कुछ कारण रहे होंगे जिन्होंने बिग बी को बाध्य किया होगा इस रोल को स्वीकार करने में।
विद्या का प्रेम, आम्टे का पलायन
पा में विद्या मेडिकल स्टूडेंट है। जीवन के किसी मोड़ पर उसकी मुलाकात अमोल आम्टे नाम के नौजवान से हो जाती है। बढ़ते भरोसे के साथ दोनों की मुलाकातें भी बढ़ती हैं। मुलाकातों के बढ़े अंतरंग कदम का पता उन्हें तब चलता है जब उनके सामने सिर्फ दो ही रास्ते बचते हैं - या तो शादी या अबॉर्शन।
आम्टे बेहद महत्वाकांक्षी करेक्टर है। भरोसे से लबरेज। उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण उसका करियर है। इस करियर के रास्ते में किसी भी 'लिजलिजी संवेदना' के लिए कोई जगह नहीं। ऐसे हर बैरियर को कुचलते और लताड़ते हुए उसे आगे बढ़ना है। एक बड़ा और जिम्मेवार नेता बन कर देश का भविष्य संवारना है। यही सीख वह विद्या को भी देता है। उसे याद दिलाता है कि अगर बच्चे-वच्चे के फेर में वह पड़ी तो उसके डॉक्टर बनने का ख्वाब अधूरा रह सकता है। बेहतर होगा अबॉर्शन करा ले।
दो स्त्रियों का हौसला
विद्या मजबूत इच्छाशक्ति वाली करेक्टर है। जो किया, उसपर कोई पश्चाताप नहीं। जो आएगा उसका सामना करना, उससे जूझना, उसे जीना विद्या को ज्यादा पसंद है। विद्या की मजबूती के पीछे उसकी मां का भी हौसला है, जो - हे भगवान, तूने ये क्या किया - जैसे किसी संवाद से कोसने की बजाए विद्या से पूछती हैं कि तुम्हें बच्चा चाहिए या नहीं? जब विद्या बच्चे को जन्म देने की अपनी इच्छा जताती है तो मां उसे गले लगा लेती हैं। वह घर और बच्चे की पूरी जिम्मेवारी इस कदर ओढ़ लेती हैं कि विद्या का करियर न डगमगाए। दोनों स्त्रियों के इस संघर्ष और दृढ़ता की कहानी कहता है विद्या का डॉक्टर बन जाना।
विद्या और अमोल आम्टे आज की पीढ़ी का प्रतिनिधि चरित्र हैं, जबकि विद्या की मां रहन-सहन से पारंपरिक होते हुए विचारों से आधुनिक महिला की प्रतिनिधि पात्र।
पत्रकारों की नादानी
फिल्म पा दिखलाती है कि आम्टे समझदार और ईमानदार युवा एमपी है। किसी करप्शन का वह साझीदार नहीं। वह समाज के वंचित वर्ग के लिए काम करना चाहता है, पर दलाल मार्का नेता राह का रोड़ा बनते हैं। इस कड़ी में कुछ पत्रकार भी हैं, जो अपनी नासमझी और नादानी से इस रोड़े को चट्टान में तब्दील करते हैं। वह ब्रेकिंग न्यूज की हड़बड़ी में कैसे न्यूज का मर्म तोड़ते करते हैं। सेंसेशनल बनाने के चक्कर में न्यूज को डिफरेंट शेप और सेंस देते हैं। अपनी सतही जानकारी और अधकचरी सूचनाओं से दर्शकों और पाठकों को गुमराह करने वाले पत्रकारों को आईना दिखाती है यह फिल्म।
आम्टे का पश्चाताप
फिल्म जब अंत के करीब पहुंचती है, तो अमोल आम्टे को पता चलता है कि औरो उसका बेटा है। हालांकि दोनों की मुलाकात से ही फिल्म शुरु हुई है। आम्टे एमपी बन चुका है। पर तब आम्टे के लिए औरो महज एक ऐसा बच्चा है जिसे प्रोजेरिया ने जकड़ रखा है। आम्टे के भीतर उस असामान्य बच्चे के लिए सिम्पैथी के भाव हैं। वह उसकी हर मुराद पूरी करना चाहता है। इसी क्रम में कई बार वह उसके नाज-नखरे भी सहता है। वैसे तो हर बच्चे का मन बहुत कोमल होता है, पर किसी बीमार बच्चे का मन हर किसी को कुछ ज्यादा ही कोमल लगने लगता है। ऐसा ही होता है आम्टे के साथ भी। उसके मन में औरो के लिए खास जगह बन जाती है। ऐसे में जब उसे पता चलता है कि औरो का वक्त अब खत्म होने वाला है, तो बेचैन सा वह भागा चला आता है उस हॉस्पिटल में जहां औरो एडमिट है। औरो के वॉर्ड में पहुंचते ही उसकी मुलाकात विद्या से होती है और आम्टे को पता चलता है कि औरो उसका बेटा है।
एमपी बन चुके आम्टे को अपनी चूक का अहसास होता है। जिसे उसने कभी लिजलिजी संवेदना समझा था, आज उस संवेदना को महसूस कर रोमांच से भर रहा है। इस बीच आम्टे और औरो के रिश्ते की बात उसके विरोधियों और मीडिया तक भी पहुंच जाती है। सब इसे अपने तरीके से भुनाने में जुट जाते हैं। पर आम्टे बगैर किसी लाग लपेट के इस सच को स्वीकार करता है। वह स्वीकार करता है कि उसने एक नाजुक मोड़ पर जो फैसला किया था, वह गलत था और अब वह अपनी गलती को सुधारना चाहता है।
फिल्म का यह दृश्य अपने संदेश की वजह से बहुत मजबूत बन पड़ा है। किसी भी चूक की आत्मस्वीकृति के लिए बड़ी हिम्मत की जरूरत होती है। क्या वाकई यह हिम्मत हममें है?
औरो के पीछे भागती एक छोटी बच्ची
पूरी फिल्म में साथ के लिए औरो के पीछे भाग रही एक बच्ची दर्शकों का ध्यान अपनी ओर बार-बार खींचती है। फिल्म हॉल में बैठे दर्शकों को कभी यह बात गुदगुदाती है तो कभी मंद मुस्कान से घेर लेती है। पर फिल्म जब अपने अंत के करीब पहुंचती है तो पूरी फिल्म में बिना संवाद के मौजूद इस लड़की की उपस्थिति की सार्थकता नजर आती है। वह हॉस्पिटल में आई है बीमार औरो से मिलने। उसके हाथ में एक कागज है। वही कागज जो वह ऑरो को इससे पहले भी देना चाहती थी, मगर औरो के भाग जाने के कारण कभी दे न पाई। इस कागज में एक स्केच बना है। यह औरो की ही तस्वीर है। पर इसमें लकीरें नहीं हैं। पूरा स्केच तैयार है सॉरी के रोमन लेटर से। वह कहती है कि वह वाकई डर गई थी पहली बार औरो को देख कर। अनजाने में उसने औरो का उपहास उड़ाया था। पर उसने उस भूल को स्वीकारने की कई बार कोशिश की, पर औरो ने उसे यह वक्त कभी नहीं दिया। वह कहती है कि जीवन में जब कोई गलती हो जाए, तो उससे दूसरों को तो दुख होता ही है, पर गलती करने वाले को जब अपनी गलती का अहसास होता है तो उसे सामने वाले शख्स से ज्यादा पीड़ा होती है।
जीवन में अगर हम भी इसी तरह चीजों को समझने लगें तो कई ऐसे रिश्ते जो टूट चुके हैं, जुड़ते नजर आएंगे।
और अब औरो की बात
औरो। बारह साल का बच्चा। प्रोजेरिया से पीड़ित। बेहद संवेदनशील। बिल्कुल अपनी मां और नानी की तरह। स्कूल के बच्चों के बीच उसकी खास पहचान। अपनी थकान से कई बार हतप्रभ सा। कई बार क्षुब्ध सा। पर ऐसा नहीं कि उसका क्षोभ दूसरों पर उतार दे। उसे पता है कि उसे मसालेदार चीजें नहीं खानी। वह नहीं खाता। खिचड़ी खा कर संतोष कर लेता है। उसे मां ने बता दिया है कि उसका पिता एमपी अमोल आम्टे है। उसे यह भी पता है कि आम्टे को उसका ही राज नहीं पता। वह कई बार आम्टे से मिलता है, पर उसे नहीं बताता है। एकाध दफे बताने को होता है फिर अपनी ही बात को बालसुलभ चंचलता से ढंक लेता है। चंचलता के इस आवरण में छुपी उसकी गंभीरता दर्शकों को लुभाती है।
निर्देशन में खटकने वाली एक बात
औरो बहुत नाजुक है। इतना नाजुक कि वह पत्थरों पर बैठ नहीं सकता। क्रिकेट के मैदान में थोड़ा दौड़ जाये तो हॉस्पिटल पहुंच जाता है। पर वही औरो जब फील्ड में या मेट्रो ट्रेन में मंकी डांस करता है, तो उसका शरीर न तो थकता है, न उसे किसी सहारे की जरूरत पड़ती है। इन दो दृश्यों में औरों का शरीर अलग-अलग तरीके से बिहेव करता है। लगता है बाल्की यहां पर मंकी डांस करवाने के लोभ का संवरण नहीं कर पाये।
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
at
12:13 PM
16
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Labels: अमिताभ बच्चन, पा, बाल्की, बिग बी



