आज चोखरे बाली पर सुरेश जी का 'दहल' जाना पढ़ा और दूसरों को 'दहलाने की उनकी कोशिश' भी देखी। सुरेश जी कितने संवेदनशील हैं इस बात का पता इससे ही चल जाता है कि उन्होंने इतनी भयंकर वारदात को महज 'घटना' माना है। आपने लिखा है 'यह नारी अशिक्षित नहीं है. उसने अंग्रेजी में एम् ऐ किया है. ' सुरेश जी, शिक्षित होने का संबंध जो लोग डिग्रियों से तौलते हैं, मुझे उनके शिक्षित होने पर संदेह होने लगता है। आपको ढेर सारे ऐसे लोगों के उदाहरण अपने समाज में मिल जाएंगे, जिन्होंने स्कूल-कॉलेज का चेहरा तक नहीं देखा, पर उनकी शालीनता और उनके संस्कार के सामने डिग्रीधारी भी बौने नजर आने लगते हैं।जिरह पढ़ें, आप अपनी लिपि में (Read JIRAH in your own script)
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Friday, May 16, 2008
दहलाने वाली दृष्टि
आज चोखरे बाली पर सुरेश जी का 'दहल' जाना पढ़ा और दूसरों को 'दहलाने की उनकी कोशिश' भी देखी। सुरेश जी कितने संवेदनशील हैं इस बात का पता इससे ही चल जाता है कि उन्होंने इतनी भयंकर वारदात को महज 'घटना' माना है। आपने लिखा है 'यह नारी अशिक्षित नहीं है. उसने अंग्रेजी में एम् ऐ किया है. ' सुरेश जी, शिक्षित होने का संबंध जो लोग डिग्रियों से तौलते हैं, मुझे उनके शिक्षित होने पर संदेह होने लगता है। आपको ढेर सारे ऐसे लोगों के उदाहरण अपने समाज में मिल जाएंगे, जिन्होंने स्कूल-कॉलेज का चेहरा तक नहीं देखा, पर उनकी शालीनता और उनके संस्कार के सामने डिग्रीधारी भी बौने नजर आने लगते हैं।
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
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12:44 PM
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Thursday, May 15, 2008
विकास का भेंग
भइया 92 में ही दिल्ली आ गया था। मैं आया हूं महज चार साल पहले। भइया को दिल्ली भेजने के बाद पापा यही कहा करते थे कि वह नौकरी की तलाश में नहीं, भविष्य की तलाश में गया है। मैं इतने वर्ष टिका रहा रांची में तो सिर्फ अपनी जिद पर कि पापा के साथ रहना है। पर आखिरकार मुझे भी दिल्ली का रुख करना पड़ा। मुझे भेजते वक्त पापा की अभिव्यक्ति थी 'जब पराग को भेजा था दिल्ली, तो लगा मेरा दिमाग मुझसे अलग हुआ। रेमी की शादी की, तो लगा कोई मेरा दिल मुझसे अलग कर ले गया। और अब तुम्हें भेज रहा हूं तो जान रहा हूं कि मैं अपाहिज हो जाऊंगा, क्योंकि तुम्ही तो मेरे हाथ-पांव हो।'

यह कहानी सिर्फ मेरे परिवार की कहानी नहीं है। यह इस देश के हर तीसरे-चौथे-पांचवें परिवार की कहानी है। गांव का बेटा बेहतर की तलाश में शहर की ओर भाग रहा है, शहर का बेटा इसी बेहतर की तलाश में महानगर का रुख करता है और महानगर का बेटा भाग रहा है विदेश। यानी हम सब भाग रहे हैं, हांफ रहे हैं, खीज रहे हैं, जूझ रहे हैं। इस जूझने से हासिल हो रहा है थोड़ा ज्यादा पैसा, थोड़ा ज्यादा तनाव और बुरी तरह अपने और अपने परिवार से कटते जाने का संत्रास।
इस देश में हर वह शख्स जो अपने पिता होने का दायित्व निभाता है, अपना पूरा वर्तमान और भविष्य के तमाम सपने झोंक देता है अपने बच्चों पर। इस झोंकने के पीछे कहीं वह सोच भी काम करती है कि यही बच्चे तो हमारे बुढ़ापे का सहारा होंगे। बच्चे भी पिता के सपनों पर खरा उतरने की कोशिश करते हैं। पर बदले हुए वक्त और इस वक्त की जरूरत के मद्देनजर उन्हें भी कई समझौते करने पड़ते हैं। इन समझौतों के बीच बड़ा हुआ बच्चा अपने बच्चों का बाप बन चुका होता है और फिर वह उस बच्चे के लिए अपना वर्तमान और भविष्य झोंकने लगता है। यानी, कुल मिलाकर यह चक्र हर मध्यवर्गीय भारतीय को पीसता रहता है।
सच यह है कि ऐसे हालात पीड़ा पैदा करते हैं। अनामदास ने ठीक कहा है यह पीड़ा अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य को एक साथ जीने का संघर्ष है। जो मुड़कर देखना नहीं चाहते, वह खुश हैं। बच्चों की प्रगति देखकर अलग रह रहा पिता भी खुश होता है। पर यह खुशी उसके अकेलेपन पर भारी पड़ती है।
आखिर, बेहतर की तलाश में हो रहा विस्थापन हम क्यों स्वीकार करते हैं। दरअसल, इंसान की अतृप्ति उसे बेहतर की तलाश में भटकाती है। जैसे ही एक अतृप्ति तृप्त होती है, उसकी जगह फिर कोई नई अतृप्ति आ जाती है। क्योंकि यह इंसान जानता है कि तृप्त जानवर होने से बेहतर है अतृप्त आदमी बन कर रहना। तो अपने को आदमी बनाये रखने के लिए बहुत सहज रूप में वह अपने भीतर नई अतृप्तियां भरता जाता है। ऐसे ही समय में बेहतर की परिभाषा भी बिल्कुल व्यक्तिपरक हो जाती है। कोई अपनी बेहतरी दिल्ली छोड़कर यूपी के किसी कस्बे में बसने में देखता है तो कोई किसी कस्बे को छोड़कर विदेश में बस जाने में। यानी, विस्थापन की वजहें कई सारी हैं। कई बार बिल्कुल ही निजी भी।
इन सब के बीच, विस्थापन की एक बड़ी वजह है विकास की अधकचरी योजना। हो रहे विस्थापन का 60-70 प्रतिशत हिस्सा इसी का नतीजा है। यह वह देश है जहां किसी शहर में मेट्रो की लाइन बिछ रही होती है और कई इलाके साइकल चल सकने लायक सड़क के लिए तरसते रह जाते हैं। कुछ शहरों में आधुनिकतम संसाधन हैं तो कई इलाके बुनियादी साधनों का इंतजार कर रहे हैं। एक तरफ ऋण में डूबे किसान आत्महत्या कर रहे हैं तो दूसरी तरफ करोड़ों टन अनाज गोदाम में सड़ रहा है। यानी, विकास की भेंगी दृष्टि देश के हर हिस्से को नहीं देख पा रही है। विकास का यह भेंग जब तक दूर नहीं होता, लोगों का विस्थापन होता रहेगा। हम पलायन करते रहेंगे सिर्फ अपने इलाके से नहीं बल्कि देश और समाज के प्रति अपने दायित्वों से भी।
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
at
11:55 AM
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Tuesday, May 13, 2008
बता री सजनी
हां री सजनी, अब हो गई तेरी सगाई
न कर नम अपनी ये प्यारी-प्यारी आंखें
हां री सजनी, दुआएं लिए खड़ी है माई
चल उठ, छोड़ अतीत देख अब सिर्फ आगे
हां री सजनी, मत कह अब दुहाई है दुहाई
मत कोस किसी को, नहीं बदलेगा कुछ भी
हां री सजनी, अब न बाप सुनेंगे न भाई
मेरी सांसों की हर आहट, भर रही है घबराहट
बता री सजनी, ये दिल क्यों निकला हरजाई
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
at
9:48 PM
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Wednesday, May 7, 2008
बेटा करे डिनर, पिता खाए 'बन'
यह अयाचित स्थिति क्यों बन जाती है जिंदगी में। आज मनःस्थिति ऐसी नहीं कि इस पर चर्चा कर सकूं। पर किसी पोस्ट में यह चर्चा होनी है कि रोजगार की वजह से हो रहा विस्थापन भी दर्द के नए प्रदेश में हमें ले जाता है।
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
at
12:26 AM
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Saturday, April 26, 2008
प्रथम चुंबन
शिराओं में
खून की गति
कम हो तो ज़रूरी नहीं
कि आदमी उदास, हताश या निराश है।
कई क्षण ऐसे होते हैं
जहां वक़्त रुक जाता है,
शिराओं में खून जम जाता है,
और ज़िंदगी
हसीन लगने लगती है।
तल्ख अनुभवों को
ताक पर रख
अगर वक़्त को महसूसा जाये
तो सचमुच
वक़्त भी धड़कता है
और इस वक़्त की नब्ज
हमारे हाथों में है
जिसकी नक्काशी
न जाने कितने संदर्भों को
जन्म देती है
जहां पल-पल अहसास होता है
कि हम ज़िंदा हैं।
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
at
3:19 PM
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Friday, April 25, 2008
बच्चे कहते हैं
ओ पिता,
तुम बहुत गंदे हो
तुम मेरे साथ नहीं खेलते।
खेलने के लिए कहता हूं
तो डांट कर मुंह फेर लेते हो।
पहले तुम
इतने गुस्सैल तो नहीं थे!
अब अम्मा पर भी
झल्लाने लगे हो!
तुम्हें क्या मालूम
तुम्हारे पीछे
अम्मा कितना रोती हैं!
तुम इतना झुक कर
क्यों चलने लगे?
तुम्हारे केश
इतने सफ़ेद और
चेहरा
इतना रूखा क्यों हो गया?
अब तो मैं
तुम्हारे साथ खेलूंगा भी नहीं।
बूढ़ों के साथ बच्चे
कहीं खेलते हैं भला!
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
at
3:46 PM
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Monday, April 21, 2008
उनके इंतजार में
उनके इंतजार में जाने कब से खड़ा हूं उसी मोड़ पर
अब है उन्हें ही रंज, जो गये थे खुद मुझे छोड़ कर
सही वक्त नहीं यह किसी से शिकवा-शिकायत का
देख, मातम मना रहे हैं लोग, अब रिश्ते तोड़ कर
गर तू चाहता है जीतना अब भी, हारी हुई यह जंग
फिर छोड़ दे ये रोना-धोना, अब दुश्मनों से होड़ कर
बहुत मुश्किल नहीं है मेरे भाई, झुकेंगे ये कसाई
तू शुरू तो कर अपनी चाल, सारी शक्ति जोड़ कर
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
at
11:20 AM
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Sunday, April 20, 2008
टेक केअर ऑफ माई आइज़
सरों से सहयोग की भी अपेक्षा करता है। उसे अपना दुख सबमें नज़र आता है और सबका दुख ख़ुद में महसूस करता है। पर जैसे ही उसकी स्थिति मजबूत होती है, वह अपनी पुरानी ज़िंदगी भूल जाना चाहता है। निरीह और लाचार तमाम लोग उसे अब बोझ लगने लगते हैं। तो पढ़ें इस एसएमएस को जो मनुष्य के त्याग और स्वार्थ की पराकाष्ठा को दिखला रहा है : There was a blind boy, who used to
hate every one except his girlfriend.
He always used to say that l'll marry u
if i could see!! Suddenly 1 day someone
donated him eyes n then when he saw
his glfriend, he was astonished to see
that his glfriend was also blind!
His glfriend then asked
"WILL U MARRY ME NOW?
he simply refused....
his glfriend went away saying...
"JUST TAKE CARE OF MY EYES."
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
at
12:24 PM
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Thursday, April 17, 2008
यौन पवित्रता : जड़ता टूटनी चाहिए (अंतिम)
स्त्री पर पुरुष का हक जैसी धारणाएं स्त्री को भयमुक्त होकर खुली हवा में जीने नहीं देतीं। खुली हवा में जीने का मतलब यह कतई नहीं होता कि जब चाहा, जिसके साथ चाहा हमबिस्तर हो लिये। यह तो एक तरह की यौन उच्छृंखलता होगी। खुली हवा में सांस लेने का मतलब सिर्फ़ इतना है कि स्त्री मान ले और समाज स्वीकार ले कि जिस तरह पुरुष निडर और निःसंकोच होकर कहीं भी घूम सकता है, स्त्री भी घूम सकती है। लूट की वारदातें अपनी जगह पर हैं। लूटनेवाला तो कभी भी और कुछ भी लूट सकता है, तो क्या इस डर से स्त्री अपना कार्यक्षेत्र सीमिल कर ले?
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अनुराग अन्वेषी
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12:56 AM
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Wednesday, April 16, 2008
यौन पवित्रता : जड़ता टूटनी चाहिए (एक)
बलात्कार की वारदात मुंबई की लोकल ट्रेन में हो या मरीन ड्राइव की किसी पुलिस चौकी पर, दिल्ली की सड़कों पर रात में दौड़ती कार में हो या फिर किसी छोटे से शहर के किसी हिस्से में; वह जब भी सुर्खियों में आती है, सबके भीतर डर छोड़ जाती है। ऐसी खबरों के बाद यह समाज पुलिस की निष्क्रियता पर मर्सिया गाता है और सुरक्षा व्यवस्था को जम कर कोसता है। इसके साथ ही वह ऐसी वारदातों के होने की वजह तलाशता है। अक्सर सन्नाटा, परिचित, रिश्तेदार या फिर बदले की (दुः) भावना वजह बनते हैं। अकेली क्यों गई थी, किसी को साथ क्यों नहीं ले गई... पता नहीं कितने सवाल नाचते रहते हैं, पर कोई सही जवाब नहीं मिल पाता। और आखिरकार हम वहीं के वहीं खड़े रह जाते हैं। अपनी दुनिया में मस्त। दरअसल, ये सवाल और ये चिंताएं महज तात्कालिक हैं, जो उभरते-डूबते रहते हैं। बलात्कार से जुड़ी असल समस्या इससे कहीं ज़्यादा गहरी है।जनता की सुरक्षा या पुलिस की सक्रियता पर चिंता इस लेख का विषय नहीं। चिंता की बात यह है कि बलात्कार की हर वारदात को हमारा समाज पीड़िता की इज्जत से जोड़ कर क्यों देखता है? दुखद पहलू यह कि पढ़ा-लिखा तबका भी इसे 'इज्जत की लूट' का नाम देता है। यह विचारने की ज़रूरत है कि क्या ऐसी वारदात से पीड़िता की इज्जत वाकई तार-तार हो जाती है? यहां पर यह सवाल सिर उठाने लगता है कि यह 'इज्जत' क्या है? क्या पुरुष और महिलाओं की इज्जत के मापदंड अलग-अलग होते हैं? लूटनेवाला तो वहशी होता है, दरिंदा होता है। अगर वह दरिंदा 'होमो' हुआ तो जाहिर तौर पर उसकी दरिंदगी का शिकार पुरुष होगा। क्या उस स्थिति में भी हम कहेंगे कि फलां पुरुष की इज्जत लूट ली गई? पुरुष वर्चस्व वाला यह समाज कतई ऐसा नहीं कहेगा। बल्कि वह इस दरिंदगी को 'अप्राकृतिक यौनाचार' का नाम देगा।
ज़्यादा दूर जाने की ज़रूरत नहीं। हाल के वर्षों में हुए सांप्रदायिक दंगों को याद करें। महिलाओं के साथ हुई दुराचार की वारदातें ताज़ा हो जाएंगी। आख़िर दंगाइयों के निशाने पर महिलाएं क्यों आईं? इसीलिए कि दंगाई मर्दों की निगाह में किसी ख़ास कौम को पराजयबोध कराने का सबसे सरल तरीका यही दिखा।
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
at
12:58 PM
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Thursday, April 10, 2008
विरोध की भाषा
विरोध की एक भाषा
मुझे भी आती है
पर सिर उठाने से पहले
मुझे बार-बार समझाती है
और मैं, 
जो हाथ में थाम
ज़बान का खंजर
उठ खड़ा हुआ था
अभी-अभी अचानक
मिमियाता हुआ-सा
घुस जाता हूं अपने खोल में
रूह कांप जाती है
और कांप जाता है पंजर
हर तरफ दिखता है
सिर्फ़ उजाड़ और बंजर।
सोचा था,
मेरी आवाज़ पर जुटेंगे लोग
पर देखो
गिद्धों की टोली में
मैं अकेला
और निरीह खड़ा हूं
खड़ा भी कहां
सिर्फ़ पड़ा हूं
सड़ा हूं, सड़ा हूं और सचमुच सड़ा हूं
पर अपनी बात पर
अब भी अड़ा हूं
कि थके-हारे लोग
आज नहीं तो कल
जुटेंगे
हमें तोड़ने की चाह रखनेवाले
ख़ुद टूटेंगे
अपनी इसी आस्था के कारण
उनकी छाती में मैं
कील-सा गड़ा हूं
मुझे समझाने वाली भाषा के लिए
मैं चिकना घड़ा हूं
महसूस करता हूं
कि किसी भी साजिश के ख़िलाफ
वाकई मैं बड़ा हूं
देखो यारो, देखो
एक बार फिर मैं
पूरी ढिठाई के साथ खड़ा हूं।
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
at
11:28 AM
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Monday, April 7, 2008
तेरे साथ का मतलब
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
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10:22 AM
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Tuesday, April 1, 2008
डेथ नोट

पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
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8:46 PM
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Monday, March 31, 2008
पाश की निगाह में भगत सिंह
भगत सिंह और पाश की शहादत की तारीख़ एक ही है पर वर्ष अलग। वैसे, पंजाबी कवि पाश अपने जीवनकाल में क्रांतिकारी देशभक्त भगत सिंह को बेहद पसंद करते रहे होंगे, इसमें शक़ नहीं। 23 मार्च 1982 को पाश ने भगत सिंह को कुछ यूं याद किया था :
उसकी शहादत के बाद बाक़ी लोग
किसी दृश्य की तरह बचे
ताज़ा मुंदी पलकें देश में सिमटती जा रही झाकी की
देश सारा बचा रहा बाक़ी
उसके चले जाने के बाद
अपने भीतर खुलती खिड़की में
लोगों की आवाज़ें जम गईं
उसकी शहादत के बाद
देश की सबसे बड़ी पार्टी के लोगों ने
अपने चिहरे से आंसू नहीं, नाक पोंछी
गला साफ़ कर बोलने की
बोलते ही जाने की मशक की
उससे संबंधित अपनी उस शहादत के बाद
लोगों के घरों में, उनके तकियों में छिपे हुए
कपड़े की महक की तरह बिखर गया
शहीद होने की घड़ी में वह अकेला था ईश्वर की तरह
लेकिन ईश्वर की तरह वह निस्तेज न था।
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अनुराग अन्वेषी
at
1:13 AM
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Friday, March 28, 2008
पाश का 'लोहा'
आप लोहे की कार का आनंद लेते हो
मेरे पास लोहे की बंदूक है
मैंने लोहा खाया है
आप लोहे की बात करते हो
लोहा जब पिघलता है
तो भाप नहीं निकलती
जब कुठाली उठाने वालों के दिल से
भाप निकलती है
तो पिघल जाता है
पिघले हुए लोहे को
किसी भी आकार में
ढाला जा सकता है
कुठाली में देश की तकदीर ढली होती है
यह मेरी बंदूक
आपके बैंकों के सेफ;
और पहाड़ों को उल्टाने वाली मशीनें,
सब लोहे के हैं।
शहर से उजाड़ तक हर फ़र्क
बहिन से वेश्या तक हर अहसास
मालिक से मुलाजिम तक हर रिश्ता,
बिल से कानून तक हर सफ़र,
शोषणतंत्र से इंकलाब तक हर इतिहास,
जंगल, कोठरियों व झोपड़ियों से पूछताछ तक हर मुक़ाम
सब लोहे के हैं।
लोहे ने बड़ी देर इंतज़ार किया है
कि लोहे पर निर्भर लोग
लोहे की पंत्तियां खाकर
ख़ुदकुशी करना छोड़ दें
मशीनों में फंसकर फूस की तरह उड़नेवाले
लावारिसों की बीवियां
लोहे की कुर्सियों पर बैठे वारिसों के पास
कपड़े तक भी ख़ुद उतारने के लिए मजबूर न हों।
लेकिन आख़िर लोहे को
पिस्तौलों, बंदूकों और बमों की
शक्ल लेनी पड़ी है
आप लोहे की चमक में चुंधियाकर
अपनी बेटी को बीवी समझ सकते हैं
(लेकिन) मैं लोहे की आंख से
दोस्तों के मुखौटे पहने दुश्मन
भी पहचान सकता हूं
क्योंकि मैंने लोहा खाया है
आप लोहे की बात करते हो।
पेशकश :
अनुराग अन्वेषी
at
2:12 PM
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Tuesday, March 25, 2008
पाश को मार कर भी नहीं मार सके आतंकवादी
यह हैं पाश। अवतार सिंह संधू 'पाश'। आज से बीस साल पहले (23 मार्च 1988 को) खालिस्तानी आतंकवादियों ने इनकी हत्या कर दी थी। इस पंजाबी कवि का अपराध (?) यही थी कि यह इस जंगलतंत्र के जाल में फंसी सारी चिड़ियों को लू-शुन की तरह समझाना चाह रहे थे। चिड़ियों को भी इनकी बात समझ आने लगी थी। और वे एकजुट होकर बंदूकवाले हाथों पर हमला करने ही वाली थीं कि किसिम-किसिम के चिड़ियों का हितैषी मारा गया। उस वक्त पाश महज 37 बरस के थे।वैसे, यह बेहद साफ़ है कि कोई भी किसी की हत्या तभी करता है, जब उसे सामनेवाले से अपने


मैं जानता हूं 

