जिरह पढ़ें, आप अपनी लिपि में (Read JIRAH in your own script)

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जिरह करने की कोई उम्र नहीं होती। पर यह सच है कि जिरह करने से पैदा हुई बातों की उम्र बेहद लंबी होती है। इसलिए इस ब्लॉग पर आपका स्वागत है। आइए,शुरू करें जिरह।

Tuesday, June 30, 2009

दफ्तर में करने को कुछ नहीं, ये है न !

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Tuesday, June 2, 2009

सात सुरों की धुन (पापा का ब्लॉग)

साथियो, आज से मेरे पापा ने भी ब्लॉगिंग शुरू कर दी। ब्लॉग का नाम रखा है सात सुरों की धुन। उनका इरादा है कि इस ब्लॉग पर वह अपनी कविता, गीत और गजल पोस्ट किया करेंगे। लेख, कहानी, आलोचना या समीक्षा के लिए एक दूसरा ब्लॉग वह तैयार कर रहे हैं। उसका नाम दिया है उन्होंने - जो अनकहा रहा।
तो फिर आप देखें उनका पहला ब्लॉग - सात सुरों की धुन

Wednesday, May 27, 2009

आप भी देखें मेरी दुर्दशा


रमणजीत के हर इलस्ट्रेशन में एक नई चमक दिखती है, एक नया आयाम दिखता है। उन्होंने मेरे आग्रह पर यह इलस्ट्रेशन तैयार किया। और सच कहूं तो इस इलस्ट्रेशन को देखने के बाद मेरा परिचय मेरे चेहरे की कुछ लकीरों से हुआ। कितना रोमांचक होता है अपने चेहरे को दूसरे के ब्रश से जानना! वाकई, रमणजीत बढ़िया कलाकार हैं।

Thursday, May 7, 2009

मत करें दान, करें मतदान

गीदड़ कहता शेर से
नया जमाना देख
एक वोट तेरा पड़ा
मेरा भी है एक

पता नहीं किसकी पंक्तियां हैं यह। पर यह सच है कि वह जमाना लद गया जब शेर जैसे लोग बाकी तमाम लोगों को गीदड़ सरीखा समझते थे। अपनी गीदड़ भभकियों से सबको डराते फिरते थे। साथियो, लोकतंत्र का यह पर्व इस बार हमारे लिए शर्मनाक हादसा न बने, इसके लिए बेहद जरूरी है कि हम अपनी खोल से बाहर निकलें। विचार करें, अंधों की जमात में बैठे किस काने राजा को वोट देना है। ऐसे ही बदलेंगी स्थितियां। आज अंधों में काना राजा दिख रहे हैं कल कानें राजाओं के बीच आंख वाले सेवक दिखलायी देंगे। इस बदल रही व्यवस्था को पूरी तरह हम और आप ही बदल सकते हैं इसलिए वाकई यह जरूरी है कि तमाम जरूरी काम को हाशिये पर रख इस जरूरी महापर्व में हम शरीक हों। अंत में कहना सिर्फ इतना है कि मत करें दान, करें मतदान।

Wednesday, May 6, 2009

संकोच में फंस गया हूं

नमिता जोशी मेरी अच्छी दोस्त हैं। उन्होंने मुझे एक मेल किया और जिद ठान ली कि इसे मैं पोस्ट के रूप में अपने ब्लॉग पर डालूं। संकोच के साथ मैं उनकी इस जिद भरी गुजारिश पूरी कर रहा हूं।

-अनुराग


आज आप सब लोग जिरह के सरताज अनुराग अन्वेषी जी को जन्मदिन की शुभकामनाये दे सकते हैं. आज ही के दिन इस कलाकार ने इस धरती पर कदम रखा था. शब्दों के जादूगर अनुराग को मेरी ओर से happy Birthday .. इसके साथ ही आज के दिन आप सब यह भी बताये की अनुराग जी के बारे में आप क्या सोचते हैं...
-namita

Sunday, May 3, 2009

आगरा हो या दिल्ली : हालात हर जगह एक से हैं

नमिता शुक्ला को दिल्ली आए हुए अब साल भर होने जा रहा है। स्वभाव से वह निर्भीक हैं और पेशे से पत्रकार। वह मानती हैं कि डर नाम का भाव हम सबों के भीतर बसा होता है। और कोई भी छोटी-सी घटना उस डर को उभार सकती है। तकरीबन दो साल पहले आगरा के एक अखबार से बतौर क्राइम रिपोर्टर उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की थी। वहां वह फोटोग्राफर की भूमिका भी निभाती थीं। आगरा का एक संस्मरण वह यहां शेयर कर रही हैं।

-अनुराग अन्वेषी

बा

त दो साल पहले की है, मैंने आगरा में नौकरी ज्वॉइन की थी। रहने का ठौर मिला था मौसी के पास। मेरे घर के लोग भी इतमिनान में थे कि चलो, बेटी अपनी मौसी के घर में रह रही है। मौसी का घर सिकंदरा में था जबकि मेरा ऑफिस संजय प्लेस में। दिन भर की नौकरी बजा कर रात तकरीबन 8 बजे घर लौटती थी अपनी एक्टिवा बाइक से। सब कुछ सामान्य चल रहा था। एक रोज मुझे ऑफिस से निकलने में थोडी देर हो गयी। तकरीबन 8:30 बजे मैं घर के लिए निकली। सिकंदरा हाइवे से होते हुए घर जा रही थी।

थोडी देर बाद ही मुझे लगा कि कोई गाड़ी मेरा पीछा कर रही है। मैंने पीछे मुड़कर देखा तो मेरा शक सही निकला। एक टाटा सूमो में बैठे कुछ लोग मेरा पीछा कर रहे थे। मैंने अपनी एक्टिवा की स्पीड बढ़ा दी। इसके साथ ही टाटा सूमो की भी स्पीड बढ़ गयी। अनिष्ट की आशंका से पलक झपकते ही मेरा मन बुरी तरह घबरा गया। बगैर विचारे मेरी गाड़ी की स्पीट 70-80 होने लगी। पर यह काफी नहीं थी। सूमोसवार मेरी बगल में पहुंच चुके थे। उसमें से कुछ लड़के सिर बाहर निकालकर चिल्लाने लगे। उस वक्त मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे। लेकिन शायद मुसीबत सामने होती है तो हिम्मत अपने आप ही आ जाती है। मैंने गाड़ी की स्पीड और बढा दी। अपनी अब तक की लाइफ में सबसे तेज़ गाड़ी उसी दिन चलायी थी। सिकंदरा आने से कुछ पहले ही रास्ते में पंछी पेठे कि दुकान पड़ती है। मैंने देखा वहां काफी लोग खड़े हैं, दुकान पर अच्छी खासी भीड़ थी। वहां मैंने अपनी गाड़ी रोक दी। दुकान पर भीड़ देख सूमो वाले आगे निकल गये।

हिम्मत नहीं हो रही थी पर मैंने घर जाने के लिए शॉर्टकट रास्ते का इस्तेमाल किया। सकुशल घर पहुँचते ही सबसे पहले छत पर गयी और खूब रोई। मुझे उस वक्त घर के एक-एक लोग बेहद याद आए। उस दिन मुझे अहसास हुआ कि समाज चाहे कितना भी प्रगतिशील क्यों न हो जाए, हम लड़कियां कई बंधनों में जकड़ी हैं। असुरक्षा का टोप पहन हमें इस आजाद समाज में रहना है...

Thursday, April 30, 2009

ब्लॉगर साथियो से अपील

साथियो,
अभिनीत मेरा भांजा है। उम्र से महज 12 साल, पर बुद्धि से 21 साल वालों बड़ा। पटना में रहता है। सेवेंथ का स्टूडेंट है। बगैर किसी की मदद के उसने बना लिया है अपना ब्लॉग। खास बात यह कि उसे ब्लॉग बनाने की प्रेरणा मिली अपनी मां को ब्लॉगिंग करते देख, जो पेशे से डॉक्टर हैं। कहना पड़ेगा एक बार फिर कि वाकई किसी बच्चे की पहली शिक्षिका मां ही होती है। एक बाल मन का ब्लॉग कैसा होता है - देखना हो तो एक बार जरूर देखें : गिरह
मेरी गुजारिश है कि गिरह पर जाकर अपनी राय से अभिनीत को जरूर अवगत कराएं। जाहिर है इससे उसका हौसला बढ़ेगा।

Tuesday, April 21, 2009

मां की गोद का जादू

आज पता नहीं क्यों, सुबह से ही मन काफी अशांत था। बचपन की तमाम यादें सिरहाने आकर बैठ गयी थीं। उन दिनों में लौटने को जी मचल-मचल जा रहा था। पर यह मुमकिन न था। इन सब के बीच मां बेतरह याद आती रही। जाहिर है मेरी बेचैनी दुनी हो गई। क्या करता, अपनी पुरानी कविताएं पढ़ने लगा। इसी बीच मां को याद कर लिखी कविता मेरे सामने आ गई। हालांकि वह कविता इस ब्लॉग पर काफी पहले डाल चुका हूं, पर एक बार फिर से इसे दूसरे रूप में आपके सामने रखने की चाह हुई।


दिल्ली इज नॉट सेफ फॉर गर्ल्स


डर सिर्फ स्त्रियों को ही नहीं लगता, डरते पुरुष भी हैं इस माहौल में। आने वाले दिनों में इस ब्लॉग पर पुरुषों के भी ऐसे अनुभव आपको पढ़ने को मिलेंगे। फिलहाल कात्यायनी उप्रेती ने अपना यह अनुभव हम सबों के लिए लिख भेजा है। वह दिल्ली में रहकर पत्रकारिता कर रही हैं :

-अनुराग अन्वेषी

दि

दिल्ली इज नॉट सेफ फॉर गर्ल्स'। राजधानी में लड़कियों की सेफ्टी पर जब भी बात उठती है, इसी लाइन से शुरू होकर इसी पर खत्म होती है। लड़कियों से पूछा जाए, तो शायद हर लड़की किसी न किसी ऐसी घटना से गुजरी है, जिसे हमारा कानून 'क्राइम' कहता है। खुद की बात करूं, तो जब भी इस इश्यू पर सोचती हूं, तो मुझे मेरे और दोस्तों-परिचितों के कई अनुभव याद आते हैं। वे अनुभव जो बार-बार कहते हैं कि इस समाज का बड़ा हिस्सा आज भी लड़कियों को ऑब्जेक्ट मानता है।

अभी कुछ दिनों पहले की तो बात है। मेरा ऑफ डे था और इंडियन हैबिटैट सेंटर में शाम 7 बजे से एक प्रोग्राम। जाने का मन था लेकिन दिमाग ने सवाल किया - लौटने में प्रॉब्लम तो नहीं होगी? मन ने कहा - चल यार...। दिन में मां से फोन पर बात हुई, तो प्रोग्राम की बात निकल गई। वह फट से बोली - रहने दे, रात हो जाएगी... वैसे भी दिल्ली सेफ नहीं। खैर, मैं चली गई। प्रोग्राम और लोगों से मुलाकातें अच्छी लगीं। लेकिन मेरी नजरें रह-रहकर घड़ी देखने लग जाती थी। रात 8:30 बजे मैं मेन रोड पर थी। सड़क पर अभी लोग दिख रहे थे। तीन ऑटो दिखे, मजबूरी का फायदा उठाने के लिए तैयार, अपने दोगुने दामों के साथ। मैंने बस से जाना तय किया। कुछ कदम आगे रोड के किनारे एक गाड़ी के सामने खड़े 32-33 साल के शख्स से पूछा - एक्स्क्यूज मी, सामने जो स्टैंड है वहां से साउथ एक्स के लिए बस मिलेगी? आदमी ने एक चीप स्माइल पास की और बोला - कितने पैसे दोगी मैडम, मैं अपनी ही गाड़ी में छोड़ दूंगा। देखने से वह गाड़ी का ड्राइवर लगा। मेरे भीतर गुस्सा और डर ने फौरन सिर उठाया। उसकी बेशर्म मुस्कान बरकरार थी और वह जवाब के इंतजार में था। उसके चेहरे के भाव देखकर मेरे डर को ओवरटेक करता हुआ गुस्सा मेरे पास आ गया, जिसने हिम्मत जनरेट कर दी और मैंने कहा - अभी 100 नंबर पर फोन करूंगी, पुलिस की गाड़ी फ्री में घर छोड़ेगी। यह सुनते ही फट से वह दूसरी गाडिय़ों के पीछे होते हुए ओझल हो गया। एक मिनट बाद मैं स्टैंड में थी और दो मिनट बाद एक ठसी बस में। बस में चढ़ते ही मैंने अपने जेंडर की तलाश की। दो दिखीं तो चैन मिला। घर पहुंचते ही सही सलामत घर पहुंचने की खबर मां को दी।

ऐसे छोटे-छोटे मामले तो हम लड़कियां तकरीबन हर रोज झेलती हैं। कई बार सोचती हूं कि चलो अच्छा है, इसी बहाने कुछ बुरे लोगों को डराने का गुर तो सीख हैं हम। पर इसी के साथ दूसरा ख्याल आता है कि ये छोटे मामले ही कई बार बड़े बन जाते हैं। सड़क छाप मजनुओं को डराने की कोशिश कई बार किसी बड़ी मुसीबत खड़ी कर देती है। जाहिर है इस शहर में हर लड़की अंधेरे में तो क्या, उजाले में भी खुद को सेफ नहीं मानती। लड़कियां हैरान, परेशान, सावधान हैं। उनके लिए शाम को अकेले निकलना, ऑटो लेना, दिन में भी सुनसान सड़क में जाना जैसी तमाम चीजों के आगे 'अवॉइड करें' जोड़ दिया जाता है। लेकिन अवॉइड करना क्या सही सॉल्यूशन है? इससे तो वे दुनिया के कई पहलुओं से महरूम हो जाएंगी। आखिर हम अपने इस लापरवाह सिस्टम के लूपहोल्स को कैसे भर सकते हैं? लड़कियों की सिक्युरिटी को लेकर बना हर नियम-कानून इम्प्लिमेंटेशन मांगता है। इन नियम-कानून को इंम्प्लिमेंट करवाने वाले जब तक एक्टिव नहीं होंगे और जब तक इन्हें तोडऩे वालों को तुरंत सजा नहीं मिलेगी, तब तक लड़कियां अवॉइड करेंगी। फिर चाहे वह शाम को घर से निकलना हो या बस में लगने वाले अननैचरल धक्का। और जब भी वे इस दुनिया में अपने सपनों को पाने के लिए बाहर निकलेंगी, समाज के ये सभ्य पुरुष उन्हें घेरेंगे और इस शहर को 'दिल्ली इज नॉट सेफ फॉर गर्ल्स' का दर्द सहना पड़ेगा।

Friday, April 17, 2009

मैंने रंजू की कविता चुराई

आज मैंने रंजना भाटिया की कविता चुरा ली। वह कविता जो उन्होंने अपने ...वें जन्मदिन (उम्र नहीं बतायी जाती) पर लिखी थी। उनकी ही कविता उन्हें जन्मदिन पर गिफ्ट कर रहा हूं।

Wednesday, April 15, 2009

हुस्न हाजिर है

हुस्न हाजिर है मुहब्बत की सजा पाने को। पर ये पंक्तियां सुनकर सजा देने के लिए बढ़े पांव जड़ हो जाते हैं। मुझे लगता है... अरे कहां मैं अपनी बात सुनाने में लग गया ! मेरे लगने को मारें गोली, आपको क्या लगता है यह जरूर बताएं...


Monday, April 13, 2009

हां, लगता है मुझे डर

सोनिया वर्मा

मैं
अगस्त 2006 में कानपुर से दिल्ली आई थी। मेरे जैसी न जाने कितनी लड़कियां अपने छोटे से शहर से देश की राजधानी में बेहतर करियर बनाने का सपना संजोए आई होंगी, लेकिन यहां आने के बाद वे भी इस बड़े शहर की कुछ कड़वी सचाइयों से वाकिफ हुई होंगी। यहां शाम होते ही रास्ते में अकेली चल रही लडक़ी का मन न जाने कितनी आशंकाओं से घिर जाता है। मैं डरपोक नहीं, लेकिन हर रोज अखबार में छपी घटनाओं, न्यूज चैनलों में घंटों चलने वाली खबरों ने मेरा मन शंकाओं से जरूर भर दिया है।

अचानक कोई आता दिखा। मेरी धडक़न बढ़ गई। दरवाजा बंद करने को तेजी से उठी तो देखा सामने से प्यून आ रहा था। उसे देखते ही सांस में सांस आई। मैंने उसे जोर से डांटा कि तुम्हें यहां काम करने के पैसे मिलते हैं, बाहर घूमने के नहीं। उसने कुछ जवाब नहीं दिया लेकिन मैं जानती थी कि मैं उसे डांटकर मैंने अपना डरा चेहरा छुपाने की कोशिश की थी।


मन में बढ़ती जा रही असुरक्षा की भावना का नतीजा ही है कि रात तो दूर दिन के उजाले में भी किसी जगह पर अकेली रह जाऊं तो मन में न जाने कितने बुरे ख्याल आ जाते हैं। ऐसा ही कुछ उस रोज हुआ। मास कम्यूनिकेशन में पोस्ट ग्रैजुएशन डिप्लोमा कोर्स करने के बाद एक प्रॉडक्शन हाउस जाइन किया था। मैं न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी में रहती थी और ऑफिस कालकाजी में था, सो आने- जाने में ज्यादा समय नहीं लगता था। उस सुबह करीब आठ बजे अपने ऑफिस के लिए निकली। सुबह की ठंडी हवा प्यारी लग रही थी, अपने ख्यालों में डूबी ऑफिस के पास पहुंच चुकी थी। तभी मेरी नजर ऑफिस के मेन गेट से कुछ कदमों की दूरी पर खड़े दो लोगों पर पड़ी। लड़िकियों को यह सब भी पढ़ाया नहीं जाता, वे तो बड़े होते हुए लोगों की नजरों और उनके छूने की कोशिशों से बचते हुए अपने आप अच्छे और बुरे में फर्क करना सीख लेती हैं। सो मैं भी समझ चुकी थी कि दोनों युवक भले इरादे नहीं रखते थे। मैं तेजी से ऑफिस की ओर बढ़ी। सामने देखा तो शटर बंद था। मैं परेशान होती उससे पहले प्यून आता दिखाई दिया। उसने शटर खोला और मैं अंदर दाखिल हो गई। ऑफिस बेसमेंट में था, उस पर मेरा केबिन एकदम आखिर में। मैंने केबिन में पहुंचर लंबी सांस ली। क्योंकि शनिवार था इसलिए बाकी साथी कुछ लेट आने वाले थे। अचानक मन में ख्याल आया कि इस वक्त इलाके में न तो ज्यादा चहल-पहल है और न ही साथ के ऑफिस खुले हैं। ऐसे में अगर दो बदमाश दिख रहे लोग यहां घुस आए तो मेरी तो चीख तक बाहर नहीं जा पाएगी। ये सोचते ही मैं झट से फ्रंट ऑफिस में आ गई। यहां आई तो देखा प्यून न जाने कहां गायब हो गया था।

मैंने नजरें सामने के शीशे पर टिका दीं, जहां से आने-जाने वाले साफ दिख सकते थे। दिल जोर से धडक़ रहा था। मुझे पसीना आ गया। न जाने कितनी खबरें याद आ गईं। पहले सोचा ऑफिस का दरवाजा अंदर से बंद कर लूं, फिर सोचा ऐसे बात-बात पर घबरा जाना बेवकूफी है। कुछ देर बाद तो सब आ ही जाएंगे और फिर यह वही ऑफिस है जहां रोजाना घंटों गुजारती हूं। डरने जैसी कोई बात नहीं, लेकिन डर दूर नहीं हुआ। अचानक कोई आता दिखा। मेरी धडक़न बढ़ गई। दरवाजा बंद करने को तेजी से उठी तो देखा सामने से प्यून आ रहा था। उसे देखते ही सांस में सांस आई। मैंने उसे जोर से डांटा कि तुम्हें यहां काम करने के पैसे मिलते हैं, बाहर घूमने के नहीं। उसने कुछ जवाब नहीं दिया लेकिन मैं जानती थी कि मैं उसे डांटकर मैंने अपना डरा चेहरा छुपाने की कोशिश की थी। अपने ऑफिस में कुछ घंटे जल्दी पहुंच जाना किसी मुसीबत की वजह नहीं है। लेकिन हादसों को ऐसे ही कुछ मिनटों की दरकार होती है।

Tuesday, April 7, 2009

दिल्ली में डरा-सहमा मन- 2

डर एक मनोभाव है, बेहद स्वाभाविक मनोभाव। पर जब यह दूसरे मनोभावों पर हावी होने लगे, तो बात चिंताजनक होने लगती है। लड़कियों का मन बेहद कोमल होता है, बल्कि कहना यह चाहिए कि मन के दो रूप हैं - कोमल और कठोर। कोमल मनोभाव स्त्री मनोभाव है और कठोर, पुरुष मनोभाव। जरूरी नहीं कि यह कठोर तत्व पुरुष शरीर में ही मौजूद हो और कोमल तत्व स्त्री शरीर में। जाहिर है कहना यह चाहता हूं कि दिल्ली हो या मुंबई, रांची हो या करांची - हर तरफ यह कोमल मन डरा सहमा है। फिलहाल, पेश है दीपा पवार का एक संस्मरण। वह पेशे से पत्रकार हैं। :

-अनुराग अन्वेषी


खबार पढ़ने की जब लत लग रही थी, मेरा सबसे ज्यादा ध्यान क्राइम की खबरों पर जाता था। लूट, चोरी और छेड़खानी जैसी छोटी खबर भी मुझे बहुत बड़ी लगती थी। उन दिनों भी अखबार रेप, अपहरण, छेड़छाड़, लूट और हत्या की खबरों से अंटे रहते थे। इन खबरों को पढ़ने के बाद इनसानी रिश्ते मुझे बकवास की तरह लगने लगते। सारा शहर मुझे जानवर सरीखा लगने लगता। फिर जब मन खबरों से बाहर आता, मैं खुद से जिरह करती। कई बार लगता था कि ये स्त्रियां खुद को इतना कमजोर क्यों मानती हैं? डटकर मुकाबला क्यों नहीं कर सकतीं? आखिर बस जैसी सार्वजनिक जगह में कोई कैसे किसी को छेड़कर बच निकलेगा? जरा-सा शोर मचाने की हिम्मत तो महिलाओं में होनी ही चाहिए, फिर देखें वे कि कैसे इन मजनुओं का कचूमर निकालती है पब्लिक। पर धीरे-धीरे ये खबरें मेरे लिए आम होती गईं। अपनी ओर ध्यान भी नहीं खींच पाती थीं वे, पढ़ने के लिए बाध्य करना तो दूर की बात। एक तरह से मान बैठी कि डरपोक स्त्रियों की नियति है यह।

वक्त बीतता रहा और ऐसी खबरों को जीवन के हाशिये पर छोड़ती चली। अचानक एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि मेरे भीतर मर चुका डर अचानक अपना सिर उठा बैठा। मैं ब्लूलाइन बस में बैठकर सीपी जा रही थी। दिन का वक़्त था। फिर भी बस में बहुत कम मुसाफिर थे। ड्राइवर, कंडक्टर और उनके एक साथी के आलावा कुल 5-6 लोग। बसों में आना-जाना सामान्य सी बात थी मेरे लिए। जब मैं बस में बगैर किसी साथी के होती हूं तो अक्सर किसी न किसी विषय पर सोचती रहती हूं। उस दिन भी किसी टॉपिक पर खुद से विचार-विमर्श कर रही थी। अचनाक मैंने महसूस किया कि बस के कंडक्टर ने अपने साथी को कुछ इशारा किया। कंडक्टर ठीक मेरे आगे वाली सीट पर बैठा था। मुझे लगा कंडक्टर का यह इशारा कुछ मुझसे जुड़ा है। यह सब कुछ सोच ही रही थी कि अगले पल उसका साथी जो दूसरी तरफ बैठा था, उसने मेरी ओर देखा फिर कंडक्टर की ओर देख कर उसे उसने ओके का इशारा किया। मेरी चेतना जो तभी से मुझसे बहस करती चल रही थी, वह इस पल भर के इशारों पर आकर केंद्रित हो गई। कंडक्टर और उसके साथी का इशारा मुझे बेहद भद्दा और डरावना लगा। अब बस का ड्राइवर भी मुझे घूरने लगा था। मैं बस में आगे ही बैठी थी, इसलिए मुझे यह भी ध्यान नहीं था कि बस में अब कितने मुसाफिर बैठे हैं। मुझे लगा कि कहीं बस में मैं अकेली तो नहीं बच गई हूं? बेहद तनाव में आ चुकी थी मैं। ड्राइवर, कंडक्टर और उसके साथी आपस में फूहड़ हंसी-मजाक कर रहे थे। इस बीच मैंने उनसे अपनी आंखें चुरा बस में बैठे यात्रियों की संख्या का जायजा लिया। थोड़ी राहत मिली। बमुश्किल 5 लोग बैठे थे। सवारियों में एक लड़की को देखकर जान में जान आयी। मैंने उसी वक़्त फैसला किया कि जहां यह लड़की उतरेगी मैं भी वहीं उतर जाऊंगी। मुझे बारहखंबा रोड जाना था। पर उनके इशारों और फूहड़ हंसी-मजाक ने मुझे इतना चिंतित कर दिया था कि मैं तिलक ब्रिज पर ही उस लड़की के साथ उतर गयी। उसके बाद मैंने डीटीसी की भरी हुई बस से आगे का सफर तय किया।

इस छोटी-सी घटना के बाद घर लौटकर मैंने अपने डर का विश्लेषण किया।

मैं क्यों डरी, मेरे पास तो मोबाइल फोन है। किसी अयाचित स्थिति में मैं 100 नंबर डायल कर पुलिस को बुला सकती थी।

- दरअसल, कई खबरें पढ़ चुकी हूं ऐसी कि मदद के लिए 100 नंबर पर कॉल करते रहे पीड़ित और पुलिस मौके पर पहुंची डेढ़-दो घंटे बाद।

ठीक है कि 100 नंबर का भरोसा बहुत मजबूत नहीं है। पर खुद पर तो भरोसा है न, इतना आतंकित होने की जरूरत क्या थी?

- खबरें बताती हैं कि दिनदहाड़े हत्या हुई, पर आश्चर्य, किसी को नहीं दिखता हत्यारा। न पकड़ पाते हैं, न उसके खिलाफ गवाही देते हैं। मेरी मदद को कौन आता?

रही बात आतंकित होने की, तो स्त्री होने का अहसास, उसकी मजबूरियां, उसकी सीमाएं जो घुट्टी के तौर छुटपन से ही पिलाई जाती हैं, उसी का नतीजा था मेरा डर। यह अलग बात है कि मैंने अपनी इच्छा शक्ति से, अपने साथियों की हौसलाआफजाई से और अपनी समझदारी से उस डर को मार दिया था, पर उसे अपने से बाहर नहीं कर पाई थी। और जैसे ही मैं थोड़ी कमजोर पड़ी कि वह डर सिर उठाकर सामने आ खड़ा हुआ। पर मुझे खुशी है कि मैं अतिविश्वास की शिकार नहीं, मैंने बिल्कुल सही फैसला किया तिलक ब्रिज पर उतरने का। आपका क्या ख्याल है?

Saturday, April 4, 2009

दिल्ली में डरी-सहमी लड़कियां

नौकरीपेशा लड़कियों के करेक्टर पर दबी जुबान चर्चा हमेशा होती रही है, अगर नौकरी की अनिवार्य शर्त हो नाइट शिफ्ट, तब तो चर्चा ज्यादा रंगीन हो जाया करती है। पर इन नौकरीपेशा लड़कियों की परेशानियों की चर्चा को यह समाज हमेशा हाशिये पर रख कर चला है। देश की राजधानी में नाइट शिफ्ट में काम करने वाली ऐसी ही दो लड़कियों की हत्या अभी हाल के महीने में हुई है, यह अलग बात है कि दोनों हत्याकांड के अभियुक्त पकड़े जा चुके हैं। इन हत्याओं के बाद इस महानगर की लड़कियों के भीतर कैसा डर घर कर गया है - यह सवाल भी मीडिया में अपनी जगह बनाता रहा। मीडिया में स्पेस की कमी है, इसलिए वहां विस्तार से ऐसे मुद्दों पर बात नहीं होती। पर ब्लॉग में यह चर्चा की जा सकती है। आज एक ऐसी ही लड़की की बात इस ब्लॉग पर रख रहा हूं, जो पेशे से पत्रकार हैं। पर इन दो हत्याकांड के बाद उनका विश्वास भी एक रात डगमगा गया, जब बारिश हो रही सड़क पर उन्होंने खुद को अकेला पाया। परिचय और नाम जानबूझ कर नहीं दे रहा हूं। क्योंकि मकसद शख्स को सामने लाना नहीं, बल्कि आशंका और उस डर को सामने लाना है जो इस राजधानी की आबोहवा से बना है :

-अनुराग अन्वेषी


हां,

यह सही है कि अब मैं उस डर से उबर चुकी हूं। पर वह बीस-पच्चीस मिनट का अकेलापन मुझे ताउम्र याद रहेगा। इस घटना से पहले मैं नहीं जानती थी कि डर कहते किसे हैं। पर उस पच्चीस मिनट ने सिखाया कि अकेली लड़की कैसे डरती होगी किसी सुनसान सड़क पर बांह पसारे पेड़ों की छाया से। दिल्ली के मिजाज का कोई भरोसा नहीं, कब वह झुलसा देने वाली गर्मी बरसाने लगे और कब, शुरू हो रही गर्मी पर बारिश की फुहार छोड़ दे।

अभी चंद रोज पहले की ही तो बात है। जिगीषा मर्डर केस सुर्खियों में रहा था। ऑफिस हो या घर - हर तरफ इस केस की ही चर्चा थी। नाइट शिफ्ट ड्यूटी का डर। लड़की होने का डर। इन चर्चाओं में मैंने भी हिस्सा लिया था लेकिन तब तक किसी डर को कभी महसूस नहीं किया था और ही वह मुझे छू पाया था कभी। यहां तक कि जिगीषा हत्याकांड के बाद जब कामकाजी लड़कियॊं की सेफ्टी पर स्टॊरी लिखने के लिए कहा गया, तब मैंने अपने बॉस से पूछा कि फिर उसी पुराने राग को अलापने से कोई लाभ होगा? उन्होंने कहा कि तुम एक्सपर्ट्स से ये बात करो कि सोल्युशन क्या है। तब मैंने पूछा था कि क्राइम क्या सिर्फ लड़कियॊं के ही साथ हो रहा है। अगर नहीं तो फिर क्यों ये सब बार-बार लिखकर लोगों को डराएं। इस पर उन्होंने समझाया कि नहीं, क्राइम हर किसी के साथ हो रहा है लेकिन लड़कियों को सॉफ्ट टारगेट मान कर बदमाश उन पर आसानी से हमला कर देते हैं। मैं उनकी बात से कनविंस नहीं हुई थी, पर हां, स्टोरी जरूर लिख दी।

लेकिन उस शाम प्रोग्राम खत्म होने के बाद होटल अशोक से 8:30 बजे जब बाहर निकली, हल्की बारिश हो रही थी। इस इलाके में सन्नाटा पसरने लगा था। पर खुद पर इतना भरोसा था कि सड़क पर निकल आई। सोचा कि बारिश रुकने का इंतजार करने से बेहतर होगा कि ऑटो लेकर ऑफिस पहुंच जाऊं। ऑटो के चक्कर में सड़क पर आगे बढ़ती गई। अब तक बारिश तेज हो चुकी थी, अंधेरा और आंधी भी बारिश का साथ दे रहे थे। दूर-दूर तक सड़क पर सन्नाटा पसरा था। अंधेरा ऐसा कि परिचित जगह भी अनजान लगने लगे। मुझे यह अंदाजा भी नहीं लग रहा था कि मैं सही सड़क पर चल रही हूं या गलत। पंद्रह मिनट तक तो मेरे दिमाग में सिर्फ जल्दी ऑटॊ मिलने का ख्याल था, लेकिन खराब मौसम की वजह से ऑटॊवाले भी आते-जाते नहीं दिख रहे थे। जो एक-दो दिखे, उन्होंने जाने से इनकार कर दिया। अब तक मैं काफी आगे निकल आई थी। सड़क के अंधेरे को कभी कभार चीर दे रही थीं गुजरने वाली बड़ी गाड़ियों की मुंह चिढ़ाती लाइटें। ऐसे में अब मुझे घबराहट होने लगी थी।

घबराहट इस कदर बढ़ गई कि घर के लोग याद आने लगे। मीडिया में पसरे जोखिमों की वजह से यह नौकरी करने की पापा की सलाह याद आने लगी। जॉब छोड़कर पढ़ाई पूरी कर लेने की भाई की नसीहत बुरी नहीं लगी इस वक्त। और बॉस की बात कानों में गूंजने लगी कि लड़कियों को बदमाश सॉफ्ट टारगेट समझते हैं। सब कुछ दिमाग में घूमने लगा और समझ नहीं पा रही थी कि क्या करूं। उस वक्त मैं जरूरत से ज्यादा चौकन्नी हो गई थी। पेड़ों के बीच से तेज हवा के गुजरने से आती सांय-सांय की आवाज मेरे भीतर और घबराहट पैदा करने लगी। बांह पसारे खड़े लंबे पेड़ दैत्य की तरह लगने लगे। कोई गाड़ी दूर से आती दिखती, तो सांसें थम जाती। अपने आत्मविश्वास को बनाए रख मैं अब भी आगे बड़ी जा रही थी पर पता नहीं क्यों मुझे रोना रहा था। अपने को समझाने की कॊशिश कर रही थी कि मैं रिपॊर्टर हूं, मुझे ऎसे डरना नहीं चाहिए। लेकिन फिर ख़याल आता - आखिर हूं तॊ लड़की ही। जर्नलिस्ट सौम्या का चेहरा आंखों के सामने से गुजर जाता। डिवाइडर से टकरा कर रुकी उसकी कार दिखने लगी। जिगीषा का नाम ध्यान आते ही मेरे घबराहट दोगुनी हो गई। उस डर के साथ गुस्सा भी बहुत रहा था घरवालॊं की बात मानने के लिए अपने आप पर। और लड़कियां सॉफ्ट टारगेट हॊती हैं यह जानते हुए ऑफिस से रात में अकेले रिपोर्टिंग के लिए भेजने के फैसले पर। अचानक दिमाग में आया कि बहुत हॊ गई ये नॊकरी अब और नहीं। फिर मैंने बॉस को फोन लगाया। अपनी हालत बताई। बॉस ने तुरंत ही एक कलिग को मेरा लोकेशन बता निकलने का आदेश दिया और फिर लगातार मेरे से फोन संपर्क में रहे।

यह ठीक है कि अब मैं उस रोज के डर से उबर चुकी हूं। और यह मैं खूब अच्छी तरह से जानती हूं कि रिपोर्टिंग के ऐसे अवसर आते ही रहेंगे और मैं जाती भी रहूंगी। पर इस शहर की व्यवस्था से उपजे सवाल का कोई जवाब मैं ढूंढ़ नहीं पा रही हूं कि देश की राजधानी में अगर लड़कियां इस कदर डर का शिकार बनी हैं, तो देश के दूसरे हिस्सों का क्या हाल होगा?

Monday, March 23, 2009

हर तरह की गैरबराबरी के खिलाफ


कि
सी व्यक्ति को क्या सिर्फ इसलिए याद कर लेना चाहिए कि आज उसका जन्मदिन है; या इसकी कोई दूसरी वजह भी हो? सच बात तो यह है कि हर दिन कई-कई लोगों का जन्मदिन होता है, लेकिन हम सिर्फ उन्हें ही याद करते हैं जिन्होंने ऐसा कोई सकारात्मक काम किया होता है, जिससे देश-काल उनका ऋणी हो गया हो। इस अर्थ में यह हमारा नैतिक दायित्व होता है कि हम उन्हें याद करें। पर लोहिया के लिए यह तर्क अधूरा लगता है। उन्हें सिर्फ इसलिए याद नहीं किया जाना चाहिए कि यह हमारा नैतिक दायित्व है बल्कि इसलिए भी किया जाना चाहिए कि उन्होंने हमें जीने के कई सार्थक और नये मानदंड भी दिये।

हमें डॉ. लोहिया को इसलिए भी याद रखना चाहिए कि आज भी समाज को लोहिया की जरूरत है। कोई भी समाज जब थक-हार जाता है, उसके तेवर चुकने लगते हैं, उसकी ऊर्जाएं शेष होने लगती हैं
लोहिया नास्तिक थे और गांधी पूर्णतः आस्तिक। गांधी की ईश्वरीय आस्तिकता ऐसी गहरी थी कि मृत्यु के क्षणों में भी उनके आराध्य का नाम उनकी जुबान पर था। किंतु लोहिया ऐसी किसी भी ईश्वरीय शक्ति के प्रति पूरी तरह नास्तिक थे। लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि वे आस्थावान नहीं थे। उनकी आस्था उन्हें गहरे जोड़ती थी - मनुष्यों से, इनसानियत से। उनकी यह आस्था इतनी गहरी थी कि सान्निपातिक क्षणों में भी वे जब-तब भूखे-लाचारों के बारे में बड़बड़ा उठते थे। उनकी आस्था थी - समाज और सुदृढ़ समाज के तेवरों में।
तो लोगों के जीवन में निरर्थकता पनप जाती है और यह वह क्षण होता है जब समाज के भटक जाने की गुंजाइश और आशंका बढ़ जाती है। ऐसी हर गुंजाइश और ऐसी हर आशंका को निराशा के तौर पर महसूसा जा सकता है। ऐसे समय में डॉ लोहिया का आप्त वाक्य 'निराशा के कर्तव्य' और इस शीर्षक के तहत उनका विचार हमें हमारी जिम्मेवारियों का अहसास करता है और निराशा के उन क्षणों में भी दृढ़ता के साथ चलते रहने की प्रेरणा देता है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि डॉ. लोहिया आजाद भारत के सबसे प्रखर और मौलिक राजनीतिक चिंतक होने के साथ ही एक संघर्षशील, कल्पनाशील व सतत सक्रिय राजनेता थे। जरा देखिए कि लोहिया ने कैसी राजनीतिक पार्टी की कल्पना की थी - 'मैं चाहता हूं कि हमारी पार्टी ऐसी हो जाये कि वह पिटती रहे, पर डटी रहे। आखिर वह कौन-सी ताकत थी, जो तीन सौ वर्ष तक ईसाई मजहब को बार-बार पिटने के बाद भी चलाती रही? समाजवादी आंदोलन के पिछले 25 वर्ष के इतिहास को आप देखेंगे, तो पायेंगे कि सबसे बड़ी चीज जिसकी इसमें कमी है, वह यह कि यह पिटना नहीं जानते। जब भी पिटते हैं, धीरज छोड़ देते हैं। मन टूट जाता है। और हर सिद्धांत और कार्यक्रम को बदलने के लिए तैयार हो जाते हैं।'

उनके इसी विचार को अगर हम और विस्तारित अर्थ 'संस्था' के रूप में देखें, तो इसकी प्रासंगिकता आज और जबर्दस्त नजर आयेगी। आज की सामिजिक संस्था मूल्यहीनता के दौर से गुजर रही है। इस इकाई के परिचित चेहरे आत्ममुग्ध और आत्मरति के शिकार हो गये हैं। आत्मश्लाधाओं में जीते ये लोग इतने व्यक्तिवादी होते गये हैं कि हमारी अपनी संस्कृति हाशिए पर आ गयी है।

समाजवादी व्यवस्था के हिमायती थे डॉ. लोहिया। उनकी कामना थी कि वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था की जगह पर नयी समाजवादी व्यवस्ता की स्थापना हो। निजी पूंजी और विषमताओं के खिलाफ लोहिया की यह दृष्टि युगांतकारी थी। पूंजीवादी व्यवस्था के संदर्भ में उनका निष्कर्ष था कि यह व्यवस्था औद्योगिक क्रांति से निकली सभ्यता की संतान है। उनकी दृष्टि यह भी कहती थी कि यह सभ्यता लगातार मरणासन्न है और इसकी जगह पर नयी सभ्यता की स्थापना हर हाल में होनी है। डॉ. लोहिया के भीतर ऐसी आशंका 1950-51 में पैदा हो गयी थी और उन्होंने उसी समय अपने मित्रों के आमंत्रण पर की गयी अमेरिका की यात्रा में कई जगहों पर अपनी इस आशंका को व्यक्त भी किया था। 13 जुलाई 1951 को न्यूयॉर्क के आईडल वाइल्ड हवाई अड्डे पर उन्होंने कहा, 'अमेरिकी जनता के प्रति मेरे मन में बहुत प्यार है, लेकिन आधुनिक सभ्यता के बारे में, जिसकी चरम सीमा अमेरिका है, मेरे मन में कई संदेह हैं। मैं यहां यह देखने आया हूं कि प्रमुख क्या है - प्रेम या संदेह?' 35वें दिन अपनी अमेरिका यात्रा के समापन पर उन्होंने कहा, 'अमेरिकी जनता के प्रति मेरे अनुराग में वृद्धि हुई है, पर वर्तमान सभ्यता के प्रति मेरे मन में पल रही आशंका भी बड़ी हो गई है।' उसी यात्रा के दौरान उन्होंने एक बार कहा था - 'मैं फोर्ड और स्टालिन में कोई फर्क नहीं देखता। दोनों बड़े पैमाने के उत्पाद, बड़े पैमाने की प्रौद्योगिकी और केंद्रीकरण पर विश्वास करते हैं, जिसका मतलब है कि दोनों एक ही सभ्यता के पुजारी हैं।' अपनी आशंका को और पुख्ता ढंग से डॉ. लोहिया ने कहा, 'हमें यह बात समझ लेनी चाहिए कि यह सभ्यता मर चुकी है, किंतु लाश के रूप में अगले 50 वर्षों तक बनी रह सकती है और युद्धादि की क्रूर घटनाओं को जन्म दे सकती है।'

औद्योगिक क्रांति से उपजी हुई इस सभ्यता के बारे में जो संशय डॉ. लोहिया के भीतर पनपे थे, उन संशयों को वर्तमान में मूर्त रूप में देखा जा सकता है। बताने की जरूरत नहीं कि यूरोपीय और अमेरिकी समाज इन दिनों प्रयोजनहीनता का दंश झेल रहा है। वहां के दो-तीन दशकों के साहित्य प्रयोजनहीनता और उद्देश्यहीनता को अभिव्यक्त कर रहे हैं। वहां 'विचारों के अंत' और 'इतिहास के अंत' की बातें मुखर हो रही हैं। फ्रांस के लेखक जूनियन ग्रीन का कहना है कि 'पेरिस बुझ रहा है और इसकी सारी रोशनियां मद्धिम पड़ गयी हैं।' साहित्य अकादेमी की संगोष्ठी में भाग लेने के लिए भारत आयी वहां की युवा लेखिका लोरांस कोसे ने एक लेख में कहा था, 'आज फ्रांस के साहित्य में विचारों के अंत की अभिव्यक्ति, विचार मात्र के प्रति तिरस्कार, उद्देश्यों के प्रति संदेह, अप्रतिबद्धता और अपने भीतर सिमटने की प्रवृति के रूप में दिखाई पड़ रही है। अब न तो गुस्से से भरे लेखक हैं, न न्याय के लिए लड़ने वाले लेखक और न ही मातृ भाव बढ़ानेवाले लेखक हैं। यहां तक कि उनमें लिखने का उत्साह नहीं है।' यह हाल सिर्फ फ्रांस का नहीं है, पश्चिमी सभ्यता के लगभग सभी देशों का है। वहां के सारे दर्शन और तमाम विचार फीके पड़ते जा रहे हैं। यही वजह है कि बुद्धजीवियों की निगाह में इतिहास का अंत होता जा रहा है। इतिहास का ऐसा अंत तो दुखद है ही, लेकिन गौरतलब बात यह है कि इसकी वजहें वही हैं, जो डॉ. लोहिया ने काफी पहले बतायी थीं।

लोहिया नास्तिक थे और गांधी पूर्णतः आस्तिक। गांधी की ईश्वरीय आस्तिकता ऐसी गहरी थी कि मृत्यु के क्षणों में भी उनके आराध्य का नाम उनकी जुबान पर था। किंतु लोहिया ऐसी किसी भी ईश्वरीय शक्ति के प्रति पूरी तरह नास्तिक थे। लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि वे आस्थावान नहीं थे। उनकी आस्था उन्हें गहरे जोड़ती थी - मनुष्यों से, इनसानियत से। उनकी यह आस्था इतनी गहरी थी कि सान्निपातिक क्षणों में भी वे जब-तब भूखे-लाचारों के बारे में बड़बड़ा उठते थे। उनकी आस्था थी - समाज और सुदृढ़ समाज के तेवरों में। और उनकी यह आस्था नारी के समक्ष जाकर श्रद्धा का रूप ले लेती थी। प्रसाद की भाषा में कहा जाये तो 'नारी तुम केवल श्रद्धा हो।' उन्होंने समाज में नारी के समान अधिकार के लिए, उनके अधिकारों की रक्षा के लिए जो तेवर अपनाया, वह निस्संदेह परंपराभंजक ही था। उनका मानना था कि सीता-सावित्री नहीं, बल्कि द्रौपदी इस देश की प्रतिनिधि नारी है। उनकी कामना थी कि द्रौपदी की तेजस्विता इनमें पुनः स्थापित हो और रजिया की तरह वे पुनः सत्ता की केंद्र बनें।

डॉ. लोहिया एक बार अपने सहयोगी लाडली मोहन निगम के साथ लक्ष्मीबाई के किले की खूबसूरती देखने गये थे। वहां वे रानी लक्ष्मीबाई की घोड़े पर सवार प्रतिमा को अपलक देखते रहे। उसके नीचे खुदे पत्थर पर जब उनकी निगाह पड़ी तो उन्होंने देखा कि वहा लिखा था, 'नारी जाति की गौरव महारानी लक्ष्मीबाई।' इसे पढ़कर लोहिया आग-बबूला हो उठे। कहने लगे, 'इस देश के राजा इतने राक्षसी रहे हैं, यह मैं कभी कल्पना नहीं कर सकता। यहां नारियों को सम्मान कभी नहीं मिल सकता; यह वाक्य लिखने वाला शासक वही होगा, जो समता और बराबरी की बात करता है, लेकिन वह कभी समता और बराबरी दे नहीं सकता है। क्या झांसी की रानी नारियों की ही प्रतिनिधि थीं? क्योंकि जानता हूं कि देश अगर झांसी की रानी को देश का गौरव समझना चाहता, तो पुरुषोचित अहं को ठेस पहुंचती।' थोड़े समय के विराम के बाद उन्होंने फिर कहा, 'मैं इस बात को पूरे देश भर में कहूंगा। और अगर इस गलती को नहीं सुधारा गया, तो मैं इस पत्थर को तोड़ दूंगा'

समाज में महिलाओं की तात्कालीन स्थिति उन्हें सालती थी। वे चाहते थे कि समाज पर पुरुष का जो वर्चस्व कायम है वह टूटे। यहां महिला और पुरुष की समान भागीदारी हो।
दरअसल डॉ. लोहिया हर तरह की गैरबराबरी के खिलाफ थे और उनकी 'सप्त क्रांति' में भी पूरी दुनिया में जारी नस्ल, वर्ण, भाषा, क्षेत्र, लिंग, अर्थ और धर्म पर आधारित भेदभाव मिटाने पर जोर दिया गया है। क्योंकि इनके रहते मानव समाज कभी भी एक आदर्श समाज नहीं बन सकता। लोहिया ने यह सब सिर्फ कहा या लिखा ही नहीं, बल्कि इनके विरुद्ध संघर्ष खड़ा करने का निरंतर प्रयास भी करते रहे। चूंकि यह संघर्ष आज भी न सिर्फ अधूरा है, बल्कि आज की दुनिया शायद इन भेदभावों के चलते और भी तनावग्रस्त व समस्याग्रस्त नजर आ रही है, इसलिए लोहिया की प्रासंगिकता आज और बढ़ गयी है।

Thursday, March 12, 2009

मुकम्मल तस्वीर की तलाश में तेंदुलकर

लेखक नरेंद्र पाल सिंह का आत्मकथ्य :

जानने वाले मुझे एनपी के नाम से पुकारते हैं। पत्रकारिता में कदम जमाए दो दशक से ज्यादा हो चुके हैं। करियर का आगाज बतौर खेल पत्रकार किया लेकिन फिर टेलीविजन पत्रकारिता में कई साल गुजारने के बाद अब क्रिकगुरुऑनलाइन डॉट कॉम में बतौर सलाहकार संपादक काम कर रहा हूं। करियर यात्रा के दौरान अमर उजाला, आजतक, एनडीटीवी और सहारा समय जैसे संस्थानों में बड़ी भूमिकाओं में काम किया। वैसे, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कई साल गुजारने के बावजूद खेल मेरे लिए जुनून ही है। उसमें मुझे ज़िंदगी का अक्स दिखता है। दरअसल, सीएलआर जेम्स की इस बात पर मुझे पूरा भरोसा है कि खेल शून्यता में नहीं खेला जाता है, यह समाज का आईना बन हमारे सामने आता है। यही वजह है कि अपने लेखन मैं समाज के हर हद को छूना चाहता हूं। इसलिए, मेरे लिए खेल ज़िंदगी है...

चिन तेंदुलकर क्राइस्टचर्च के एएमआई स्टेडियम के बीचों बीच सजी 22 गज की स्टेज पर अपने रंग बिखेर कब के लौट चुके हैं। धोनी की टीम इंडिया का कारवां क्राइस्टचर्च से उड़ान भरता हुआ अब हेमिल्टन पहुंच गया है। लेकिन,क्रिकेट चाहने वालों के जेहन में सचिन रमेश तेंदुलकर के बल्ले से निकली शतकीय पारी अभी भी जारी है। दर्द से कराहते तेंदुलकर क्रीज पर एक नयी गेंद का सामना करने के लिए फिर स्टांस ले रहे हैं। उनके बल्ले से बहते स्ट्रोक एक स्लाइड शो की तरह निगाहों के सामने से गुजर रहे हैं। एक बार नहीं बार बार।

इसकी वजह ये नहीं है कि न्यूजीलैंड में पहला वनडे शतक बनाते तेंदुलकर की इस 163 रनों की नाबाद पारी ने भारत को एक और आसान जीत दिलायी। इसलिए भी नहीं कि ये तेंदुलकर को वनडे में अपने ही 186 रनों के शिखर से आगे ले जाने की दहलीज पर ले आयी। इसलिए भी नहीं कि इस पारी ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में तेंदुलकर के बल्ले से शतकों के शतक के ख्वाब को हकीकत में बदलने की उम्मीद जगा दी है।

दरअसल, ये पारी आंकडों और रनों के मायावी खेल से कहीं बहुत आगे जाकर क्रिकेट की स्टेज पर तेंदुलकर होने के अक्स तलाशती एक और बेजोड़ पारी है। इस पारी में क्रीज पर मौजूद एक बल्लेबाज नहीं है। ये अपनी साधना में लीन एक कलाकार है। सिर्फ इस फर्क के साथ कि उसके हाथ में ब्रश की जगह बल्ला थमा दिया गया है। कैनवास की जगह क्रिकेट के मैदान ने ली है। अपने खेल में डूबकर उसका भरपूर आनंद लेते हुए तेंदुलकर नाम का ये जीनियस इस कैनवास पर एक और तस्वीर बनाने में जुटा है। ये रनों, रिकॉर्ड और लक्ष्य से पार ले जाती तस्वीर है।

क्रिकेट की पूरी दुनिया वैसे उसकी रची हर पेंटिग को सराहती है। लेकिन, हर दूसरे कलाकार की तरह सचिन को भी शायद अपनी एक मुकम्मल तस्वीर की तलाश है। बीस साल से लगातार अंतरराष्ट्रीय मंच पर वो अपने स्ट्रोक्स को रन में, रनों को शतक में और शतकों को नए शिखर में तब्दील कर रहे हैं। लेकिन, उनकी इस मुकम्मल तस्वीर की खोज खत्म नहीं हुई है। वो लगातार जारी है।

इसलिए,बीस साल लगातार क्रिकेट खेलने के बावजूद वो आज भी गेंद की रफ्तार, उसकी दिशा और लंबाई को गेंदबाज के हाथ से छूटने के साथ ही पढ़ लेते हैं। कदमों के मूवमेंट की हर बारीकी को तय करते हैं। क्रीज को बॉक्सिंग रिंग में तब्दील कर एक चैंपियन मुक्केबाज की तरह सधे हुए फुटवर्क के साथ स्ट्रोक्स के लिए सही पोजिशन ले लेते हैं। अपने बेहद सीधे बल्ले के मुंह को आखिरी क्षण में खोलते हैं। गेंद कभी लाजवाब कारपेट ड्राइव की शक्ल में तो कभी हवा में सीधे सीमा रेखा की ओर रुख करती है। क्राइस्टचर्च में इसी तरह उनके बल्ले से निकले 16 चौकों और पांच आसमानी छक्कों के बीच यह अहसास बराबर मजबूत होता रहा कि इस कलाकार के अवचेतन में गहरे कहीं कोई मुकम्मल तस्वीर दर्ज है। वो अपने स्टोक्स के सहारे इसे उकेरने में जुटा है। लेकिन, तस्वीर अभी भी पूरी नहीं हो पायी है। ये उसकी अपनी खड़ी की गई चुनौती है। उसे इससे पार जाना है। लेकिन, इतिहास का सच तो यही है कि कलाकार कभी अपनी मुकम्मल तस्वीर तक पहुंच ही नहीं पाता। वो केवल उसे रचने में जुटा रहता है। बस, इसे रचने के लिए वो सही मौके और सही क्षण का इंतजार करता है। ये मौका और ये लम्हा आते ही उसकी साधना शुरु हो जाती है। क्राइस्टचर्च में भी तेंदुलकर उसी मौके और लम्हे में पहुंच गए थे, जहां से उनकी अधूरी तलाश आगे बढ़ रही थी। इसीलिए ये पारी हमारे ही जेहन में जारी नहीं है। वो भी उस पारी को अभी जी रहे हैं। मुकाबले के बाद अपनी पारी का जिक्र करते तेंदुलकर के बयान पर गौर कीजिए। यहां वो क्रिकेट की बात करते हैं। विकेट की भी और माहौल की भी। लेकिन, यही जोर देकर कहते हैं कि यहां आपको इस मैदान के आकार के मुताबिक अपनी बल्लेबाजी और स्ट्रोक्स को ढालना था। तेंदुलकर ने खुद को बखूबी ढाला भी। अपनी पहचान बन चुके स्ट्रेट ड्राइव को कुछ देर के लिए भुलाते हुए उन्होंने बैटिंग क्रीज के समानांतर दोनों ओर रन बरसाए। एक नहीं,दो नहीं 129 रन। अपनी क्रिकेट को लेकर तेंदुलकर की यही सोच उन्हें क्रिकेट के रोजमर्रा के गणित से बाहर ले जाता है। ये तेंदुलकर को क्रिकेट के दायरे से पार ला खड़ा करती है।

शायद सोच का यही धरातल है कि इसी मैच में युवराज की क्लीन स्ट्राइकिंग पावर, धोनी के ताकत भरे स्ट्रोक्स और रैना की बेहतरीन टाइमिंग से भी रनों की बरसात होती है। लेकिन, सचिन के जीनियस के सामने ये कोशिशें हाशिए पर छूट जाती हैं। इतना ही नहीं, इस नयी टीम इंडिया के ये नाम, उम्र और अनुभव में ही पीछे नहीं छूटते। अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद तेंदुलकर की इस ऊंचाई के सामने बौने दिखने लगते हैं।

तेंदुलकर आज भी टीम की रणनीति में अपनी भूमिका तय कर उसे मंजिल तक पहुंचाते हैं। कभी दूसरे छोर पर सहवाग के साथी के तौर पर तो कभी सहवाग के जल्द आउट होने पर आक्रमण की बागडोर हाथ में लेते हुए। कभी एक छोर को संभाल अपने नौजवान साथियों को क्रिकेट के गुर के साथ साथ जरुरी हौसला थमाते हुए। वो धोनी की इस टीम इंडिया के एक सदस्य हैं। उनकी विनिंग कॉम्बिनेशन की एक मजबूत कड़ी। लेकिन, इसके बावजूद वो टीम में सबसे अलग पायदान पर हैं। सचिन इस टीम के एक सदस्य, एक खिलाड़ी भर नहीं है। सचिन एक युग में तब्दील हो चुके हैं। धोनी की इस विश्व विजयी टीम में वो एक एवरेस्ट की मानिंद खड़े हैं, जिसके इर्द गिर्द बाकी खिलाड़ी पठार की तरह दिखायी देते हैं।

फिर, युग में तब्दील हो चुके तेंदुलकर आज की घटना नहीं हैं। सर डोनाल्ड ब्रैडमैन ने 90 के दशक में अपनी ड्रीम टीम में सचिन को जगह देते हुए उन्हें एक जीनियस से एक युग में बदल डाला था। तेंदुलकर एक ऐसी टीम में शुमार किए गए, जो समय, काल और देश की हदों से बाहर खड़ी थी। शायद, एक ड्रीम टीम में ही कई युगों को एक साथ समेटा जा सकता है। दिलचस्प है कि 80 के दशक में डेनिस लिली के बाद बीते 25 सालों में तेंदुलकर की अकेले खिलाड़ी हैं, जिन्हें इस टीम में जगह मिल पायी। जॉर्ज हैडली से लेकर एवरटन वीक्स तक विव रिचर्ड्स लेकर ब्रायन लारा तक विक्टर ट्रपर से लेकर वॉली हेमंड तक, नील हार्वे से लेकर ग्रैग चैपल तक, डेनिस कॉम्टन से लेकर ग्रीम पॉलक तक-तेंदुलकर सब को पीछे छोड़ते हुए टीम में दाखिल हुए। लेकिन, ये फैसला करते वक्त ब्रैडमैन किसी दुविधा में नही थे। उनका कहना था-ये सभी बल्लेबाज अपने प्रदर्शन में किसी बल्लेबाज से कम नहीं हैं। न आंकडों में कहीं उन्नीस ठहरते हैं। सभी खेल के महान नायक हैं। लेकिन, तेंदुलकर अलग हैं। उनके पास किले की तरह मजबूत डिफेंस हैं। साथ ही जरुरत के मुताबिक रक्षण को आक्रमण में बदलने की महारथ। और इससे भी आगे उनकी कंसिस्टेंसी। तेंदुलकर में अपनी झलक देखते ब्रैडमेन का कहना था कि उनकी बल्लेबाजी परिपूर्ण है।

बेशक, ब्रैडमैन की निगाहों में तेंदुलकर एक दशक पहले ही एक परिपूर्ण बल्लेबाज बन गए थे। लेकिन शायद तेंदुलकर को अभी भी परिपूर्णता की तलाश है। अपनी मुकम्मल तस्वीर की तलाश है। अपनी इस कोशिश के बीच वो सिर्फ एक बल्लेबाज और क्रिकेटर नहीं रह जाते। तेंदुलकर एक सोच की शक्ल ले लेते हैं। एक नजरिए में तब्दील हो जाते हैं। ये संदेश देते हुए कि क्रिकेट की किताब अब तेंदुलकर की नजर से भी लिखी जाएगी। ठीक उसी तरह जैसे सर डॉन ब्रैडमैन ने क्रिकेट को परिभाषित किया। शायद यही सचिन रमेश तेंदुलकर होने के मतलब है।

Wednesday, February 25, 2009

सोच समझ कर लिखें ब्लॉग में

जो लोग ब्लॉग को निजी डायरी मान बैठे हैं और इस नाते जो मन में आए यहां बुकड़ देते हैं; उन्हें दैनिक हिंदुस्तान में आज छपी यह खबर जरूर पढ़नी चाहिए। नई दिल्ली के विशेष संवाददाता के हवाले से यह खबर छापी गयी है। दैनिक हिंदुस्तान की इस खबर को साभार जिरह पर अपने ब्लॉगर साथियों के लिए पेश कर रहा हूं।

-अनुराग अन्वेषी


ब्लॉ
ग पर मनमर्जी की बकवास लिखने, भड़ास, कुंठाएं प्रकट करने और अपुष्ट आरोप लगाने वाले सावधान। यह मानहानि का अपराध हो सकता है जिसके लिए तीन साल की सजा तथा दो लाख रुपये का जुर्माना हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में ब्लॉग पर राजनीतिक पार्टी के खिलाफ अभियान चलाने वाले युवक को राहत देने से इनकार कर उसके खिलाफ दायर मानहानि की एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस केजी बालाकृष्णन और पी सथाशिवम की खंडपीठ ने करल के यवक की रिट याचिका खारिज करते हुए कहा कि इस बारे में कानून अपना काम करेगा। कोर्ट ने यह तर्क ठुकरा दिया कि ब्लॉग पर लिखे गये शब्द ब्लॉगर्स समुदाय के लिए ही थे, सार्वजिनक नहीं। इस संबंध में साइबर कानून के विशेषज्ञ पवन दुग्गल कहते हैं कि ब्लॉग लिखने वालों को अपनी सीमा में रहना चाहिए। ब्लॉग एक सार्वजनिक स्थल है जिस पर लिखी गई हर बात सार्वजनिक होती है। आईटी एक्ट में इसके दुरुपयोग पर रोक है। इस कानून में ब्लॉगर को 'इंटरमीडियरी सर्विस सोर्स' की श्रेणी में रका गया है जो साइट पर लिखी हर बात के लिए नेटवर्क सर्विस प्रोवाइडर की तरह जिम्मेदार होता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर आप किसी की मानहानि नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि ब्लॉग सार्वजनिक स्थल है इसलिए इसमें कही गई कोई भी बात आपराधिक और सिविल मानहानि का कारण बन सकती है। आपराधिक मामले में मानहानिकर्ता को तीन साल की सजा तथा दो लाख रुपये जुर्माना हो सकता है। युवक ने सीधे सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर की थी और कहा कि उसके खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द की जाए क्योंकि ब्लॉग पर पोस्ट किए गए कमेंट ब्लॉगर्स समुदाय के लिए थे, सार्वजनिक नहीं।

Wednesday, February 18, 2009

चलो, व्यूह रचें

मां की कविता प्रतीक्षा पढ़ते हुए ये बातें 26 दिसंबर 95 की रात लिखी थीं। प्रतीक्षा यहां पढ़ी जा सकती है।

निःशब्द
होकर बिखर जाना,
किसी ताजा खबर की आस में
सचमुच
बहुत बड़ी भ्रांति है
सच है
कि सपने प्यारे होते हैं
लेकिन
वासंती बयार के साथ
उन्हें उड़ा देना
ठीक वैसा ही है
कि हम विरोध करें
और हमारी तनी मुट्ठियां
हवा में आघात करें
इसलिए चलो
बाहर की उमस को बढ़ने से रोकें
और
फिर से
युद्ध के लिए एक व्यूह रचें।

Saturday, February 14, 2009

मां

मां की कविता 'गूलर के फूल' पढ़ते हुए 6 फरवरी 95 की रात 2 बजे मेरी प्रतिक्रिया यह थी। 'गूलर के फूल' 'चांदनी आग है' (मां की कविताओं का संग्रह) में शामिल है। कविता यहां पढ़ी जा सकती है।


गूलर के फूल
की तलाश में
तुम
बि-ख-र-ती गयी
और बुनती रही
हमारे लिए
बरगद-सी छांव

Wednesday, January 21, 2009

आग-राग

मां की कविता 'साक्षी' पढ़ते हुए 9 फरवरी 95 की रात यह कविता लिखी थी। 'साक्षी' चांदनी आग है संकलन में शामिल है। वह कविता यहां पढ़ी जा सकती है।

-अनुराग अन्वेषी





आग मेरे भीतर है।
राख मैं भी हुआ हूं।
पर आग,
किसी समझौते का नाम नहीं मित्र।
बल्कि आग होना नियति हो गयी।

जब सभी संभावनाएं
शेष हो जाएं,
तो आग साक्षी होती है,
हमारे उबलने की।
और हम लिख देते हैं,
उम्र की चट्टान पर
कई अक्षर।
इस उम्मीद में,
कि शायद कभी,
फिर कहीं पैदा हो
आग।