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Friday, May 16, 2008

दहलाने वाली दृष्टि

आज चोखरे बाली पर सुरेश जी का 'दहल' जाना पढ़ा और दूसरों को 'दहलाने की उनकी कोशिश' भी देखी। सुरेश जी कितने संवेदनशील हैं इस बात का पता इससे ही चल जाता है कि उन्होंने इतनी भयंकर वारदात को महज 'घटना' माना है। आपने लिखा है 'यह नारी अशिक्षित नहीं है. उसने अंग्रेजी में एम् ऐ किया है. ' सुरेश जी, शिक्षित होने का संबंध जो लोग डिग्रियों से तौलते हैं, मुझे उनके शिक्षित होने पर संदेह होने लगता है। आपको ढेर सारे ऐसे लोगों के उदाहरण अपने समाज में मिल जाएंगे, जिन्होंने स्कूल-कॉलेज का चेहरा तक नहीं देखा, पर उनकी शालीनता और उनके संस्कार के सामने डिग्रीधारी भी बौने नजर आने लगते हैं।

आपने लिखा 'उसके पिता ने अपनी इस एकलौती बेटी को बेटों जैसा प्यार दिया. शिक्षा पूरी होने पर उसे एक स्कूल में अध्यापिका की जॉब दिला दी.'


दो-तीन बातें इन दो वाक्यों पर। पहली बात तो यह कि उस पिता ने सिर्फ प्यार दिया। यह आकलन आपका है क्या कि बेटों जैसा प्यार दिया? जो परिवार अपनी बेटी को एमए तक की पढ़ाई करने का अवसर दे, वह दकियानूसी नहीं हो सकता। दकियानूस दृष्टि यह है कि हम उसे कहें कि उसे बेटों जैसा प्यार दिया। खतरनाक बात यह कि अध्यापक पिता ने अपनी बेटी को पढ़ा तो दिया पर उसके भीतर समझ पैदा नहीं कर सका, संस्कार पैदा नहीं कर सका। और तो और आपके मुताबिक 'शिक्षा पूरी होने पर उसे एक स्कूल में अध्यापिका की जाब दिला दी।' गौर करें सुरेश जी, वह लड़की इतनी भी शिक्षित नहीं थी कि एक छोटी-सी जॉब पा सके। आपके मुताबिक, उसके टीचर पिता ने उसे जॉब दिलाई थी। एक दुखद बात और कि जो टीचर अपने घर के बच्चे को सही और गलत के अंतर को समझ पाने की दृष्टि नहीं दे सका, वह समाज को क्या सिखलाएगा? और आखिर में एक कुतर्क, अगर बाप ने बेटी को बेटों जैसा प्यार दिया, तो बेटी ने भी उस प्यार का सम्मान करते हुए बेटों जैसा काम किया। बहरहाल, अपराध न बेटा (पुरुष) करता है, न बेटी (स्त्री)। यह आपको भी समझना चाहिए।


आपने लिखा 'मैंने भी जब इस के बारे में सुना... '। पर आपने हमें जो सुनाया, वह तो लाइव कमेंट्री की तरह है। लगा ऐसा कि हत्याएं हो रही हैं और आप वहां खड़े होकर बारीक तरीके से वारदात के हर स्टेप को अपनी डायरी में दर्ज कर रहे हों। दरअसल, आपने इस वारदात को अपनी ओर से रोचक बनाने की अथक कोशिश की है। हां सुरेश जी, अपराध की प्रकृति ही ऐसी होती है कि वह रोचक नहीं हो सकता, वह घृणित ही रहेगा। उसे रोचक अंदाज में पेश करने की कोशिश उससे भी ज्यादा घृणित। ऐसी किसी वारदात को स्त्री-पुरुष से जोड़कर देखने वाली दृष्टि इस समाज के लिए कितनी खतरनाक है, इस पर अगर आप विचार कर सकें (मुझे संदेह है) तो करें। और फिर बताएं कि यह अपराध किसी स्त्री ने किया या किसी पुरुष ने?

Thursday, May 15, 2008

विकास का भेंग

मैं रहता हूं गाजियाबाद के वसुंधरा (यूपी) में। नौकरी करता हूं दिल्ली के एक अखबार में। मेरे बड़े भाई का घर भी वसुंधरा की इसी जनसत्ता सोसाइटी में है। वह नौकरी करते हैं एक न्यूज चैनल में। मेरी छोटी बहन धनबाद (झारखंड) के एक कॉलेज में हिंदी की लेक्चरर है। मां को गुजरे अब 13 साल बीत चुके हैं। पापा रांची (झारखंड की राजधानी) में रहते हैं। अपना मकान है। पांच किरायेदार हैं।

भइया 92 में ही दिल्ली आ गया था। मैं आया हूं महज चार साल पहले। भइया को दिल्ली भेजने के बाद पापा यही कहा करते थे कि वह नौकरी की तलाश में नहीं, भविष्य की तलाश में गया है। मैं इतने वर्ष टिका रहा रांची में तो सिर्फ अपनी जिद पर कि पापा के साथ रहना है। पर आखिरकार मुझे भी दिल्ली का रुख करना पड़ा। मुझे भेजते वक्त पापा की अभिव्यक्ति थी 'जब पराग को भेजा था दिल्ली, तो लगा मेरा दिमाग मुझसे अलग हुआ। रेमी की शादी की, तो लगा कोई मेरा दिल मुझसे अलग कर ले गया। और अब तुम्हें भेज रहा हूं तो जान रहा हूं कि मैं अपाहिज हो जाऊंगा, क्योंकि तुम्ही तो मेरे हाथ-पांव हो।'

यह कहानी सिर्फ मेरे परिवार की कहानी नहीं है। यह इस देश के हर तीसरे-चौथे-पांचवें परिवार की कहानी है। गांव का बेटा बेहतर की तलाश में शहर की ओर भाग रहा है, शहर का बेटा इसी बेहतर की तलाश में महानगर का रुख करता है और महानगर का बेटा भाग रहा है विदेश। यानी हम सब भाग रहे हैं, हांफ रहे हैं, खीज रहे हैं, जूझ रहे हैं। इस जूझने से हासिल हो रहा है थोड़ा ज्यादा पैसा, थोड़ा ज्यादा तनाव और बुरी तरह अपने और अपने परिवार से कटते जाने का संत्रास।

इस देश में हर वह शख्स जो अपने पिता होने का दायित्व निभाता है, अपना पूरा वर्तमान और भविष्य के तमाम सपने झोंक देता है अपने बच्चों पर। इस झोंकने के पीछे कहीं वह सोच भी काम करती है कि यही बच्चे तो हमारे बुढ़ापे का सहारा होंगे। बच्चे भी पिता के सपनों पर खरा उतरने की कोशिश करते हैं। पर बदले हुए वक्त और इस वक्त की जरूरत के मद्देनजर उन्हें भी कई समझौते करने पड़ते हैं। इन समझौतों के बीच बड़ा हुआ बच्चा अपने बच्चों का बाप बन चुका होता है और फिर वह उस बच्चे के लिए अपना वर्तमान और भविष्य झोंकने लगता है। यानी, कुल मिलाकर यह चक्र हर मध्यवर्गीय भारतीय को पीसता रहता है।

सच यह है कि ऐसे हालात पीड़ा पैदा करते हैं। अनामदास ने ठीक कहा है यह पीड़ा अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य को एक साथ जीने का संघर्ष है। जो मुड़कर देखना नहीं चाहते, वह खुश हैं। बच्चों की प्रगति देखकर अलग रह रहा पिता भी खुश होता है। पर यह खुशी उसके अकेलेपन पर भारी पड़ती है।

आखिर, बेहतर की तलाश में हो रहा विस्थापन हम क्यों स्वीकार करते हैं। दरअसल, इंसान की अतृप्ति उसे बेहतर की तलाश में भटकाती है। जैसे ही एक अतृप्ति तृप्त होती है, उसकी जगह फिर कोई नई अतृप्ति आ जाती है। क्योंकि यह इंसान जानता है कि तृप्त जानवर होने से बेहतर है अतृप्त आदमी बन कर रहना। तो अपने को आदमी बनाये रखने के लिए बहुत सहज रूप में वह अपने भीतर नई अतृप्तियां भरता जाता है। ऐसे ही समय में बेहतर की परिभाषा भी बिल्कुल व्यक्तिपरक हो जाती है। कोई अपनी बेहतरी दिल्ली छोड़कर यूपी के किसी कस्बे में बसने में देखता है तो कोई किसी कस्बे को छोड़कर विदेश में बस जाने में। यानी, विस्थापन की वजहें कई सारी हैं। कई बार बिल्कुल ही निजी भी।

इन सब के बीच, विस्थापन की एक बड़ी वजह है विकास की अधकचरी योजना। हो रहे विस्थापन का 60-70 प्रतिशत हिस्सा इसी का नतीजा है। यह वह देश है जहां किसी शहर में मेट्रो की लाइन बिछ रही होती है और कई इलाके साइकल चल सकने लायक सड़क के लिए तरसते रह जाते हैं। कुछ शहरों में आधुनिकतम संसाधन हैं तो कई इलाके बुनियादी साधनों का इंतजार कर रहे हैं। एक तरफ ऋण में डूबे किसान आत्महत्या कर रहे हैं तो दूसरी तरफ करोड़ों टन अनाज गोदाम में सड़ रहा है। यानी, विकास की भेंगी दृष्टि देश के हर हिस्से को नहीं देख पा रही है। विकास का यह भेंग जब तक दूर नहीं होता, लोगों का विस्थापन होता रहेगा। हम पलायन करते रहेंगे सिर्फ अपने इलाके से नहीं बल्कि देश और समाज के प्रति अपने दायित्वों से भी।

Tuesday, May 13, 2008

बता री सजनी


बिन मौसम मुझे याद तेरी क्यों आई
हां री सजनी, अब हो गई तेरी सगाई

न कर नम अपनी ये प्यारी-प्यारी आंखें
हां री सजनी, दुआएं लिए खड़ी है माई

चल उठ, छोड़ अतीत देख अब सिर्फ आगे
हां री सजनी, मत कह अब दुहाई है दुहाई

मत कोस किसी को, नहीं बदलेगा कुछ भी
हां री सजनी, अब न बाप सुनेंगे न भाई

मेरी सांसों की हर आहट, भर रही है घबराहट
बता री सजनी, ये दिल क्यों निकला हरजाई

Wednesday, May 7, 2008

बेटा करे डिनर, पिता खाए 'बन'

आज मेरा 38वां जन्मदिन है। संयोग से मेरे वीकली ऑफ का दिन भी। बच्चों की जिद थी कि डिनर के लिए होटल चलें। उनकी जिद पूरी कर दी। उन्होंने खूब चाव से खाना खाया। यह देखकर मुझे भी संतोष हुआ। पर साथ ही मेरे जेहन में यह बात भी कौंध रही थी कि मेरे पिता आज घर पर बिल्कुल अकेले हैं। चौबीस घंटे घर में रहनेवाली मेड सरहूल का पर्व मनाने गांव गई है। दो-चार दिन में लौटना है। उसकी अनुपस्थिति में पापा ने आज सुबह दूध-चूड़े पर गुजारा किया। दोपहर में कुछ भी नहीं खाया और डिनर के लिए दुकान से बन (एक तरह की पावरोटी) मंगवा ली है। मैं अपने बच्चों के साथ होटल में चिकन और बटरनान खा कर लौटा हूं। और मेरे पिता अपने बच्चों से दूर ब्रेड खाकर काम चला रहे हैं।

यह अयाचित स्थिति क्यों बन जाती है जिंदगी में। आज मनःस्थिति ऐसी नहीं कि इस पर चर्चा कर सकूं। पर किसी पोस्ट में यह चर्चा होनी है कि रोजगार की वजह से हो रहा विस्थापन भी दर्द के नए प्रदेश में हमें ले जाता है।

Saturday, April 26, 2008

प्रथम चुंबन

शिराओं में
खून की गति
कम हो तो ज़रूरी नहीं
कि आदमी उदास, हताश या निराश है।

कई क्षण ऐसे होते हैं
जहां वक़्त रुक जाता है,
शिराओं में खून जम जाता है,
और ज़िंदगी
हसीन लगने लगती है।

तल्ख अनुभवों को
ताक पर रख
अगर वक़्त को महसूसा जाये
तो सचमुच
वक़्त भी धड़कता है
और इस वक़्त की नब्ज
हमारे हाथों में है
जिसकी नक्काशी
न जाने कितने संदर्भों को
जन्म देती है
जहां पल-पल अहसास होता है
कि हम ज़िंदा हैं।

Friday, April 25, 2008

बच्चे कहते हैं

ओ पिता,
तुम बहुत गंदे हो
तुम मेरे साथ नहीं खेलते।
खेलने के लिए कहता हूं
तो डांट कर मुंह फेर लेते हो।


पहले तुम
इतने गुस्सैल तो नहीं थे!
अब अम्मा पर भी
झल्लाने लगे हो!
तुम्हें क्या मालूम
तुम्हारे पीछे
अम्मा कितना रोती हैं!

ओ पिता,
तुम इतना झुक कर
क्यों चलने लगे?
तुम्हारे केश
इतने सफ़ेद और
चेहरा
इतना रूखा क्यों हो गया?

अब तो मैं
तुम्हारे साथ खेलूंगा भी नहीं।
बूढ़ों के साथ बच्चे
कहीं खेलते हैं भला!

Monday, April 21, 2008

उनके इंतजार में

उनके इंतजार में जाने कब से खड़ा हूं उसी मोड़ पर
अब है उन्हें ही रंज, जो गये थे खुद मुझे छोड़ कर

सही वक्त नहीं यह किसी से शिकवा-शिकायत का
देख, मातम मना रहे हैं लोग, अब रिश्ते तोड़ कर

गर तू चाहता है जीतना अब भी, हारी हुई यह जंग
फिर छोड़ दे ये रोना-धोना, अब दुश्मनों से होड़ कर

बहुत मुश्किल नहीं है मेरे भाई, झुकेंगे ये कसाई
तू शुरू तो कर अपनी चाल, सारी शक्ति जोड़ कर

Sunday, April 20, 2008

टेक केअर ऑफ माई आइज़

यह एसएमएस मुझे मेरे बेहद करीबी एक साथी ने भेजा। लघुकथा के कलेवर का यह एसएमएस मनुष्य की मानसिक बुनावट की जटिलताओं की ओर ध्यान खींचता है। इनसान जब ख़ुद को निरीह पाता है, तो वह सबसे घुल-मिल कर रहता है और दूसरों से सहयोग की भी अपेक्षा करता है। उसे अपना दुख सबमें नज़र आता है और सबका दुख ख़ुद में महसूस करता है। पर जैसे ही उसकी स्थिति मजबूत होती है, वह अपनी पुरानी ज़िंदगी भूल जाना चाहता है। निरीह और लाचार तमाम लोग उसे अब बोझ लगने लगते हैं। तो पढ़ें इस एसएमएस को जो मनुष्य के त्याग और स्वार्थ की पराकाष्ठा को दिखला रहा है :

There was a blind boy, who used to
hate every one except his girlfriend.
He always used to say that l'll marry u
if i could see!! Suddenly 1 day someone
donated him eyes n then when he saw
his glfriend, he was astonished to see
that his glfriend was also blind!
His glfriend then asked
"WILL U MARRY ME NOW?
he simply refused....
his glfriend went away saying...
"JUST TAKE CARE OF MY EYES."

Thursday, April 17, 2008

यौन पवित्रता : जड़ता टूटनी चाहिए (अंतिम)

स्त्री पर पुरुष का हक जैसी धारणाएं स्त्री को भयमुक्त होकर खुली हवा में जीने नहीं देतीं। खुली हवा में जीने का मतलब यह कतई नहीं होता कि जब चाहा, जिसके साथ चाहा हमबिस्तर हो लिये। यह तो एक तरह की यौन उच्छृंखलता होगी। खुली हवा में सांस लेने का मतलब सिर्फ़ इतना है कि स्त्री मान ले और समाज स्वीकार ले कि जिस तरह पुरुष निडर और निःसंकोच होकर कहीं भी घूम सकता है, स्त्री भी घूम सकती है। लूट की वारदातें अपनी जगह पर हैं। लूटनेवाला तो कभी भी और कुछ भी लूट सकता है, तो क्या इस डर से स्त्री अपना कार्यक्षेत्र सीमिल कर ले?

बलात्कार एक विकृत मानसिकता है। विभिन्न सर्वेक्षणों के मुताबिक अधिकतर मामलों में पीड़िता के आसपास के लोग ही होते हैं बलात्कारी। स्त्री के संबंध में मर्दों का इतिहास सचमुच बहुत गंदा रहा है और यही समाज स्त्री से अपनी यौन पवित्रता को किसी भी कीमत पर बचाये रखने की अपेक्षा करता है। स्त्री से यौन पवित्रता की यह मांग बहुत अस्वाभाविक है और इसे इज्जत से जोड़ कर देखने की हमारी दृष्टि उतनी ही दकियानूसी भी।

समाज का कोई घिनौना चरित्र किसी स्त्री को जब पूरी बस्ती में नंगा घुमा देता है, तो क्या इस हादसे को पीड़िता की इज्जत से जोड़कर देखने की ज़रूरत है या फिर इसे उस बस्ती के मुर्दा होने से जोड़ कर देखा जाना चाहिए? महिला को नग्न किये जाने से महिला की इज्जत उतर गई या फिर वह पूरी बस्ती ही नंगी हुई? क्या इस वारदात से बस्ती के सारे मर्द नंगे नहीं हुए?

बलात्कार को इज्जत से जोड़कर देखने की एक वजह पीड़िता की 'प्राइवेसी' का भंग होना भी हो सकता है। लेकिन कई दूसरी परिस्थितयों में भी तो लोगों की प्राइवेसी ख़त्म होती है, उस वक़्त उनका नज़रिया क्यों बदल जाता है? जहां तक 'इज्जत' का प्रश्न है, तो वह उम्र भर कमाया गया धन होती है। किसी की भी इज्जत होती है तो किसी एक वजह से नहीं। बल्कि उस स्त्री या पुरुष को लोग उसकी पूरी समग्रता में देखते हैं।

बलात्कार को स्तब्ध कर देने वाला अपराध मानने के पीछ मुख्य चिंता स्त्री के कौमार्य की सुरक्षा की हो सकती है। समाज में यह धारणा बलवती है कि वही स्त्री विवाह योग्य है, जिसका पहले किसी पुरुष से यौन संबंध न हुआ हो। इसके ठीक उलट पुरुष के लिए ऐसी किसी कौमार्य की बाध्यता समाज में नहीं है। कहीं न कहीं स्त्री और उसकी यौन शुचिता के प्रति हमारी यह एकांगी दृष्टि बलात्कार को ख़ास अपराध में तब्दील कर देती है।

विचार करने की एक बात यह भी है कि इस वारदात को कितना ख़ास माना जाये? इस दुष्कृत्य को रोकने के लिए किसी स्त्री से कितनी शारीरिक क्षति स्वीकार करने की अपेक्षा आप करेंगे? क्या सचमुच बलात्कार इतना जघन्य है कि उसके लिए स्त्री को अपनी जान की बाज़ी लगा देनी चाहिए? दुखद यह है कि आज समाज उस स्त्री को अपने सिर-माथे पर बिठा लेगा, जिसने बलात्कारी के मंसूबों को नाकाम कर दिया हो। भले ही इसके लिए उसे अपने हाथ-पांव गवांने पड़े हों। और दूसरी तरफ, किसी के साथ अगर यह वारदात सफल हो गई, तो समाज उस स्त्री को शक की निगाह से देखेगा। समाज का यह नज़रिया कितना सही है? दरअसल यह सारी हाय-तौबा इसीलिए है कि हमारी महान संस्कृति ने स्त्री को असूर्यपश्या के रूप में जड़ दिया है। जड़ता की यह स्थिति टूटनी चाहिए।

Wednesday, April 16, 2008

यौन पवित्रता : जड़ता टूटनी चाहिए (एक)

बलात्कार की वारदात मुंबई की लोकल ट्रेन में हो या मरीन ड्राइव की किसी पुलिस चौकी पर, दिल्ली की सड़कों पर रात में दौड़ती कार में हो या फिर किसी छोटे से शहर के किसी हिस्से में; वह जब भी सुर्खियों में आती है, सबके भीतर डर छोड़ जाती है। ऐसी खबरों के बाद यह समाज पुलिस की निष्क्रियता पर मर्सिया गाता है और सुरक्षा व्यवस्था को जम कर कोसता है। इसके साथ ही वह ऐसी वारदातों के होने की वजह तलाशता है। अक्सर सन्नाटा, परिचित, रिश्तेदार या फिर बदले की (दुः) भावना वजह बनते हैं। अकेली क्यों गई थी, किसी को साथ क्यों नहीं ले गई... पता नहीं कितने सवाल नाचते रहते हैं, पर कोई सही जवाब नहीं मिल पाता। और आखिरकार हम वहीं के वहीं खड़े रह जाते हैं। अपनी दुनिया में मस्त। दरअसल, ये सवाल और ये चिंताएं महज तात्कालिक हैं, जो उभरते-डूबते रहते हैं। बलात्कार से जुड़ी असल समस्या इससे कहीं ज़्यादा गहरी है।

जनता की सुरक्षा या पुलिस की सक्रियता पर चिंता इस लेख का विषय नहीं। चिंता की बात यह है कि बलात्कार की हर वारदात को हमारा समाज पीड़िता की इज्जत से जोड़ कर क्यों देखता है? दुखद पहलू यह कि पढ़ा-लिखा तबका भी इसे 'इज्जत की लूट' का नाम देता है। यह विचारने की ज़रूरत है कि क्या ऐसी वारदात से पीड़िता की इज्जत वाकई तार-तार हो जाती है? यहां पर यह सवाल सिर उठाने लगता है कि यह 'इज्जत' क्या है? क्या पुरुष और महिलाओं की इज्जत के मापदंड अलग-अलग होते हैं? लूटनेवाला तो वहशी होता है, दरिंदा होता है। अगर वह दरिंदा 'होमो' हुआ तो जाहिर तौर पर उसकी दरिंदगी का शिकार पुरुष होगा। क्या उस स्थिति में भी हम कहेंगे कि फलां पुरुष की इज्जत लूट ली गई? पुरुष वर्चस्व वाला यह समाज कतई ऐसा नहीं कहेगा। बल्कि वह इस दरिंदगी को 'अप्राकृतिक यौनाचार' का नाम देगा।

इस समाज में मर्दों को परंपराओं से यह सीख मिलती रही है कि हर स्त्री पर किसी न किसी मर्द का अधिकार है। यह अलग बात है कि इस मर्द के चेहरे वक़्त के साथ बदलते जाते हैं। यानी शादी से पहले स्त्री पिता के अधिकार क्षेत्र में होती है और शादी के बाद यह सत्ता हस्तांतरित कर दी जाती है स्त्री के पति के नाम। इस सत्ता के मद में चूर भारतीय मर्द बलात्कार को इज्जत से जोड़ कर इसलिए भी देखता है कि उसे लगता है बलात्कार की घटना (वारदात नहीं) उसके अधिकार क्षेत्र में किसी दूसरे पुरुष द्वारा किया गया हमला है। यानी स्त्री की मानसिक पीड़ा को नज़रअंदाज कर मर्द इस वारदात को अपनी प्रतिष्ठा पर किया गया हमला मानता है। उसे इस वारदात से अपनी पराजय का बोध होता है।

ज़्यादा दूर जाने की ज़रूरत नहीं। हाल के वर्षों में हुए सांप्रदायिक दंगों को याद करें। महिलाओं के साथ हुई दुराचार की वारदातें ताज़ा हो जाएंगी। आख़िर दंगाइयों के निशाने पर महिलाएं क्यों आईं? इसीलिए कि दंगाई मर्दों की निगाह में किसी ख़ास कौम को पराजयबोध कराने का सबसे सरल तरीका यही दिखा।


दूसरी तरफ, इस समाज में स्त्री भी अपने आप को किसी और की थाती मानकर बढ़ने देती है। घर में ही उसे शोषण सहने की सीख दी जाती है। उसे स्त्रीयोचित तमाम गुण सिखाये जाते हैं। उसे बताया जाता है कि तेज़ दौड़ना, खिलखिलाकर हंसना या फिर पलटकर सवाल करना स्त्रीयोचित नहीं होता। यानी, हर क़दम पर एक नये स्त्रीयोचित गुण से उसके व्यक्तित्व को निखारा जाता है। इन सारी नसीहतों को घुट्टी की तरह पीकर वह संकोच, दब्बूपन और कायरता के सांचे में ढलती हुई जीती-जागती मूर्ति बनती है। हमारा मर्दवादी समाज अपनी गढ़ी हुई इस मूर्ति पर सीना तानकर कहता है, देखो, उसमें लज्जा है, शील है, सहनशीलता है।

Thursday, April 10, 2008

विरोध की भाषा

विरोध की एक भाषा
मुझे भी आती है
पर सिर उठाने से पहले
मुझे बार-बार समझाती है
और मैं,
जो हाथ में थाम
ज़बान का खंजर
उठ खड़ा हुआ था
अभी-अभी अचानक
मिमियाता हुआ-सा
घुस जाता हूं अपने खोल में
रूह कांप जाती है
और कांप जाता है पंजर
हर तरफ दिखता है
सिर्फ़ उजाड़ और बंजर।

सोचा था,
मेरी आवाज़ पर जुटेंगे लोग
पर देखो
गिद्धों की टोली में
मैं अकेला
और निरीह खड़ा हूं
खड़ा भी कहां
सिर्फ़ पड़ा हूं
सड़ा हूं, सड़ा हूं और सचमुच सड़ा हूं
पर अपनी बात पर
अब भी अड़ा हूं
कि थके-हारे लोग
आज नहीं तो कल
जुटेंगे
हमें तोड़ने की चाह रखनेवाले
ख़ुद टूटेंगे
अपनी इसी आस्था के कारण
उनकी छाती में मैं
कील-सा गड़ा हूं
मुझे समझाने वाली भाषा के लिए
मैं चिकना घड़ा हूं
महसूस करता हूं
कि किसी भी साजिश के ख़िलाफ
वाकई मैं बड़ा हूं
देखो यारो, देखो
एक बार फिर मैं
पूरी ढिठाई के साथ खड़ा हूं।

Monday, April 7, 2008

तेरे साथ का मतलब


जाने ये कैसी अजब रात है
भीतर गहरे दबी कोई बात है

नाकाम हैं तुम्हें भूलने की कोशिशें
कि कोशिशों पर यादों का घात है

तू अपनी धुन में काम किये चला चल
मत सोच कि ज़िंदगी शह या कि मात है

मेरी हिम्मत का राज़ तू भी सुन
मेरी पीठ पर अपना ही हाथ है

वाकई मौत से भी भिड़ता रहूंगा मैं
जिंदगी में जब तलक तेरा साथ है

Tuesday, April 1, 2008

डेथ नोट

मैं जानता हूं

मेरे मर जाने के बाद भी
ऐसा कुछ नहीं होगा
जो मैं चाहता रहा हूं
बरसों से।
मेरी आंखों में दौड़ रहा है
इन दिनों लगातार जो रीतापन
यह हृदय की स्पंदनों में
बरसों से छुपा था
यह अलग बात है
कि तुम सब बेखबर थे।

मेरी मौत
पता नहीं कितनी नयी बातों को
जन्म देगी
दोस्त/दुश्मन के शिनाख्त की
एक बिल्कुल नयी तहजीब
तुम्हें बताएगी।
लेकिन इससे पहले
जरूरी है कि तुम ख़ुद को पहचानो।
यही बात तुमसे नहीं होगी।

दरअसल साथी,
ख़ुद को पहचानने के लिए
ज़रूरी है ख़ुद से जिरह करना
और जब भी करोगे तुम ख़ुद से जिरह
अपने को पाओगे
मेरे क़त्ल की साजिश में शरीक।

साथी,
यह काली रात
और गहराती जा रही है।
सुबह की उम्मीद में
जगा रहना चाहता हूं मैं
पर तुम्हारे भीतर जो डर
गहराया है
उसे दूर करने के लिए
बेहद ज़रूरी है कि मैं मर जाऊं।
शायद मेरा मरना
तुम्हारे भीतर एक नया इनसान गढ़ सके।

साथी,
कल तुम्हारा जन्मदिन है
तुम्हारे इस जन्मदिन पर मैं
अपनी ज़िंदगी
तुम्हें दे देना चाहता हूं।
मेरे अक्षरों से उगेंगे अगर
लाल रंग
उसे सिंदूर की तरह लगा लेना।
बड़ी खूबसूरत लगती हो तुम,
तुम्हारी हंसी, तुम्हारी बोली
तुम्हारा रूठना, तुम्हारा रोना
तुम्हारा गुस्साना, तुम्हारा...
तुम्हारे भीतर जो कुछ भी है
वाकई, सब बहुत प्यारा है
और जब भी
तुम्हारे भीतर देखता हूं
वहां मेरी आकृति भी दिखती है
जो पूरी बेशर्मी के साथ
तुम्हारे भीतर बैठी है
और तुम उसे बेतरह प्यार कर रही हो।
ऐसे में मेरा अस्तित्व नंगा होता है।
और अपनी नंगई से घबराकर
मैं सचमुच मर जाना चाहता हूं।

गर मेरा मर जाना यह साबित कर सके
कि सचमुच मैं ज़िंदा आदमी था
तो मुझे, मर ही जाना चाहिए
मेरी आंखों में तुम तैर रही हो
मेरी रगो में तुम दौड़ रही हो
मेरे विचारों को पापा का प्यार
रौंद रहा है
और मेरी मृत्यु के रास्ते में
मेरा डर खड़ा है
पापा और तुम्हारा रूप लिये हुए।

Monday, March 31, 2008

पाश की निगाह में भगत सिंह





"जिस दिन उसे फांसी लगी उसकी कोठरी से उसी दिन लेनिन की एक किताब बरामद हुई थी जिसका एक पन्ना मोड़ा हुआ था देश की जवानी को उसके आखरी दिन के मोड़े हुए पन्ने से आगे बढ़ना है।"
-पाश

भगत सिंह और पाश की शहादत की तारीख़ एक ही है पर वर्ष अलग। वैसे, पंजाबी कवि पाश अपने जीवनकाल में क्रांतिकारी देशभक्त भगत सिंह को बेहद पसंद करते रहे होंगे, इसमें शक़ नहीं। 23 मार्च 1982 को पाश ने भगत सिंह को कुछ यूं याद किया था :

उसकी शहादत के बाद बाक़ी लोग
किसी दृश्य की तरह बचे
ताज़ा मुंदी पलकें देश में सिमटती जा रही झाकी की
देश सारा बचा रहा बाक़ी
उसके चले जाने के बाद
अपने भीतर खुलती खिड़की में
लोगों की आवाज़ें जम गईं
उसकी शहादत के बाद
देश की सबसे बड़ी पार्टी के लोगों ने
अपने चिहरे से आंसू नहीं, नाक पोंछी
गला साफ़ कर बोलने की
बोलते ही जाने की मशक की
उससे संबंधित अपनी उस शहादत के बाद
लोगों के घरों में, उनके तकियों में छिपे हुए
कपड़े की महक की तरह बिखर गया
शहीद होने की घड़ी में वह अकेला था ईश्वर की तरह
लेकिन ईश्वर की तरह वह निस्तेज न था।

Friday, March 28, 2008

पाश का 'लोहा'

आप लोहे की कार का आनंद लेते हो
मेरे पास लोहे की बंदूक है
मैंने लोहा खाया है
आप लोहे की बात करते हो
लोहा जब पिघलता है
तो भाप नहीं निकलती
जब कुठाली उठाने वालों के दिल से
भाप निकलती है
तो पिघल जाता है
पिघले हुए लोहे को
किसी भी आकार में
ढाला जा सकता है

कुठाली में देश की तकदीर ढली होती है
यह मेरी बंदूक
आपके बैंकों के सेफ;
और पहाड़ों को उल्टाने वाली मशीनें,
सब लोहे के हैं।
शहर से उजाड़ तक हर फ़र्क
बहिन से वेश्या तक हर अहसास
मालिक से मुलाजिम तक हर रिश्ता,
बिल से कानून तक हर सफ़र,
शोषणतंत्र से इंकलाब तक हर इतिहास,
जंगल, कोठरियों व झोपड़ियों से पूछताछ तक हर मुक़ाम
सब लोहे के हैं।

लोहे ने बड़ी देर इंतज़ार किया है
कि लोहे पर निर्भर लोग
लोहे की पंत्तियां खाकर
ख़ुदकुशी करना छोड़ दें
मशीनों में फंसकर फूस की तरह उड़नेवाले
लावारिसों की बीवियां
लोहे की कुर्सियों पर बैठे वारिसों के पास
कपड़े तक भी ख़ुद उतारने के लिए मजबूर न हों।

लेकिन आख़िर लोहे को
पिस्तौलों, बंदूकों और बमों की
शक्ल लेनी पड़ी है
आप लोहे की चमक में चुंधियाकर
अपनी बेटी को बीवी समझ सकते हैं
(लेकिन) मैं लोहे की आंख से
दोस्तों के मुखौटे पहने दुश्मन
भी पहचान सकता हूं
क्योंकि मैंने लोहा खाया है
आप लोहे की बात करते हो।

अनुवाद - चमनलाल

Tuesday, March 25, 2008

पाश को मार कर भी नहीं मार सके आतंकवादी

यह हैं पाश। अवतार सिंह संधू 'पाश'। आज से बीस साल पहले (23 मार्च 1988 को) खालिस्तानी आतंकवादियों ने इनकी हत्या कर दी थी। इस पंजाबी कवि का अपराध (?) यही थी कि यह इस जंगलतंत्र के जाल में फंसी सारी चिड़ियों को लू-शुन की तरह समझाना चाह रहे थे। चिड़ियों को भी इनकी बात समझ आने लगी थी। और वे एकजुट होकर बंदूकवाले हाथों पर हमला करने ही वाली थीं कि किसिम-किसिम के चिड़ियों का हितैषी मारा गया। उस वक्त पाश महज 37 बरस के थे।

वैसे, यह बेहद साफ़ है कि कोई भी किसी की हत्या तभी करता है, जब उसे सामनेवाले से अपने