जिरह पढ़ें, आप अपनी लिपि में (Read JIRAH in your own script)

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जिरह करने की कोई उम्र नहीं होती। पर यह सच है कि जिरह करने से पैदा हुई बातों की उम्र बेहद लंबी होती है। इसलिए इस ब्लॉग पर आपका स्वागत है। आइए,शुरू करें जिरह।
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Wednesday, January 16, 2008

दर्द से दवा तक

जब कंटीली झाड़ियों में
उग आता है
अचानक कोई फूल
मुझे लगने लगता है कि
जिंदगी की यातनाएं
कम हुई हैं

पिता के फटे हुए कुर्ते
और बहन की
अतृप्त इच्छाओं से
आहत मन
जब सुनता है
मंदिर और मसजिद के टूटने की बात
तो बेचैनियां बढ़ जाती हैं

आज की तारीख में
प्रासंगिक नहीं रह गया
कि सोचूं
प्रेमिका के काले घुंघराले केश
कितने सुंदर हैं
और एक दूसरे के बिना
हम कितने अकेले

लेकिन इन सब के बावजूद
जब मेरे लगातार हंसते रहने से
दादी की मोतियाबिंदी आंखों में चमक
बढ़ जाती है
तो मेरा दर्द
खुद-ब-खुद
कम हो जाता है।

2 comments:

prabhat said...

A scholar has said somewhere : Prose- The words in their best order.
Poetry-The best words in their best order.

Liked so much your best words in their best order.

lekin kya kavita ke alava kuch aur bhi milega yaha???

Ek ziddi dhun said...

Achhi kavita hai