जिरह पढ़ें, आप अपनी लिपि में (Read JIRAH in your own script)

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जिरह करने की कोई उम्र नहीं होती। पर यह सच है कि जिरह करने से पैदा हुई बातों की उम्र बेहद लंबी होती है। इसलिए इस ब्लॉग पर आपका स्वागत है। आइए,शुरू करें जिरह।
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Wednesday, January 16, 2008

आशा और आत्मवंचना

ओ बाबू,
जब भी सुनती हूं
तुम्हारी बांसुरी पर
अपना नाम
मदमस्त हो जाती हूं मैं।
यकीन मानो
उस समय मुश्किल नहीं होता
बीच की नदी को
फलांग कर
तुम्हारे पास पहुंचना।

मानती हूं
कि जीने का सलीका
तुमने सिखाया
पर बाबू
इतनी मजबूत नहीं
कि झेल सकूं
इतना मानसिक तनाव
इस कस्बे के लोग
तुम्हें बद मानते हैं
लेकिन तुम जानते हो
तुम्हारे बाहर
मेरी कोई दुनिया नहीं।

बदलते रहेंगे नक्षत्र
बदलेगा मौसम
बदलेंगे लोग
बदलेगा परिवेश
पर मुझे भरोसा है
कि खिलाफ हवाओं के बीच भी
हम साथ रहेंगे
इसीलिए इस बदरंग मौसम में भी
नाचती हूं मैं।

(प्रसारित/प्रकाशित)

1 comment:

juhi said...

There is no relationship in this world bigger and better than that of a child and his mother.
Anurag has chosen beautiful words to describe what each child feels for his mother but probably can't express in similar fashion.
After reading this I felt like running to my mother and spending some quality time with her which I probably have not done in years now.

Very well written Anurag!!!!