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Saturday, February 14, 2009

मां

मां की कविता 'गूलर के फूल' पढ़ते हुए 6 फरवरी 95 की रात 2 बजे मेरी प्रतिक्रिया यह थी। 'गूलर के फूल' 'चांदनी आग है' (मां की कविताओं का संग्रह) में शामिल है। कविता यहां पढ़ी जा सकती है।


गूलर के फूल
की तलाश में
तुम
बि-ख-र-ती गयी
और बुनती रही
हमारे लिए
बरगद-सी छांव

4 प्रतिक्रियाएं:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

माँ बरगद की छांव ही होती है ..आपने अपने भाव बहुत सुंदर व्यक्त किए हैं

रवीन्द्र प्रभात said...

सुंदर और सारगर्भित पंक्तियाँ !

संगीता पुरी said...

बहुत ही सटीक कहा.....

Ek ziddi dhun said...

मुझे ये कविता बेहद अच्छी लग रही है। ये आपके निजी से आगे जाती है।